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बनारस असंभव जगह है

व्योमेश शुक्ल
एक
ठेठ पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे उदार, नयनाभिराम, आधुनिक, अप्रत्याशित, सुंदर और शक्तिशाली दृश्य क्या हो सकता है? मैं बताऊँ ? आप सुबह-सुबह सडक के रास्ते बनारस से लखनऊ के सफर पर निकलें और बीच में पडने वाले कस्बों और गाँवों से अनगनित लडकियाँ और किशोरियाँ - स्कूल ड्रेस में, पैदल या साइकिलों पर पढने जाती दिखें। यह रोज विशाल से विशालतर होता जाता यथार्थ है, लेकिन मुझ जैसे लोगों पर कभी-कभी - किसी घटना की तरह जाहिर होता है। शिक्षा बीते सत्तर बरसों की सबसे बडी उपलब्धि है; और आगे यही शिक्षा बहुत बडा सामाजिक परिवर्तन करने वाली है।
यकीन मानिये, ये लडकियाँ हमारे भविष्य की मुख्यधारा हैं।

इतना सुरक्षित जीवन कि आज तक एक रेलगाडी तक नहीं छूटी। सब कुछ पहले से तय। ऐसे जीवन की जय करूँ या इसे लानत भेजूँ ? कमतर किस्म के संशय, कमतर चुनौतियाँ, कमतर पराक्रम और कमतर सुंदरता।
मैं धन्य हूँ; मुझे धिक्कार है।
दो
विचित्र है। सुबह शुरूआत की इच्छा नहीं होती और रात में खत्म करने का मन नहीं होता। मन करता है बैठें रहें, बातचीत करते रहें और न बैठने का मौका मिलता है, न बतियाने का। फिर जब मौका मिलेगा तो इसमें भी मन नहीं लगेगा। पहुँचते-पहुँचते पहुँचने की खुशी खत्म हो चुकी होती है; फिर कहीं और जाना पडता है। लौटने में कोई रोमांच बचा नहीं - लोग पहले ही फोन करके जान लेंगे, कहाँ तक लौटे।
तीन
सरलीकरण के खिलाफ रघुवीर सहाय की एक बारीक बात मुझे बार-बार याद आती है। उन्होंने कहा था कि मान लीजिये आप कह रहे हैं कि सबलोग बेईमान हैं; लेकिन उनमें से अगर एक भी ईमानदार है तो आप उसके साथ अन्याय कर रहे हैं।
चार
सबसे शानदार लोग भी घूस देकर, बेवकूफ बनाकर या झाँसा देकर काम निकालना सीख रहे हैं, क्योंकि एक बात सबको पता चल गयी है कि दुनिया का कोई भी घी सीधी उँगली से निकल नहीं सकता। प्रतिभा के लिए यह खेद की बात है। प्रतिभाशाली के पास कोई आश्वासन नहीं है, तो वह अपना दरवाजा छोडकर परिऋमा कर रहा है। अपने पर यकीन करना मुश्किल होता जा रहा है और इस बात ने रचनाकार की आयु बहुत क्षीण बना दी है। वह मर रहा है।
ऐसे में, जब कोई अपनी लौ लगाये हुए दिख जाता है तो मन उसके काम के आगे, उसके मिजाज के आगे बिछ जाता है।
पाँच
मंगलेश डबराल की किताब लेखक की रोटी हिंदी आलोचना की हैण्डबुक है। अगर कुछ सुझाव देने का हक हो तो मैं नौजवान आलोचकों से कहूँगा कि ये किताब उनकी टेबुल या उनके झोले में हमेशा होनी चाहिए। याद रखने या उद्धृत करने के लिए नहीं - लेखक की रोटी के अधिकांश निबंध मुझ समेत बहुत से लोगों को याद हैं; ये उसके पार की जरुरत है। हमारी आत्मिक खुराक। शमशेर की कविता और रघुवीर सहाय के कवि-व्यक्तित्व की खासियतों के जक्र यहाँ इतने मौलिक और सम्मोहक हैं कि पाठक को वे स्वयं मंगलेशजी की अच्छाइयों के रूपक की तरह नजर आते हैं। उनकी सराहनाओं के नावीन्य और बडप्पन से अच्छा होना, अच्छा बनना सीखा जा सकता है।

और उनकी कविता - जिसने चुपचाप हिंदी कविता को बनाया, बढाया और बदला है, उसका संकोच अब हमारे लिए एक राजनीतिक मूल्य है। इस संकोच को हिंदी के मौजूदा पर्यावरण में अंततः जिस हद तक माना और समझा गया है, वह समवेत उपलब्धि है और तमाम शोर का प्रतिकार। आज अगर धर्मनिरपेक्षता समकालीन कविता का सबसे बडा मुद्दा है तो इतने डायरेक्ट और तल्ख बिंदु तक कविता को ले आने में गुजरात के मृतक का बयान की केन्द्रीय भूमिका है। वह 2000 के बाद के भारत में कविकर्म का घोषणा पत्र है।

आदमी नशा क्यों करता है ? उसके आशय क्या हो सकते हैं ? प्रसादजी ने कामायनी में इसका जवाब खोजा था।
पुरोडाश के साथ सोम का पान लगे मनु करने,
लगे प्राण के रिक्त अंश को मादकता से भरने।
यानी भीतर जो खला है, उसे मादकता से भरा जाता है।
छह
मानस की अंतिम दो पंक्तियाँ देखिये। बाबा अगर आज की दुनिया में होते तो करेक्टनेस के तंग दायरे उनकी क्या गति करते।
कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर, प्रिय लागहुँ मोहे राम ।।
कामी जैसे नारी को चाहता है और लोभी जैसे पैसे को- तुलसीदास अपने आराध्य को वैसे ही चाहना चाहते हैं।
क्या चाहना है।
सात
उदयन वाजपेयी का मानना है कि कविता में अलग से छंद की अलग से माँग करना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा कोई शब्द नहीं, जो छंद में न हो। भाषा में सबकुछ छंदमय है। वह बोर्खेज का एक वाक्य भी वह उद्धृत करते हैं Each word is born from a verse.
दरअसल, छंद और मीटर में कन्फ्यूज होकर ही कविता से छंद की माँग की जा सकती है।
आठ
मैं बचपन में बडा भोंदू था। मुझे खुद कुछ करना नहीं आता था। एक नाटक में मैं अकाल से त्रस्त ग्रामवासी बना और स्टेज पर मोजे पहन कर चला गया। यह बहुत बडी गलती थी, लेकिन किसी ने इस पर ध्यान ही न दिया। मैं अपनी अध्यापिका की डांट खाने से बच गया। मैंने पाया कि जंदगी और नाटक एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जिसमें कभी-कभी तो सबका ध्यान आपकी ओर होता है और कभी कोई भी आपको नहीं देख रहा होता।

नाटक हमें सचाई की विचित्र ताकत को समझना सिखाता है। सचाई बहुत सादा और चुप रहने वाली चीज है। रोजमर्रा का जीवन इतनी सारी बातों और चीजों से भरा हुआ होता है कि हमलोग उसमें अलग से सच को पहचान नहीं पाते। सच प्याज के छिलकों की तरह तहदार होता है। एक परत हटेगी तो दूसरी परत सामने आ जायेगी। फिर तीसरी, चौथी और यह सिलसिला आगे बढता जायेगा। सच को महसूस करने के लिये हमें कलाओं की ओर जाना पडता है। नाटक हमें उँगली पकडकर सच के करीब ले आता है। नाटक देखकर या नाटक खेलकर आप अपने शरीर, अपने दिल और दिमाग पर सच का अनुभव कर सकते हैं। वह आफ अभ्यास और आपकी आदत में शामिल हो जाता है। गाँधीजी के साथ यही हुआ था। उन्होने सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की जिंदगी पर तैयार एक नाटक देखा और उससे इतने प्रभावित हुए कि कभी झूठ न बोलने की कसम खा ली। नाटक के जरिये जिस सचाई से उनका परिचय हुआ, उसने उनके जीवन में इतनी बडी भूमिका अदा की, जिसका बयान करना मुश्किल है। उनकी आत्मकथा का नाम ही है - सत्य के साथ मेरे प्रयोग। अगर गाँधीजी ने वह नाटक न देखा होता तो शायद हमारा देश आजाद ही न हुआ होता।

नाटक देखते हुए हमें पहले से पता होता है कि जो कुछ हम देख रहे हैं वह नाटक है। अगर मंच पर एक लडकी अचानक बुढिया हो गयी तो वह सच में बुढिया नहीं हो गयी है। बस उसके बालों पर सफेद रंग लगा दिया गया है और वह झुक-झुककर चल रही है। तब क्या नाटक एक झूठ है और जो लोग नाटक कर रहे हैं वे झूठे हैं ? नहीं। दरअसल उस लडकी के बूढी हो जाने में कोई सच छिपा हुआ है, जो हमें बाद में पता चलेगा। नाटक या कहानी या उपन्यास या सिनेमा - ये सभी इसी तरह झूठ बोलकर सच कहने की कलाएँ हैं।

नाटक में काम करते हुए मैंने अपने नायकों की खोज की। बचपन में मुझे एक लंबी-चौडी संगीतबद्ध रामकथा में सीता के स्वयंवर में जाकर शिवजी का धनुष तोडने में असफल रह जाने वाले एक राजा की भूमिका मिली। फिर क्या था, छुट्टियाँ चल रही थीं, तो मैं पूरे-पूरे दिन रिहर्सल में रहने लगा। मैं नाटक के पार्श्वसंगीत और वानर सेना पर मुग्ध था। कुछ ही दिनों में मुझे दूसरे कलाकारों की पंक्तियाँ और मुद्राएं भी याद हो गयीं। अगर कोई कलाकार नहीं आया या देर से आया तो अभ्यास में मुझे उसकी जगह पर खडे हो जाने का अवसर मिलने लगा। मैं मन ही मन मनाया करता कि हनुमानजी या सुग्रीव या जामवंत देर से आयें। मुझे गदाओं, तीर-धनुषों, मुखौटों, मुकुटों और तलवारों की दुनिया से प्यार हो गया। सपने में अकेला मैं ताडका, खर-दूषण, सुरसा और मेघनाद का मुकाबला गा-बजाकर-नाचकर करने लगा। नाटक ने मुझे यही सिखाया था कि किसी भी तरह की हिंसा के सामने संगीत और कलाएँ ही मनुष्यता का पहला और आखिरी औजार हैं।
नौ
हमें साफ नदी-जल चाहिए। वीरभद्र मिश्र ने कहा था।
वीरभद्र मिश्र अब इस दुनिया में नहीं हैं। बनारस में गंगा के पानी की शुद्धता के लिए उन्होने पचास सालों तक बिना थके अभियान चलाया। वह दिमाग से वैज्ञानिक और दिल से शुद्ध आस्तिक थे। आईआईटी बीएचयू में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर और मशहूर संकटमोचन मंदिर के महंत। उनसे होने वाली बातचीत मैं कहीं न कहीं लिख लेता था।
लाखों-करोडों लोगों के लिए गंगा जी का सर्वोत्तम इस्तेमाल भक्त कवि तुलसीदास की इस पंक्ति की राह पर चलकर संभव हुआ है -
दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह वेद पुराना
हमारी सभ्यता में नदी जल की शुद्धता और उसके उपयोग के मानक यही हैं - दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान।

गंगाजी हमें जीवन के चारों पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करती हैं। बगैर किसी भेदभाव के, वह हमें भक्ति का तत्व देती हैं। लेकिन, अगर शहरों के सीवेज को यों ही नदियों में गिराया जाता रहा तो गंगाजी को जीवन का माध्यम मानने वाले मुझ-जैसे न जाने कितने श्रद्धालुओं का शीघ्र पटाक्षेप हो जायेगा।

पेस्टीसाइड्स और बैक्टिरियोफेज वगैरह पश्चिमी पैमाने हैं। पश्चिम के जीवन में नदियों का आध्यात्मिक महत्त्व नहीं है। वहाँ स्वीमिंग पूल के पानी के लिए अलग, पीने के पानी के लिए अलग और समुद्र-जल के लिए अलग-अलग सफाई के मानक हैं। नदी के लिए भी एक ढीला-ढाला सफाई-पैमाना बना लिया जाता है। हमें उतना नहीं, उससे कहीं साफ नदी-जल चाहिए। विडंबना यह है कि फिलहाल हमारी नदियाँ पश्चिम के पैमानों पर भी खरी नहीं उतरतीं।

सीवेज और औद्योगिक अवशिष्ट-मिश्रित गंगाजल के प्रयोग से शहरों में कुछ गम्भीर स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा हुई हैं। मैं खुद पोलियो, टायफाइड और पीलिया का शिकार रहा हूँ; लेकिन मुझे गंगाजी से अलग नहीं किया जा सकता, जैसे मछली को जल से। यदि गंगाजी के किनारे बसे 114 शहर यों ही अपना सीवेज गंगा जी में गिराना जारी रखेंगे तो गंगा बेसिन में निवास करने वाले 40 करोड लोगों को ताजा पानी नहीं मिल पाएगा। इस प्रकार, गंगा-प्रदूषण विश्व-भर में स्वच्छ जल के प्रदूषण की एक अभूतपूर्व समस्या बन गई है।

अगर अचानक भूकंप आ जाये तो लोग कुछ न कुछ तो करेंगे! जान बचाने की कैसी भी कोशिश। वैसा ही नदियों के मामले में क्यों नहीं होता?

बंगलुरु के किनारे कोई गंगाजी नहीं बहतीं। पैसठ लाख से कम आबादी वहाँ की नहीं है। पूरे शहर के मल-मूत्र की निकासी का, उसकी ‘रिसाइकिलिंग’ का एक सिस्टम बनाया गया है। तब हम अपना सीवेज क्यों नदी में गिराते हैं? मान लीजिए गंगाजी बनारस के किनारे नहीं हैं। मल-मूत्र के निस्तारण का कोई और इंतजाम कीजिए। बहस सिर्फ एक बात पर हो - गंगा जी में सीवेज गिरेगा कि नहीं। सीवेज मत गिराओ, तब देखो - कोई प्रदूषण नहीं है।

कोई भी काम किसी अकेले का नहीं होता। एक थे बाबू रघुनाथ सिंह - बनारस के पहले सांसद। बाबू साहब कहते थे कि जिस काम को अकेले किया जा रहा हो वह बडा काम हो ही नहीं सकता। जिसमें बहुत से लोग न लगे हों वह काहे का काम! इस नजरिये से गंगा-प्रदूषण का काम अभी छोटा ही है।

अपनी किताब ‘इंटरवल ड्यूरिंग पॉलिटिक्स’ में राममनोहर लोहिया ने नदियों के हाल पर लिखा है। वे कहते हैं कि प्रदूषण-मुक्ति का कार्य, दरअसल, शंकराचार्यों और दूसरे धर्माचार्यों का है। लोहिया का काम भी कबीर को याद किये बगैर नहीं चलता -
माया महा ठगिनी हम जानी।
केसव के कवला होइ बैठी, सिव के भवन भवानी।
पंडा के मूरति होइ बैठी, तीरथ हूँ मैं पानी
माया बडी भारी ठगिनी है। यह भगवान विष्णु के घर में लक्ष्मी, शिव के यहाँ पार्वती, पंडे के यहाँ मूर्ति और तीर्थों में पानी बनी बैठी है।

लोहिया कबीर की कविता को याद करते हुए कहना चाहते हैं कि तीर्थ तीर्थ इसलिए है कि वहाँ जल है। बिना पानी के किसी जगह का तीर्थ होना संभव नहीं। यह महज संयोग नहीं कि सभी तीर्थों के किनारे नदियाँ हैं। उसी पुस्तक में लोहिया ने यह भी कहा है कि नदियों की शुद्धि के लिए गैरराजनीतिक आंदोलन चाहिए।

दस
एक मुलाकात में विलक्षण डिजाइनर और रंगनिर्देशक बंसी कौल ने मुझसे कहा : बनारस के ही एक उदाहरण को समझें : अंदाजन, कम से कम दस हजार नावें होंगी। दस हजार नावें तो दस हजार मल्लाह। एक-एक नाव पर कम से कम बीस-बीस लोगों का परिवार पल रहा होगा। इस आँकडे का एक मतलब यह है कि एक संस्थान के रूप में बनारस ने एक बडी अर्थव्यवस्था की भी रचना की है। हम हमेशा पारंपरिक तरीकों से सोचते हैं। अर्थव्यवस्था को सोचते हुए हम उद्योगों की बात करते हैं, विदेश व्यापार या कृषि की बात करते हैं। यह भी तो एक अर्थव्यवस्था है, जिसकी रचना बनारस नाम के एक धार्मिक संस्थान ने की है। धार्मिक संस्थान अनोखी इकॉनमी संभव करता है। वैसा कोई और नहीं कर सकता। चाहे फूलवाला हो, भिखारी हो या रोटी बाँटने वाला हो। वह भक्त भी- जिसे लगता है कि उसने बहुत पाप किये हैं, अपने पापबोध से मुक्त होने के लिए बहुत दान करता है। भारत एक विचित्र बडी अर्थव्यवस्था है, जहाँ पापबोध भी उसका हिस्सा है। इस पर बात करने की जरूरत है।

ग्यारह
पंकज चतुर्वेदी की कविता। पंकज अनुभव को राजनीति के सामान में बदल लेते हैं। यह अनुभव की अनंत संभावनाओं में एक और संभावना की तलाश है या इस वक्त के कवि का कर्त्तव्य। इस कर्त्तव्य को वह कलात्मक चुनौती की तरह स्वीकार करते हैं और एक निहायत सादा, ताजा, आदिम और काबिलेयकीन ‘मौलिक-विशेष’, यों, आज की कविता को हासिल हो जाता है।

दिक्कत यह है कि कवि की ऐसी राजनीतिक उपलब्धि को हिंदी साहित्यसंसार में मुहावरा वगैरह कहकर समझ लिया जाता है। जगमग दृश्य में पंकज उन बहुत कम, अनोखे कवियों में से हैं जिन्होंने एक दूसरे जैसी कविता नहीं लिखी और वर्चस्वशाली शिल्पों से असहमत रहे आए। उनकी रचना में उपलब्ध के साथ सामंजस्य, सहयोग या संतुलन का अभाव है, लेकिन यह अभाव भी किसी वाचालता में खुद को जाहिर नहीं करता, बल्कि नमी, व्याकुलता, वैराग्य, यथार्थ की निरुपायता और एक असमाप्त मननशील युयुत्सा की मिलीजुली रौशनी से उसकी आवाज बनती है। ऐसी आवाज जितनी बनती है, उतनी बढती भी है। ऐसी आवाज में व्यक्ति की भीतरी परतें भी पारदर्शी होकर सामाजिक सचाइयाँ बन जाती हैं। ऐसी आवाज में, जैसा निर्मल वर्मा मलयज के लिए कह गए हैं, हमेशा एक मंद्र अर्जेंसी होती है। ऐसी आवाज का आत्म ही मुक्तिबोध के शब्दों में, एक आभ्यंतरीकृत विश्व होता है।

अपमान उनकी कविता का प्रमुख मुद्दा है। गौरतलब है कि व्यक्ति के अपमान को पंकज कितने सिरों से उठाते हैं, ग्रामप्रधान की बैठक यानी अन्यायमय सामाजिक यथास्थिति के ग्राउंड जीरो से शुरू करके निर्वैयक्तिक इशारे करते रहने वाले चमकदार हिंदी कवियों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कंडीशंड रेफ्लेक्सेस तक। ऐसे अप्रत्याशित और विविध उनके लिये सुविधाएँ और अलंकरण हो सकते थे, लेकिन रचना में वे सरोकारों के हिस्से बनकर मौजूद हैं।

रघुवीर सहाय की कविता जिस एक दर्जा नीचे रहने के दर्द की खातिर कविता को खोलती है, वह मुक्ति पंकज की कविता के लिये किस कदर आजीवन कर्त्तव्य बन गयी है, इसे देखा जाना चाहिए और इस कविता की राजनीति को बहस और साहित्यिक सामाजिकता के कुछ और बीच में ले आना चाहिए। पंकज की कविता को ताकत के अन्यायी रूपों की आलोचना के तौर पर पढा जाना भी बाकी है। वैसे तो हमारे यहाँ अनिवार्य चीजें लगातार बाकी हैं। नब्बे के दशक, जिसके कवि पंकज बोलचाल में माने जाते हैं, की भीड में से प्रतिनिधि कवियों की नेक, विश्लेषणसम्मत और ऐतिहासिक तलाश का काम बाकी है।बहरहाल, पंकज जैसी कविता पढते हुए हम कविता की अपनी शक्ति पर भरोसा रख सकते हैं और विश्लेषण के लिये प्रतीक्षा कर सकते हैं।

बारह
कल गणेश चतुर्थी थी। भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चौथी तिथि को पडने वाला मराठी लोकोत्सव नहीं; माघ के कठिन जाडे की चौथी तारीख पर आने वाला उत्तरभारतीय स्त्रियों का रंगारंग त्योहार - जिसमें माँएँ अपने बेटों के लंबे, स्वस्थ और प्रसन्न जीवन की कामना में दिन-भर उपवास करती हैं, गणेशजी के मंदिरों में जाती हैं; नंगे पैर, लंबी कतारों में घंटों खडी रहकर पहले दर्शन की प्रतीक्षा और फिर दर्शन करती हैं। गणेशजी की हैसियत हिन्दू धर्म में बहुत ऊँची है। कोई भी मंगल कार्य उनकी पूजा के बगैर शुरू ही नहीं हो सकता। शुक्र है कि राजनीतिक दलों का ध्यान उनकी ओर नहीं है।
लेकिन मैं गणेशजी के बारे में क्यों सोच रहा हूँ। दरअसल मुझमें और उनमें कई बातें एक-सी हैं। मैं उन्हीं की तरह खूब मोटा-ताजा हूँ। उन्हीं की तरह अपनी माँ का लाडला हूँ और मौका मिलता तो उनकी ही तरह अपनी माँ की खातिर पिता के हाथों अपना सिर भी कटवा लेता। गणेशजी अपने माँ-पिता की परिऋमा करके मान लेते हैं कि दुनिया का चक्कर लग गया। मैं भी वैसा ही आलसी हूँ। मेरा भी कहीं जाने का मन नहीं करता। घर में खा पीकर, टोपी मोजा पहनकर, जमीन पर चटाई या कालीन बिछाकर, पढने की डेस्क सामने रखकर और पालथी मालकर जम कर पढता रहूँ या कोई व्यास अगर बोले तो महाभारत जैसा कुछ लिखूँ। यह हुई न बात।
लेकिन बात महज इतनी नहीं है। कुछ और भी है, जिसकी वजह से आज तक मेरे तार गणेशजी से जुडे हुए हैं। मेरे नाना बडागणेश मंदिर के पुजारी थे और मेरा पूरा बचपन ननिहाल में रहकर मंदिर में चढा हुआ मेवा-मिष्ठान और लड्डू खाकर बीता। मेरी माँ बेशक आधुनिक महिला थीं और दान-दक्षिणा का अन्न आदि खाना उन्हें पसंद ना था; सो नाना की मृत्यु के बाद वह सिलसिला पूरी तरह बंद हो गया; लेकिन मन में गणेशजी और उनके चूहे के लिए जो घरेलू और अकारण प्रेम था वह तो चलता ही चला गया।
बहरहाल यह युग बीत गया और अपनी माँ के साथ नब्बे के दशक के शुरुआती बरसों में एक दिन मैं नयी दिल्ली में था। हमारे पास खाली समय था तो माँ मुझे ललित कला अकादेमी की दीर्घा में चल रही एक प्रदर्शनी में लेती गयीं। कमाल देखिये वह प्रदर्शनी गणेशजी पर ही एकाग्र थी। उन चित्रों के गणेश बहुत मस्तमौला थे - मेरे मन पर सदा के लिये छप जाने वाले। एक चित्र में गणेशजी त्रि*केट खेल रहे थे; एक में कृष्ण की तरह गोपिकाओं के बीच बांसुरी बजा रहे थे और एक में हनुमानजी की तरह आसमान में उड रहे थे। आखिरी चित्र अभूतपूर्व था। उसमें गणेशजी के रावण की तरह दस सिर थे और वह रावण की तरह राम से युद्ध भी कर रहे थे। वह चित्र देखकर मैं प्रसन्न हो गया। मेरे गणेशजी ऐसे ही हो सकते थे - मोटे, आलसी, मातृभक्त; लेकिन विविध, बहुआयामी और बहरूपिये।
ऐसे गणेशजी की जय हो।

तेरह
विजयदेव नारायण साही पर एकाग्र संगोष्ठी में प्रसंगवश अशोकजी ने एक बहुत सुंदर वृत्तांत सुनाया। सत्तर के दशक में मध्यप्रदेश कला परिषद की वीथिका में मेघमन्द्र आवाज में साहीजी का कवितापाठ; पृष्ठभूमि में रामकुमार के चित्रों की प्रदर्शनी और श्रोताओं में कालजयी पंडित कुमार गंधर्व - जिन्हें कवितापाठ के बाद गाना भी था, लेकिन वहीं अभिभूत बैठे रह गये थे। संस्मरण सुनाते हुए अशोकजी भी इस त्रयी पर वैसे ही - कुमारजी की तरह - ठिठक गये।
चौदह
आज मैंने एक कहानी सुनी। महाराज चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के जमाने की। एक बार उन्होंने सभी नवरत्नों, दरबारियों और भृत्यों आदि से एक सवाल पूछा - बताओ! मैं सम्राट क्यों हूँ ? लोग सोचने लगे। महाराज ने आगे कहा, मुझे कल तक अपने प्रश्न का उत्तर चाहिये, अन्यथा वेतन, भत्ते, मानदेय और पारितोषिक समेत राज्य की ओर से मिलने वाली सभी सुविधाएँ समाप्त।
लोग चिंतित हो गये। वह माली भी बहुत परेशान था जो राजा के बागीचे में काम करता था। उसकी नयी नवेली बहू से यह देखा न गया। उसने कहा कि मुझे कल दरबार में ले चलिये। मैं महाराज को बतालाऊंगी कि उनके चक्रवर्ती सम्राट होने की वजह क्या है।
अगले दिन माली उसे अपने साथ ले गया। यह बात सबको पता चल गयी थी। लोग बहुत उत्सुकता से उस नयी नवेली बहू की ओर देख रहे थे। बहू बोली : महाराज! आप मेरे साथ महल के बाहर कुछ दूर तक चलिये, तभी इस सवाल का जवाब दिया जा सकता है।
महाराज नयी नवेली बहू के पीछे-पीछे महल के बाहर चल पडे। उनके पीछे पूरा राज-समाज। कुछ दूर आगे एक मेंढक मिला। वह अपने कुएँ से निकलकर बाहर की हवा खा रहा था। बहू ने मेंढक से पूछा : बताओ मेंढक : महाराज महाराज क्यों हैं? मेंढक ने जवाब दिया : कुछ और आगे जाओ। एक धूलचट्टा - धूल चाटने वाला - मेंढक मिलेगा। वह बता देगा कि महाराज महाराज क्यों हैं। लोगबाग धूलचट्टे मेंढक के पास पहुँचे। उसने बताया : पिछले जन्म में मैं, हवाखोर मेंढक और महाराज विऋमादित्य सगे भाई थे। हम तीनों रोज घर से निकलकर जंगलों की ओर शिकार के लिये जाते थे। एक दिन शिकार के पहले हमलोग अपना कलेवा खा रहे थे कि एक भूखा-दूखा आदमी आकर हमसे खाना माँगने लगा। बडे भाई ने कहा कि अपना खाना मैं तुम्हें दे दूँ तो क्या हवा खाऊँ ? इस जन्म में वह वही मेंढक है जो अपने कुएँ के बाहर बैठा हवा खा रहा है। फिर वह मँगता मेरे पास आया। मैंने उससे कहा कि अपना खाना तुम्हें दे दूँ तो क्या धूल चाटूँ ? आप देख ही रहे हैं; इस जन्म में मैं यहाँ बैठा धूल चाट रहा हूँ। तीसरे भाई - इस जन्म के महाराज विऋमादित्य ने अपना पूरा कलेवा उस आदमी को दे दिया। अब आपलोग समझ ही गये होंगे कि महाराज महाराज क्यों हैं।
वैसे तो इस कहानी से बहुत सी शिक्षाएँ मिलती हैं; लेकिन सबसे बडी शिक्षा यह है कि जो राजा होगा, वह सबसे पहले प्रजा की भूख को संबोधित होगा।
जो राजा जनता की भूख से पहले कुछ और सोचे या करे; मेरे लिये वह हवाखोर है या धूलचट्टा। साथ में टर्र-टर्र टर्राने वाला अलग से।

बनारस पर कुछ और नोट्स
बनारस असंभव जगह है। उसकी नाप मुश्किल है। इस पार भी है, उस पार भी। राख में है और बालू में भी है। खडा है और भाग रहा है। नींद में है और जाग रहा है। आग और पानी का मुकाबला है बनारस। शोर के साथ संगीत की जुगलबंदी है। मंत्र और गालियों में होड है। प्यार की सबसे कोमल कहानी का नायक पहलवान है। निगुर्ण के गुण राम हैं और सगुण मस्जिद में सोया है।

एक बार सिकंदर लोदी बनारस आया, तो उसने कबीर को बुलवा भेजा। कबीर साहब खूब सजधज कर सुल्तान से मिलने चले। रास्ते में बहुत से लोग उनके साथ हो लिये। जब कबीर सिकंदर लोदी के दरबार में पहुँचे तो बहुत देर हो गयी थी। सुल्तान बहुत गुस्से में था। उसने वजह पूछी। कबीर का जवाब ही बनारस का जवाब है। उन्होंने सुल्तान से कहा : हुजूर ! रास्ते में एक चींटी मिल गयी थी। वह नौ मन काजल लगाये हुई थी। उसके एक कंधे पर ऊँट था और दूसरे कंधे पर हाथी। बडे शान से न जाने कहाँ चली जा रही थी। मैं भी कुछ दूर तक उसके पीछे चलता चला गया। उसी में देर हो गयी।

कुछ बादशाह समझदार होते हैं। सिकंदर लोदी भी था। वह समझ गया। उसके तर्कसम्मत दुनियादार सवाल का ऐसा टेढा अलौकिक जवाब देने वाला कोई कवि नहीं हो सकता था। उसकी आवाज में दरअसल एक शहर बोल रहा था। ऐसा शहर जिसके पास हर प्रश्न का अनूठा तर्कातीत उत्तर है।

मृत्यु। जीवन का अंत। शोक का सबसे गाढा मौका। बनारस ने इस क्षण का सामना उत्सव से किया। मरण को मंगल में बदलकर। इसे किसी भी दिन और किसी भी समय महाश्मशान - मणिकर्णिका पर जाकर नसों में महसूस किया जा सकता है। मृत्यु पर इतने अनुष्ठान, इतना आवागमन, इतने अभिराम विजुअल्स और इतने कोलाहल को शामिल कर लिया गया कि मरने का दुख अकेला पड जाय। अगर मरने के बाद के समय को अनुभव किया जा सकता, तो यकीन मानिये, दुनिया-भर के लोग निरे एडवेंचर की खातिर यहीं आकर मरना पसंद करते।

बनारस की पहचान के सारे बिंब भटके हुए देवता हैं। वे अपने मंदिरों से बाहर निकलकर भक्तों की अंतहीन कतार में खडे हैं। समय नाव में बैठा है और साधु का लंगोट आसमान में पतंग की तरह लहरा रहा है। सालभर राधे-राधे करने वाले पुष्टिमार्गी रामलीला में सीता और लक्ष्मण का श्रृंगार कर रहे हैं। नदी रेत में छिपी हुई है। मैकडोनाल्ड की स्मार्ट इमारत के सामने ठेठ कचौडी जलेबी का फिदायीन ठेला लगा हुआ है। सब अपने आप में एकदूसरे से अलग-अलग भी बनारस हैं। प्रेमचंद को शहर की बात नहीं आती, जयशंकर प्रसाद को गाँव का पता नहीं मालूम। छन्नूलाल मिश्र ध्रुपद नहीं जानते, काशीनाथ सिंह को कविता से कोई लेना देना नहीं है। संगीत, नृत्य, साहित्य और नाटक में ठीक है कि उस्ताद गिरिजा देवी, सितारादेवी, हजारी प्रसाद और भारतेंदु जैसी हिमालयन शख्सियतें इनदिनों यहाँ नहीं हैं, लेकिन औसत और मँझोले दर्जे के लेखक, कलाकार, नर्तक और संगीतकार जितने बनारस में हैं, शायद ही दुनिया में कहीं होंगे। यानी, माहौल खूब है।

बनारस में तो सात वार और नौ त्यौहार। हर बडे त्यौहार के पीछे यहाँ का खास अपना- छोटा और सुंदर- विचित्र-सा कोई पर्व और है। दशहरे के पीछे भरतमिलाप; दीवाली के बाद देव दीपावली और होली से सटा हुआ बुढवा मंगल। यह शहर हर बार परंपरा पर अपना हस्ताक्षर कर देना चाहता रहा है।

नौजवान इस शहर से ऊबे या घबराये नहीं। उन्होंने इस शहर के पारा-पारा रूपों का आलिंगन कर लिया और अपनी हैसियत-भर उसे बदलने भी लगे। पिछले दो दशकों में यहाँ जो भी बदलाव हुए हैं, उनकी वजहों में राजनीति के साथ-साथ यौवन भी बराबर-बराबर शामिल है। जैसे, बनारस कथक नृत्य का गढ है; पर सितारादेवी और गोपीकृष्ण ने जितनी बडी लकीर खींच दी है, उससे कैसे पार पाया जा सकता था? लेकिन रुकिये, यहीं की एक लडकी सोनी चौरसिया ने रोलर स्केट्स पर बिना रुके, बिना गिरे; रात और दिन को एक में मिलाकर लगातार 124 घंटों तक नृत्य किया और गिनीज बुक में चली गयी। इस बीच गुणवत्ता नहीं, बेचैनी जरूरी चीज बनकर उभरी और उसने उचककर विगत की महानताओं को छू लिया है।

अतीत को झमेला मानकर चलने में निराशा और कुंठा का ही व्यापार संभव है। वहीं उसे पूजा की वस्तु बनाकर भी सिर्फ नकली ही हुआ जा सकता है। बनारस तो जैसा है, वैसा है। आधा पुरातन, आधा अधुनातन। आधा भरभराकर गिरता हुआ, आधा उसके मलबे में-से निकलकर जी उठने के लिए संकल्पबद्ध। किस ओर रहना है, यह हमारे ऊपर है।

आँकडे बताते हैं कि बनारस भारत के सबसे घनी आबादी वाले शहरों में से है। रोजाना बहुत बडी तादाद में पर्यटक और आसपास के जिलों के लोग यहाँ आते हैं। वे जितनी देर तक यहाँ रुकेंगे, उतना ही फायदा व्यापार को होगा। ढाई दशक पहले शुरु हुई संसार-प्रसिद्ध गंगा आरती की लोकप्रियता के पीछे टूरिस्ट को कुछ देर और रोक लेने का यही फलसफा काम कर रहा है। बनारस के लोग आरती की अलौकिकता और दिव्यता का गुणगान इसलिए भी करते हैं। वह अगर धम* की चीज है तो उसकी खोज का श्रेय वाणिज्य को जाता है।

बनारस में मरने से मुक्ति मिलती है। यह विचार हिन्दू मन में तीर की तरह धँसा हुआ है। लोग मरने के लिये यहाँ आते हैं। परिजनों और बंधु-बांधवों के साथ। सिर्फ इस एक बात ने बनारस की कहानी में एक महाकाव्य की तासीर पैदा कर दी है। नेपाल और भूटान के राजपरिवारों की सैकडों विधवाएँ यहाँ मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही हैं। ललिताघाट-स्थित ऐसे ही एक प्रतीक्षालय में इक्यासी साल की महामाया बोराल सिक्किम से आकर पिछले पचास बरस से इंतजार कर रही हैं; लेकिन कमबख्त मौत है कि आती ही नहीं। महामाया और उनकी दर्जन-भर प्रतीक्षारत सहेलियों का उल्लास देखकर कोई भी अचंभित हो जाय। उनकी दिनचर्या किसी कविता-जैसी है। अल्लसुबह गंगास्नान और विश्वनाथजी का दर्शन। आश्रम लौटकर कीर्तन और जलपान। फिर रोजाना का काम। कोई दीये की बाती बनाती हैं, कोई नकली मोतियों की माला गूँथती हैं, तो कोई टॉफी पर कागज चढाती हैं। दोपहर का भोजन, शाम को दोबारा गंगास्नान और पुनः नृत्यमय कीर्तन और रात्रिभोज। मृत्यु के यकीन को आँचल में गाँठ की तरह बाँधकर निर्भय-निस्संग आगे बढता जीवन।

बनारस के श्मशान - मणिकर्णिका घाट पर एक भवन है काशीलाभ मुक्ति भवन। उसमें भी रहकर लोग मृत्यु का इंतजार करते हैं, लेकिन उस मकान के बाहर साइनबोर्ड पर एक बात ऐसी लिखी हुई है जिसे पढकर हँसी आती है, डर लगता है और प्यार भी उमडता है। वाक्य पर ध्यान दें : कोई यहाँ अधिक से अधिक पंद्रह दिन रह सकता है। अगर यहाँ रहकर कोई पंद्रह दिनों तक नहीं मरा, तो उसे अपने रहने की व्यवस्था कहीं और करनी होगी।

वहाँ लिखी यह बात बार-बार याद आती है।

बीते दो दशकों में बनारस की शक्ल तेजी से बदली है। गंगा-घाटों का होटलीकरण हुआ है। नगर की स्काइलाइन खतरे में है। लालच बढा है और त्याग की उम्र कम हुई है। स्मृति पर हमला हुआ है। गुरु-शिष्य परंपरा कमजोर हो गयी तो संगीत, नृत्य और नाटक सीखने वालों ने संस्थानों का रुख कर लिया, जबकि संस्थानों की आभा घट ही रही है। महान रचनाओं की पांडुलिपियाँ एकदूसरे से रगड खाकर टूट गईं, कबीर की माला को थाईलैंड के चोर उडा ले गये। रामलीला में निराशा है और हिस्सेदारी की भावना पस्त हो रही है।

लेकिन मेले में भीड है। नये उत्सव आ गये, लेकिन पुरानों की आभा भी उतनी कम नहीं हुई। सीखने की कमी है, लेकिन अभिव्यक्ति के अवसर बढे हैं। आबादी और ट्रैफिक ने चुनौतियाँ बदल दी हैं। लोगों का आसानी से आना-जाना मुश्किल है, लेकिन इस बात ने स्थानीय व्यापार को बचाया ही है।

चाहें तो आप बनारस को उसकी गंध से भी पहचान लें। कहीं इत्र है, कहीं पान; गरम मसालों और मिठाइयों की गलियाँ अलग हैं। एक गुड का बाजार है, एक फूल का। महक कमजोर हुई है, लेकिन दूसरी खुशबुएँ भी तो आयी हैं। बनारस ने सबकुछ को शामिल किया है। कोई भी यहाँ अन्य नहीं है। बंगाली, मराठी, तेलुगू, कन्नड और गुजराती लोगों के नदी किनारे बडे-बडे मुहल्ले हैं और इन सब को एक में मिलाकर संपन्न लोगों का नया महानगरीय बनारस भी यहीं तन रहा है। निमा*ण की धूल बहुत उड रही है और उसने आसमान को पिछले दशक-भर से घेर रखा है, लेकिन उसी धूल के बीच, साढे तीन सौ साल पुरानी बनारसी साडी की दुकान किसी भविष्य की तरह चमकती है। इस दुकान ने ग्लोबल मार्केट के साथ चलना सीखा है और इंटरनेशनल एयरपोर्ट से लेकर तमाम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उसके दमखम और गुणवत्ता की आजमाइश के रोजाना अखाडे हैं।

बनारस जितना भीतर है, उससे कहीं ज्यादा बाहर है। वह जितना बिस्मिल्लाह की तरह संस्थापित है, उतना ही रविशंकर की तरह विस्थापित। सात समंदर पार भी वह बनारस-बनारस ही बजता है। जिन्हें इस शहर ने ठुकरा दिया, वे इस बात में धन्य हैं। गो वाँ नहीं प वाँ के निकाले हुए तो हैं; का’बे से इन बुतों को भी निस्बत है दूर की।

बनारस की नागरिकता समयातीत है। यहाँ रहने का आनंद चालू वक्त को चुनौती देते रहने में ही है। आप या तो इस पार - अतीत में रहें; या उस पार - भविष्य में। जीवन यहाँ इसी अर्थ में असंभव है, क्योंकि वह अतियों के तानेबाने से बुना गया है।

तो बनारस में आपका स्वागत है, गो वह अगर आपको निकाल बाहर भी कर दे तो इसे अपना सौभाग्य मानिये।

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