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तीन कविताएँ

दीनदयाल ओझा
1. भटकान अर्थ और भाषा का

आज
भटकाव
मानव की मनोवृत्तियों के साथ-साथ
अर्थ और भाषा का भी
चल रहा है
और छल रहा है
समस्त प्रकृति को।

बहुत-बहुत
अनर्थकारी होता है
अर्थ और भाषा का भटकाव
बहुत विकटतम करता है
सद्-कर्म और
सद्-जीवन पर घाव।

तुम सीख गये
कोई बात नहीं
यह कदाचार
पर आने वाली संतति को तो
मत सिखाओ
ताकि बचा रह सके
समग्र सृष्टि में
अर्थ और भाषा का सदाचार।


2. पढना और समझना

सीख तो गये हम
लिखन और पढना

भूल गये हम
जीवन घडना और समझना।

आज
मनुष्यों के बीच
किताबें बढ रही हैं
बहुत-बहुत लिखी हुई
पर ज्ञान नहीं बढ रहा है
उस अनुपात में

मुझे मालूम है
तुम अध्यापक, आचार्य, प्राचार्य हो
इसलिए
पढना सिखाने के साथ-साथ
तनिक समझना भी सिखाओ
क्योंकि
पढना; पढना होता है
और समझना; समझना



3. नाले और नदियाँ

नाले गंदी कर रहे हैं
नदियाँ
और नदियाँ गंदा कर रही हैं
सागर।
सागर गंदा कर रहे हैं
सृष्टि को।

गंदा करने का
यह क्रम
और कब तक चालू रहेगा
कोई तो
ज्ञानी-विज्ञानी
सच-सच बताओ
विविध रूपों में विकृत होते
विव्लव को बचाओ
बचाओ ऽऽऽ बचाओ।