fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

वसंत की उत्कंठा

श्यामसुन्दर दुबे
जीवन एक उम्मीद है। संसार के साथ चलने की, संसार में रमे रहने की! आसक्ति का अपनेपन से उपजा बोध जब ऊर्जा का स्रोत बन जाता है तब जीवन के अनेक अर्थ प्रकट होने लगते हैं। ऐसा अर्थवान जीवन समय के टेढे-मेढे गलियारों में से गुजरते हुए न केवल अपना रास्ता बनाता है, बल्कि दूसरों के लिए भी उसे प्रशस्त करता है। सृष्टि-चऋ उम्मीद की धुरी पर घूमता है। कितना विनाश, कितना ध्वंस अहर्निश घटित हो रहा है! इस सबके बीच जीवन की ललक जागती रहती है। पतझर की विषण्ण वेला में जब संपूर्ण वन-प्रदेश वीतरागी बनकर उजाड-सा हो जाता है, तब कोई एक कलिका चुफ-चुफ किसी शाखा में फूट पडती है -मुस्कान बिखेरती हुई। साधना की सिद्धि बनकर, जीवन की जययात्रा बनकर! उसके साथ ही समूचा जंगल खिलखिला उठता है। वसंत का राग-बोध चतुर्दिक गूँजने लगता है। वसंत एक उत्कंठा है -ऋतुओं के भीतर से जागती, समय को सरस बनाती! उत्कंठा कहाँ नहीं है -सर्वत्र है। सबको गतिशील किये हुए है! वसंत की उत्सुकता जीवन-सौभाग्य की उपलब्धता है।
वसंत को पाने के लिए कुछ खोना पडता है। त्याग के वैभव की संप्राप्ति का नाम ही वसंत है। सबके अपने-अपने वसंत हैं। सिद्धार्थ ने क्या नहीं छोडा? राजभवन से लेकर पत्नी-पुत्र तक को त्यागकर सिद्धार्थ ने बुद्धत्व का वसंत प्राप्त किया। इस वसंत की सुगंध युगों के अंतरालों को भेदकर आज भी अपना मादक भाव बिखेर रही है। गाँधी ने लंगोटी धारण करके जिस आत्म-ऐश्वर्यपूर्ण जीवन को अपनाया, वह आज के प्रतिहिंसक विश्व की धधकती मरुभूमि में शांति का सौरभ विकीर्ण करने का सामर्थ्य संजोये है। कितने निदाघ, कितनी पावस, कितने शरद, हेमंत, शिशिर, सहकर वसंत उगता है। रीतिकालीन कवि बिहारी ने वसंत की साधना की ओर संकेत करते हुए लिखा है, नहिं पावसु, ऋतुराज यह तजि तरुवर चित भूल। अपतु भये बिनु पाइहैं, क्यों नव दल फल फूल। यह ऋतुराज वसंत है। इसे प्राप्त करने के लिए अपत्र होना ही पडता है तभी तो नये पल्लव, फल और फूल प्राप्त किये जा सकते हैं! पतझर के बिना वसंत संभव नहीं होता है।
पतझर भले ही वन का विपत्ति काल लगता हो, किन्तु मेरे लिए तो यह वन का आंतरिक समृद्धि काल है। वृक्ष का वैराग्य काल ह। अपने राग अनुभव को अपनी आत्मिक गहराईयों में परिपक्व करने का यह काल एक नयी सामाजिकता का उद्गीथ रचता है। कोई एक अकेला वृक्ष नहीं, कोई एक अकेली नस्ल वाला वृक्ष नहीं -सभी वृक्ष, एक साथ अपने पत्तों को त्याग देते हैं। बडे से बडा वृक्ष और छोटे से छोटा गुल्म सब इस कठिन समय में एक से हैं एक हैं। यह रस के परिपाक का समय है। पतझर में वृक्ष सूखता नहीं है, भीतर ही भीतर अपना रस संग्रह करता है। रंगों, रूपों, ध्वनियों, स्पर्शों और आस्वादों में बदलने की अद्भुत सृजन क्षमता का अनोखा विधान अपनी शाखाओं-प्रशाखाओं में आयोजित करता हुआ। ऊपर से रूखी दिखने वाली डालें भीतर ही जीवन की गहन आसक्तियों से परिपूर्ण हैं। निराला यदि कहते हैं- कि डाल रूखी जरूर है, पर सूखी नहीं है। वे आशान्वित हैं कि इसी डाल पर वासंती वस्त्रों की रंग-बिरंगी प्रदर्शिनी खिल उठेगी। वसंत अपने संपूर्ण आभरणों से इसे श्ाृँगारित कर देगा। वसंत की उत्कंठा इसे नूतन बना देगी!
वसंत के आगमन की आशा एक अवलंब है। एक ऐसी जगह पर, जहाँ सब कुछ छूट जाने के बाद अनंत रिक्तियों का सामना करता पडता हो। जहाँ अकेले पडते आदमी का साहस चुक रहा हो। स्मृतियों में आबद्ध सुख के झिलमिलाते से क्षण जहाँ आँसुओं की टपकती-ढुलकती आभा में झलक रहे हों। जहाँ पत्रहीन कंटकित गुलाब के पेड में एक भी फूल न बचा हो -फूलों की गंध का झोंका जहाँ कभी-कभी चक्कर लगा जाता हो भला ऐसे भंडफोड परिवेश में रस-लुब्धक भ्रमर क्या करेगा। उसे भाग जाना चाहिए - उड जाना चाहिए कहीं और जगह! कविवर बिहारी कहते हैं,जिन दिन देखे वे कुसुम गई सु बीत बहार! अब अली रही गुलाब की अपत कटीली डार! भ्रमर! जा भाग जा! बहार बीत गई है। अब इन कांटों में तू क्या करेगा। कवि ही यदि जीवन से पलायन का विषय राग अलापने लगे तो फिर वसंत की उत्कंठा को जगाएगा कौन? कवि इस संसार का वसंत है। उसे लगता है कि पलायनवाद उसका इष्ट नहीं है। वह लौटाना चाहता है एक सुखद और प्रफुलित परिवेश। वह भ्रमर के भीतर गहन आस्था का, जीवन के प्रति एक चरम आसक्ति का भाव सुरक्षित करना चाहता है। इहीं आस अटक्यो रह्यो अलि गुलाब के मूल। अईहैं फेरि वसंत ऋतु इन डारन वे फूल। गुलाब के पौधे की जड में भ्रमर, इसी आशा से अटक जाता है कि फिर वसंत आयेगा और रूखी डालों में फूल खिल जाएँगे। जड की रस-स्राविनी शक्ति से जैसे भ्रमर परिचित है। पौधे के भीतर जो शक्ति है, वह भविष्य की उज्ज्वल संभावना की ओर ही संकेत करती है। वसंत अनंत संभावनाएँ लेकर आता है। रस, रूप, गंध, स्पर्श और ध्वनि का मेला लगाने वाला वसंत जीवन के अनेक लुभावने दृश्य रचता है। पतझर के प्रहारों का प्रतिकार करने वाली जडों में जीवन-रस का संचित मधुकोष सुरक्षित रखना ही वसंत की उत्कंठा का आधार है।
जडों का रस सूख रहा है, और वसंत की उत्कंठा की कलिका में कोई कीडा प्रविष्ट हो गया है। मुझे निराला फिर याद आ रहे हैं-पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा-बुझा है। यह कथन उन्हीं निराला का है जो कहते थे अभी-अभी ही तो आया है, मेरे वन में मृदुल वसंत! अभी न होगा मेरा अन्त। आशा दुराशा में बदल गई। कोंपल आने-आने को थी कि ऐन उसके उद्भवन बिन्दु पर जहर की बूँद टपक पडी। वसंत की उत्कंठा को दग्ध किया जा रहा है। जड पर विष बुझा बाण चला दिया गया है। मेरा वसंत ठिठक गया है। गाँव के भीतर सूनापन है। जंगल का वसंत जब गाँव तक आता है, तब वसंत जीवन की जागृति का जरीया बनता था। तभी वह चारुतर वसंत होता था। कालिदास ने इसी वसंत को याद किया था, द्रुमाः सपुषाः सलिलं सपद्मं स्त्रियं सकामा पवनः सुगंधि। सुखः प्रदोषः दिवसश्च रम्याः सर्व प्रिये चारूतरं वसंते। यह वसंत चारुतर तभी है, जब इसमें रमने वाला मनुष्य अपने भीतर के वसंत से भरा-पूरा हो। अन्यथा फूल, बबूल और अनफूले कचनारों से उसे क्या मतलब? जो पुष्पित वे और जो अपुषित वे भी, उस मनुष्य के किस काम के जो मशीनों के जंजाल में खट रहा है, जो बीस मंजिल के दर्जे में गठरी-पुठरी बना धक्कम-धुक्की में पिचल रहा है-पिस रहा है। इस आदमी के लिए मंजरित आम, सुगंधित पवन, खिले कमल दल, रमणीय दिवस और सूखी रात्रियाँ किस प्रयोजन की! मनुष्य जब इस सृष्टि में संभव नहीं हुआ होगा, तब भी प्रकृति अपने इसी रूप में विहंसती होगी, तब भी वह चारुतर वसंत की मल्लिका बनती होगी, किन्तु मनुष्य के बिना यह सब एक प्राकृतिक घटना मात्र थी। प्रकृति तो मनुष्य की सापेक्षता में ही अपनी संवेदनात्मक सार्थकता का विस्तार करती है। प्रकृति और मनुष्य की साझेदारी ही वसंत को सकाम बनाती है। मनुष्य के अभाव में वसंत का अभिन्न सहचर कंदर्प किस पर अपने पंच प्रसून वाण छोडेगा। ऐंद्रियक उत्तेजनाओं को उद्दीप्त करने वाला वसंत जिन कला-संवेदनाओं में उपस्थित होता रहा है, वे कला प्रतिमान तो मनुष्य ने गढे हैं। राग मालाएँ, चित्रबीथिकाएँ, नृत्य, नाटिकाएँ, नर्म ऋीडाएँ और इन्हें आस्वादित करने वाली रस धाराएँ अपनी प्रस्तुति में मनुष्य और प्रकृति के अंतराल में लीलारत वसंत जब एकमेक होते हैं, तभी वसंत की कविता रची जाती है।
जंगलों, बाग-बगीचों में जितने रंग के फूल खिलते थे, वे सभी रंग मेरे गाँव के परिधानों पर नमूदार हो उठते थे-वासंतिक त्योहार होली पर! तब केमीकल से बने रंग प्रचलन में नहीं थे। रंग गाँवों में ही बनाये जाते थे। टेशू के फूल से केसरिया रंग बनता था। कनेर, गुडहल, कचनार जैसे फूलों के रंग उतारने के लिए आसवन प्रत्रि*या अपनाई जाती थी। हरा रंग पत्तों से उतारा जाता था -इसे जंगलिया नाम दिया गया था। जैसे रंगपात्र में जंगल की रंगदारी ही उडेली गई हो। ये रंग पिचकारियों में भरकर जब डाले जाते थे, तब इनकी तेज बौछार से अच्छे-अच्छों के छक्के छूट जाते थे, इसलिए इस रंग-प्रहार को पिचकारी मारना कहा जाता था। शिकायत होती कि न मारो पिचकारी, मोरी भीगी रंग सारी। ऐसी पिचकारी मत चलाओ मेरी पूरी साडी भींज गई है। साडी ही नहीं भींजती थी-मन भी भींजते थे। रंगों की बौछार के पहले रंग की गंध से सराबोर होने वाली कहती थी, मो पे रंग न डारो साँवरिया मैं तो ऊसई अतर में भीजी। मैं तो वैसे ही खस, मोंगरा, बेला जैसे फूलों के इत्र में भींगी हुई हूँ-अब मेरे ऊपर रंग डालने की जरूरत नहीं है। मेरे भीतर मेरे अपने मन में तो तुम्हारे प्रेम का इत्र खुशबू मार रहा है-मुझे उसी में डूबी रहने दोः तन भींजते थे और मन गीले हो जाते थे। गीले मन ही गाँव में प्रेम का पारावार रचते थे। प्रत्येक व्यक्ति के मन में यह ललक रहती थी कि वह होली में रंग-बिरंगा हो उठे, ऐसी होली खेले कि उसका अहम गल जाए। वह पहचानहीन हो जाए! हुरिहारों की भीड बन जाए!
अब न वे रंग-गुलाल में सनने वाले गाँव बचे, न वे फगुवारे जिनके बोल अमराईयों में गूंजते थे तो मुकुलित आम से पिंग पराग ऐसे झडने लगता था, जैसे अमराई भी पीला गुलाल उडा रही हो। गाँव खाली हो गया है। पता नहीं कहाँ-कहाँ मेरा गाँव मारा-मारा फिर रहा हो। पेट के खातिर खटने के लिए चक्करघिन्नी हुआ मेरा गाँव अब भारतीय कहाँ रहा। वह पर प्रांतीय होकर कभी किसी प्रांत से खदेडा जा रहा है, कभी किसी प्रांत से। अपनी जडों से बेदखल होकर लोगों को पाँव जमाने की जगह नहीं मिल रही है। जडें सूख रही हैं। वे जडें जो गाँव को रससिक्त बनाये रखती थी। आल्हा, कजरी, दिवारी, होली, फाग से लेकर व्रत-त्योहार, नाच, माच जैसे कला आयोजनों ही से गाँव में वसंत बगरा रहता था। अब छातीजार अकाल-दुकाल गाँव को घेरे हुए हैं। खेती ठेका पर, यंत्रों और रासायनिक उर्वरकों के भरोसे! बोया बीज नहीं मिल पाता। बैंकों का कर्ज और मुफ्तखोरी की सरकारी आदतों ने गाँव को निकम्मा बनाया। नयी पीढी गांजा, सट्टा, जुआ और शराब में डूबी है। समाज की नीरंध्र एकरसता दरारों से पीडित है। ताना, बाना से लड रहा है। एक रंग दूसरे रंग के विरुद्ध तना खडा है। रंग-बिरंगा मेरा देश कितना बदरंग हो गया है? स्वतंत्रता के मुकुलित वसंत पर निरंतर तुषारापात हो रहा है। अब न तो गाँव का चैन लौटाया जा सकता है, न हल-बक्खर लौटाये जा सकते हैं। न वे लोकगीत, जिनके आसरे आडे समयों को लोग काट लेते थे। फिर भी मेरा देश बदल रहा है, मोबाईल पर पूरी दुनिया मुट्ठी में ले चलने वाला मेरा गाँव बदल रहा है। किसी में बल-बूता नहीं जो इस बदलाहट को रोक सके इसलिए बीते हुए पर सियापा करने के बजाय परिवर्तनों को जडों से जोडने की हिकमतें तलाशना जरूरी है -वे हिकमतें चाहे महात्मा गाँधी में मिलें, चाहे आदि शंकराचार्य में मिलें, चाहे विवेकानंद में मिलें -इन हिकमतों में ही मेरे देश की जडों का जीवनरस समाया हुआ है। इस रस से आपूरित जडें ही देश में वसंत की प्रतिभूति हैं।
कालिदास के अभिज्ञान शांकुतलम् में एक दृश्य आता है। राजा दुष्यंत को वह अंगूठी प्राप्त होती है,जो उन्होंने शकुंतला को भेंट की थी। अंगूठी प्राप्त होते ही दुष्यंत शकुंतला की याद से पीडित हो उठते हैं। यह आसन्न वसंत का समय था। वे विरह व्यथित होकर आदेश देते हैं कि वसंत से कह दो वह मेरे राज्य में न आये। आम्र-बौरों को मुलकित होने से रोका जाए। वसंत को स्थगित करने का आदेश कितना परिपालित हुआ मैं यह तो नहीं जानता किन्तु इतना जरूर जानता हूँ कि वसंत का रुतबा चऋवर्ती नरेश से भी ज्यादा है -इसलिए वह आया होगा, जरूर आया होगा। मनुष्य के भीतर जो अदम्य जिजीविषा है, वह उसे प्रत्येक विपरीत के मध्य खडे होने का साहस देती रहेगी। यह जिजीविषा ही उम्मीदों का पर्याय है। वसंत उम्मीदों के जागरण की अकुलाहट देता है। उम्मीदों को पल्लवित, पुष्पित तथा फलभरित भी करता है। वसंत की उत्कंठा केवल ऋतु की ही उत्कंठा नहीं, वह मनुष्य के भीतर का सौभाग्य है। मनुष्य के भीतर उमडती-घुमडती उत्सव चारुता की कविता है। यह कविता कभी मरती नहीं है, कभी जीर्ण-शीर्ण नहीं पडती। पश्य देवस्य काव्यम् न जीर्णयति न मारयति।
सम्पर्क : श्री चंडी जी वार्ड,
हटा (दमोह) म.प्र. 470775.,
मो. 09977421629