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हिंदी कथा संसार की अदृश्य स्त्रियाँ

सुप्रिया पाठक
कहानी शब्द कानों में पडते ही, जो बिम्ब हमारे सामने सबसे पहले उभरता है वह है दादी,नानी या माँ का। बचपन की हमारी स्मृतियों में हमारी ये माँएं, दादियाँ, मौसियाँ ,नानियाँ जब कोई किस्सा-कहानी कहती, अपने भाव-भंगिमाओं से उसे पूरे भरोसे के साथ हम बच्चों के दिलो-दिमाग में बैठाती। ऐसा करते हुए वो खुद को भी जाने-अनजाने उस कहानी का एक किरदार बना लिया करतीं थीं । उनके कारण हम रोज एक नई कहानी से रूबरू होते चले गए उस कहानी के कई किरदार हमारे जेहन में अब तक बने रह गए। उस समय कहानी हमारे लिए कोई साहित्यिक विधा नहीं थी, और ना ही उसे सुनाने वाली हमारी माँ कोई बडी कथाकार। कहानी हम सबके लिए संसार को जानने-समझने का एक माध्यम थी। इसके बहाने हम तमाम किस्म के सामाजिक (यथा राज-रंक, अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, प्रेम, सद्भाव, ईर्ष्या ,जलन, द्वेष, भाईचारा, मोह, जाति-पांति) संरचनाओं एवं मानवीय संबंधों को समझते हुए बडे हो रहे थे। कहानी वस्तुतः एक सशक्त विधा थी जो बिना किसी तामझाम के अत्यंत लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात हम तक पहुँचाते हुए हमारे भावनात्मक पक्षों को मजबूती प्रदान किया करती थी। महाआख्यानों की गाथा से लेकर छोटी-छोटी किंवदंतियों की किस्सागोई करती हुई ये स्त्रियाँ अपने अनुभव संसार और कथा दृष्टि से उस कथानक के सबसे कमजोर पात्र को भी हमारे सामने जीवंत कर दिया करतीं। ग्रिम बंधुओं, जैकब (1765-1863) और विल्हैम (1786-1859) ने जगह-जगह घूमकर बेहतरीन लोककथायों का संकलन किया था । अपनी पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि उन्होंने किस प्रकार ये कहानियाँ इकठ्ठी कीं, या इसके लिए उन्हें कहाँ-कहाँ जाना पडा और कैसी कैसी कोशिशें करनी पडी। वे लिखते हैं कि, एक बूढी स्त्री जिन्हें काफी कहानियाँ याद थीं, के पास वे कुछ छोटे-छोटे बच्चों को भेज दिया करते और कहानी सुनाने का आग्रह किया करते । हम खुद भी दरवाजे के पीछे छिप के बैठ जाते और कहानी सुनते हुए उसे लिखते जाते। वो जिस अंदाज से कहानी सुनातीं,उनके सामने बडे बडे कथाकार और किस्सागो पानी भरते से प्रतीत होते। इसलिए कि उनके कथा सुनाने में एक अजीब सा रस और नाटकीयता थी।1 यह थी लोक की स्त्री और उसकी वाचिक परंपरा जो धीरे-धीरे लोक से निकल कर लेखन की शास्त्रीय दुनिया में समाती चली गई । जिसने दादी-नानियों की उस किस्सागोई परंपरा का भी अंत कर दिया जो बच्चों के लिए कहानी से ज्यादा हकीकत हुआ करता था। आखिर ऐसा क्यों और कैसे हुआ कि स्त्रियाँ इस विधा से दरकिनार कर दी गईं? इसकी पडताल वर्तमान समय में प्रासंगिक है।
वर्तमान समय में सांस्कृतिक चुप्पियों को विमर्श के जरीए भरने के ऋम में स्त्री कथा के मौखिक और लिखित परंपरा का पुनर्लेखन एक आवश्यक हस्तक्षेप है। स्त्रीवादी सिद्धांत में इतिहास लेखन वस्तुतः विस्मृत आख्यानों, स्वरों तथा परंपराओं की पडताल की एक विधा है,जिसने अपने सार्थक हस्तक्षेप से कई नई व्याख्याओं को जन्म दिया है। आइए, इसके जरीए ही हम हिंदी कहानियों की विकास यात्रा को समझें और लगभग विस्मृत कर दी गई किस्सागो स्त्रियों के साथ-साथ वर्तमान समय की कुछ चुनिंदा स्त्री कथाकारों के लेखन के वैचारिक आयामों की चर्चाकरें जिन्होंने अपनी पुरखिनों की थाती संभाल रखी है और अपने लेखन में भी सायास उन परंपराओं, संबंधों तथा वर्जनाओं को अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत कर रही हैं जो स्त्रियों की वाचिक कथा संसार का हिस्सा रही हैं। वस्तुतः यह समस्त स्त्रियों के संबंध में सामाजिक-सांस्कृतिक रूप में विद्यमान जेंडर विभेद को समझने का प्रयास है। साथ ही, साहित्य की वाचिक एवं लिखित परंपरा के इतिहास लेखन के क्रम में इतिहासकारों तथा आलोचकों द्वारा उन्हें स्त्री के रूप में एक श्रेणी मानकर अलग-थलग कर दिए जाने की प्रवृति के आलोचनात्मक विश्लेषण का भी प्रयास है।
आधुनिक हिंदी कथा सहित्य का जन्म ऐसे समय में हुई जब साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष एक नए दौर में प्रवेश कर चुका था। इसी समय साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रतिरोधात्मक कार्रवाईयाँ जोर पकड रही थीं।2 हिन्दी कहानी का आविर्भाव सन् 1900 से 1907 के बीच समझा जाता है। किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी इंदुमती 1900 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई। यह हिन्दी की पहली कहानी मानी गई। 1901 में माधवराव सप्रे की एक टोकरी भर मिट्टी ; 1902 भगवानदास की प्लेग की चुडैल 1903 में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की ग्यारह वर्ष का समय और 1907 में बंग महिला उर्फ राजेन्द्र बाला घोष की दुलाईवाली बीसवीं शताब्दी की आरंभिक महत्वपूर्ण कहानियाँ थी। मीरजापुर निवासी राजेन्द्रबाला घोष बंग महिला के नाम से लगातार लेखन करती रहीं। उनकी कहानी दुलाईवाली में यथार्थ चित्रण व्यंग्य विनोद, पात्र के अनुरूप भाषा शैली और स्थानीय रंग का इतना जीवन्त तालमेल था कि यह कहानी उस समय की जरूरी कृति बन गई। इस काल खण्ड की अन्य उल्लेखनीय लेखिकाएँ थीं- जानकी देवी, ठकुरानी शिवमोहिनी, गौरादेवी, सुशीला देवी और धनवती देवी। यह राजनीतिक उथल-पुथल और जन-जागरण का भी समय था। अतः इनके बाद की महिला कहानीकारों में हमें राष्ट्रीय-चेतना के दर्शन हुए। वनलता देवी, सरस्वती देवी, हेमन्तकुमारी और प्रियम्वदा देवी ने अपनी कहानियों में राजनीतिक सरोकारों का परिचय दिया। समाज में फैली कुरीतियों यथा बाल-विवाह, पर्दा प्रथा और अशिक्षा को विषय-वस्तु बना कर मुन्नी देवी भार्गव, शिवरानी देवी (प्रेमचन्द की पत्नी) चन्द्र प्रभादेवी मेहरोत्रा, विमला देवी चौधरानी आदि ने कहानियाँ लिखीं। इन रचनाकारों ने अपने तरीके से यथार्थपरक, समाजोन्मुखी लेखन की नींव रखी।
इसी सन् 1916 ई. के आस-पास प्रेमचन्द और प्रसाद कहानी के क्षेत्र में आए। इसके बाद हिन्दी कहानी पर अंग्रेजी और बंगला कहानीकारों का प्रभाव कम होने लगा। द्विवेदी युग की सरस्वती, सुदर्शन, इन्दु, हिन्दी गल्प-माला आदि पत्रिकाओं का हिन्दी-कहानी के प्रारम्भिक विकास में बडा महत्त्वपूर्ण योगदान है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य में कथा लेखन की विधा हजारी प्रसाद द्विवेदी के समय में विकसित हुई। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और द्विवेदी दोनों ही हिंदी साहित्य के प्रस्थान बिंदू के रूप में जाने जाते हैं, परंतु यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदी साहित्य के इतिहास एवं विकास पर चर्चा करते हुए वे महिला लेखन पर कोई टिप्पणी नहीं करते और ना ही स्त्री कथा लेखन के इतिहास को कोई तवज्जो देते हैं। आचार्य शुक्ल की सबसे बडी कामयाबी इस बात में रही कि उन्होंने हिन्दी जनमानस में इस बात को पूरे विश्वास के साथ बैठा दिया कि यहाँ की स्त्रियाँ मानसिक विकास में सामान्य से निचले स्तर की रही हैं। उन्होंने एक जगह लिखा है, नाथ सम्प्रदाय भी जब फैला तब उसमें भी जनता की नीची और अशिक्षित श्रेणियों के बहुत-से लोग आए जो शास्त्र-ज्ञान सम्पन्न न थे जिनकी बुद्धि का विकास बहुत सामान्य कोटि का था। इनमें कम से कम इतनी बुद्धि तो रही कि आचार्य को इनका नाम लेने के लिए मजबूर होना पडा, तब स्त्रियों की बौद्धिक क्षमता आचार्य की नजरों में क्या होगी कि उनका नाम लेना भी वे उचित नहीं समझते? यही वजह है कि इतिहासकारों को स्त्रियों में रचनात्मकता के कोई तत्त्व ही नहीं मिलते। दक्षिण भारतीय स्त्री आन्दाल (सातवीं-आठवीं सदी) और हिन्दी की मीरा (पंद्रहवीं सदी) जैसी कवयित्रियाँ क्या अचानक बिना किसी स्त्री लेखन की परम्परा के पैदा हो सकती थीं?4 यह प्रवृत्ति दरअस्ल महिला लेखन को कमतर अथवा नगण्य मानने की उनकी पितृसत्तात्मक विचारधारा का परिचायक है जिसने हिंदी साहित्य की परंपरा में स्त्री लेखन की कोई परंपरा कभी बनने ही नहीं दी। वस्तुतः वह लेखक कहलाने की श्रेणी से ही सयास बहिष्कृत की गईं। स्त्री के प्रश्न हाशिए के नहीं बल्कि जीवन के केंद्रीय प्रश्न हैं। किंतु हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में स्त्री प्रश्नों अथवा स्त्री मुद्दों की लगातार उपेक्षा की जाती रही है। कुछेक इतिहासकारों को छोड दें तो अधिकांश इतिहासकारों ने या तो स्त्रियों की रचना को उपेक्षित ही किया या उस पर छिटपुट टिप्पणी करके खाना पूर्तिभर की।
इस उपेक्षा का कारण यह हर्गिज नहीं था कि स्त्रियों ने नहीं लिखा। ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि स्त्री रचनाकारों की एक लम्बी श्ाृंखला है जिन्होंने लगातार लिखा है। सुधा सिंह ने अपनी संपादित पुस्तक स्त्री कथा में सिलसिलेवार ढंग से स्त्री कथाकारों तथा उनकी कहानियों को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से ही हिन्दी में स्त्रियाँ साहित्य रचनाएँ कर रही थीं। बंग महिला की दुलाईवाली को हिन्दी की पहली कहानियों में जगह मिली और बीसवीं सदी में महिलाओं ने पत्रिकाएँ भी निकालीं, लेकिन 1950 से पहले के साहित्य इतिहास में जगह बनाने योग्य महिलाएँ महादेवी वर्मा के अलावा किंचित मात्र ही रहीं। प्रगतिशील कहे जाने वाले आन्दोलनों में एक भी स्त्री रचनाकार क्यों नहीं आई, यह प्रश्न गहराई से सोचने को विवश करता है।
भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से लेकर साठोत्तरी दौर की महिला कथाकारों के बीच कुछ खुली कुछ दबी एक ऐसी भी पीढी आई जिसने स्त्री-जीवन के संघर्षों को तत्कालीन प्रसंगों की कहानियों के माध्यम से प्रकाश में लाने का प्रयास करते हुए आने वाली पीढी का मार्ग प्रशस्त किया। सामाजिक कुव्यवस्था, निजी अनुभव, व्यक्तिगत बंधन तथा आत्मीय रिश्ते- ऐसी कई चीजे हैं जो महिला लेखकों को बाकी सब से अनूठा बनाती हैं। इस दौर की प्रमुख हस्ताक्षर हैं-बंगमहिला (राजेन्द्रबाला घोष), उषादेवी मित्रा, सुभद्राकुमारी चौहान, होमवती देवी, सुमित्राकुमारी सिन्हा, चन्द्रकिरण, सौनरेक्सा, शिवरानी देवी प्रेमचन्द, रजनी पनिकर आदि। इनकी कहानियों का मुख्य आधार रहा स्त्री-जीवन। साठोत्तर तक आते-आते स्त्री की दशा और दिशा में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन आए जो हमें उस दौर की कहानियों में भी देखने को मिलते हैं। महादेवी स्त्री को लेकर अपने समय की सोच पर या स्थितियों पर कोई बयान नहीं देतीं पर उस समय से उठाए गए एक स्त्री पात्र का जैसा रोंगटे खडे कर देने वाला चित्रण वह करती हैं, वह अपने आप में एक बयान है। कृष्णा सोबती की मित्रो मरजानी, उषा प्रियंवदा की पचपन खंभे-लाल दीवारें, मन्नू भंडारी की कहानियाँ -बंद दराजों का साथ, तीन निगाहों की एक तस्वीर, अकेली, नई नौकरी, स्त्री सुबोधिनी परंपरा और विद्रोह के संधिकाल में खडी स्त्री की कहानियाँ हैं। इन कहानियों का विश्लेषण करें तो उस समय की स्त्री की सामाजिक स्थिति को बखूबी पहचाना जा सकता है। लेकिन महिला रचनाकारों की यह त्रयी जब तक रचनारत थी, इन्हें महिला लेखन के खाँचे में नहीं डाला गया। उनकी कहानियों का जिऋ या समीक्षा मुख्यधारा के रचनाकारों के साथ ही की गई।
भारतीय लेखिकाओं के विषय में यह बात विशेष तौर पर कही जा सकती है क्योंकि यहाँ एक महिला कई तरह की सामाजिक एवं निजी भूमिकाओं का निर्वाह करती है। भारत में इस वक्त कई लेखिकायें हैं जो चाहती हैं कि उनके लेखन को स्त्री पुरुष के लिंग मतभेदो से परे होकर देखा जाए। परंतु इसका अर्थ ये नहीं है कि उन्हें स्त्रियों द्वारा लिखे स्त्रियों पर आधारित अपनी कृतियो पर गर्व नहीं है। साठ-पैंसठ साल पहले तक महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर, उनके सशक्तीकरण, उनकी उपलब्धियों और संघर्षों पर, उनके रचे साहित्य और अवधारणाओं पर गंभीरता से चर्चा नहीं की जाती थी। महिला लेखन को बहुत सम्माननीय दर्जा प्राप्त नहीं था और जो दो-चार महिलाएँ रचनाएँ करती भी थीं, उन्हें घर के सीमित दायरे की सीमित समस्याओं के घेरे में रचा लेखन मानकर या घर बैठी सुखी महिलाओं का लेखन मानकर या तो गंभीरता से नहीं लिया जाता था या एक आरक्षित रियायत दे दी जाती थी कि आखिर तो इनका दायरा छोटा है, परिवेश सीमित है तो बडे फलक के मुद्दे कैसे उठाएँगी। इस धारणा का खण्डन करते हुए स्त्री-विमर्श से जुडे मुद्दों को तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप अपनी कहानियों के माध्यम से नींव रखकर साठोत्तरी महिला कथाकारों को भवन-निर्माण की पूरी सामग्री उपलब्ध करवाई। हिन्दी कहानी में स्त्री-विमर्श की शुरुआत के साथ ही कहानी के कथ्य और शिल्प में विमर्श का कान्सेप्ट कहानी के नवीन स्वरूप को हमारे समक्ष प्रस्तुत हुआ।
माँ की कहानियाँ हमें सुलाती थीं, समकालीन स्त्री कथा साहित्य हमें जगाता है........
महिला कथाकारों में जितनी ख्याति और लोकप्रियता शिवानी ने प्राप्त की है, वह एक उदाहरण है श्रेष्ठ लेखन के लोकप्रिय होने का। शिवानी लोकप्रियता के शिखर को छू लेनेवाली ऐसी हस्ती हैं, जिनकी लेखनी से उपजी कहानियाँ कलात्मक भी होती हैं और मर्मस्पर्शी भी। अन्तर्मन की गहरी पर्तें उघाडने वाली ये मार्मिक कहानियाँ शिवानी की अपनी मौलिक पहचान है जिसके कारण उनका अपना एक व्यापक पाठक वर्ग तैयार हुआ। इनकी कहानियाँ न केवल श्रेष्ठ साहित्यिक उपलब्धियाँ हैं, बल्कि रोचक भी हैं। हिंदी की आधुनिक लेखिकाओं में मृणाल पण्डे अपने विशिष्ट रचना संसार के कारण अलग पहचान बनाए हुए हैं। उनका लेखन जीवन कि समग्रता का प्रस्तुतीकरण लेकर सामने आता है। उन्होंने स्त्री की पहचान,स्त्री कि शक्ति, स्त्री के संघर्ष एवं स्त्री से जुडे हुए अनेक प्रश्नों का विश्लेषण अपनी रचनाओं में किया है। मृणाल पाण्डे का भारतीय जीवन के नये परिवेश पर गम्भीर पकड है, जिसमे भारतीय परिवारों कि व्यवस्था करती हुई नारी का यथार्थ चित्रण है। उनके कथा साहित्य में चित्रित स्त्रीपरिवेश, स्थिति और विशिष्ट संवेदनाओं को लेकर सामने आती हैं। उनकी रचनाओं में स्वाभाविकता एवं सहजता है। अनुभूति की गहराई एवं नवीन मूल्यों को उभारने का प्रयत्न भी उनकी रचनाओं की प्रमुख विशिष्टता है। स्त्री का बदलता रूप, उसका आत्मविश्वास एवं विद्रोह, अपनी अस्मिता की पहचान करती अद्भुत जीवंत, स्त्री के तमाम नवीन रूप उनके कथा साहित्य में दृष्टिगोचर होते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मृणाल पाण्डे का कोई जवाब नहीं। किसी मंत्री से राजनीति पर बातचीत हो या भाषा-विवाद या महिला मुद्दा सभी पर उनकी प्रस्तुति विचारोत्तेजक होती है। पत्रकारिता का कोई भी क्षेत्र उनसे अछूता नहीं।
उसी प्रकार सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि और गहरे भावनात्मक प्रवाह की धनी कथाकार हैं वंदना राग।परिपक्व भाषा-संस्कार और अपने पात्रों के माध्यम से अपने समय-समाज के स्याह-सफेद पर वयस्क दृष्टि डालते हुए वंदना राग अपनी कहानियों में जीवन की जिन विडम्बनाओं और छवियों को चिह्नित करती हैं, उनसे हम अपने समय के खाली स्थानों को समझ और पकड सकते हैं। वंदना राग के पात्र अपनी संश्लिष्टता और वैविध्य में अपनी समकालीन सच्चाइयों को इतने विश्वसनीय ढंग से उजागर करते हैं कि उनकी कहानियाँ अपने समय की समीक्षा करती नजर आती हैं। जिये हुए और जिये जा रहे अपने वक्त का साक्ष्य उनकी भाषा में भी दिखाई देता है जो सिर्फ कहानी को बयान नहीं करती, उसकी अन्तर्ध्वनियों को चिह्नित भी करती जाती हैं। इस संग्रह में शामिल दसों कहानियाँ इस तथ्य की साक्षी हैं कि हिन्दी की युवा कहानी अपने कथ्य के जरिये अपने वक्त को जितनी गम्भीरता से पकडने की कोशिश कर रही है, वह उल्लेखनीय है, और वंदना राग ने इस परिदृश्य में अपनी सतत और रचनात्मक उपस्थिति से बार-बार भरोसा जगाया है। संग्रह में शामिल विरासत, त्रि*समस कैरोल, मोनिका फिर याद आई और हिजरत से पहले जैसी कहानियाँ पाठकों को लम्बे समय तक याद रहेंगी। वन्दना राग अपने समय की ऐसी कथाकार हैं, जिन्हें किसी पूर्वांग्रह समाहित ढाँचे में नहीं बाँधा जा सकता है। वे अपनी कथा-रचना की प्रत्रि*या के दौरान ही सारे स्थापित ढाँचों का अतिऋमण कर अपने लिए सर्वाधिक नया स्पेस बनाती चलती हैं। एक बिंदास, खुले, यायावर समान। यही नयापन उनके विविध आयामी कृतित्व में उद्भासित होता है। उनके यहाँ थीम्स और पात्रों का सीमा-बन्धन नहीं है। वहाँ स्त्री, पुरुष, दलित, पिछडे, अल्पसंख्यक और वंचित सभी हैं और वे सभी अपने संश्लिष्ट और मनुष्यगत स्वरूपों में हैं। वे अपनी अच्छाइयों और बुराइयों समेत अपने समय से मुठभेड करते हैं। उनकी सर्वाधिक चचि*त कहानी यूटोपिया साम्प्रदायिकता जैसे नाजुक विषय को एक नए अन्दाज में उठाती है। रोमान से हटकर यह कहानी साम्प्रदायिकता बोध और साम्प्रदायिक अस्मिताओं के संघर्ष की उस कठोर स्थापना को रेखांकित करती है, जिसके आगे प्रेम, मनुष्यता अथवा अन्य कोमल भावनाओं के लिए कोई स्थान बचा नहीं रह जाता। यह हमारे समय की सबसे बडी त्रासदी है। इसी प्रकार कहानी कबिरा खडा बजार में और शहादत और अतिऋमण स्त्री की पहचान तथा स्त्री की शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक स्वाधीनता के मार्ग को तलाशने वाले संघर्षों की कहानियाँ हैं। नमक, छाया युद्ध, टोली तथा नक्शा और इबारत इस तरह की प्रामाणिक कहानियाँ हैं। वन्दना का नजरिया सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि वाला है। सबसे बडी बात यह है कि वे एक धुनी किस्सागो हैं। उनकी भाषा चुस्त और सधी हुई है और उसमें विचारों का प्रवाह रवानगी भरा है। आज के इस हाय-तौबा वाले युग में उनकी कहानियाँ समय की विडम्बनाओं का साहसी प्रतिमान रचती हैं। विमर्शों की बगटूट तेज रफ्तार नहीं, सार्वभौमिक सत्यों की तरफ खरामा खरामा बढते कदम इनकी कहानियों का शिल्प है।वंदना राग की कहानियाँ सात आँगनों के पार द्वार की तरह खुलती हैं।
अल्पना मिश्र हिन्दी कहानी के सूची-समाज में अनिवार्य रूप से शामिल नहीं हैं, लेकिन वे उसकी सबसे मजबूत परम्परा का एक विद्रोही और दमकता हुआ नाम हैं। उन्हें उखडे और बाजार प्रिय लोगों द्वारा सूचीबद्ध नहीं किया जा सका। कहानी का यह धीमा सितारा मिटने वाला, धुँधला होने वाला नहीं है, निश्चय ही यह स्थायी दूरियों तक जाएगा। अल्पना मिश्र की कहानियों में अधूरे, तकलीफदेह, बेचैन, खंडित और संघर्ष करते मानव जीवन के बहुसंख्यक चित्र हैं। वे अपनी कहानियों के लिए, बहुत दूर नहीं जातीं, निकटवर्ती दुनिया में रहती हैं। अल्पना मिश्र उडती नहीं हैं, वे प्रचलित के साथ नहीं हैं, वे ढूँढती हुई, खोजती हुई, धीमे-धीमे अँगुली पकडकर लोगों यानी अपने पाठकों के साथ चलती हैं। गैर हाजिरी में हाजिर, गुमशुदा, रहगुजर की पोटली, महबूब जमाना और जमाने में वे, सडक मुस्तकिल, उनकी व्यस्तता, मेरे हमदम मेरे दोस्त, पुष्पक विमान और ऐ अहिल्या कहानियाँ इस संग्रह में हैं। इन सभी में किसी-न-किसी प्रकार के हादसे हैं। भूस्खलन, पलायन, छद्म आधुनिकता, जुल्म, दहेज हत्याएँ, स्त्री-शोषण से जुडी घटनाएँ अल्पना मिश्र की कहानियों के केन्द्र में हैं। उनकी वे नायिकाएँ बचपन से यौन-शोषण की शिकार हैं, या साथी, रिश्तेदार पुरुषों की यौन कुंठाओं से प्रताडित हैं, उनके साथ या उन जैसों के साथ जीने के लिए विवश भी। वे छोटी पूँजी से चल रही कान्वेंट स्कूलों की लडकियां हैं या रोजमर्रा की जिंदगी में अनिच्छित निगाह और छुअन को झेलती महिलाएँ, जिनके स्मृति लोक में भी ऐसी लिजलिजे अहसास कैद हैं। अल्पना मिश्र के पहले कथा संग्रह भीतर का वक्त की कहानी कथा के गैर जरूरी प्रदेश में की अरुंधती की स्मृतियों में गंधाते ये अहसास उसके बचपन से ही जज्ब हैं, जो उसके कुंठित शिक्षक की उसके प्रति क्रूर अमानवीयता से बनी स्मृतियाँ हैं, जिनमें माँ-पिता की भयानक चुप्पी भी शामिल है, उसे अपनी पीडा के साथ अकेले छोडती हुई चुप्पी ।
प्रसिद्ध लेखिका मृदुला गर्ग लेखन के बारे में अपना पक्ष रखती हुई कहती हैं मैं लिखती हूँ क्योंकि इसके अतिरिक्त मैं कुछ और करने का सोच ही नहीं सकती। लिखना मेरे लिए सांस लेने जैसा है। इसके अतिरिक्त कई ऐसी लेखिकाएँ हैं जो अपने पात्रों को नारीवादी प्रतिबद्धता के साथ प्रस्तुत करती हैं। प्रसिद्ध उडिया लेखिका प्रतिभा राय कहती हैं -
स्त्रियों को दी गई यथास्थिति तथा समाज द्वारा पीडित लोगों के लिए लडने का एक माध्यम है नारीवादी लेखन। मेरी द्रौपदी (राय की एक जानी-मानी रचना) एक ऐसी रचना है जो आधुनिक होने के साथ साथ लडाई के भी खिलाफ है और शांति की समर्थक है।
गीतांजलि श्री और मनीषा कुलश्रेष्ठ हिंदी कथा-साहित्य की युवा पीढी की लेखिकाओं के लेखन का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो पिछले कुछ सालों में हिंदी साहित्य में प्रमुख रूप से दर्ज हुई हैं। हो सकता है कि इनमें से कोई शिल्प के स्तर पर ज्यादा महारत हासिल कर चुकी हों या कोई वर्तमान की राजनीतिक-सामाजिक जटिलताओं को दूसरे से बेहतर समझती हों, अभिव्यक्त करती हों, कोई अपनी जातीय वर्गीय यथार्थ को सीधे-सपाट और गहरे जुडाव के साथ अपनी कथा में व्यक्त करती हो तो कोई इन यथार्थों को दूर से देखते हुए,भागीदार न होने की सीमा के कारण व्यक्त करने में कभी थोडा चूक जाती हों , लेकिन ये कहानीकार हिंदी के महिला लेखन की युवा पीढी की रचना-प्रवृत्तियों और उनके सरोकारों, उनकी शैली और कथ्य को प्रतिनिधित्व करती हुई मानी जा सकती हैं। चर्चित लेखिका ममता कालिया का कहना है कि-
पिछले कुछ समय से हिंदी में महिला लेखिकाएँ जिजीविषा के साथ काफी कुछ लिख रही हैं और कहानी लेखन में एक तरह से पुरुष लेखक माइनॉरिटी में आ गए हैं। समाज में एक सकारात्मक किस्म का वातावरण बन रहा है। कृष्णा सोबती को ज्ञानपीठ पुरस्कार हम जैसे कितने ही लोगों की प्रेरणा स्रोत है। लेखिकाओं के प्रति नजरिया बदलता है। यह अच्छा संकेत है कि महिलाएं अपनी पीडा, संघर्षों और अनुभवों के बारे में खुलकर लिख रही हैं। हिंदी में गल्प लेखन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, 10-15 साल पहले कहा जाता था कि स्त्रियाँ भी लिखती हैं। स्त्रियों ने इस बीच लिखकर यह साबित कर दिया कि स्त्रियाँ ही लिख रही हैं। मुझे एक तरह से लगता है कि कहानी लेखन में पुरुष लेखक माइनॉरिटी में आ गए हैं. आप उन्हें अंगुलियों पर गिन सकते हैं। इस स्थिति के पीछे कारण आप कह सकते है कि स्त्रियों की जिजीविषा हो. उनका अडयिलपन हो, आप कुछ भी कह सकते हैं।
विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक अवरोधों को पार करती,कई दरारों को पाटती, अपनी पहचान तलाशती, समाज में स्थान निर्धारण के लिये संघर्ष करती स्त्री पर महिला कथाकारों ने पूरी संवेदनशीलता के साथ लिखा। उन्होंने परिवर्तित सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में पति-पत्नी के बीच सम्बन्धों में टूटन और अलगाव, प्रेम और सेक्स का नवीन भाव-बोध, विवाहेतर सम्बन्ध, अहम् के टकराव, पराश्रयता से मुक्ति, स्वावलम्बन, आर्थिक संरचना में हुए परिवर्तन के कारण उपभोक्तावादी संस्कृति के जीवन में प्रवेश में आए परिवर्तनों का सामाजिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक पक्ष की कसौटी पर तटस्थ होकर अपनी कहानियों में रेखांकित किया है। महिला कथाकारों को लेखन में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिये अपने समक्ष खडी अनेक बाधाओं को पार करना है क्योंकि तथाकथित संभ्रान्त आलोचक वग* महिला कथाकारों की साहित्यिक जगत में सजग, दबंग और सराहनीय उपस्थिति को आसानी से पचा नहीं पा रहा है। नारीवादी लेखन आज के समय की जरूरत है। आधुनिकता और उदार सोच के तमाम दावों के बावजूद स्त्री की सामाजिक स्थिति या उत्थान में कोई बडा ऋांतिकारी परिवर्तन नहीं आया है। स्त्रियों को स्वयं भी इस दंभ से बचना होगा कि चूंकि स्त्री है अतः स्त्री समस्याओं या भावनाओं को वही बेहतर समझ सकती है। वह सृजन के क्षेत्र में पैर रख रही है न कि किसी रणक्षेत्र में। नारी मुक्ति का संघर्ष लम्बा है और इसे मुख्यतः स्वयं नारी को लडना है। लेकिन यह लडाई पुरुष वर्ग के विरुद्ध न होकर व्यवस्था के अन्तर्विरोधों व पुरुष प्रधान समाज से निथरे नारी विरोधी अवमूल्यों के प्रति होनी चाहिए। समाज व अपनी संस्कृति से जुडी वर्तमान परिवेश की चुनौतियाँ स्वीकार करके ही महिला सृजन सफल हो रहा है और होगा। महिलाएँ भी अपनी लेखकीय संभावनाओं को पूरी तरह तभी संपन्न कर सकती हैं जबकि वे अपने लिए उस स्पेस व समय की मांग करें जो उनको चाहिए, जो उनके लेखन के लिए जरूरी है और तब यह समय और स्थान फैलता जायेगा खुदबखुद और वह भी जंगली पौधे की तरह पनपती जाएगी। एक अनंत वितान में फैलने के लिए।
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सम्पर्क : विभागाध्यक्ष,स्त्री अध्ययन विभाग
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
वर्धा, महाराष्ट्र - 442001
मो. 9850200918
ईमेल : supriya_rajj@yahoo.co.in