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अज्ञेय : आस्तिकता का भाव-नैवेद्य

पाण्डेय शशिभूषण शीतांशु
अज्ञेय से मैं कभी नहीं मिला, लेकिन उनकी रचनाओं और उनके व्यक्तित्व से मैं बार-बार मिलता रहा और इनके निकट रहने का आह्लाद प्राप्त करता रहा। उसी तरह मैं अज्ञेय और उनकी कृतियों के प्रति अपने लेखन और पत्राचार से अज्ञेय के निकट रहा और उनहोंने मेरे लेखन को सराहा, मेरी प्रतिभा को प्रोत्साहन और मान दिया और जहाँ-कहीं भी अपने अग्रोन्मुख होने की प्रक्रिया में मेरी प्रतिभा की उपेक्षा के खतरे सामने आए, वहाँ उससे अवगत होते ही उन्होंने मुझे मेरी प्रतिभा की रक्षा करने का संकल्पित आश्वासन तक प्रदान किया तथा उस दिशा में अपनी ओर से सक्रियता भी दिखाई। ऐसा रक्षा-कवच मुझे हिन्दी में किसी वरिष्ठ आचार्य या साहित्यकार से नहीं मिला।
अज्ञेय-स्रष्टा थे, सर्जक थे, चिंतक थे, विवेचक थे, परंपरा और संस्कृति के मूल तत्त्व के ज्ञाता, गृहीता और संरक्षक थे। वह जहाँ आस्थावादी भारतीय थे, वह वहीं पाश्चात्य चिंतन और लेखन और आधुनिकता के अधीती मीमांसक भी थे। वह कर्मठ थे और उनके कर्म का प्रसार बहुत व्यापक था। वह न केवल रचना-कर्म को अपितु दैनिक जीवन के कर्म को और विभिन्न प्रकार के आजीविका-कर्म को कुशलता से निष्ठापूर्वक सम्पन्न करना जानते थे। रचनाकर्म उनका सर्वाधिक प्रिय कर्म था। अपने जीवन और रचनाकर्म दोनों में वह प्रमाता भी थे, प्रयोक्ता भी थे और भोक्ता भी थे। उनकी अपनी विशिष्ट उपलब्धियाँ थीं। वे कवि थे, गीत-प्रगीतकार थे, लम्बी कविता के कवि थे, हाइकू और तुक्तकों के कवि भी थे, उपन्यासकार थे, निबंधकार थे और संस्मरण तथा यात्रावृत्त-लेखक भी थे। दूसरे शब्दों में वह स्मृति-लेखाकार (संस्मरणकार) थे। अंतःप्रक्रिया के लेखक थे, जिसे अब तक किसी ने न तो उद्घाटित किया था और न उसे लिखने का साहस ही दिखाया था। अज्ञेय ने अपनी बार साहित्य-विधा के रूप में इसे अभिव्यक्त किया था। वे पत्रकार थे। समाचार-पत्रकारिता से साहित्यिक पत्रकारिता तक में न केवल उनकी दक्ष पैठ थी, बल्कि इन दोनों जगहों पर उन्होंने अपना कीर्त्तिमान स्थापित किया था। दिनमान और नया प्रतीक इसके प्रमाण हैं। गंभीर उनकी प्रकृति थी और सहजता उनकी संस्कृति। उनका काव्यपाठ हमें उनकी ओर खींचता था। उनके संपादकीय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण, स्मरणीय और संरक्षणीय हैं।
अज्ञेय संवेदना से भाषा तक मौलिक थे। भाषा की शुद्धि और भाषा के सचेत और सटीक प्रयोग को वह अपनी सर्जना में महत्त्व देते थे। साथ ही वह सर्जनात्मक भाषा के निर्माता भी थे। उनमें नेतृत्व की क्षमता थी। उनका प्रभामण्डल देदीप्य था। इसीलिए अनेक नये सर्जक अज्ञेय की ओर उन्मुख हुए। नए सर्जकों की न केवल उनको तलाश रहती थी, अपितु जहाँ-कहीं उन्हें प्रतिभा दिखती थी उसे वह निष्ठापूर्वक प्रोत्साहित करते थे। नए रचनाकारों का मार्गदर्शन करने की उनमें क्षमता थी। साहित्य-जगत् में विरोध सहने की उनमें अदम्य शक्ति थी। वे आस्थावादी थे, शिविरवादी नहीं थे। इस बिन्दु पर उन्होंने लगातार विरोध सहे, पर उन्होंने अकेले अपनी रचनात्मकता शक्ति के आधार पर अपने को हिन्दी साहित्य में स्थापित किया। जो लोग विरोध के लिए उनका विरोध करते रहे, अज्ञेय के दिवंगत होने के बाद वे लोग भी उनके प्रशंसक बन गए। नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी इसके प्रमाण हैं। उनकी रचनाओं ने अपने-आप को कालजयी रूप में स्थापित किया।
अज्ञेय के समग्र कथा-साहित्य को पढकर मैंने उनकी कथा-भाषा पर तीस-बत्तीस पृष्ठों का एक लम्बा आलेख लिखा था जयति बचन रचना अति नागर । यह मेरा बहुत ही सुविचारित और सूक्ष्म गहन अन्तर्दृष्टिपूर्ण आलेख था। इसे मैंने आलोचना पत्रिका में तत्कालीन सम्पादक (1971) डॉ. नामवर सिंह को प्रकाशनार्थ भेज दिया था। अज्ञेय और नामवरजी दोनों यही उन दिनों जोधपुर विश्वविद्यालय में थे। अज्ञेय तुलनात्मक साहित्य विभाग में आचार्य-अध्यक्ष थे और नामवर हिन्दी विभाग में। अपने आलेख की एक प्रति मैंने अज्ञेय को भी भेज दी थी। नामवरजी ने अज्ञेय पर लिखा मेरा उक्त आलेख अपनी वादग्रस्तता के कारण आलोचना में नहीं छापना था, सो उन्होंने नहीं छापा। अज्ञेय ने मेरा वह पूरा आलेख पढा था। यह तो उनके पत्र से बाद में मुझे पता चला। पर तत्काल उन्होंने मुझे कोई उत्तर नहीं दिया और मौन रह गए। इस आलेख के लिखने के दौरान मैंने अज्ञेय की कथा-भाषा की बारीकियों को बहुत निकट से जाना। अज्ञेय जी के यहाँ उनकी भाषा में कई प्रकार के सर्जनात्मक उभार हैं। मुझे लगा किसर्जनात्मक भाषा की इतनी बारीक पहचान और रचना हिन्दी में किसी अन्य समकालीन कथाकार के यहाँ प्रायः नहीं है। वे यह मानते हैं कि कथा में यथार्थ तो होता ही है, पर उसकी प्रस्तुति तद्वत् नहीं होती। उसे नये-नये रूप में इस तरह प्रस्तुत करना पडता है, जिससे वह अपने पाठकों का न केवल ध्यान आकर्षित कर सके वरन् उसके चित्त में अपना स्थायी प्रभाव भी छोड जाए। यथार्थ में अपनी कथाभाषा में अज्ञेय जो यह परिवर्तन लाते हैं, वह सर्जनात्मकता के सहारे ही आता है। इस सर्जनात्मकता के कई उपकरण हैं- बिम्ब, प्रतीक, मिथक और फन्तासी। प्रतीक की संघटना कथा-भाषा की पूरी संरचना में परिव्याप्त होती है। संकेत भी अज्ञेय की कथाभाषिक संरचनात्मकता का एक सबल उपकरण है। अधिक मितभाषा के रचनाकार हैं, मौन भी उनकी भाषा की शक्ति है। उनकी कथा-प्रोक्तियाँ कथित से अधिक अकथित को गहराती और व्यंजित करती हैं। भाषा का प्रयोग करते-करते सहसा उनके पत्रों को यह अवधान होता है कि यह शब्द उतना सटीक नहीं है ओर उसकी जगह वे दूसरे सटीक शब्दों का प्रयोग कर बैठते हैं। उनकी कहानी की संरचना बहुत सुसंहत होने के साथ-साथ निहितार्थ से परिपूर्ण होती है। आवृत्ति और प्रतीपता उनकी कथा-भाषा का प्रमुख गुण है। शेखर एक जीवनी और नदी के द्वीप में इसके उदाहरण भरे पडे हैं। नदी के द्वीप में यह आवृत्ति स्थानिकता (Local) में सुघटित होने के साथ-साथ साकल्यपरक (Global) भी है। उनकी कहानी पठार का धीरज एक किस्म की फंतासी के बीच से अपना अर्थ खोलती है। उनकी रोज या गैंग्रीन शीर्षक कहानी अपने रचाव में इतनी जटिल और इतनी अर्थपूर्ण है कि यहाँ कालिकता की दृष्टि से वह अपनी स्थितिगत स्थायिता का उद्घाटन करती है वहीं स्थलीयता की दृष्टि से वह गैंग्रीन के प्रतीक को सार्थकता प्रदान करती है। काल-चेतना की दृष्टि से इस कहानी का एक नाम रोज है और स्थल-चेतना की दृष्टि से इस कहानी का एक नाम गैंग्रीन है। रोज कहानी का प्रतिपाद्य शब्द (Theme word) बन जाता है और गैंग्रीन बीज शब्द (Key word) बन जाता है। कहानी में मूर्त गैंग्रीन से अमूर्त गैंग्रीन की अर्थवत्ता की यात्रा है। कभी-कभी अज्ञेय नितांत नये शब्द गढते और नए अर्थ में उनका प्रयोग करते है। यह नया अर्थ अभिधेय तो नहीं होता, पर व्यंजित अवश्य हो जाता है। यहाँ बाहरी अंग के मूर्त गैंग्रीन से हृदयगत और जीवनगत अमूर्त गैंग्रीन को उद्घाटित करने की साभिप्रायता है और यह सब भाषा की सर्जनात्मकता के स्तर पर संपन्न होता है। अज्ञेय की कथा-भाषा इतने संकेतों से भरी है कि वहाँ भाषेतर सेंकेत भी अर्थवान हो उठते हैं। एक गहरा हृदयगत अमृर्त अर्थ अपने सम्पुष्टीकरण द्वारा भाषेतर प्राकृतिक संकेतों से अनेकसः अर्थवान् होने लग जाता है। वे जटिल-से जटिल मनोभाव को भाषा की सर्जनात्मता के द्वारा संकेतित-व्यंजित कर देते हैं।
इसी तरह अज्ञेय की काव्यभाषा पर मैं आरंभ से ही रीझता रहा। इसलिए कि वे किसी तरह हमें एक खिंचाव के साथ अपने प्रतिपाद्य और रचनात्मक संवेदनशीलता तक ले जाते है। उनकी कुछ छोटी कविताएँ मुझे बहुत पसंद हैं जिनमें एक कविता है-जीवन-मर्म, और दूसरी कविता है सोन मछली। मैंने इन दोनों कविताओं की गहरी व्यंजना को सार्थक रूप में उद्घाटित किया है। मुझसे पूर्व इन कविताओं की ऐसी सार्थक साभिप्रायता का उद्घाटन संभव नहीं हो सका था। इसी तरह उनकी एक और लघु कविता याद आती है- कतकी पुनों। इसकी भी गजब की सार्थकता है। उनकी एक लम्बी कविता है असाध्य वीणा जिसे प्रायः रचना-पक्रियागत अर्थ देने वाली कविता माना गया है। मैंने पहली बार इस कविता में असाध्य वीणा को दैवत् वीणा के मिथकीयता से जोडा और इसके अंतरंग में व्याप्त निगूढ अर्थवत्ता का उद्घाटन किया है। इस शरीर रूपी वीणा की साधना और सिद्धि से अज्ञेयता की स्थायी भावभूमि प्राप्त होती है। यह अद्वयता आत्मिक उन्नयन की सिद्धि है। इसमें मनुष्य और मनुष्य तथा मनुष्य और जीव का एकात्मक बोध भी है।
अज्ञेय ने स्वयं शब्दार्थ-चेतना के प्रति अपनी जागरूकता के परिचय के दो महत्त्वपूर्ण उदाहरण दिए हैं। एक उदाहरण शब्दों के दोहराव से अर्थ-छाया के परिवर्तित होते जाने का है और दूसरा उदाहरण शंकुतला के द्वारा बालक भरत को दुष्यंत के प्रति इंगित रूप में कहे गए कि पृच्छ ते भागधोयम जैसे कथन का है।
अज्ञेय का पत्रकार रूप मुझे एक ओर बहुत पसंद था, तो दूसरी ओर नापसंद भी रहा। दिनमान का एक संपादकीय स्मरण आता है, जिसमें उन्होंने स्वातंत्र्योत्तर शब्द के गलत प्रयोग पर आपत्ति जताते हुए साहित्य में शब्दों के प्रयोग का औचित्य समझाया था। उन्होंने बताया था कि स्वातंत्र्योत्तर शब्द प्रायः आजादी प्राप्त होने के बाद के युग के लिए व्यवहृत होता है। पर इस शब्द से अर्थ निकलता है स्वतंत्रता के बीत जाने के बाद का युग। स्वातंत्र्य+उत्तर यानी स्वतंत्रता बीत जाने के बाद का काल, जबकि जिस काल में इसका प्रयोग किया जाता है, वह काल है पारतंत्र्योत्तर काल। पर अज्ञेय नेकई इस शब्द की ओर संकेत किए जाने के बाद भी विश्वविद्यालय के आचार्यों ने इस शब्द का गलत प्रयोग बंद नहीं किया और इस शीर्षक से सैकडों शोधकार्य वे करवाते रहे।
अज्ञेय ने 1966 में टाइम्स् ऑफ इण्डिया गु*प के समाचार-साप्ताहिक दिनमान में पूर्ण विराम(।) की जगह फुलस्टॉप (.) का प्रयोग आरंभ किया। यह एक प्रकाशन-समूह का निर्णय था। टाइम्स ऑफ इण्डिया ग्रुप की सभी हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं के लिए यह नीति बनाई गई थी कि हिन्दी में पूर्ण विराम (।) की जगह अंग्रेजी फुलस्टॉप (.) का प्रयोग किया जाए। हिन्दी के विराम-चिह्नों में अकेला पूर्ण विराम (।) उसका निजी विराम-चिह्न है अन्यथा उसके शेष सभी विरामांकन अंग्रेजी से लिएगए है। इसलिए पूर्णविराम की जगह फुलस्टॉप को चलाने वालों के लिए यह तर्क बहुत स्वाभाविक था कि जब सभी चिह्न अंग्रेजी से ले लिए गए हैं तो भला इसे भी लेने में क्या आपत्ति हो सकती है? पर वे यह नहीं सोच पाये कि पूर्ण विराम-चिह्न उसकी निजी अस्मिता का प्रतीक है। इस खउी पाई को हटा देने से कई असंगतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। यहाँ डॉट्स के लिए बिंदु-प्रयोग किए जाते हैं, वहाँ यह पता लगाना कठिन होगा कि यह बिन्दु-चिह्न वाक्य के अंत में आए फुलस्टॉप के बाद का है या वाक्य के पूरा होने के पहले का है। ऐसा नहीं है कि भारतीय परम्परा में कभी अतीत में बिन्दुओं का प्रयोग ही नहीं हुआ। उमापति के पारिजातहरण की पाण्डुलिपि में बिंदुक, जिसे आज फुलस्टॉप कहेंगे, के प्रयोग देखने को मिलते है। पर यह भी चलन में नहीं आ पाया। इसमें अज्ञेय का ही नेतृत्व रहा हो, ऐसा तो नहीं था, क्योंकि उन दिनों धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती थे। निश्चय ही एक साझा निर्णय किया गया होगा। पर मुझे इस बात का घोर दुःख था कि अज्ञेय ने हिन्दी की अस्मिता की एकमात्र विरासत इस खडी पाई (।) का पक्ष क्यों नहीं लिया? इसलिए मैंने तत्काल एक आलेख लिखा- हिन्दी में पूर्णविराम की जगह फुलस्टॉप का प्रयोग। यह आलेख बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् की शोध-पत्रिका परिष्द-पत्रिका में प्रकाशित हुआ।
1977-78 में मैं गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में रीडर बनने के बाद बी.ए. भाग-एक के हिन्दी पाठ्यक्रम में सुरुचि नामक पाठ्य पुस्तक का संपादन कर रहा था। इसमें मेरे द्वारा अज्ञेय की पाँच कविताएँ संकलित की गई थीं। विश्वविद्यालय के नियम के अनुसार इसके लिए अज्ञेय से अनुमति माँगी गई थी। पहली बार जब उनका उत्तर प्राप्त नहीं हुआ तब मैंने पुनः पुनः उन्हें इस विषय में अपना अनुरोध-पत्र भेजा। पर उन्होंने मुझे कोई उत्तर नहीं दिया। व्यंजित यह हुआ कि वे नहीं चाहते कि उनकी रचना हमारे विश्वविद्यालय के इस पाठ्य संकलन में संकलित की जाए। अंत में कुलपति के आदेश से मुझे बहुत विवश होकर उनकी पाँचों कविताएँ संकलन से निकाल देनी पडीं। मेरा मन बहुत दुखी था, मेरे लिए आत्मग्लानि की स्थिति थी। मैं इस आत्मग्लानि के धुएँ में कब तक सपचता, धुँधुआता रहता। अतः मैंने उन्हें अपने अवसाद के क्षणों में एक पत्र लिखा। जिसमें मेरे द्वारा लिखी गई प्रमुख बातें इस प्रकार थीं कि रचनाकार बडा नहीं होता, रचना बडी होती है। रचनाकार की दृष्टि यादृच्छिक हो सकती है, पर रचना तो अपनी सर्जनात्मक संरचना का ही सत्य कहती है। दूसरे यह कि पंजाब जैसे अहिन्दी-भाषी प्रदेश में उनकी कविताओं को पढाने से उन्हीं के द्वारा वंचित किया जाना भला कहाँ तक श्रेयस्कर हो सकता है? तीसरे, यहाँ तक रॉयल्टी की बात है, उन पाँच कविताओं के लिए रचनाकार की ओर से रॉयल्टी जो भी उन्हें काम्य थी, वह हमारा विश्वविद्यालय उन्हें दे देता। अंत में मैंने उन्हीं की काव्य-पंक्तियों को उद्धृत करते हुए लिखा था- यहाँ न मिलिहं माधो। अब चले चलो ऊधो। और फिर इति नमस्करान्ते लिखकर मैंने अपना पत्र समाप्त कर उन्हंम भेजा दिया था। इसके लगभग बीस-पच्चीस दिनों बाद मुझे डाक से एक लम्बा लिफाफा मिला, जो नवभारत टाईम्स के कार्यालय से भेजा गया था। जब मैंने लिफाफा खोला तो उसमें अज्ञेय का मेरे नाम तीन पृष्ठों का लम्बा पत्र मिला। मैंने उस पत्र को बार-बार पढा और उसके बाद उस वस्तु-स्थिति से परिचित हुआ, जिसके कारण गुरु नानक देव विश्वविद्यालय को अपनी रचनाएँ प्रकाशित करने की अनुमति उन्होंने नहीं दी थी। उस पत्र की मुख्य बातें इस प्रकार थी। पहले तो मैं अज्ञयजी की आरंभिक पंक्तियों से ही आर्द्र हो उठा था। अज्ञेय ने लिखा था कि मैं जानता हूँ कि आप का मुझ पर कृपा-भाव रहा है। इसको मैं सिर-आँखों पर लेता हूँ। ये दो पंक्तियाँ मुझे विचलित कर गई थीं और मुझे अज्ञेय पर नए सिरे से सोचने के लिए विवश कर दिया था। मैं सोचने लगा कि हिन्दी के जिस महान साहित्यकार को इनके धुर विरोधी अहम्मन्य कहते हैं वह क्या सही है? मैंने अज्ञेय पर कोई पुस्तक नहीं लिखी थी। तब तक उनकी कथा-भाषा पर महज एक लम्बा आलेख लिखा था। उनकी कुछ छोटी कविताओं से लेकर उनकी लम्बी कविता असाध्य वीणा पर तो मैंने बाद में लिखा। यह सारा-कुछ उनकी रचनाओं से प्रभावित होकर मैंने स्वयं ही लिखा था और अपने इस परवर्ती लेखन की तो उन्हें कोई जानकारी भी नहीं दी थी। पर रचनाकार की यह शालीनता और दूसरे के चित्त की वेदना को समझने वाली यह करुणा उनके व्यक्तित्व की कितनी बडी पूंजी थी, उसे मैंने तब जाना और पहचाना। हिन्दी में सर्जक और आलोचक के बीच अंतर किया जाता रहा है। इसके बीच प्रथम और द्वितीय कोटि का विभाजन भी किया जाता रहा है। सर्जक बडा माना जाता रहा है और आलोचक का कद उसके सामने सदैव छोटा बना रहा है। अज्ञेय के तब तक तीन बडे स्थापित आलोचक भी थे- रामस्वरूप चतुर्वेदी, चंद्रकांत बांदिवडेकर और नन्दकिशोर आचार्य। फिर भी मेरे लेखन के लिए अंदर से हिला देने वाली ऐसी अभिव्यंजना! मैंने अज्ञेय पर कोई कृपा नहीं की थी, मैंने उनको पढकर और उन पर लिखकर आत्मतोष पाया था। अपनी आलोचना-प्रक्रिया में मेरा यही प्रयास था कि मैं उनके साहित्य की अब तक अनकही विशेषताओं को पहली बार उजागर कर रहा हूँ उनकी अर्थगर्मी साभिप्रायता को पहली बार उद्घाटित कर रहा हूँ। यही मेरा आत्मआह्लाद और आत्मतोष था। एक रचनाकार पर कुछ लिखकर कृपा-भाव जताने की अहम्मन्यता मेरे भीतर कभी नहीं थी। पर अज्ञेय ने जिस रूप में इसे लिखा वह बडे और छोटे के भेद को मिटा देने वाला था। शायद यह बोध ही इसके पीछे था कि जिस व्यक्ति को मैं और मेरी रचना इतनी प्रिय रही हो उसके मन को मेरे एक व्यवहार से भला क्यों पीडा पहुँची? मैंने अपने पत्र में उन्हें लिखा था कि आज मैं यह मान गया हूँ कि हिन्दी में रचनाकार बडा नहीं है, रचना बडी है। यह मैं कुछ अपवादों को छोडकर आज भी मानता हूँ। अज्ञेय ने मेरी इस धारणा को मिटाने का और अपने को अपवाद की कोटि में रखने का प्रयास मानो कृपा भाव जैसी अभिव्यक्ति से किया। अज्ञेय अपने आत्मीय दीर्घा को संकुचित करना नहीं चाहते थे। आगे उन्होंने यह स्पष्ट लिखा था कि सामान्यतः ऐसा पत्र आता तो मैं कोई उत्तर नहीं देता। पर आप को पीडा पहुँची है, इसलिए मैं उत्तर दे रहा हूँ और वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ। मैंने उन्हें यह लिखा था कि अहिन्दी-भाषी प्रदेश में आपने अपनी रचनाओं को पढाए जाने की अनुमति नहीं दी और विद्यार्थियों को इस अवसर से वंचित किया। इसके उत्तर में उन्होंने एक जागरूक साहित्यकार के रूप में अपना अभिमत रखा था कि अहिन्दी-भाषी प्रदेश में साहित्यपाठ को पढाने से अधिक भाषा सिखाने की अपेक्षा और महत्ता होती है। वहाँ हिन्दी शुद्ध लिखी और बोली जाए, इस पर बल होता है। दूसरे, यह क्यों मान लिया जाए कि अध्यापक जिन रचनाओं को पाठ्यक्रम में नहीं पढा पा रहा है, उसे अलग से विद्यार्थियों को बताने से क्यों चूके, अपितु उसका यह धर्म होता है कि जो श्रेष्ठ रचनाएँ पाठ्यक्रम में सम्मिलित नहीं हैं उनके विषय में यभी वह अपने विद्यार्थियों को बताए। फिर उन्होंने संस्थाओं की उस मनमानी-भरी उपेक्षा के विषय में भी लिखा था, जो साहित्यकारों के प्रति प्रायः ऐसे संस्थानों से की जाती है, जिससे साहित्यकारों के स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है। यह भी लिखा था कि ऐसा दुर्व्यवहार अध्यापकों के साथ करने से भी ये संस्थान नहीं चूकते। उन्होंने हमारे विश्वविद्यालय के साथ अपने भोगे गए कटु अनुभव की बात लिखी थी। रचना-विषयक अनुमति लेने के संदर्भ में हमारे विश्वविद्यालय से उनके साथ जो पूर्व में पत्र-व्यवहार हुआ था, वह अस्पष्ट न पढे जाने योग्य साइक्लोस्टाइल्ड पत्र के रूप में हुआ था। फिर एक बार अज्ञेय को गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की ओर से साढे तीन रुपये-मात्र का मनीआर्डर भेजा गया था। उनके ऐसे कटु अनुभव से तब मैं आवगत हो सका था और यह भी जान सका था कि हमारे विश्वविद्यालय के ऐसे दुर्व्यवहार से उनके स्वाभिमान को कितनी ठेस पहुँची होगी। बस शीर्ष के प्रतिष्ठित साहित्यकार की छोटी-से-छोटी रचना का मानदेय साढे तीन रुपये हो सकता है? इसलिए उन्होंने गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किए जाने के लिए अपनी अनुमति के विषय में कोई उत्तर नहीं दिया था। उन्होंने प्रश्ा* किया था कि लेखक के प्रति ऐसा तुच्छ भाव विश्वविद्यालय के द्वारा व्यक्त हो, यह भला कहाँ तक उचित और समीचीन है? उन्होंने मुझसे आग्रह किया था कि संस्थान के ऐसे दुर्व्यवहारों के विरोध में आत्मरक्षार्थ आपको भी खडा होना चाहिए। इस तरह उनके इस पत्र से उनके व्यक्तित्व की कई मूलभूत विशेषताएँ मेरे सामने उजागर हो उठी थीं। उनकी सदाशयता, उनकी विनयशीलता, अपनों से छोटों को मान्यता देने की उदारता अपनाना साहित्यकारों और लेखकों के साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहारों के प्रति जागरूकता, उनके विरोध में खडे होने की क्षमता, प्रकाशन का अधिकार नहीं देने की क्षमता, आत्मसम्मान पर किए जाने वाले प्रहारों के प्रति प्रतिरोधात्मकता, हिन्दी भाषा की शुद्धता के प्रति उनकी जागरूकता, उनके व्यक्तित्व की दृढता, चिन्तन की बहुआयामिता - ये सारी चीजें इस पत्र के विश्लेषण से परिलक्षित होती हैं।
अज्ञेय ने ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत होने के तुरन्त बाद वत्सलनिधि विन्यास की स्थापना की थी। इसके अंतर्गत प्रतिवर्ष किसी मूर्धन्य विद्वान का व्याख्यान होता था और बाद में उसे पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता था। इसके प्रथम वर्ष के कार्यक्रम की उन्होंने मुझे पर्व सूचना दी थी और मुझे उस व्याख्यान-विशेष में सम्मिलित होने तथा प्रतिभागिता करने के लिए आमंत्रित किया था। पर मैं उस समय अपनी और अपनी पारिवारिक अस्वस्थता के कारण उसमें सम्मिलित नहीं हो पाया। इस अवसर पर मैंने उन्हें अपनी बधाई दी थी और अपना खेद व्यक्त करते हुए अपने न आ पाने की सूचना भी उन्हें भेज दी थी कि मैं चाह कर भी उपस्थित नहीं हो पाऊँगा। इसका उन्होंने तत्काल उत्तर दिया कि मुझे लगता था कि शायद आप नहीं आ पाएँगे, पर यह सूचना आप तक पहुँचे, यह मैं चाहता था। इससे ऐसा लगा कि मैं उनके ध्यान-केन्द्र में रहता था।
एक बार मैंने अज्ञेय को अपनी एक पाण्डुलिपि के प्रकाशनार्थ किसी प्रकाशन से बातचीत करा देने का आग्रह किया था। अपनी पाण्डुलिपि की विषय-सूची से मैंने उन्हें अवगत करा दिया था। उन्होंने तत्काल अपनी बेबाक राय भेजी थी। उसमें मेरे दस आलेख थे जिनमें से चार को छोडकर छह के प्रकाशन का उन्होंने परामर्श दिया था। जिन चार को उन्होंने फिलहाल मुझे उस पाण्डुलिपि से अलग कर देने के लिए कहा था वे उनके अनुसार धार के नहीं, किनारे के कवि थे। इनमें धर्मवीर भारती और दुष्यंत कुमार जैसे रचनाकार भी सम्मिलित थे। उन्होंने आगे लिखा था कि शेष बातें प्रकाशक के साथ बैठकर तय की जाएंगी। इससे रचना और रचनाकार की परख और पुस्तक के संपादन की उनकी कुशल कला का मुझे अभिज्ञान हुआ था।
एक बार मैं अपनी पदोन्नति के समय चक्रव्यूह जैसी स्थिति से घिर गया था। मुझे प्रोफेसर न बनने देने के लिए मेरे विभाग के प्रोफेसर-अध्यक्ष डॉ. रमेश कुंतल मेघ ने मानो कसम खा रखी थी। इसके लिए वे संभावित विशेषज्ञों से उनके घर जा-जाकर ऐसा आग्रह भी कर आए थे। इनमें डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव और भोलानाथ तिवारी जैसे मेरे संभावित विशेषज्ञ थे, जिनके नाम विशेषज्ञों की नामिका (पेनल) में थे। उन्हीं दिनों डॉ. मेघ ने मुंबई विश्वविद्यालय में डॉ. चन्द्रकांत बांदिबडेकर की प्रोफेसर पद पर नियुक्ति की थी। उनका नाम भी अन्य विद्वानों के साथ विशेषज्ञों की इस नामिका में था। यद्यपि इन सबसे मेरा निजी अकादमिक और लेखकीय परिचय था और ये सब मेरे वैदुय और मेरे लेखन से भली-भाँति अवगत थे। तब भी मेरे मन में एक आशंका बार-बार उभरती रहती थी कि कहीं बांदिवडेकर उनके प्रति कृतज्ञ होने के कारण उनके दबाव में आकर चयन समिति में मेरे विरुद्ध न हो जाएँ। अतः मैंने अज्ञेय को अपनी इस आशंका से अवगत कराते हुए एक निजी पत्र भेजा कि बांदिवडेकर मेरे प्रतिकूल न हों। इसे आप कृपा कर देख लें। लगभग तीन सप्ताह बाद अज्ञेय का पत्र आया कि पत्रोत्तर में विलंब का कारण पत्र के विषय के प्रति उनके मन में अवमानना का कोई भाव नहीं था, बल्कि मुख्यालय से बाहर गए होने के कारण उत्तर में विलम्ब हुआ। वे पत्र के विषय से परिचित हो गए हैं। उन्होंने आने के साथ ही बांदिवडेकर को फोन किया है कि अब तक उन्हें गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की ओर से इस आशय का कोई पत्र मिला है या नहीं और उन्होंने निषेधात्मक उत्तर दिया है। अज्ञेय ने मुझे लिखा था कि मैं पुनः उन्हें फोन करके जानकारी ले लूँगा और इस विषय में मेरी प्रतिभा के साथ कोई मनमानी नहीं की जा सके, इसे वे देखेंगे। उन्होंने यह भी पूछा था कि चयन-समिति अभी बैठी है या नहीं? अगर बैठ चुकी है तो उसके परिणाम से मुझे अवगत करा देंगे। तब तक चयन-समिति बैठ चुकी थी और मेरा नाम प्रोफेसर पद के लिए संस्तुत कर दिया गया था। मैंने अपना कार्यभार भी संभाल लिया था। सो मैंने उनके प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त करते हुए अपने पद-ग्रहण की सूचना उन्हें दे दी। अज्ञेय के लिखे अनेक छोटे पत्र मेरे पास हैं जो औपचारिक हैं और उनके द्वारा दो अनौपचारिक आत्मीय पत्रों के प्राप्त होने का सौभाग्य हिन्दी में अकेला मुझे को प्राप्त हुआ है, इसका मुझे गर्व है। ऐसे पत्र न उन्होंने रामस्वरूप चतुर्वेदी को लिखे, न चन्द्रकांत बांदिबडेकर को और न ही नंदकिशोर आचार्य को। आचार्य तो लगभग एक वर्ष तक उनके साथ उनके दिल्ली आवास में ही रहे। यह गौरव उन्हें प्राप्त हुआ। पर उनके अत्यन्त आत्मीय पत्र प्राप्त करने का यह मेरा सौभाग्य था कि उनके हृदय के इस आत्मीय गह्वर में मेरा स्थान बन सका। चाहे वह संयोगवश ही क्यों न बना हो। मेरे नाम लिखे उनके ये पत्र साहित्य अकादमी, दिल्ली से विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के सम्पादन में प्रकाशित अज्ञेय पत्रावली में प्रकाशित हैं।
१९८६ से १९८९ तक मैं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से बनाई गई अखिल भारतीय हिन्दी पाठ्यक्रम समिति का एक मानद सदस्य था। इसका मुख्यालय बनारस हिन्दी विश्वविद्यालय, वाराणसी में था। इसके संयोजक-समन्वयक/निर्देशक प्रोफेसर शिवप्रसाद सिंह थे। इस समिति की बैठक महीने या दो महीने में एक बार अवश्य होती थी। अधिकतर केन्द्र में ही होती थी, पर दूसरे विश्वविद्यालयों में भी इसकी बैठक हुआ करती थी। १९८६ के वर्षान्त में वाराणसी में तीन दिनों की बैठक समाप्त करने के बाद हम लोग दूसरे दिन लौटने वाले थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अतिथि-भवन के मेरे बगल वाले कमरे में प्रोफेसर चन्द्रकांत बांदिवडेकर रुके हुए थे। डिनर के बाद हम लोग एक साथ डाइनिंग हॉल से निकले और अतिथि-भवन के परिसर में बाहर खुले में अज्ञेय जी पर बातें करने लगे। चाँदनी रात थी। पर जाडों के दिन थे। अतः थोडी ही देर में हम दोनों लौटे और बांदिवडेकर के कमरे में बैठ गए। वहीं बांदिवडेकर ने बताया कि जब अज्ञेय पर लिखी पुस्तक छपते ही उन्होंने उन्हें भेजी तब उसका कोई उत्तर अज्ञेय ने उन्हें नहीं दिया। बाद में भेंट होने पर उस पुस्तक के विषय में बातें हुईं। वहीं हम दोनों भारती और उनके पारस्परिक संबंध की भी चर्चा करने लगे थे। मैंने बांदिवडेकर को भारती पर अज्ञेय का लिखा एक तुक्तक भी सुनाया- एक थे धर्मवीर भारती/ साकिम अतरसुइया/ धोखे से छू आए बांग्ला देश की घइया/ पद्मश्री तो पा गए, पर कविता भुला गए/ रह गए होकर केवल बंबइया। यह अज्ञेय का हास-परिहास ही था। इस पर हम दोनों हँसते रहे। अज्ञेय ने भारती को कभी बीच धार के कवि के रूप में महत्त्व नहीं दिया था, बल्कि किनारे के कवि के रूप में ही उनका मूल्यांकन किया था। उन्होंने कनुप्रिया की जो समीक्षा कल्पना पत्रिका में की थी, उसके भाषा-प्रयोग से अज्ञेय असंतुष्ट थे। अज्ञेय भाषा के प्रयोग में सांस्कृतिकता, शालीनता और संदर्भ-औचित्य के पारखी थे। इसीलिए माखनलाल चतुर्वेदी के कई भाषा-प्रयोग भी उन्हें अटपटे लगे थे। कनुप्रिया के दो भाषा-प्रयोग उन्हें बहुत खटके थे। एक भारती के द्वारा राधा के सम्बोधन के लिए कनु के द्वारा किया जाने वाला राधन शब्द का प्रयोग और दूसरा मित्र शब्द का व्यवहार भी कनुप्रिया के पौराणिक-सांस्कृतिक संदर्भ में उन्हें अनुचित लगा था। उनका तर्क था कि राजन की तर्ज पर यहाँ राधन का प्रयोग उचित नहीं है, क्योंकि इसकी ध्वनि पुरुषवाची हो जाती है। इसी तरह मित्र शब्द में उन्हें आधुनिक गर्लफैण्ड की ध्वनि मिलती थी। पर उनकी यह आपत्ति मुझे बहुत समीचीत नहीं दीख पडी थी। जहाँ तक राधन की जगह राधे शब्द के प्रयोग की साकांक्षता का प्रश्ा* है, उसमें ऐसा प्रतीत होता है कि वह व्यक्ति संबोधनकर्त्ता से काफी दूर है। प्रत्यक्ष रूप में तो यह दूरी भौगोलिक है पर कहीं-न-कहीं यह आंतरिक दूरी को भी ध्वनित करती है पर राधन शब्द से ऐसा प्रतित होता है कि पुकारने वाला जो पल मात्र के लिए दूर हो गया है वह उसे निकट बुला रहा है। इसकी ध्वनियाँ दूरी से निकट लाने-बुलाने का संकेत देती है। इस शब्द के उच्चारण के बाद यह कहने की कहीं कोई अपेक्षा नहीं रह जाती कि यह कहना पडे कि मेरे पास आओ। राऽधन के उच्चारण में यह सारा-कुछ दूर से निकट बुलाया जाने वाला संदेश स्वतः मुखर हो उठता है। मित्र के विषय में मैं मानता हूँ कि यह एक पारंपरिक शब्द है और मैत्री भाव को, पारस्परिक समानता के भाव को व्यक्त करने के लिए इसका व्यवहार किया गया है। साथ ही यह कहीं सूर्यवाची भी है। प्रकाश और रंगद्योतक भी है।
बांदिवडेकर जी ने मुझे बताया कि दोनों के बीच में लम्बे समय तक अनबोली स्थिति भी थी। पर एक बार जब अज्ञेय जी मेरे घर आए तब उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे भारती के घर ले चलो। मैं उनसे मिलना चाहता हूँ। भारती जी का फ्लैट मेरे साकुंतल आवास में ही था। मैं उन्हें उनके पास ले गया तथा उन दोनों के पारस्परिक संवाद का साक्षी भी बना।
फिर हम लोगों ने अज्ञेय जी के आत्मबल, आत्मविश्वास, लेखकीय स्वाभिमान, मान्यतागत दृढता, जीवन को सम्पूर्णता में देखने की संदृष्टि तथा इसके साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की भी चर्चा की। जब वे अमेरिका गए थे तब उन्होंने अपना होल बॉडी सिटी-स्कैन कराया था। डॉक्टर ने कहीं कोई चिंता की बात नहीं देखी थी। हृदय-विषयक कुछ सामान्य दवाएँ दी गई थीं। अज्ञेय भारत लौट आए थे। हम लोगों ने उनके दीर्घायु होने की कामना की। इसके साथ ही मैं बांदिवडेकर जी से विदा लेकर अपने कमरे में आ गया।
१९८७ की चार अप्रैल की तारीख रही होगी। अचानक और अप्रत्याशित रूप से दुखित कर देने वाला समाचार सुनने को मिला कि अज्ञेय अब नहीं रहे, उनका देहांत हो गया। मैं उन दिनों विभागाध्यक्ष था। मैं अज्ञेय को अपने यहाँ बुलाना चाहता था। पिछले वर्ष वह नहीं आ पाये। पर मेरे मन की यह साध और सोच फलित नहीं हो पाई। मैंने उसी समय विभाग में शोक-सभा का आयोजन किया। हमारे साथ हमारे विभाग में पधारे हुए विजिटिंग प्रोफेसर आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी भी उस शोक-सभा में सम्मिलित हुए। पूरा विभाग सम्मिलित हुआ। शोक-संवेदना का प्रस्ताव पारित किया गया। हिन्दी का एक जीनियस सर्जक हिन्दीसाहित्य के रंगमंच से सदा-सदा के लिए विदा ले चुका था-जेते नाहिं दिबो तबू चले जाई।
अज्ञेय सेना में थे, सैनिक थे, क्रांतिकारी थे, परतंत्र भारत में आजादी के लिए बम बनाना भी सीखा था। पर हिन्दी साहित्य में भी वे अंत तक योद्धा की भूमिका में ही अपने ऊपर किए जाने वाले सारे प्रहारों-आघातों को झेलते रहे। पर इनके बीच रहकर भी उन्होंने अपनी सर्जना के अनुपम, कीर्तिमान से इनको निरुत्तर कर देने वाला प्रत्युत्तर दिया।
मुझे याद आती है अज्ञेय की सोनमछली की वह कविता कई वाक्यों से बनी एक पूर्ण काव्य-प्रोक्ति है। कविता में एक ओर द्रष्टा है और दूसरी ओर भोक्ता। द्रष्टा और भोक्ता की स्थिति वाक्यगत प्रतिज्ञप्तियों से ज्ञापित होती है। हम निहारते रूप- यहाँ द्रष्टा की स्थिति को ज्ञापित करता है। द्रष्टा सौन्दर्य-पक्ष पर मुग्ध है, आसक्त है। दूसरी ओर भोक्ता काँच के पीछे ऐक्विवेरियम में कैद है। उसका हाँफना एक्विवेरियम की इस कैद में उसके जीवन-कर्म और उसके मुक्ति-प्रयास को दिखाता है। मछली बार-बार चक्कर लगाकर हाँफ जाती है, पर इस कैद से मुक्ति नहीं पा पाती। उसकी जिजीविषा मुक्ति की जिजीविषा है। कविता यह स्पष्ट कर देती है कि एक ओर भोक्ता के लिए जिजीविषा काँच के पीछे है, तो दूसरी ओर द्रष्टा के लिए काँच से बाहर रूप-तृषा भी है जिजीविषा। इस प्रकार यहाँ वाक्याधारित अर्थ-स्तर की विरोधी स्थिति की सक्रियता देखने को मिलती है, जिससे यह अर्थ मुखर होता है। पर ये दोनों जिजीविषाएँ एक ही स्थिति में बँधी हैं। वह स्थिति है काँच का बना एक्विवेरियम। कवि ने इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है। पर काँच क पीछे मछली का चक्कर लगा-लगाकर हाँफना जहाँ इस स्थलीयता को स्पष्ट कर देता है वहीं रूप का निहारा जाना भी इस स्थलीयता को केन्द्रित करता है।
इस कविता में लेखिम स्तर पर (Graphemic level) दो बार कोष्ठक (Bracket) के प्रयोग हुए हैं-(सोन-मछली) में और पुनः (और काँच के पीछे) में। यहाँ लेखिम स्तर की यह आवृत्ति साभिप्राय तौर पर सक्रिय है। कोष्ठक का यह घेरा कैद की स्थिति को ज्ञापित करने के लिए है। सोन-मछली कैद में है। अतः इस स्थिति को कोष्ठक से व्यंजित किया गया है और काँच के पीछे में पुनः कोष्ठक इस कैद की स्थिति को शब्दार्थ के साथ-साथ और स्पष्टतर कर देने के लिए आया है।
यहाँ सोन-मछली केवल सोन-मछली नहीं है, अपने अभिधेयार्थ वाली मछली, बल्कि यह स्वर्णाभूषण और धन-सम्पत्ति, सुख-सौख्य के आकर्षण में निरन्तर फँसायी जानेवाली वह नारी है, जो पुरुष की गृहस्थी के ऐक्विवेरियम में कैद रहती है। यहाँ ऐक्विवेरियम को संकेतित करनेवाली काँच अपने अर्थ को गृहस्थी के पारदर्शी घेरे में अन्तरित कर देती है। ऐसा घेरा, जिसमें सीमित पारदर्शिता तो है, पर गतिशीलता या पदचाप तक गृहस्थी के सीमित आँगन में ही कैद है।
अब इन दोनों स्थितियों की अलग-अलग वाक्य-संसक्तियों को लें- (सोन-मछली) हम निहारते रूप/ रूप-तृषा भी है जिजीविषा। पुरुष नारी को गृहस्थी के दायरे में ऐक्विवेरियम की सोन-मछली की तरह कैद करता और रखता है। यह उसका रूप निहारता है। उसका मूल प्रयोजन उसके रूप-पक्ष का ही है। इस रूप-पक्ष के साथ ही उसके साथ-संयोग के काम का यौन (Sex) विषयक अनेक पक्षों को दूरवर्ती सम्भावनाएँ भी उद्घाटित होने लगती हैं। पुरुष की जिजीविषा यहाँ तक जीती है। इस कविता में काम जैसे पुरुषार्थ को उसकी जिजीविषा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चूँकि सामान्य रूप में यही जिजीविषा रूप में और पुरुष की प्राथमिक जिजीविषा में यहाँ स्वीकृत नहीं है। अतः यहाँ भी जैसे बलात्मक निपात का प्रयोग कवि ने रूप-स्तर की विरलता के रूप में किया है। हम के लिए यह भी जिजीविषा-रूप ही है। हम उत्तम पुरुष बहुवचन सर्वनाम है, जिसकी वर्तमानकालिक क्रिया भी बहुवचन पुल्लिंग है। रूप-स्तर की यह पुल्लिंगता ही पुरुष का अर्थ प्रदान कर देती है और पुरुष को सामाजिकता का विस्तार दे देती है। दूसरा संसक्त वाक्य है- काँच के पीछे हाँफ रही है मछली/ और काँच के पीछे है जिजीविषा। यहाँ भी अर्थ-स्तर की अस्वीकार्यता है। जिजीविषा कोई मूर्त वस्तु नहीं है, जो काँच के पीछे दृश्यमान हो। वस्तुतः यह मछली के लिए उपमान है। मछली को संकेतित करनेवाला शब्द है। काँच के पीछे मछली हो तो है। वह जिजीविषा-रूप है। जिजीविषा की साकारिता है वह। इस काँच के पीछे मछली का हाँफना उसकी जीवन-क्रीडा और मुक्ति-संघर्ष-दोनों दृष्टियों से है। आन्तरित अर्थ में नारी के कर्म-संघर्ष और मुक्ति-संघर्ष- दोनों को ज्ञापित करनेवाली प्रतिज्ञप्तिपरक क्रिया है हाँपना। नारी की यह जिजीविषा उसकी सामान्य जिजीविषा है। इसके अतिरिक्त उसकी कोई अन्य गति पितृसत्तात्मक समाज में नहीं है। वास्तव में यह उसके लिए प्राथमिक कोटि की जिजीविषा है, जबकि पुरुष की निरूपित जिजीविषा उसके लिए द्वितीयक कोटि की जिजीविषा है। पर यहाँ द्वितीय कोटि की जिजीविषा ही प्राथमिक कोटि की जिजीविषा पर हावी है। इस प्रकार यहाँ हम और मछली के ब्याज से भारतीय समाज में चले आ रहे पुरुष और नारी के सम्बन्ध को, उसकी मनोवृत्ति और कर्मवृत्ति को तथा उनकी जीवन-स्थिति के वैषम्य को उजागर किया गया है। यहाँ मछली के रूप में नारी की स्थिति की जैसी उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की गयी है वह कवि पन्त की निमजंकित पंक्तियों में भी सुलभ नहीं है- मुक्त करो नारी को, चिर वन्दिनि नारी को/ युग-युग की बर्बर कारा से, जननी, सखि, प्यारी को।
काँच के बाहर हम है और काँच के भीतर मछली। यहाँ कविता में केवल काँच के पीछे (भीतर) का कथन है, इसी से काँच के बाहर की स्थिति व्यंजित होती है। यहाँ हम का पुरुष और मछली का नारी रूप में अर्थ संकेतित होने लगता है, प्रतीयमानता उजागर हो उठती है।
अज्ञेय को भाववादी, व्यक्तिवादी कवि मानने वाले पाठक और आलोचक उनकी सामाजिक चेतना को कभी समझ नहीं पाये। सोनमछली उनकी सामाजिक चेतना की कविता है। प्रगतिवादी काव्यान्दोलन ने नारी की स्थिति की ओर सर्जकों का ध्यान खींचा था। अज्ञेय की यह कविता एक ओर उस संवेदना को निरूपित करती नारी को एक्विवेरियम की कैद से मुक्त करने-कराने को व्यंजित करती है, तो दूसरी ओर यह स्त्रीवादी चेतना का समानधर्मा पुरुष स्वर बनकर हमारे सामने आती है। अज्ञेय की सामाजिक चेतना अभिधेयात्मकता में मुखर नहीं होकर प्रायः प्रतीयमानता में मुखर हुई है। अज्ञेय जब यह कहते हैं कि यह दीप अकेला गर्व-भरा मदमाता/ इसको भी पंक्ति को दे दो तो यहाँ दीप जहाँ ज्ञान के आलोक प्रतीयमानित करता है, वहीं ऐश्वर्य से सम्पन्न जगमगाहट को भी संकेतित करता है। आग्रह पर कि यह व्यष्टि में सीमित न रहे, इसे समष्टि (पंक्ति) को दे दो। इस शैक्षिक और आर्थिक सामाजिक चेतना को क्या केवल इसलिए नकार दिया जाएगा, क्योंकि यहाँ जनवादी सिद्धान्तों की फार्मूलाबद्धता नहीं है। जनवादी आलोचना में प्रायः मध्यवर्ग के व्यक्तित्व के रूपान्तिकरण की बात की जाती है। अज्ञेय की दूर, दूर, दूर वहाँ है, कविता में सर्वसामान्य जन के साथ मध्यवर्ग का यह रूपान्तरण ही तो घटित हुआ है। अनेक प्रकार के श्रमी जनों के साथ यह आत्मप्रसारीकरण ही एक प्रकार से मध्यवर्ग के व्यक्तित्व को सामान्यजन के बीच रूपान्तरित कर देना है। अज्ञेय की सर्जना में ऐसी सामाजिक चेतना स्वतः अन्तर्मुक्त मिलती है।
अज्ञेय अन्तर-पाठीय (Inter-Textural) सर्जक हैं। उन्होंने अन्तर-पाठ के सहारे अपने काव्य-पाठ (Poetic Text) और गद्य-पाठ (Prose Text) को नयी अर्थवत्ता की कौंध से दीप्त कर दिखाया है। इसीलिए यदि प्रभाकर माचवे उनकी थाँप कविता को एक यूरोपीय कविता की अनुकृति और रामविलास शर्मा उनकी सोनमछली को अंग्रेजी गोल्डफिश कविता की अनुकृति कहते हैं, तो साठोतरी अन्तरपाठीय (Inter Textual) स्थापनाओं से उनके अपरिचित रहने और अज्ञेय पर ऐसा आरोप करने पर तरस आता है। अज्ञेय अपनी इन दोनों कविताओं के अंग्रेजी में लगभग एक जैसे पूर्व पाठों के रहते हुए भी अपनी ऐसी नवीन सर्जना से जो अर्थ की दिशा रूपान्तरित कर जैसी अर्थ-विच्छिति-भरी अपनी अनोखी सृष्टि करवाते हैं, वह उन दोनों पूर्व पाठों में भला कहा सुलभ है? वहाँ सर्जन की तैराकी भर हैं, पर अज्ञेय की सर्जन में संवेदना की गोताखोरी है। नामवर हिन्दी कविता और कहानी के तैराक आलोचक रहे हैं। इसीलिए वह यह आरोप करते हुए बताते हैं कि अज्ञेय की कविता में आपको कहीं भी सडक शब्द नहीं मिलेगा, क्योंकि उसमें सामाजिक चेतना का अभाव है। पर क्या मार्कस के मूलभूत वैचारिक चिन्तन के आधार, अधिरचना, प्रतिबद्धता, विचारधारा/ द्वन्द्वात्मकता आदि बीज शब्दों (Key words) के विवेचन में सडक शब्द नहीं आया है? नामवर का कविता में भी अभिधात्मक सडक चाहिए, वह परास केशीगत (Hapogrammaticality), जो सडक को व्यंजित करे, वह नहीं चाहिए। यदि यह क्षमता उसमें होती और अज्ञेय की द्वान्द्वर, दूर मैं वहाँ हूँ कविता उन्होंने पढी और समझी उन्हें आधार रूपी और मात्रा को परिचालित करने वाला, गति देने वाला यह संदेशीय शब्द बडी सरलता से अज्ञेय काव्य में मिल चुका होता। अज्ञेय की कविता प्रायः आलोचक को उसकी पूर्वग्रस्त परिपक्वता से बाँधे रहती है। तभी रामस्वरूप चतुर्वेदी उम्रद्वत शब्दावली से बाँध देते हैं और तत्प के प्रति उनके लगाव को नहीं देख पाते हैं, उन्हें में सीमित करना चाहते हैं और उनके रूमान हरपल की ओर से आँखें बूँद लेते हैं। नन्दकिशोर आचार्य को कविता केवल तैराकी की इच्छा, तितीर्ण को काग्रत् काती है और गोताखोरी के लिए प्रेरित नहीं होती, प्रकृति अज्ञेय की असाधारीण एक और दैवतवीणा के रूप में मिथकीय आचार्य बन जाती है, तो दूसरी ओर लोकवीणा के रूप में इतिहास का यथार्थ। जब कोई वाजपेयी अपनी गर्वीली दिप्तिसेमाथ उन पर अपनी ईर्ष्या की विडम्बनात्मकता मं लिखित है कि बूढा गिद्ध क्यों पंख फैलाये? तो मुझे बरबस अज्ञेय की वह पंक्ति याद आ जाती है- यह दीप अकेला गर्व- कमाता भी पंक्ति को दे दो। पर वह अपने दम्भ में ही फूला रहता है। पर वही वाजपेयी दुनिया से विदा ले लेने पर उसकी र्विमान व्यक्ति और कहल की प्रशंय करने लग जाते है। अज्ञेय को अज्ञेय ही रहने देने के लिए हिन्दी का शिविर यद्यपि निरन्तर प्रयास करता रहता है, पर अज्ञेय सबके लिए ज्ञेय हो जाते हैं और जनवादी आलोचक वे ही इस महान साहित्यकार के सन्दर्भ में अज्ञेय रह जाते हैं।
मैं अज्ञेय की कविता को आस्तिकता-भरे किसी भाव-नैवेद्य के रूप में ग्रहण करता हूँ। मुझे उनमें कालांकितता और कालातीतता- दोनों के दर्शन होते हैं।
अज्ञेय ने महाकवि निराला की तरह स्वयं तो यह घोषणा नहीं की कि लखो दिया है पहना/ मैंने यह हार बना/ भारति उर डर में अपना/ देख दृग यके। पर मुझे प्रतीत होता है कि उनकी सर्जकीय आत्मा और सर्जना को ऐसी गर्वोक्ति प्रिय नहीं थी।
उनके निधन को आज बत्तीस (32) वर्ष बीत जाने के बाद भी उनके साहित्य से अविच्छिन्न रूप से जुडे रहने पर भी मेरा जी चाहता है कि उदास न होऊँ/ पर उदासी/ पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए? मुझे लगता है कि उसकी जीवन-मर्म कविता (ऐसे) झरना/ (जैसे) झरता पत्ता/ हरी डाल से/ अटक गया (हो) उन पर पूरी तरह चरितार्थ हो उठी है।
इस अज्ञेय नामक स्रष्टा-साहित्यकार के यहाँ कितना-कुछ ज्ञेय भाव, विचार और फला वैभव है, इसकी पहचान और इसका संज्ञान-दोनों मुझमें समाहित है। इसीलिए यउनकी सर्जना को आस्तिक मन से मैं कालांकितता के भाव-नैवेद्य की तरह ग्रहण करता हूँ और कालातीतता के चरणामृत से रसाप्याचित होता हूँ।

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