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आठ कविताएँ

बी. एल माली अशांत
1.
माँ की याद आती है तो मैं
छोटा हो जाता हूँ
और चलने लग जाता हूँ
आँगन पर
घुटनों के बल।
मैं भूल जाता हूँ कि मैं
अब इतना बडा हो गया हूँ!

2.
माँ की याद आती है तो मैं
पाता हूँ अपने आपको
खुड्डी में
माँ के पास बैठा
माँ मुझे रोटी देती है
मैं उसके गोडे के पास बैठा
रोटी खाता हूँ!
मैं भूल जाता हूँ अपने आपको
कि मैं महानगर में बनाए
अपने एक मकान में बैठा हूँ
माँ की याद के साथ
मुझे अपना घर याद आ जाता है।



3.
माँ की याद आती है तो मैं
स्कूल से आकर अपने आपको
माँ के पास खडा पाता हूँ
कहता हूँ- माँ मुझे भूख लगी है
रोटी दो!
मैं भूल जाता हूँ अपने आपको
महानगर में बैठा।

4.
माँ की याद आती है तो मैं
अपने आपको उठता हुआ पाता हूँ ऊपर
बढता हुआ पाता हूँ आगे
मैं देखता हूँ कि
मैं बडा हो गया हूँ
माँ के पास खडा खडा!

5.
माँ की याद आती है तो
माँ मुझे टीका लगाती दिखाई पडती है
मेरी शादी में
फूले नहीं समाती
मैं व्यस्त देखता हूँ माँ को
अपनी आँखों में!

6.
मैं माँ को याद करता हूँ तो
माँ मुझे बहुओं के पास खडी मिलती है
पोते-पोतियों में रमती
उनके साथ हँसती ।

7.
माँ को याद करता हूँ तो माँ मुझे
कहती दिखाई पडती है
घर के लिए सामान लाना है
बहुओं से पूछती दिखाई पडती है
क्या-क्या लाना है
मँगवा लो घर की चीजें-बस्तें..देख!

मैं देखता हूँ, माँ
माँ ने घर को खडा किया है!

8.
माँ घर बुनती है।
माँ घर बनाती है
माँ!
संसार के सब घर
माँ ने बनाए हैं।
मैंने घर नहीं बनाया
महानगर में एक मकान बनाया है
अपने लिए
घर के लिए नहीं!

सम्पर्क : 3/343 मालवीय नगर,
जयपुर-302 017 (राजस्थान)
मो. 9414386649