fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

उषा प्रियंवदा का कथा संसार

दिनकर दाधीच
हिन्दी साहित्य के सातवें दशक से लेखिकाओं ने सूक्ष्मता से अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है। लेखिकाओं ने साहित्य की विविध विधाओं में लेखनी चलाई और नारी जीवन से जुडी हर समस्या को साहित्य के माध्यम से जनमानस तक लाने का प्रयास किया है। महिला कथाकारों ने कथा साहित्य के माध्यम से अपनी मौलिक सृजन प्रतिभा से हिन्दी साहित्य संसार को नया मोड दिया है, इसलिए इनका कथा साहित्य हिंदी जगत् के लिए बहुत ही मौलिक एवं महत्त्वपूर्ण रहा है। सभी लेखिकाओं ने नारी के व्यक्तित्व को एक ठोस धरातल प्रदान किया है और नारी जीवन की विडंबना को सूक्ष्मता तथा गंभीरता से अंकित किया है। इसके साथ ही मानवीय जीवन से संबंधित विविध पहलुओं को भी संवेदनात्मक दृष्टि से देखा और परखा है। स्त्री कथाकारों में उषा प्रियंवदा का लेखकीय दृष्टि से विशेष महत्त्व रहा है। इन्होंने वापसी कहानी से हिन्दी कहानी के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान स्थापित की है।
उषा प्रियंवदा ने आधुनिकता की चुनौती को स्वीकार कर जीवन को उसके वास्तविक रूप में पहचाना है। समकालीन महिला कथाकारों में उषा प्रियंवदा एक उल्लेखनीय लेखिका हैं जो अपनी विशिष्ट लेखन शैली के कारण साहित्य जगत् में सफलता हासिल कर पाई हैं। इनका कथा-साहित्य मानवीय संवेदनाओं के साथ गहराई से जुडा हुआ है।
उषा प्रियंवदा ने अपने कथा साहित्य में मध्यवर्गीय परिवारों में हो रहे आधुनिक परिवर्तन और नारी की बदलती भूमिका के सूक्ष्मता से विश्लेषित किया है। उषा प्रियंवदा की कहानियों में व्यष्टि से समष्टि तक का चित्रण मिलता है। उनकी कहानियों में जीवन का अकेलापन, ऊब और उदासीनता का यथार्थबोध पहली बार हिन्दी में गहरी संवेदनशीलता के साथ उभर कर आया।
डॉ. गोरधनसिंह शेखावत ने उषा प्रियंवदा की कहानियों के बारे में लिखा है- ‘उषा जी की कहानियों में जीवन और परिवार को अनुभूतिप्रवण चित्र दिखाई पडते हैं। आधुनिक नगर बोध की उदासी, अकेलेपन, ऊब आदि का अंकन उन्होंने यथार्थ के साथ किया है। उनकी कहानियों में चमत्कार नहीं, पर इनकी कहानियाँ गहरा प्रभाव छोडती हैं।1
उषा जी की कहानियों में हमें आधुनिक नगरीय जीवन के अत्यन्त अनुभूतिप्रवण चित्र मिलते हैं। इससे कहानियों का कलात्मक संतुलन इस धारणा का खण्डन करता है कि नारी कथाकारों में भावुकता की प्रधानता होती है। परंतु उषा जी ने बौद्धिक ईमानदारी के साथ चेतना के गहरे स्तरों को वाणी देने का सफल प्रयास किया है जिसके कारण आप कथा साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट बन गई हैं। इन्द्रनाथ मदान के शब्दों में -
‘उषा प्रियंवदा की कहानी-कला से रूढियों, मृत परम्पराओं, जड मान्यताओं, मीठी-मीठी चोटों की ध्वनि निकलती है। घिरे हुए जीवन की उदासी एवं उबासी उभरती है, आत्मीयता व करुणा के स्वर फूटते हैं। सूक्ष्म व्यंग्य कहानीकार के बौद्धिक विकास और कलात्मक संयम का परिचय देता है जो तटस्थ दृष्टि और गहन चिंतन का परिणाम है। पिछले कई दशकों से ये निरंतर सृजनरत हैं और इस अवधि में इन्होंने जो कुछ लिखा है, वह परिमाण में कम होते हुए भी विशिष्ट है।2
उषा प्रियंवदा की पारिवारिक जीवन से संबंधित कहानियों में अमरीकी जीवन के भी विभिन्न चित्र प्रस्तुत हुए हैं। इसमें बार-बार अकेलेपन और अजनबीपन के भाव उभरकर आते हैं। बिन्दु एक ही है- वैयक्तिक सुख-दुःख; किन्तु उसके कारण भिन्न हैं। कभी आर्थिक, कभी पारिवारिक, कभी असफल प्रणय व उन्मुक्त प्रेम। इस अकेलेपन में व्यक्ति अपने भरे-पूरे परिवार में, भीड-भाड में अपने को निपट अकेला पाता है। समृद्धि के बीच भी उसे अथाह विरक्तता का अहसास होता है, प्रिय से प्रिय व्यक्ति के संग रहकर भी उसे अजीब विसंगति का बोध होता है।
संभवतः परिस्थितियों से पलायन कर जाना आज के मनुष्य की नियति है। समाज ने जो भी सम्बल प्रदान किये हैं वह उसे स्वीकार्य नहीं हैं और नवीन सम्बल वह बना नहीं पाया है। पुराने मूल्य पूर्णतया टूटे नहीं हैं, नये मूल्य पूर्णतया स्थापित नहीं हो पाए। परिणामस्वरूप मनुष्य दोनों के मध्य अटककर रह गया है। ऐसे मनुष्य से सहानुभूति ही प्रकट की जा सकती है। उषा जी की कई कहानियों में ऐसी ही शून्यता, एकाकीपन, निराशा तथा अजनबीपन आदि अनुभूतियाँ परिलक्षित होती हैं।
उषा प्रियंवदा का सृजन उनके परिवेश, निजी व्यक्तित्व और गहन संवेदना का प्रतिफल है। उषा जी व्यक्ति स्वातंत्र्य की पक्षधर हैं। यह स्वातंत्र्य स्त्री व पुरुष दोनों के संदर्भ में है। इसका उदाहरण वे स्वयं और उनकी कृतियाँ हैं। वे कभी बंधकर चलना पसंद नहीं करतीं। न ही जीवन में और न ही सृजन में।
सही अर्थों में देखा जाए तो उषा प्रियंवदा ने दिखने में छोटी लगने वाली सामाजिक समस्याओं की गहराई में जा कर कहानी-लेखन का कार्य किया और देश-काल एवं वातावरण के अनुसार उसका फलक विस्तृत होता चला गया। कच्चे धागे कहानी में कुंतल के अपने पडोसी जीजी से संबंध और उनके भाई से विवाह के सपने कच्चे धागे से कोमल और नाजुक होते हैं जो क्षणभर में बिखरकर चकनाचूर हो जाते हैं। यहाँ पर कहानीकार ने दहेज समस्या को भी उभारा है। जिंदगी और गुलाब के फूल कहानी में सेवारत सुबोध स्वाभिमान की रक्षा हेतु त्यागपत्र देकर बेरोजगार हो जाता है। इस कहानी में बेरोजगार सुबोध की पारिवारिक उपेक्षा एवं मानसिक अंतर्द्वंद्व का मार्मिक चित्रण हुआ है।
उषा प्रियंवदा की उत्कृष्ट कहानी वापसी में परिजनों की आधुनिक भौतिकवादी, स्वच्छंद जीवन दृष्टि तथा घोर व्यक्तिवादी जीवन दर्शन के कारण पैंतीस वर्ष की नौकरी के बाद अर्थात् अपनी सेवानिवृत्ति के बाद शेष जीवन स्वजनों के साथ सुकून से बिताने का सपना संजोये घर लौटे गजाधर बाबू का यह सपना दिवास्वप्न ही प्रतीत होता है। भरे-पूरे परिवार में स्वकेन्द्रित परिजनों के बीच गजाधर बाबू स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं। विपरीत मानसिक संवेदनाओं से सामना करने के बाद अंततः परिजनों की उपेक्षा और कटूक्तियों से आहत गजाधर बाबू पुनः सेठ रामजीमल की चीनी मिल में नौकरी करने के लिये विवश हो नये लक्ष्य की ओर चले जाते हैं। परिजनों में भी मुख्य रूप से उनकी पत्नी की उपेक्षा वे सह नहीं पाते और गजाधर बाबू एक बार फिर घर से वापसी कर जाते हैं। वापसी कहानी में मानवीय संवेदनाओं का सूक्ष्म चित्रण हमारे समक्ष उपस्थित होता है। विशेष रूप से उस समय जब उनकी धर्मपत्नी रसोई से उनकी चारपाई यह कहकर निकालती है कि यहाँ अब चलने-फिरने की जगह नहीं रही। वृद्धावस्था में परिवार और पत्नी का साथ चाहने वाले व्यक्ति पर जब ऐसा होता है तो निस्संदेह उसका मोहभंग होकर मानवीय संवेदनाएँ बिखरकर चूर-चूर हो जाती हैं। जैसे किसी मेहमान के लिए कोई अस्थायी प्रबंध कर दिया जाता है उसी प्रकार बैठक में कुर्सियों को दीवार से सटाकर बीच में गजाधर बाबू के लिए एक पतली सी चारपाई डाल दी गई-गजाधर बाबू उस कमरे में पडे-पडे कभी-कभी अनायास ही उस अस्थायित्व का अनुभव करने लगते।3 इससे लगता है कि बदलते वर्तमान परिवेश में वृद्ध पिता अकेलेपन व टूटन का शिकार हो रहे हैं। बुजुर्ग पीढी की यह नियति अत्यन्त शोचनीय है।
उषा प्रियंवदा ने अपनी कहानियों में समाज की समसामयिक समस्याओं की गहराई में उतरकर अपनी सूक्ष्म दृष्टि से उनकी नब्ज टटोलते हुए व्यक्ति के जीवन से जुडी समस्याओं को उजागर किया है। उन्होंने नारी जीवन में आने वाले परिवर्तनों को बखूबी परखा है। उषा प्रियंवदा ने आजादी से पहले और आजादी के बाद महिलाओं के दृष्टिकोण में आये परिवर्तनों को बारीकी के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। उनके इस व्यापक दृष्टिकोण को पाठकों ने स्वीकारा है। परिणामस्वरूप उनकी मानवीय संवेदनाएँ जन-जन की मानवीय संवेदना के रूप में बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति के साथ व्यक्त हुई हैं।
उषा प्रियंवदा ने स्त्री की इच्छा, कामना और त्वरित निर्णय लेने से जुडे प्रश्नों को विभिन्न दृष्टिकोणों से अपनी कहानियों में चित्रित किया है। उन्होंने इसे स्त्री और पुरुष पात्रों के माध्यम से उठाया है। इनकी कहानियों में स्त्री स्वतंत्रता के मानदंड विभिन्न रूपों में परिलक्षित होते हैं। छुट्टी का दिन और पूर्ति कहानियों में चित्रित नायिका को देखकर लगता है कि क्या अपने पैरों पर खडे हो जाने और परिवार वालों से रिश्ता तोडकर स्वतंत्र जीवन मात्र से ही स्त्री सशक्त हो पाएगी? वस्तुतः इन दोनों कहानियों में स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने पर भी जीवन के अकेलेपन से पीडित है। धन कमा लेने मात्र से अकेलेपन को दूर नहीं किया जा सकता है। छुट्टी का दिन की माया को अकेलेपन से भागने पर मुक्ति नहीं मिलती और इस स्थिति के लिए वह स्वयं को ही दोषी ठहराती है। प्रस्तुत कहानी में उषा प्रियंवदा का यह दृष्टिकोण बेहद प्रभावित करता है कि जीवन में अर्थोपार्जन भी वर्तमान परिवेश में जीवनयापन के लिए जरूरी है। लेकिन अकेलेपन से मुक्ति मिले बिना सुकून की आशा नहीं की जा सकती।
सम्बन्ध कहानी की श्यामला मानसिक अव्यवस्था की शिकार है। घर से दूर विदेश में बसी श्यामला न तो अपने परिवार वालों या दाम्पत्य बंधन में बँधना चाहती है और न ही इनसे दूर रहकर सुखी ही रह पाती है। माँ-बाप और बहन उससे इसी कारण असंतुष्ट हैं। श्यामला लौटकर भारत भी नहीं आना चाहती है। उसने अपनी नौकरी के लिए बहुत कुछ किया था। वह कहती है, एक निरुपाय, बेसहारा, आऋोश कर दिया तो सबके लिए जितना हो सका, जैसे जिया अब भी क्यों बोझ ढोया जाए। एक भावुक कर्त्तव्य के वश पर अब क्यों वे सब उसे अपनी जिन्दगी नहीं जीने देते जैसे भी वह चाहे।4
विदेशी परिवेश में मानसिक द्वन्द्व का कारण भारतीय परिवेश के संस्कारों और परंपराओं को उस समाज में खोजना है। इसी के परिणामस्वरूप निर्मित धारणा ही व्यक्ति के संस्कारों की टकराहट का हेतु बनती है। आप्रवासी भारतीयों की इस जैसी समस्याओं का मार्मिक चित्रण हमें उषा प्रियंवदा की कहानियों में दिखाई देता है।
चाँदनी में बर्फ पर में एक ऐसे युवक का चित्रण किया गया है जो अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए अपने माता-पिता और प्रेमिका कल्याणी को छोडकर विदेश जाकर मीरा नाम की विदेशी लडकी से विवाह कर लेता हैं। मीरा स्वच्छंद विचारों वाली आधुनिक स्त्री है। हेम से विवाह के पहले उसके कई पुरुष मित्रों से संबंध रहे हैं। मित्रों के साथ स्केटिंग करना, घर पर शोर मचाना हेम को पसंद नहीं है। वह चाहता है कि मीरा भारतीय नारी की तरह झगडे, चिल्लाए और उस पर अधिकार जताए, पर मीरा ऐसा कुछ भी नहीं करती है। वह अपनी मरजी से स्वच्छंद जीवन जीती है।
विदेश में कल्याणी को अविनाश की पत्नी के रूप में देखकर हेम उसे पाने के लिए पुनः लालायित हो उठता है। वह चाहता है कि कल्याणी उससे यूँ ही मिलती रहे, परन्तु कल्याणी अपने भारतीय संस्कारों के कारण हेम के निवेदन को अस्वीकार कर देती है।
उषा प्रियंवदा ने प्रस्तुत कहानी में कल्याणी और मीरा दो स्त्रियों के माध्यम से पूर्वी व पश्चिमी संस्कारों के अंतर को बडी बारीकी से प्रभावी रूप में दिखाया है। उषा जी की यह कहानी उन भारतीय युवाओं की गाथा है जो स्वयं की उन्नति के लिए विदेशी संस्कारों वाली लडकी से विवाह तो कर लेते हैं पर उनकी स्वच्छंदता को वे बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। उनकी अपेक्षा रहती है वह आदर्श भारतीय नारी के गुणों का निर्वाह करे, परन्तु ऐसा न होने पर संबंधों की डोर ढीली पड जाती है और संस्कारों की टकराहट उत्पन्न होती है।
कितना बडा झूठ की नायिका किरण विवाहिता और दो बच्चों की माँ होते हुए भी विदेशी समाज की देखा-देखी मैक्स नामक पुरुष से संबंध रखती है। वह चाहती है कि मैक्स केवल उसका होकर रहे, पर पश्चिमी संस्कारों में पला मैक्स किरण को छोडकर वारिया से शादी कर लेता है। विदेश में एक ही से बंधकर रहने की परंपरा बहुत ही कम है। यह हमें स्वदेश में ही देखने को मिलता है। भारतीय परंपरा के अनुसार विवाहित का परस्त्री-पुरुष से संबंध अनैतिक माना गया है। पाश्चात्य संस्कृति के अनुकरण के कारण ही विदेशों में रहने वाले भारतीयों का व्यवहार विकृत होता जा रहा है।
एक और विदाई की नमिता को लगता है कि उसका पति उससे प्रेम नहीं करता है। इस कारण पति-पत्नी में दूरियाँ हैं। इसी दूरी से छुटकारा पाने के लिए पति और परिवार को छोडकर वह विदेश पढने के लिए चली जाती है। विदेशी समाज में रहते हुए वह स्त्री-पुरुष के उन्मुक्त संबंधों को नजदीक से देखती है। वह देखती है कि किस तरह स्त्री-पुरुष एक से ज्यादा आपसी संबंध बनाते हैं, ऐसे संबंध, जिनमें ठहराव नहीं है। वह विदेशी जीवनशैली से ऊब जाती है और अपने संस्कारों व मर्यादा को भूल नहीं पाती है। उसे एहसास होता है कि उसका प्यार, जीने का सहारा अपना देश ही है और उसकी जिन्दगी उसका पति ही है। इसलिए वह अपने देश लौटने का निर्णय कर लेती है। कहानी की नायिका नमिता काँपते कंठ से बार-बार कहती है- लो मैं आ गई, लो मैं आ गई हूँ।5
सुरंग कहानी के तीनों पात्र खोखली जिंदगी जी रहे हैं। माँ, अरुणा और बेबी। हरिद्वार से देहरादून आने वाली गाडियाँ जब सुरंग के पास खडी रहती हैं तो लम्बी सीटी मारती है। यह सीटी पात्रों के घर में सुनाई देती है। माँ घर के अंदर सुबकने लगती है। सुरंग में ही अरुणा के भाई की मौत हो गई थी। रेल की पटरी के निकट तक जाने की मनाही पिता ने सबको कर दी थी। अरुणा को बचपन से ही ट्रेनें अच्छी लगती थीं। सिग्नलों की लम्बी कतारें, देहरादून से आने-जाने वाली गाडियों का स्लेटी धुआँ, पटरियाँ, अरुणा उनमें खो जाती थी। अरुणा के भाई की उपस्थिति कहानी में नहीं है, परंतु उसका प्रभाव घर के सभी सदस्यों पर है। माँ, जब से बेटा मरा है, प्रायः सारा दिन घर से बाहर ही रहने लगी है। तीन घंटे भजन-कीर्तन के बाद भी उसके चेहरे से खीज की रेखाएँ नहीं जातीं। अरुणा के अपने दुःख अलग हैं जिनसे निष्कृति पाने की चेष्टा में उसकी कलाइयों पर परमानेंट दाग रह गये हैं। जगह-जगह भटकने पर अरुणा अपने शहर लौट आती है। अब तक उसकी नियुक्ति बाहर के शहरों में ही रही थी।6
आधुनिकता के नाम पर आर्थिक लोभ के कारण एक पत्नी का शोषण स्त्री-पुरुषों के संबंधों में दूरियाँ पैदा कर देता है। स्वीकृति कहानी के पति-पत्नी रुचि में अंतर के कारण एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं। जिसका परिणाम पति-पत्नी, सत्य और जपा दोनों को भुगतना पडता है। पति अपनी नवविवाहिता पत्नी को सिर्फ पैसे कमाने के साधन के रूप में देखता है। लेकिन पत्नी-पति के साथ रहकर उसके साहचर्य का सुख उठाना चाहती है। परिणामस्वरूप दोनों के संबंधों में तनाव उत्पन्न हो जाता है।
उषा प्रियंवदा में कहानी लेखन की एक विशेष कला है। वे अपने मुद्दों, विचारों को सीधे-सीधे बयान नहीं करतीं बल्कि एक विशेष वातावरण तैयार करती हैं जिसमें मुख्य पात्र उतरता-चढता रहता है। कहानी के पात्रों के उतार-चढाव, उनके व्यवहार, उनकी बातचीत आदि से ही सारी स्थिति स्पष्ट हो जाती है। उषा प्रियंवदा की कहानियों में निहित बोध में सबसे अधिक स्वर जो उभरकर आता है वह है अकेलेपन और उदासीनता का। आज इस भाग-दौड की जिन्दगी में व्यक्ति चाहे कितना भी अपने मित्र, परिचित, प्रेम या परिवार के साथ रह ले, लेकिन कहीं-न-कहीं से कभी-न-कभी वह अपने आप को अकेला महसूस करता है और अकेलेपन की ओर अग्रसर होता है, जो उसके जीवन को नीरस बना देता है।
उषा प्रियंवदा के ये सब पात्र एक अधूरा और यातनाप्रद जीवन जी रहे हैं। अपने देश से बाहर किसी सम्पन्न और पराये मुल्क में अकेला और अलग रहना इस यंत्रणा का एक विशिष्ट पहलू है जिसको उनकी ये कहानियाँ निरन्तर रेखांकित करती हैं। आधुनिकता और पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के बीच आधुनिक नारी इतना बिखर गई है कि उसका कोई निजी स्तर नहीं रह गया है। वह न तो पूर्णरूप से पाश्चात्य संस्कारों से प्रभावित हो पाती है और न ही भारतीय आदर्शों को निभा पाती है। अर्थ और स्वार्थ पर टिके वैवाहिक जीवन की जटिलता का सशक्त चित्रण उनकी कहानियों में प्रमुखता से मिलता है। जीवन के छोटे-बडे अनुभवों एवं संवेदना को कुशलता के साथ व्यक्त करके आप्रवासी भारतीय नारियों की समस्याओं व विसंगतियों को उषा जी ने विशेष सहानुभूति के साथ प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही जीवन के विविध पक्षों का यथा वृद्ध समस्या आदि का भी पूर्ण संवेदनात्मक चित्रण उषा जी के कथा साहित्य में मिलता है।
***
संदर्भ सूची
1. शेखावत गोरधन सिंह : नई कहानी : उपलब्धि और सीमाएँ, राम पब्लिकेशन हाउस, जयपुर, संस्करण 1975, पृ. 119
2. प्रियंवदा उषा : कितना बडा झूठ, राजकमल पेपर बैक्स, नई दिल्ली, पहला संस्करण, 2008,
पार्श्व आवरण पृष्ठ
3. प्रियंवदा उषा : वापसी, बनवास, पेंगुइन बुक्स इंडिया, यात्रा बुक्स, नई दिल्ली, पहला संस्करण, 2009, पृ. 148
4. प्रियंवदा उषा : सम्बन्ध, सम्पूर्ण कहानियाँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण, 2006, पृ. 326
5. प्रियंवदा उषा : एक और बिदाई, बनवास, पेंगुइन बुक्स इंडिया, यात्रा बुक्स, नई दिल्ली, पहला संस्करण, 2009, पृ. 127
6. प्रियंवदा उषा : सुरंग, सम्पूर्ण कहानियाँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण - 2006, पृ. 361
सम्पर्क : 36, सर्वऋतु विलास, मेन रोड
उदयपुर (राज.) 313001
मो. नं. 9414137641