fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे

आशुतोष कुमार पाण्डेय
इतिहास, मुक्ति आन्दोलन और प्रतिबन्धित हिन्दी कहानियाँ
1932 तक हिंदी कहानी प्रथम कहानी विवाद को त्यागकर अपने यौवनास्था में पहुँच चुकी थी और हिंदी कथा- सम्राट् मुंशी प्रेमचंद अपने रचनाकर्म के लगभग अंतिम पडाव पर थे । इन्हीं साहित्यिक घटनाओं के बरक्स दुनिया की चर्चित आजादी की लडाइयों में शामिल भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की लडाई ने भी जोर पकड लिया था। अब भारतीय जनमानस 1857 के दमन को भूलकर नए जोश-खरोश से परतन्त्रता की बेडियों को तोडने के लिए पूरी तरह से तैयार था। इसके साथ भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सेनानियों का साथ उस समय के लेखक, साहित्यकार और बुद्धिजीवी भी बखूबी दे रहे थे, जो भारतीय जनता को अंग्रेजी परतन्त्रता या आजादी का मतलब समझा रहे थे। परतंत्रता के खिलाफ लडाई और लेखन के सन्दर्भ में लातिन अमरीकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो ने लिखा है कि जब कोई लिखता है तो वह औरों के साथ कुछ बाँटने की जरूरत ही पूरी कर रहा होता है। यह लिखना अत्याचार के खिलाफ और अन्याय पर जीत के सुखद अहसास को साझा करने के लिए ही होता है । यह अपने और दूसरों के अकेले पड जाने के अहसास को खत्म करने के लिए होता है। यह माना जाता है कि साहित्य ज्ञान और समझ को फैलाने का जरीया है और यह पढने वालों की भाषा और आचरण पर असर डालता है। ...दरअस्ल लिखा उन्हीं के लिए जाता है जिनके नसीब या बदनसीबी के साथ जुडाव महसूस किया जाता है। ये वे लोग हैं जो न ढंग का खा सकते हैं न सो सकते हैं, वे इस दुनिया के सबसे दबे-कुचले अपमानित और इसलिए सबसे भयंकर विद्रोही लोग हैं।1 यहाँ 20वीं सदी से पहले की गुलामी या आज 21वीं सदी की गुलामी के सारे तत्त्व विद्यमान हैं। 20वीं सदी का आधे से अधिक दशक बीतने के साथ ही पूरी दुनिया को गुलामी से मुक्त घोषित कर दिया गया। लेकिन बडे मुल्कों ने अपनी कुछ एजेंसियों और कुछ परियोजनाओं के माध्यम से पूरी दुनिया के मुल्कों की आवाम पर गुलामी के पुराने तौर-तरीकों में कुछ हेर-फेर करके अपनी जकड में लाने की कोशिश की है।
हिंदी कहानी की जब भी बात शुरू होती है तो अकसर नई कहानी आन्दोलन से पहले की कहानियों को पृष्ठभूमि के बतौर ही ग्रहण किया जाता रहा है। हिंदी कहानी के उद्भव को देखते हुए यह सही भी है। हिंदी कहानी हिंदी साहित्य की अन्य विधाओं के बनिस्बत आधुनिक विधा (मसलन- कविता और नाटक) है। इसे एक साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित होने के लिए मशक्कत करनी पडी। रूप और संरचना के कारण इसे मनोरंजन2 की तरह लोगों ने अपनाया। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी कहानी विधा की शुरुआत औपनिवेशिकता की चरम-अवस्था के दौर में हुई थी ।
अब तक ज्ञात जानकारी के अनुसार 54 कहानियों 3 को अंग्रेजी दमन झेलना पडा और उन्हें प्रतिबंधित किया गया। लेकिन हिंदी साहित्य के इस दमन को और भी मजबूत आधार उस समय प्रदान किया गया जब अपने साहित्यिक प्रतिमानीकरण से बाहर कर इतिहास लिखना आरम्भ किया। आधुनिक हिंदी साहित्य खासकर 1947 तक का भारतीय भाषाओं के साहित्य को अधिकतर उपनिवेशवाद के खिलाफ लिखा हुआ साहित्य माना जाता है। लेकिन औपनिवेशिक मन का सबसे अधिक प्रकोप झेलने वाला साहित्य साहित्यिक प्रतिमानीकरण से बाहर है। भारतीय साहित्य और इतिहास भारतीय समाज की विकास प्रकिया को संघर्ष के नजरिए से देखता है। इसी भारतीय समाज ने सामन्तवाद को ठुकराया, उपनिवेशवाद को ठुकराया और अब पूंजीवाद से संघर्ष कर रहा है। इस समाज ने आधुनिकता, नवजागरण, राष्ट्रवाद, जाति-मुक्ति और लैंगिक मुक्ति सम्बन्धी संघर्षों और आन्दोलनों से पूरी दुनिया के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलने की कोशिश की है । इतिहास लेखन के बदलते दृष्टिकोण और सवालों को उठाने के लिए अलग-अलग दृष्टियों से इतिहास लिखने की कोशिश हुई। इतिहास को और ज्यादा प्रासंगिक बनाने के लिए भारतीय इतिहासकारों को यहाँ तक लिखना पडा कि निम्नवर्गीय प्रसंग को प्रासंगिक बनाने के लिए केवल एक ही प्रकार के लेखन से काम नहीं चलेगा। हमें आवश्यकता है नई वैचारिकता, नई शब्दावली, नई भाषा (अपने विस्तृत मायने में), नवीन कथा शैली, मुख्तलिफ किस्म की दास्तानगोई की, जो बौद्धिक तो हो मगर कुंठित न हो, प्रयोगात्मक तो हो मगर आडम्बरी न हो, व्यापक तो हो मगर बेमानी न हो, देशज तो हो मगर राजकीय न हो और हिंदी तो हो मगर शास्त्रीय न हो। हिंदी या हिन्दुस्तानी मंज इतिहास-लेखन की जुबान क्या हो इस सवाल का जवाब भी हमें ढूँढना होगा।4 अगर हम कुछ देर के लिए इस उद्धरण पर विचारते हैं, तो इस उद्धरण में नया इतिहास लेखन के दृष्टिकोण सम्बन्धी तत्त्वों को रेखांकित करने की कोशिश की गई है, जिन्हें प्रतिबंधित साहित्य और प्रतिबंधित कहानियाँ पूरा करती हैं।
प्रतिबंधित हिंदी कहानियाँ भारतीय समाज के दर्द और इतिहास के दर्द को अपने अंदर समेटे हुए हैं। 19वीं सदी के मध्य के बाद भारत में मुक्ति के स्वर सबसे ज्यादा प्रखर रूप में गूँजे और 1857 इसके लिए विद्रोह के रूप में सामने आया। कुछ उपलब्ध प्रतिबंधित कहानियों का संकलन रुस्तम राय ने किया है। इसमें पाण्डेयबेचन शर्मा ‘उग्र’ की पहली कहानी उसकी माँ शामिल है। इस कहानी में एक संवाद इस प्रकार है- हाँ, मेरे विचार स्वतंत्र अवश्य हैं, मैं जरूरत-बेजरूरत जिस-तिस के आगे उबल अवश्य उठता हूँ। देश की दुरावस्था पर उबल उठता हूँ, इस पशु-हृदय परतन्त्रता पर।...
....तुम्हारी इस बक-बक से न तो देश की दुर्दशा दूर होगी और न उसकी पराधीनता। तुम्हारा काम पढना है, पढो। इसके बाद कर्म करना होगा, परिवार और देश की मर्यादा बचानी होगी। तुम पहले अपने घर का उद्धार तो कर लो, तब सरकार के सुधार का विचार करना।... इस पराधीनता के विवाद में चाचाजी, मैं और आप दो भिन्न सिरों पर हैं। आप कट्टर राजभक्त, मैं कट्टर राज-विद्रोही। आप पहली बात को उचित समझते हैं -कुछ कारणों से, मैं दूसरी को दूसरे कारणों से- आप अपना पथ छोड नहीं सकते- अपनी प्यारी कल्पनाओं के लिए- मैं अपना भी नहीं छोड सकता।...
...मेरी कल्पना यह है कि जो व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के नाश पर जीता हो, उसका सर्वनाश हो जाये!5 अब हम यहाँ आधुनिकता और भारतीय नवजागरण को लें और इस उद्धरण के साथ पूरी कहानी को व्याख्यायित करें। सबसे पहले इस कहानी में उस समय के महान चिन्तक और शोषितों की आवाज के साथ उपनिवेश विरोधी दुनिया के बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों को पढने को लेकर द्वंद्व से कहानी शुरू होती है और कहानी आगे एक लडके (मुख्य पात्र- लाल) की घटनाओं, उसकी संगत और उसके स्वतन्त्रता को लेकर विचार के माध्यम से बढती रहती है। लेकिन इस संवाद में स्वतन्त्रता सम्बन्धी उसके विचार भारतीय आधुनिकता और भारतीय नवजागरण दोनों को साधे हुए हैं। आप पहली बात को उचित समझते हैं-कुछ कारणों से...। आगे फिर कहता है कि जो व्यक्ति समाज या राष्ट्र के नाश पर जीता हो, उसका सर्वनाश हो जाए!
हेबरमास के बारे में लिखते हुए विजय कुमार लिखते हैं कि हेबरमास कहते हैं कि सार्वजनिक जीवन के दायरे ने 18वीं सदी के शुरुआती वर्षों में आकार लेना आरम्भ किया था। इसका उद्देश्य था कि यह व्यक्ति के पारिवारिक और सार्वजनिक जीवन के सरोकार के बीच एक पटरी बिठाये। इसका काम मनुष्य के निजी हितों तथा समाज के व्यापक हितों के बीच एक संवाद बनाते हुए किसी आम सहमति तक पहुँचना था। बुर्जुआ सामाजिक दायरे के कारण ही यह संभव हुआ कि एक तरफ तो राज्य सत्ता का विरोध करने वाली सार्वजनिक धारणाएँ आकार ले सकीं ओर दूसरी और वे ताकतें भी उभरीं जो बुर्जुआ समाज को अपने हिसाब से गढना और चलाना चाहती थीं। इस सार्वजनिक दायरे की वजह से ही जनता के सामान्य हितों के तमाम मुद्दों पर बहसें संभव हो सकी थीं और मनुष्य के कुछ बुनियादी सरोकारों की शिनाख्त की जा सकी थी। इसी सार्वजनिक दायरे ने वाणी की स्वतन्त्रता, सार्वजनिक सभाओं के आयोजन, प्रेस की आजादी, राजनीतिक प्रक्रियाओं और बहसों में खुली हिस्सेदारी को संभव बनाया था।6 यह लेख हेबरमास के आधुनिकता सम्बन्धी चिंतन के ऊपर लिखा गया है। लेकिन इस बात को ध्यान में रखते हुए उसकी माँ कहानी के संवाद में जाना पडेगा। इस कहानी में एक तरफ एक नौजवान छात्र देश को गुलामी से मुक्त कराने के लिए हर संभव उतारू है। दूसरे तरफ रूसो और दुनिया के कई स्वतन्त्रता के पक्षधर चिंतकों को पढने के द्वंद्व में उसके चाचा हैं, जो केवल उस नौजवान को यही समझाता रहता है कि पहले अपने घर और परिवार का उद्धार करो! और दूसरी तरफ उसकी माँ है, जो कभी इस बुर्जुआ सोच की तरफ आकर्षित होती है कभी अपने नौजवान लाल के प्रति। कहानी के अंत में नौजवान छात्र को गुलामी से मुक्ति हेतु षड्यंत्र के लिए फाँसी की सजा होती है। लेकिन कहानी की शुरुआत से लेकर अंत तक उस नौजवान छात्र के चाचा का जो द्वंद्व है वह एक बुर्जुआ द्वंद्व है, जो आधुनिक तो है लेकिन अपनी सहूलियत की शर्त पर।
1920 आते-आते नवजागरण और मुक्ति की चाह चरम पर थी। शम्भुनाथ ने लिखा है कि आधुनिकीकरण की तरह परम्परा को लेकर नवजागरण के हर दौर की समझ को विकासशील अवस्था में ही मानना चाहिए। फिर भी सैकडों साल की सामाजिक कुप्रथाओं के टूटने का पक्का वक्त मानो आ गया था। यह बुद्धिमत्ता के, विवेक के धमाके का युग था। भूलना नहीं चाहिए कि निरंकुश राजाओं-बादशाहों के लम्बे दमनमूलक शासन से गुजरने के बाद औपनिवेशिक छाया में, बिना किसी व्यापक उद्योगीकरण के भी कला, साहित्य-संस्कृति शिक्षा, देशभक्ति, राष्ट्रीयता और सामाजिक चेतना में जितनी गतिशीलता आई, वह भारत जैसे विशाल देश में पर्याप्त न होते हुए भी अर्थवान थी। एक तरह से पूरे देश की सोच, उसकी अंतरात्मा एक नई करवट ले रही थी।7 प्रतिबंधित कहानियों को इसी नई करवट लेने और उसको अधिक तीव्र बनाने के कारण प्रतिबन्ध का सामना करना पडा। सामन्तवादी युग में स्त्री और जाति उत्पीडन अपने चरम पर था। सती प्रथा और पर्दा प्रथा नवजागरण के स्त्री सम्बन्धी प्रमुख मुद्दे थे। जितनी सती प्रथा स्त्री समाज के लिए घातक थी, उतना ही पर्दा प्रथा भी घातक थी। पर्दा-प्रथा स्त्री समाज की गुलामी का द्योतक है और इंसानी जगत में स्त्री और पुरुष गैरबराबरी का प्रथम प्रतीक है। हिंदी साहित्य के क्षेत्र में 1947 तक महिला साहित्यकारों में मीराबाई, महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान का ही नाम आता है। प्रेमचंद हिंदी के प्रथम कथाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं में महिला पात्रों को सशक्त भूमिका में सामने रखा। इस दृष्टि से अगर हम देखें तो प्रतिबंधित कहानियों में स्त्रियां परदे से निकलकर देश की आजादी के लिए हर स्तर पर लडती दिखाई देती हैं। इस दृष्टि से ऐसी होली खेलो, लाल! (पाण्डेयबेचन शर्मा ‘उग्र’), बागी की बेटी (मुनीश्वरदत्त अवस्थी), हडताल (ऋषभचरण जैन) और दोस्त (यशपाल) इत्यादि की कहानियाँ देखी जा सकती हैं । प्रेमचंद ही अपनी एक कहानी में दिखाते हैं कि मिसेज सक्सेना ने प्रधान से पूछा- शराब की दुकानों पर औरतें धरना दे सकती हैं ?...
प्रधान ने सर झुका कर कहा. मैं आफ साहस और उत्सर्ग की प्रशंसा करता हूँ, लेकिन मेरे विचार में अभी इस शहर की दशा ऐसी नहीं है कि देवियाँ पिकेटिंग कर सकें। आपको खबर नहीं, नशेबाज कितने मुँहफट होते हैं। विनय तो वे जानते ही नहीं।
मिसेज सक्सेना ने व्यंग्य-भाव से कहा -तो क्या आपका विचार है कि कोई ऐसा जमाना भी आएगा, जब शराबी लोग विनय और शील के पुतले बन जायेंगे? यह दशा तो हमेशा ही रहेगी। आखिर महात्माजी ने कुछ समझ कर ही तो औरतों को यह काम सौंपा है। मैं नहीं कह सकती कि मुझे कहाँ तक सफलता होगी, पर इस कर्तव्य को टालने से काम न चलेगा।...
मिसेज सक्सेना ने जैसे विनय का आलिंगन करते हुए कहा- मैं आफ पास फरियाद लेकर न आऊँगी कि मुझे फलां आदमी ने मारा या गाली दी। इतना जानती हूँ कि अगर मैं सफल हो गयी, तो ऐसी स्त्रियों की कमी न रहेगी जो इस काम को सोलह आने अपने हाथ में न ले लें।8 इस संवाद में कुछ प्रश्न छिपे हैं । जो आज के भी प्रश्न हैं। नए इतिहास लेखन में वर्ग का प्रश्न महत्त्वपूर्ण है। लेकिन 1930 के भारतीय स्त्री समाज की स्थिति और वर्ग के प्रश्न को अगर हम आमने-सामने रख कर देखें तो एक बात कहनी पडेगी कि लैंगिक आधार पर किसी एक लिंग के हाथों और पैरों को बांधकर वर्ग की तलाशी नाइंसाफी मालूम पडती है। परन्तु प्रतिबंधित कहानियों में रूस को जारशाही से मुक्त कराने भी पुरुषों के साथ स्त्रियाँ जाती हैं। और भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी स्त्रियों को पुरुषों के बराबर संघर्ष करते दिखाया जाता है।
जातिगत श्रेणीबद्धता अब तक के भारतीय समाज का सार्वभौमिक प्रश्न है। भारतीय समाज सदियों से जाति विभाजित समाज रहा है। 1936 में अम्बेडकर का जाति-उन्मूलन (Anhilation of Cast) इस समस्या का ऐतिहासिक दस्तावेज है। हालाँकि अम्बेडकर से पूर्व महात्मा बुद्ध और ज्योतिबा फुले सामाजिक क्षेत्र में इस समस्या की शिनाख्त और खतरे की तरफ बहुत मजबूती से इशारा कर रहे थे। साहित्य में सिद्ध-नाथों, कबीरदास, रैदास और आधुनिक काल में स्वामी अछूतानन्द हरिहर और हीरा डोम जैसे जाति विरोधी रचनाकार तो हुए लेकिन 19वीं सदी के अंत में आधुनिकता का जो प्रोजेक्ट शुरू हुआ तो जाति की समस्या को उजागर करने वालों में स्वामी अछूतानन्द और हीरा डोम ने ही हिंदी क्षेत्र में जाति विरोधी अभियान को जारी रखा। लेकिन यहाँ एक ध्यान देने लायक बात यह है कि आधुनिकता के प्रोजेक्ट का मूल निहितार्थ रूढिवादिता और जडता से मुक्ति था। लेकिन यह मुक्ति आधुनिकता के मूल निहितार्थ के हिसाब से हिंदी क्षेत्र में कुंद- सा महसूस होता है। क्योंकि आदिकाल से भक्तिकाल, जो घोर सामन्ती काल के रूप में जाना जाता है, जाति से मुक्ति की छटपटाहट आधुनिक काल के बनिस्बत अधिक प्रखर मालूम पडती है, मसलन सिद्ध-नाथ हों या कबीर या रैदास। हालाँकि स्वामी अछूतानन्द और हीरा डोम के साथ और इनके बाद भी प्रेमचंद ने इस समस्या को बेहद संजीदा तरीके से उठाया । महात्मा बुद्ध ने धर्म को जाति समस्या का प्रमुख उपकरण है, का संकेत बहुत पहले ही कर दिया था, फिर बाद में अम्बेडकर ने भी धर्म को जाति समस्या का प्रमुख आधार माना। 1936 में उन्होंने जाति उन्मूलन लिखकर इसका तर्क प्रस्तुत किया। लेकिन उसी दौर में थोडा पहले 1923 और 1931 में अछूत समस्या (1923) और मैं नास्तिक क्यों हूँ (1931) भगत सिंह ने दो लेख लिखकर इस अमानवीय समस्या की तरफ इशारा कर दिया था। भगत सिंह ने अपने लेख अछूत समस्या में लिखा है कि इसलिए हम मानते हैं कि उनके अपने जन-प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए अधिक अधिकार माँगें। हम तो साफ कहते हैं कि उठो, अछूत कहलाने वाले असली जनसेवको तथा भाइयों! उठो! अपना इतिहास देखो। गुरुगोविन्द सिंह की फौज की असली शक्ति तुम्हीं थे! शिवाजी तुम्हारे भरोसे पर ही सब कुछ कर सके, जिस कारण उनका नाम आज भी जिन्दा है। तुम्हारी कुर्बानियाँ स्वर्णाक्षरों में लिखी हुई हैं। तुम जो नित्यप्रति सेवा करके जनता के सुखों में बढोतरी करके और जिंदगी संभव बना कर यह बडा भारी अहसान कर रहे हो, उसे हम लोग नहीं समझते। लैण्ड-एलिएनेशन एक्ट के अनुसार तुम धन एकत्र कर के भी जमीन नहीं खरीद सकते। तुम पर इतना जुल्म हो रहा है कि मिस मेयो मनुष्यों से भी कहती है - उठो, अपनी-अपनी शक्ति पहचानो। संगठनबद्ध हो जाओ। असल में स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिल सकेगा। (Those who would be free must themselves strike the blow) स्वतंत्रता के लिए स्वाधीनता चाहने वालों को यत्न करना चाहिए। इन्सान की धीरे-धीरे कुछ ऐसी आदतें हो गई हैं कि वह अपने लिए तो अधिक अधिकार चाहता है, लेकिन जो मातहत हैं उन्हें वह अपनी जूती के नीचे ही दबाए रखना चाहता है। कहावत है- लातों के भूत बातों से नहीं मानते। अर्थात् संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खडे होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इंकार करने की जुर्रत न कर सकेगा । तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुँह की ओर न ताको। लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सब कुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली सर्वहारा हो... संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट जाएँगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खडी कर दो। धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कास लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोये हुए शेरो! उठो और बगावत खडी कर दो।9 वहीं दूसरी तरफ अम्बेडकर लिखते हैं कि भारत में जाति भेद मूलतः हिन्दुओं के भीतर से निकली हुई वह गन्दगी है जिसने सारे देश के वायुमंडल को विषाक्त बना दिया है। और यह विष सिख, मुसलमान, ईसाई आदि अहिंदू लोगों में भी फैला पाया जाता है। अतएव, लाहौर के जात-पाँत तोडक मंडल को केवल हिन्दुओं का ही नहीं, सिख, मुसलमान, ईसाई आदि सभी का समर्थन मिलना चाहिये। मंडल का काम राष्ट्र की एक महान सेवा है और मंडल का यह प्रयत्न स्वराज संग्राम जब आप लडते हैं तो सारा राष्ट्र आफ साथ होता है, किन्तु इस जातिभेद विनाशक संग्राम में स्वयं मंडल को सारे राष्ट्र से संघर्ष करना होगा और वह राष्ट्र भी कोई दूसरा नहीं स्वयं अपना ही। मेरे विचार में तो मंडल का यह काम स्वराज से अधिक महत्त्वपूर्ण है। उस स्वराज से क्या लाभ, यदि हम उसकी रक्षा नहीं कर सकते । मेरी सम्मति में हिन्दू समाज से जाति भेद के महारोग के विनाश से ही उसमें अपनी आजादी की रक्षा करने की शक्ति उत्पन्न होने की आशा की जा सकती है।10 इन दोनों उद्धरणों से एक चीज तो साफ हो गई कि भारत में जाति-मुक्ति के बगैर कोई भी स्वराज अधूरा है। आम्बेडकर जहाँ जाति आधारित समाज को नकारते हैं, वहीं भगत सिंह जाति की समस्या को महत्त्वपूर्ण मानते हुए वर्ग आधारित समाज को भी नकारते हैं। इन दोनों समाज के उन्नायकों को प्रतिबंधित हिंदी कहानीकार साथ लेकर चलते हैं । प्रेमचंद ने ठाकुर का कुआँ तथा कुछ और कहानियाँ इसी दर्द को बयाँ करने के लिए लिखी थी। ठाकुर का कुआँ कहानी में अम्बेडकर द्वारा जाति की समस्याओं की शिनाख्त को बखूबी पहचाना गया है। इस कहानी में दमित या पिछडे हुए तबके को पानी पीने के लिए उच्च तबके के कुएँ से पानी लेने की मनाही थी। इसे पानी की समस्या का रूपक बनाकर भारतीय समाज के वीभत्स रूप को प्रेमचंद ने हिंदी कथा साहित्य में सामने रख दिया था। प्रेमचंद इस कहानी में लिखते हैं ठाकुर के कुएँ पर कौन चढने देगा? दूर से लोग डांट बताएँगे। साहू का कुआँ गाँव के उस सिरे पर है, परन्तु वहाँ भी कौन पानी भरने देगा। चौथा कुँआ गाँव में है नहीं। जोखू कई दिन से बीमार है। कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पडा रहा, फिर बोला- अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता। ला, थोडा नाक बंदकर के पी लूं ।11 इस कहानी का रचना समय 1932 है । इस कहानी को ध्यान में रखते हुए हमें अम्बेडकर द्वारा 1927 में किये गये पानी के लिए महाड आन्दोलन को देखना पडेगा। जिस तरह से सार्वजनिक कुओं और तालाबों से अछूत कही जाने वाली जातियों को पानी लेने का अधिकार नहीं था । इस परम्परा को नष्ट कर सबको पानी लेने के अधिकार के लिए अम्बेडकर ने सत्याग्रह किया। उसी तरह से प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य में अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से इस समस्या का हिंदी के आभिजात्य वर्गीय पाठकों का ध्यान दिलाने का सत्याग्रह किया। अम्बेडकर के महाड आन्दोलन और प्रेमचंद की इस कहानी में एक समानता यह भी है कि अम्बेडकर के इस आन्दोलन में स्त्री-पुरुष दोनों साथ में भाग लेते हैं। प्रेमचंद की कहानी में निर्भीक हो कर गंगी ही रात में ठाकुर के कुएं से पानी लेने जाती है। इसी समस्या से संबंधित एक और कहानी देखी जा सकती है। मजदूरिन कहानी लीलावती बी.ए. की कहानी है। इस कहानी की शुरुआत मुलिया (मुख्य पात्र) से होती है। कहानीकार शुरू में आभिजात्य स्त्रियों और दमित स्त्री के बीच के फर्क को दिखाता है। मुलिया के माध्यम से ही कहानी आगे बढती रहती है। इस कहानी में मुलिया मूलतः एक नौकर है और अपनी मालकिन की स्थिति को देख हमेशा द्वंद्व में रहती है। कहानीकार मुलिया के बारे में लिखता है कि उसके विषय में तो ऐसा प्रतीत होता था कि समय आगे - आगे भागता था और वह उसे थोडा ठहर-थोडा ठहर कहकर रोकने की व्यर्थ चेष्टा किया करती थी। सारा दिन खाली बैठने या इधर-उधर की गप-शप में ही व्यतीत कर देने का वह स्वप्न में भी खयाल नहीं कर सकती थी। मजदूरिन है। उसका काम सुबह से शाम तक कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहना है। सारा दिन पसीना बहाकर ही उसे पेट भरने को अन्न नसीब होता है। आप काम करती हैं, पति काम करता है, बच्चे भी कुछ-न- कुछ साथ देते ही हैं।12 ऊपर भगत सिंह ने जिस तरफ इशारा किया है, उसके साथ यह बात यहाँ साफ हो जाती है।
भारतीय सभ्यता मूलतः किसानी आधारित सभ्यता रही है । प्रतिबन्धित कहानियाँ इस किसानी सभ्यता के दमन से आहत हैं। इस सभ्यता को बचाने के लिए प्रतिबंधित कहानियाँ रूस की साम्यवादी व्यवस्था से प्रेरणा लेने की वकालत करती हैं। अंग्रेजी सरकार के साथ देशी सामंत मिलकर किसानों की स्थिति पहले से भी बदतर बना रहे थे। प्रेमचंद ने 1932 में लिखित अपने लेख में लिखा है कि भारत के अस्सी फीसदी आदमी खेती करते हैं। कई फीसदी वे हैं, जो अपनी जीविका के लिए किसानों के मुहताज हैं, जैसे गाँव के बढई, लुहार आदि। राष्ट्र के हाथ में जो कुछ विभूति है, वह इन्हीं किसानों और मजदूरों की मेहनत का सदका है। हमारे स्कूल और विद्यालय, हमारी पुलिस और फौज, हमारी अदालतें और कचहरियाँ, सब उन्हीं की कमाई के बल पर चलती हैं, लेकिन वही जो राष्ट्र के अन्न और वस्त्रदाता हैं, भरपेट अन्न को तरसते हैं, जाडे-पाले में ठिठुरते हैं और मक्खियों की तरह मरते हैं।... लार्ड कर्जन ने 1901 में यहाँ की व्यक्तिगत आय का अनुमान तीस रु. तक पहुँचाया और 1915 में वह समय था, जब योरोपीय महाभारत ने चीजों का मूल्य बहुत बढा दिया था। 1930 में वही हालत फिर हो गई जो 1901 में थी और हिसाब लगाया जाए तो आज हमारी व्यक्तिगत आय शायद पच्चीस रु. से अधिक न हो, पर आज तक किसी ने किसानों की दशा की ओर ध्यान नहीं दिया और उनकी दशा आज भी वैसी है जो पहले थी। उनके खेती के औजार, साधन, कृषि-विधि, कर्ज, दरिद्रता सब कुछ पूर्ववत् है।... सरकार ने समय-समय पर उनकी रक्षा करने के लिए कानून बनाए हैं, और शायद इस तरह के कानून अब तक और ज्यादा बन गए होते, यदि जमींदारों की ओर से उनका विरोध न हुआ होता। अबकी बार ही छूट के विषय में जमींदारों ने कम रुकावटें नहीं डालीं, लेकिन अनुभव से मालूम हो रहा है कि इस नीति से किसानों का विशेष उपकार नहीं हुआ।13 इसी मुद्दे को लेकर गाँधी ने चम्पारण सत्याग्रह और हिंदी क्षेत्र में स्वामी सहजानन्द सरस्वती का आन्दोलन प्रमुख था। इस मुद्दे पर बात करने से पहले हमें अपने हिंदी साहित्य का इतिहास के साथ गद्य साहित्य का इतिहास पर नजर दौडा लेनी चाहिए। विधाओं का इतिहास लिखने का प्रयास ऐसे तो हिंदी के कुछ इतिहासकारों ने किया है। परन्तु वह इतिहास केवल सूचनापरक ही दिखता है। मसलन रामचंद्र तिवारी (हिंदी का गद्य साहित्य), गोपाल राय (1.हिंदी कहानी का इतिहास 2. हिंदी उपन्यास का इतिहास), मधुरेश (हिंदी कहानी का विकास)। इन सभी विधा आधारित इतिहास लेखकों ने प्रवृत्ति के मसले पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा निर्धारित साहित्यिक प्रवृत्ति को मुख्य आधार बनाया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने साहित्य इतिहास के उपन्यास-कहानी उपशीर्षक के अंतर्गत लिखा है कि सामाजिक उपन्यासों में देश में चलने वाले राष्ट्रीय तथा आर्थिक आन्दोलन का भी आभास बहुत कुछ रहता है। तअल्लुकदारों के अत्याचार, भूखे किसानों की दारुण दशा के बडे चटकीले चित्र उनमें प्रायः पाए जाते हैं। इस सम्बन्ध में हमारा केवल यही कहना है कि हमारे निपुण उपन्यासकारों को केवल राजनीतिक दलों द्वारा प्रचारित बातें लेकर ही नहीं चलना चाहिए, वस्तुस्थिति पर अपनी व्यापक दृष्टि भी डालनी चाहिए। उन्हें यह भी देखना चाहिए की अंगरेजी राज्य पर भूमि की उपज या आमदनी पर जीवन निर्वाह करने वाले (किसानों और जमींदारों दोनों) की और नगर के रोजगारियों या महाजनों की परस्पर क्या स्थिति हुई। उन्हें यह भी देखना चाहिए कि राज कर्मचारियों का इतना बडा चक्र ग्रामवासियों के सिर पर ही चला करता है, व्यापारियों का वर्ग उससे प्रायः बचा रहता है। भूमि ही यहाँ सरकारी आय का प्रधान उद्गम बना दी गई है। व्यापार श्रेणियों को यह सुभीता विदेशी व्यापार को फलता-फूलता रखने के लिए दिया गया था, जिससे उनकी दशा उन्नत होती आई और भूमि से सम्बन्ध रखने वाले सब वर्गों की -क्या जमींदार, क्या किसान, क्या मजदूर- गिरती गई।14 शुक्ल जब यह बात कर रहे हैं तो उनके जेहन में प्रेमचंद युग है। इसके पहले उन्होंने किसानों की स्थिति पर नजर नहीं दौडाई है। जबकि भारतीय सामाजिक इतिहास के साथ हिंदी लोक साहित्य पर अगर हम गौर करें तो ईस्ट इंडिया कम्पनी के स्थापना के बाद से इस मुल्क के किसानों की स्थिति दयनीय होती गई। सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने लिखा है कि हमारे सामने किसान आन्दोलन के सम्बन्ध में जो जानकारी उपलब्ध है उसके अनुसार ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन के बाद अंग्रेजी शासन द्वारा भू-राजस्व की मात्रा अत्यधिक बढा देने से इसकी शुरुआत होती है। 1767 में पूर्वी सिंहभूमि के ढालभूम क्षेत्र में ढाल राजाओं ने फावर्यूसन के विरुद्ध युद्ध किया जिसमें बडी संख्या में आदिवासी किसानों ने भाग लिया। यह लडाई 1777 तक चली। लगान न देने के कारण राज्य को अंग्रेजों ने नीलाम कर दिया, जिसके कारण 1769 से 1805 तक चुआड विद्रोह हुआ। बँगला शब्दकोश में चुआड का अर्थ नीच जाति उल्लिखित है, जिसे गाली स्वरूप आदिवासियों के लिए प्रयुक्त किया गया। कैप्टन कैमेक के विरुद्ध 1770-71 में चेरो विद्रोह हुआ जो पुनः1810 में भी देखने को मिला। इसी वर्ष भोगता विद्रोह प्रकाश में आया। 1772-73 में घटवाल और फदिया विद्रोह सुनाई दिया। 1782-1807 तक तमाड विद्रोह और 1793 से 1832 तक मुंडा विद्रोह देखने को मिला। पुनः1819-20 में रुदुकोंता के नेतृत्व में मुंडाओं ने विद्रोह किया। 1793 में तिलक माँझी की अगुवाई में संथालों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। आदिवासियों की सबसे बडी समस्या जमीन और लगान की थी। उनका मानना था कि जंगल को साफ कर उन्होंने जमीन तैयार की है इसलिए जमीन पर उनका हक है। इसमें अंग्रेजों को दखल देने का अधिकार नहीं है। इन्हीं सब मुद्दों पर मानभूमि के भूमिजों ने 1798 में विद्रोह किया। 1820-21 में सिंहभूमि विद्रोह एक बार फिर प्रकाश में आया।15 आचार्य रामचंद्र शुक्ल और सुभाष चन्द्र कुशवाहा के इन उद्धरणों में कालगत अंतर महसूस किया जा सकता है। अब बात उठती है कि समाज और साहित्य में इस तरह के अंतर को कैसे समझा जाये। जबकि साहित्य का विकास सामाजिक विकास के साथ होता है। अगर केवल इस मुद्दे की बात करें, तो लोक साहित्य में किसानों की दुर्दशा की बात साहित्य से पहले मिलने लगती है। इसके प्रतिबन्धित हिंदी कविताओं में भी 1857 के सन्दर्भ में किसानों की दुर्दशा का उल्लेख मिलता है। प्रतिबन्धित हिंदी कहानियों में रूस की जारशाही के दौर से साम्यवादी दौर में पहुँचने तक की किसानों के दमन की ऐतिहासिक स्थिति को दिखाते हैं। इन कहानियों में शोषक और शोषित को आमने-सामने ही रखा गया है। उग्र की कहानी निहिलिस्ट में इसे देखा जा सकता है-
हमारे प्यारे बन्धु किसान,
मरते हाय! अ-नय के कर से पाते दुःख महान।
अनियंत्रित शासन है, कारण इसका एक प्रधान।
जब तक यह न मिटेगा तब तक कहीं नहीं कल्याण।
मास्को के हेड पुलिस स्टेशन (कोतवाली) पर बैठे हुए पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट ने सुना और देखा -कोई युवक उक्त गान को गाता हुआ चला जा रहा है। फौरन चार पुलिस कांस्टेबल दौडाए गए। युवक पुलिस सुपरिन्टेंडेंट के सामने लाया गया।16 इसके बाद आगे पुलिस अधिकारी और युवक के बीच गान गाने को लेकर बहस है। अंत में पुलिस उसको कैद कर लेती है। इस तरह की अनेक प्रतिबंधित कहानियाँ हैं । इसका मूल कारण उस समय के देशी-विदेशी साहित्यकारों का साहित्य और समाज के प्रति उनका नजरिया। अगर हम केवल भारत के पडोसी देशों की बात करें तो रूस में गोर्की, चीन में लूशुन और भारत में प्रेमचंद ऐसे कथाकार थे जो कि सामाजिक दमन और सामाजिक विकास प्रत्रि*या को जनता से समझते थे। इन तीनों के बारे में राणा प्रताप लिखते हैं कि गोर्की, प्रेमचंद और लूशुन- तीन महान कलाकार, तीन साहित्यिक विभूतियाँ और युग-प्रतिभाएँ! तीनों के बचपन थोडी-बहुत भिन्नता के साथ यकसाँ। अध्ययन, मनन और चिंतन की सीढियों को चढना और साहित्य के लेखन में प्रवृत्त होना, लगभग यकसाँ। देखने में भी थोडी-बहुत भिन्नता के साथ यकसाँ। हालाँकि गोर्की उम्र में भी, कद में भी प्रेमचंद और लूशुन से 12-13 साल बडे थे।
देश-प्रेम, आजादी और ऋांति की सेवा का ध्येय तीनों का एक था। तीनों लेखकों ने अपने-अपने देश की जनता को बेइंतहा प्यार किया।17 बदले में तीनों लेखकों को भी जनता का बहुत प्यार और सम्मान मिला। यही जनता का प्यार और स्नेह शासक के लिए खतरनाक था ।
हिंदी साहित्य में तीव्र या मद्धिम अंग्रेजी दमन का जिऋ तो मिलता है । परन्तु दमनात्मक काले कानूनों का कोई विरोध नहीं मिलता है। लेकिन प्रतिबन्धित हिंदी कहानीकारों ने इसको बखूबी उठाया है। जिसके कारण इन्हें प्रतिबन्ध का भी सामना करना पडा। इसीलिए ग्राहमशॉ और मैरीलॉयड की किताब की भूमिका लिखते हुए बी.सी.ब्लूमफील्ड ने लिखा है कि The editors show that the British normally banned publication for two main reasons: first they promoted criticism of the British administration; and second, they promoted religious and/ or racial strife. The proscription of publication for moral or sexual reasons seems almost never to have been the case, in spite of the fact that a number of such publications are known to have originated in India."18 जिस तरह से साम्प्रदायिकता और लैंगिकता अप्रतिबंधित साहित्य के विषय-वस्तु में आजादी के बाद जुडती है। उसी तरह से मुखर रूप से शासक की आलोचना भी कम ही देखने को मिलती है । प्रतिबंधित हिंदी कहानियों के लेखकों ने अपनी कहानियों में इसको प्रमुखता दी है। मास्टर साहब धीर-गंभीर गति से आगे बढ रहे थे। इस समय उन्होंने हजामत बनवाई थी। वे अपने निजी वस्त्र पहने थे। दूर से देखने में दुर्बल होने के सिवा और कोई अंतर न दिखता था। वे मानो किसी गहन विषय को सोचते हुए व्याख्यान देने रंगमंच पर आ रहे थे। उनके आगे खुली पुस्तक हाथ में लिए पादरी कुछ वाक्य उच्चारण कर रहा था। उनके पीछे जैसा अपने पूरी पोषक में थे। उनकी बगल में मजिस्ट्रेट और डॉक्टर भी चल रहे थे । क्षण भर तख्ते पर खडे रहने के बाद जल्लाद ने उनके गले में रस्सी डाल दी । पादरी ने कहा-मैं प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति प्रदान करे।
मास्टर साहब ने कहा चुप रहो, मैं प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर मेरी आत्मा को ज्वलंत अशांति दे, जो तब तक न मिटे जब तक मेरा देश स्वाधीन न हो जाये और मेरे देश का प्रत्येक व्यक्ति शांति न प्राप्त कर ले।19 यह कहानी आचार्य चतुरसेन शास्त्री की है, जिसमें पराधीनता से मुक्ति के लिए अंतिम दम तक लडने की जिजीविषा, जो परिचय पात्र के माध्यम से करवाया है, वह उनके समकालीन अप्रतिबंधित कहानियों के कहानीकारों की बस की बात नहीं दिखती। इस तरह की कहानी फाँसी (विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक), विद्रोही के चरणों पर (जनार्दनप्रसाद झा द्विज), बलिदान (मुनीश्वरदत्त अवस्थी), इत्यादि कहानियाँ हैं।
इरफान हबीब ने पी.सी.जोशी और कार्लमाक्र्स के हवाले से लिखा है कि 1857 पर पी.सी.जोशी द्वारा सम्पादित ग्रन्थ में, तलमीजखाल्दून ने सुव्यवस्थित दस्तावेजी साक्ष्यों से युक्त एक लेख में यह तर्क पेश किया है कि इस विद्रोह ने देसी सामंतशाही तथा विदेशी साम्राज्यवाद के खिलाफ किसान युद्ध का रूप ले लिया था और इस तरह यह सब से बढकर एक सामंत विरोधी आन्दोलन था और उसके बाद ही एक साम्राज्यवाद विरोधी विद्रोह। इस सिलसिले में हम पी.सी.जोशी से सहमत होंगे कि यह तर्क अनुचित तरीके से 1857 की बगावत के उपनिवेश विरोधी चरित्र को कमजोर करता है और बहुत अयथार्थवादी तरीके से भूस्वामी वर्गों को विद्रोहियों की कतारों से बहार कर देता है। स्वाभाविक रूप से यह, जैसा कि हम पहले ही देख पाए हैं, 1857 के विद्रोह माक्र्स के आकलन के भी अनुरूप नहीं है। माक्र्स के लिए यह एक ऋांति थी, एक राष्ट्रीय ऋांति, जिसमें किसानों के अलावा जमींदारों तथा ताल्लुकेदारों के भी कुछ हिस्से थे।20 बात यहाँ 1857 का विद्रोह सामन्ती और साम्राज्यवादी विद्रोह दोनों एक साथ थे या केवल साम्राज्यवादी विद्रोह ही था, की है। कुल मिलाकर मूल बात यहाँ ऐतिहासिक नजरिये की है कि किसी विद्रोह को कैसे देखा जा रहा है। लेकिन अगर हम उस दौर के या उस विद्रोह से सम्बन्धी साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से इस विद्रोह को समझने की कोशिश करेंगे तो स्पष्ट होगा कि साम्राज्य और सामंत दोनों ही से जनता मुक्ति चाहती थी। इसीलिए यह विद्रोह जनमानस में व्यापक रूप से फैला। प्रतिबंधित कहानियों में एक कहानी है- बागी की बेटी जो 1857 पर आधारित है। मुनीश्वरदत्त अवस्थी इस कहानी में दिखलाते हैं कि एक बागी, जो देश को सामन्ती और साम्राज्यवादी जडता से मुक्ति दिलाने के ऋम में शहीद होता है। उसके इस अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए उसकी बेटी ने कमर कस ली है। वे सन् 1857 के दिन थे, जबकि संसार के पूर्वी भाग -भारत में स्वतन्त्रता की आभा-सी निकल रही थी । गुलामी के अँधेरे में वर्षों रहते हुए प्राणियों के प्राण पर बन आई थी और चमकती हुई तलवारें आशा की ओर इशारा कर रही थीं । रक्त की धारा का प्रतिबिम्ब आकाश में अरुण का रूप धारण कर रहा था। इस नवीन युग के प्रमुख पात्र धुंधपंत नाना साहब पेशवा का कानपुर और उसके आस-पास अधिकार हो चुका था। बिठूर उसकी राजधानी थी। वीर सेनापति तात्या टोपे ने झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की सहायता से कालपी के मैदान में लेफ्टिनेंट बुकर को मैदान से भगा दिया। बौकर के सहायक फ्रेनर साहब तथा उनके उनतीस साथी गिरफ्तार करके बिठुर भेजे गए थे। कानपुर के युद्ध में पकडे गए सैनिकों के साथ कर्नल फ्रेनर अपनी आयु के दिन बिठुर जेल में व्यतीत कर रहे थे। उस मरहठे सरदार ने फ्रेनर से और प्रश्न नहीं किये। वह उदासीन की भाँति जेल के बाहर हो गया।21 इस कहानी में प्राणी जगत की मुक्ति के लिए तमाम उद्यम किये जा रहे हैं । इसके अलावा प्रतिबंधित हिन्दी कहानियाँ और इसके लेखक दोनों ही समाज में मौजूद किसी भी तरह की पराधीनता से मुक्ति की लालसा रखते हैं।
जिस तरह ऊपर पी.सी.जोशी के हवाले से 1857 की क्रांति को सामन्ती और साम्राज्यवादी दोनों से ही मुक्ति की बात की गई है, उसी प्रकार प्रतिबंधित हिंदी कहानियों का अध्ययन करने से ऐसा महसूस होता है कि 1857 के प्रथम जन आन्दोलन के साथ सम्पूर्ण स्वतन्त्रता आन्दोलन के केंद्र में भी सामन्ती और साम्राज्यवादी दोनों ही जडताओं के खिलाफ आन्दोलन था। कम-से-कम प्रतिबन्धित हिंदी कहानियों के गहन अध्ययन से यह बात सिद्ध हो जाती है। इसके अध्ययन और साहित्य के साथ सामाजिक इतिहास में भी राजनीतिक, सामाजिक इतिहास में वृद्धि की गुंजाइश बनेगी। हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रतिबंधित कालगत और विषयगत दोनों ही स्तर पर पुनर्रचना की सम्भावना बनेगी । इस प्रकार प्रतिबंधित हिंदी कहानियों को हिंदी साहित्य में जगह देने से हिंदी साहित्य के इतिहास पर तो असर पडेगा ही, साथ ही कहानी विधा का इतिहास भी इससे समृद्ध होगा।
***
सन्दर्भ :
1. एदुआर्दो गालेआनो (2016), आग की यादें, अंग्रेजी से अनुवाद और संपादन : रेयाजुलहक, गार्गी प्रकाशन, दिल्ली- 15
2. सुरेन्द्र चौधरी लिखते हैं -‘सामान्यतः पाठक और आलोचक के एक समुदाय के बीच इस बात को लेकर सहमति है कि कथा हमारा मनोरंजन करती है। इस मनोरंजन को लेकर अभिजात रुचि बराबर कथा-कहानियों को हेय दृष्टि से देखती आयी है।’ सुरेन्द्र चौधरी (2010), हिंदी कहानी प्रत्रि*या और पाठ, राधाकृष्ण नई दिल्ली-11
3. रुस्तम राय लिखते हैं - ‘समस्त भारतीय भाषाओं में अनेक उपन्यास और कहानी संकलन स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान प्रतिबंधित हुए हैं। अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार हिंदी कथा-साहित्य से संबंधित 54 कहानियाँ मिली हैं। ‘रुस्तम राय, स्वाधीनता आन्दोलन और प्रतिबंधित हिंदी कथा-साहित्य’, विभूतिनारायण राय (सम्पा.) कथा-साहित्य के सौ बरस, शिल्पायन, दिल्ली-24
4. शाहिद अमीन और ज्ञानेंद्र पाण्डेय, ‘पक्की से हट कर’, शाहिद अमीन व ज्ञानेंद्र पाण्डेय (सम्पा.), निम्नवर्गीय प्रसंग - राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-20
5. पाण्डेयबेचन शर्मा ‘उग्र’, ‘उसकी माँ’, रुस्तम राय (सम्पा.), प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य, राधाकृष्ण, नई-दिल्ली-15
6. विजय कुमार (2010), अंधेरे समय में विचार, संवाद प्रकाशन, मेरठ-65
7. शम्भुनाथ, भूमिका से, शम्भुनाथ (सम्पा.), सामाजिक ऋांति के दस्तावेज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-17
8. प्रेमचंद, शराबी की दुकान, बलराम अग्रवाल (सम्पा.) सोजे वतन तथा अन्य जब्तशुदा कहानियाँ, साक्षी प्रकाशन, दिल्ली- 104
9. भगत सिंह का लेख- अछूत समस्या, https://www.marxists. org/hindi/bhagat-singh/1923/achoot-samasya.htm
10.अम्बेडकर का लेख- जाति उन्मूलन द्धह्लह्लश्चर्‍//द्दड्डस्र4ड्डद्मश्ाह्यद्ध.श्ाह्म्द्द/द्दद्म
11. प्रेमचंद, ठाकुर का कुआँ, बलराम अग्रवाल(सम्पा.) सोजे वतन तथा अन्य जब्तशुदा कहानियाँ, साक्षी प्रकाशन, दिल्ली- 167
12. लीलावती बी.ए., ‘मजदूरिन’, रुस्तम राय (सम्पा.), प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य, राधाकृष्ण, नई दिल्ली-245
13. प्रेमचंद, हतभागे किसान, निर्मल वर्मा और कमल किशोर गोयनका (सम्पा.), प्रेमचंद रचना-संचयन, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-775
14. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-337
15. उद्धृत द्वारा सुभाष चन्द्र कुशवाहा, -अवध का किसान विद्रोह : 1920 से 1922ई., राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-23
16. पाण्डेयबेचन शर्मा ‘उग्र’, ‘निहिलिस्ट’ रुस्तम राय (सम्पा.), प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य, राधाकृष्ण, नई दिल्ली- 70
17. राणा प्रताप, नयी पीढी के लिए गोर्की प्रेमचंद लूशुन, गार्गी प्रकाशन, दिल्ली-149
18. From Preface written by B.C. Bloomfield, Graham Shaw and Mary Lloyd, Publications prescribed by the Government of India, The British Library, London
19. आचार्य चतुरसेन शास्त्री, ‘फंदा’, रुस्तम राय (सम्पा.), प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य, राधाकृष्ण, नई दिल्ली-269
20 इरफान हबीब, ‘राष्ट्रीय विद्रोह की कहानी’, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और चंचल चौहान (सम्पा.), 1857 इतिहास कला साहित्य, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली- 27
21. मुनीश्वरदत्त अवस्थी, ‘बागी की बेटी’, रुस्तम राय (सम्पा.), प्रतिबन्धित हिंदी साहित्य, राधाकृष्ण, नई दिल्ली-132
***
सम्पर्क
शोध छात्र, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद- 500046
ashutoshpandey010@gmail.com
मो. 919452806335