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आठ कविताएँ

रेवतीरमण शर्मा
1. गुलदाऊदी

1.
गुलदाऊदी के आगे
खडी है एक औरत
जैसे गुलदाऊदी ने
फैला दिया है
अपना आकार और रंग
वहाँ तक

2.
जब धरती के
सारे रंग चुक जाएँ
तब गुलदाऊदी कहती है
आओ मेरे पास आओ।

3.
कोट पर नहीं टांकना है
गुलदाऊदी को
चलना है साथ लेकर
अपनी प्रेमिका की तरह।

4.
तोड कर तुम्हें
भेंट नहीं करूँगा गुलदाऊदी
हो जाएगा मन मेरा खाली।

5.
जब
लगने लगती है
ये दुनिया रंग हीन
तब मैं बैठ जाता हूँ
गुलदाऊदी के पास।

6.
जिसे होना था आसमान में
कई हजार रंगों की आभावाली
लो उतर आई वह
धरा पर ।

2. मुमूर्षु औरत

कितने-कितने
संघर्षों के बाद
उसने अपने को बचाया था
आत्मघात से।

सांईं कब तक बचाता उसे
जब भरोसा न था उस पर
उसका जीवन बन गया था
रात्रि-जीवन
तेज-तेज संगीत की धुन ने
बढा दी थी उसके
हृदय की धडकन
जो भी आये प्रेमासक्त आये
पर वह थी एक बची हुई
मुमूर्षु औरत।

3. मैं जड-जीव

सूखा हुआ पेड
मरा हुआ पेड
चिडियां आ बैठती हैं
उसकी सूखी डालों पर
यही सोच कर
उनके बैठने और
चहचहाने पर शायद
फिर हो जाए हरा।

सूखा पेड जानता है
अब आकर नहीं बैठेगा
तोतों का झुण्ड
नहीं गायेंगी चिडियाँ
समवेत स्वर में कोई गान

खोज ही लेंगे लोग
इस जंगल में उसे
कराता रहेगा द्वार-पार
मरने के बाद भी।
वह चलेगा एक कदम-
लौट आयेगा उतना ही
मेज-कुर्सी पर बैठ कोई विद्वान
लिखेगा अपनी कथा-कहानी प्रेम-पगी,
सुखद या पीडादायी
आएगी आवाज अन्तर्मन से
अच्छा हुआ मैं बच पाया
दग्ध-आग से
मैं बचा हुआ जड-जीव
4. रोमियो का देश

इस देश में
मत ध्यान दीजिये
कि जिंस के दाम
कितने बढ रहे हैं

मत ध्यान दीजिये कि
रेल समय से
दौड रही है या कि नहीं

मत सोचिये
सडक पर हाथ में
लेकर घूम रहे हैं
अपनी डिग्रियाँ युवा

मत सोचिये
कितनी स्त्रियों की
अस्मिता पर
पड रही है डकैतियाँ

मत सोचिये कुछ भी
यह रोमियो का देश है
छत पर अपनी प्रेमिका को
सुना रहा होगा
गाना कोई प्रीतिकर।
5. कचनार

कचनार में
फूल खिल रहे हैं
मेरा मन खिल गया है
कचनार-सा।

6. बाँधे हुए

तुम आगे हो
और पीछे हूँ मैं
बीच में है मोगरे की बेल
एक खुशबू है
जो तुम्हें और मुझे बाँधे हुए है।

7. टूटी छत

बरसात जब होती है
मेरा मन टूटी छत सा
रिसने लगता है
कहीं न कहीं / दुबकी है मेरी प्रिया
नहीं करा सकता मुहैया
मैं उसे एक छत चूती न हो जो

8. पहाड के लोग

पिचके गाल और
चेहरे का रंग फीका पडा है
पीठ और पिण्डलियाँ
जीवित होने का प्रमाण है
पहाड के लोगों का।

वे चढ जाते हैं
कंचन-जंगा, हिमालय
और उससे भी ऊपर
वे छू आते हैं
आसमान की नीलिमा
जहाँ सडकें हैं न सीढियाँ
न तेज कदम चलने के लिए
पगडण्डियाँ
पर वे उतर जाते हैं
पहाड के दूसरी ओर
सूरज के साथ।

सम्पर्क : 49, मधुबन कॉलोनी,
अलवर-301001. मो. ९४६११९२५२९