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अतिक्रमण से उत्पन्न समय-सत्यों का अन्वेषण

राकेश बिहारी
इह शिष्टानुशिष्टानां शिष्टानामपि सर्वथा।
वाचामेव प्रसादेन लोकयात्रा प्रवर्तते।।
(इस संसार में शिष्टों अर्थात शब्दशास्त्रियों द्वारा अनुशासित शब्दों एवं उनसे भिन्न अननुशासित शब्दों की सहायता से ही सर्वथा लोक व्यवहार चलता है। ) - आचार्य दण्डी
उदारीकरण और भूमंडलीकरण के नाम पर नब्बे के दशक में जिन संरचनात्मक समायोजन वाले आर्थिक बदलावों की शुरुआत हुई थी, उसका स्पष्ट और मुखर प्रभाव आज जीवन के हर क्षेत्र में देखा जा सकता है। अधुनातन सुविधाओं और अभूतपूर्व चुनौतियों की अभिसंधि पर खडा यह कालखंड हिन्दी कहानी में एक नई कथा-पीढी, जिसे संपादकों-आलोचकों ने बहुधा युवा पीढी के नाम से पुकारा है, के आने और स्थापित हो जाने का भी गवाह है। चूँकि युवा शब्द अंततः एक खास उम्र का ही द्योतक होता है और अब यह कथा-पीढी एक महत्त्वपूर्ण आकार भी ग्रहण कर चुकी है, यह जरूरी हो गया है कि इसे एक ऐसा नाम दिया जाय जो उम्र और वय की परिसीमा से बाहर, इस कालावधि की विशिष्टताओं को भी अभिव्यंजित करे। भूमंडलीकरण जो एक राजनैतिक-आर्थिक एजेंडे के रूप में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है, की शुरुआत के बाद की कालावधि को अभिव्यक्त करने के लिये ही मैने अपनी किताब केंद्र मे कहानी में भूमंडलोत्तर शब्द का प्रयोग किया है।
भूमंडलोत्तर शब्द अबतक किसी शब्दकोश का हिस्सा नहीं है, लिहाजा इस शब्द के प्रयोग पर आपत्तियाँ होनी ही थी। ऐसा नहीं है कि इसे गढते हुये मैं किसी मुगालते या खुशफहमी में था, कि इस पर होनेवाली संभावित आपत्तियों के बारे में सोचा ही नहीं। सच तो यह है कि इस संदर्भ में कई मित्रों और वरिष्ठों से लंबी अनौपचारिक बातचीत में भूमंडलीकरण की शुरुआत के बाद की कालावधि को अभिव्यक्त करने के लिए कोई एक शब्द या पद न मिलने पर ही अपनी उन आशंकाओं के साथ मैंने भूमंडलोत्तर शब्द प्रस्तावित किया था। जिन लोगों ने मेरी वह किताब पढी है, उनकी नजर मेरी उन आशंकाओं पर भी गई होगी। इस मुद्दे पर एक रचनात्मक बहस की शुरुआत कथालोचक और मेरे प्रिय मित्र संजीव कुमार ने परिकथा के जनवरी-फरवरी 2014 अंक में की थी। वे उत्तर-छायावाद और छायावादोत्तर शब्द का उदाहरण देते हुए भूमंडलोत्तर शब्द के प्रयोग में और सावधानी बरतने की बात करते हैं। अपनी आपत्तियों के बावजूद संजीव कुमार नए शब्दों की गढंत में शुद्धतावाद किस हद तक बरता जाये को लेकर खुद को संभ्रम की स्थिति में पाते हैं और भूमंडलोत्तर शब्द के प्रयोज्य अर्थ पर सर्वानुमति की संभावनाओं की बात भी करते हैं। खुद को संभ्रम की स्थिति में कहने की उनकी विनम्रता को मैं नए शब्द के निर्माण और उसकी अर्थ-स्वीकृति की प्रत्रि*या के संदर्भ मे उनका बौद्धिक और रचनात्मक खुलापन मानता हूँ।
उसी दौरान हमारे अग्रज कथाकार और भूमंडलीय यथार्थ के विचारक रमेश उपाध्याय ने भी फेसबुक पर इस शब्द के प्रयोग को लेकर अपनी आपत्ति जताई थी। संजीव कुमार की तरह किसी नए शब्द के गढंत को लेकर एक रचनात्मक बहस करने की बजाय तथाकथित जिज्ञासा की चाशनी में लपेटकर इसका लगभग उपहास करते हुये वे कहते हैं- यह ‘भूमंडलोत्तर’ क्या है? यह किस भाषा का शब्द है? अगर हिन्दी का है, तो कोई हमें बताए कि यह शब्द कैसे बना और इसका अर्थ क्या है!
भूमंडलोत्तर शब्द के प्रयोग पर संजीव की तार्किक आपत्तियों तथा उनके बौद्धिक व रचनात्मक खुलेपन और रमेश उपाध्याय की उपहासपरक जिज्ञासाओं के बीच यह ध्यान दिया जाना चाहिये कि शब्द हमेशा व्याकरण की कोख से ही पैदा नहीं होते। यह भी जरूरी नहीं कि नए शब्द हर बार कहीं से कोई पूर्वस्वीकृत अर्थ धारण करके ही प्रकट हों। बल्कि सच तो यह है कि नए शब्दों पर एक खास तरह के अर्थ का स्वीकृतिबोध आरोपित करके उन्हें दैनंदिनी का हिस्सा बना लिया जाता है। चूंकि शब्दों का सिर्फ अर्थ संदर्भ ही नहीं उनका एक काल और भाव संदर्भ भी होता है, मैं शब्द निर्माण की प्रत्रि*या को किसी तयशुदा खांचे या शुद्धतावाद के चश्मे से देखने का आग्रही भी नहीं हूँ।
जहाँ तक भूमंडलोत्तर शब्द का प्रश्न है, इसको लेकर की जाने वाली आपत्तियों के दो मुख्य कारण हैं- एक भूमंडल शब्द में भूमंडलीकरण के उत्तरार्ध करण के भाव-लोप का, तथा दूसरा- अँग्रेजी के पोस्ट का हिंदी अनुवाद उत्तर के प्रचलित अर्थ के बाद के हवाले से भूमंडलीकरण के दौर के समाप्त न होने के भावबोध का। आधुनिकोत्तर, उत्तर आधुनिक, छायावादोत्तर या उत्तर छायावाद जैसे शब्दों/पदों के उदाहरण इन्हीं संदर्भों में दिये जाते हैं। नए शब्द, पद या शब्द-युग्म के निर्माण की प्रत्रि*या पर बात करते हुये इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि शब्दों की संधि के ऋम में किसी पद का विलोप कोई नई बात नहीं है। इस तरह के पद-विलोपों को स्वीकार कर न जाने कितने शब्दों को उनके प्रयोज्य अर्थ के साथ स्वीकृति मिलती रही है। यहाँ स्वातंत्रयोत्तर शब्द का संदर्भ लिया जाना चाहिए जिसका प्रयोग स्वतन्त्रता के बाद नहीं, स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के समय का अर्थ संप्रेषित करने के लिए किया जाता है। कहने की जरूरत नहीं कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के अर्थ में स्वातंत्र्योत्तर शब्द की स्वीकार्यता भाषा या व्याकरण के बने-बनाए नियमों से नहीं बल्कि आम बोलचाल में उसके प्रयोज्य अर्थ के स्वीकृतिबोध से मिली है। इसलिए यदि स्वातंत्र्योत्तर का अर्थ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का समय हो सकता है तो भूमंडलोत्तर का अर्थ भूमंडलीकरण की शुरुआत के बाद का कालखंड क्यों नहीं हो सकता?भूमंडलीकरण की शुरुआत के बाद की कालावधि को अभिव्यक्त करने के लिए एक निश्चित शब्द खोजते हुये मेरे जेहन में भूमंडलीकरणोत्तर भी आया था लेकिन उसके रुखडेपन के मुकाबले भूमंडलोत्तर की संक्षिप्तता और लयात्मकता मुझे ज्यादा पसंद आई और स्वातंत्र्योत्तर के उदाहरण तथा इस आलेख के आरंभ में उद्धृत आचार्य दण्डी के सूत्र ने मुझे इसका प्रयोग करने के लिए जरूरी आत्मविश्वास भी दिया।
किसी नए शब्द के उसके प्रयोज्य अर्थ के साथ स्वीकारने में होने वाली दिक्कतों का एक कारण यह भी है कि हम अपनी भाषा में नया शब्द गढने की जरूरत पर ध्यान देने से ज्यादा अँग्रेजी शब्दों के सीधे-सीधे शाब्दिक अनुवाद खोजने में उलझ जाते हैं। पोस्ट ग्लोबलाइजेशन का शाब्दिक अनुवाद भूमंडलीकरण के बाद होगा, इससे किसको इंकार हो सकता है, लेकिन भूमंडलीकरण के बाद के समय के लिए एक शब्द, पद या शब्द-युग्म की खोज करते हुये उसके प्रयोज्य अर्थबोध पर सामान्य सहमति की बात करना शाब्दिक अनुवाद की यांत्रिक प्रक्रिया से कहीं आगे की बात है, जिसे किसी लीक विशेष से बँध कर चलने वाली ठस वृत्ति से नहीं समझा जा सकता। मतलब यह कि नए शब्दों की गढंत पर बात करते हुये हमें अपनी संवेदना-चक्षुओं पर लगे आचार-संहिताओं के तालों के भार से मुक्त होकर खुले मन से विचार करना होगा।
हिन्दी व्याकरण में योगरूढि को परिभाषित करते हुये शब्दों का अपना मूल अर्थ छोडकर विशेष अर्थ धारण कर लेने की बात भी बताई जाती है। आज भूमंडलीकरण, बाजारीकरण, उदारीकरण जैसे शब्दों को उनके मूल अर्थ संदर्भों तक सीमित कर के देखा जाना कितना हास्यास्पद या अर्थहीन हो सकता है, अलग से बताने की जरूरत नहीं है। एक अर्थ में वसुधैव कुटुंबकम, और कार्ल माक्र्स की उक्ति दुनिया के मजदूरों एक हो के पीछे भी एक तरह के भूमंडलीकरण की अवधारणा ही है। लेकिन आज भूमंडलीकरण शब्द से सिर्फ और सिर्फ नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत एक ऐसे आर्थिक परिवेश के निर्माण की प्रत्रि*या का बोध होता है जहाँ पूँजी बेरोक टोक आ-जा सके। और तो और, भूमंडलीकरण, वैश्वीकरण, बाजारीकरण आदि के समानार्थी प्रयोगों को भी किसी शुद्धतावाद के चश्मे से देखने या शब्दकोश में उसकी पूर्व उपस्थिति के मानकों से जाँचने-परखने की कोशिश करें तो हमारे हाथ कुछ नहीं लगेगा। ठीक इसी तरह यदि साठोत्तरी शब्द के शाब्दिक अर्थ पर जाएँ तो मेरा कोई सहकर्मी जिसका हिन्दी कहानी के इतिहास से कोई रिश्ता नहीं, मुझे और खुद को उसी पीढी में शामिल मान लेगा। लेकिन साठोत्तरी शब्द के भाव और इतिहास-संदर्भों को देखते हुये यह कितना हास्यास्पद हो सकता है, सब समझते हैं। इसी क्रम में रमेश उपाध्यायजी द्वारा बहुप्रयुक्त पद भूमंडलीय यथार्थ या फिर पंकज राग की कविता यह भूमण्डल की रात है के ठीक-ठीक भाव को पकडने के लिए हम शब्दकोश में दिये गए भूमंडल शब्द के अर्थ का मुखापेक्षी भी नहीं हो सकते। मतलब यह कि शब्द जीवन में स्वीकृत होने के बाद ही शब्दकोष में स्थान पाते हैं। इसलिए किसी नए शब्द के प्रयोग पर चौंकने या उसका उपहास करने के बजाय उसके अर्थबोध की स्वीकृति की संभावनाओं पर भी एक रचनात्मक बहस की जरूरत है।
भूमंडलोत्तर शब्द के प्रयोग पर अपना पक्ष रखते हुये मैं व्यापक हिन्दी समाज से इस शब्द को इसके प्रयोज्य अर्थसंदर्भों, जिसमें निश्चय ही काल और भाव का संदर्भ भी जुडा हुआ है, के साथ स्वीकार करने की संभावनाओं पर विचार करने की अपील भी करता हूँ।
भूमंडलीकरण की शुरुआत के बाद का समय, जिसे मैंने भूमंडलोत्तर समय कहा है, को पिछले समय से अलग करने में तकनीकी और सूचना ऋान्ति की बडी भूमिका है। भूमंडलोत्तर समय को जिस तरह सूचना क्रांन्ति से अलग कर के नहीं देखा जा सकता है, उसी तरह उसके पहले के समय को समझने के लिए औद्योगिक क्रांन्ति की चर्चा जरूरी है। अट्ठारहवीं सदी में स्टीम इंजन के आविष्कार के साथ जिस औद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत मानी जाती है, तब से आजतक पूरी दुनिया में पूंजी का निर्माण बहुत तेज गति से हुआ है और लोगों का जीवन स्तर भी दिनानुदिन बेहतर हुआ है। लेकिन, इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि औद्योगिक क्रांति अकेली नहीं आई थी, उसके साथ एक सामाजिक ऋान्ति भी कदमताल कर रही थी। बेरोजगारी और श्रम की कम कीमत की आशंका ने तब श्रम आंदोलनों को जन्म दिया था। लेकिन विनिवेशीकरण और निजीकरण के तीव्रगामी और सुनियोजित सत्ता-अनुष्ठानों के बावजूद आज श्रम आन्दोलन की संभावनाएँ बहुत क्षीण हो गई हैं। गति, संकुचन और फ्यूजन इस समय के ऐसे अनिवार्य लक्षण हैं, जो लगभग मूल्य की तरह स्वीकार कर लिए गए हैं। ज्ञान का सूचना में, रचनात्मकता का उत्पादन में, उपलब्धि का जीत में, प्रगति का गति में, वस्तु का उत्पाद में, व्यक्ति का उपभोक्ता में और सम्बन्धों का संभावित ग्राहक में रिड्यूस हो जाना भी इस समय की बडी विशेषताएँ हैं। ज्ञान और संवेदना कभी एक दूसरे का संवर्द्धन करते थे, पर आज सूचना और संवेदना जैसे परस्पर विपरीतधर्मी हो गए हैं। सूचना और संवेदनात्मक सूचना के बीच फर्क करने की सलाहियत जिस तरह खत्म हो रही है, आज उसके कारण सूचना और अफवाह तथा फैक्ट्स और फिक्शन के बीच की दूरियाँ लगातार कम होती जा रही हैं।
अपनी भयावहता और खूबसूरती दोनों ही अर्थों में अभूतपूर्व होने के कारण पिछले दो दशकों के बीच फैले समय का भूगोल खासा जटिल है। बाजारवादी शक्तियों का नवोत्कर्ष और हमेशा से हाशिये पर जीने को मजबूर समाज और समूहों का अस्मिताबोध दोनों ही इस समय की विशेषताएँ हैं। उदारीकरण की शुरुआत के पहले तक का समय जहाँ एक खास तरह के मूल्यों और मानदंडों की स्थापना का समय था वहीं उसके बाद का कालखंड उन मूल्यों और मान्यताओं के अतिक्रमण और विखंडन का काल है। लेकिन स्थापना के विरुद्ध अतिऋमण के इस दौर को सबकुछ लुट जाने या तहस-नहस हो जाने के सतही, सरलीकृत और एकरैखिक टिप्पणियों से नहीं समझा जा सकता। नए दौर के इस विखंडन और अतिऋमण में बहुत तरह की पुनर्संरचनाओं के बीज भी छिपे हैं। जेंडर और जाति की रूढियों का प्रतिरोध, समलैंगिकों और तृतीय प्रकृति के लोगों के संघर्ष, पर्यावरण की चिंता आदि इसी की कडियाँ हैं। इन चिंताओं का एक पहलू विस्थापन और विस्मृति के द्वन्द्वों के बीच स्मृति और स्थानीयता के संरक्षण के बहाने लोक को नए सिरे से सहेजने से भी जुडता है। अतिऋमण और पुनर्संरचना के इन्हीं द्वन्द्वों से टकराकर आलोचना के नए टूल्स विकसित होंगे। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि तेज रफ्तार चलते समय के इन विविधवर्णी और बहुपरतीय यथार्थों और उसकी विडंबनाओं को भूमंडलोत्तर कहानी जिस तरह दर्ज कर रही है, उससे हिन्दी कहानी की परंपरा समृद्ध हुई है। लेकिन कुछ अपवादों को छोड दें तो, कहानी में मौजूद बदलते समय की इस धमक को आलोचना ठीक-ठीक पकडने में सफल रही है यह उसी आश्वस्ति के साथ नहीं कहा जा सकता। अब तक के स्थापित मूल्यों-मानदंडों के आधार पर इतिहास की किसी कहानी को ही सर्वश्रेष्ठता का आखिरी पैमाना मानकर की जाने वाली कथालोचना जो कई बार नई सदी की कहानियों से प्रतिबद्धता, विचारधारा और वैचारिकता के खत्म होने और कहानियों के लडखडा जाने की घोषणा करती है, से मैं सहमत नहीं हो पाता और चाहता हूँ कि आज की कहानियों को भूमंडलोत्तर समय की इन चारित्रिक विशेषताओं के आलोक में पढा जाये। सहमति-असहमति और प्रशंसा-निंदा की सुविधाजनक और सरलीकृत बाइनरी से बाहर आकर कहानियों के अंतर्लोक में प्रवेश कर जबतक उनकी सामर्थ्य और सीमा का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण नहीं किया जाता, हम आलोचना के संकट को रचना का संकट मानते हुये एक छद्म शोकाकुल चिंता का शिकार होते रहेंगे। इसका मतलब यह भी नहीं कि आज की कहानियों की कोई सीमा नहीं है। सूचना का दबाव, फैक्ट्स और फिक्शन के बीच की कम होती दूरियाँ और अंतर्द्वद्वों से मुक्त हो रहे पात्रों की उपस्थिति भूमंडलोत्तर कहानी की बडी चुनौतियाँ हैं। यह सच है कि सत्ता जनसामान्य के भीतर स्थित ज्ञानात्मक अंतर्द्वन्द्वों को भावनात्मक अंतर्द्वन्द्वों में बदलने का नियोजित प्रयास करती है और इस तरह शनैः-शनैः एकपक्षीय भावनात्मकता का एक ऐसा सैलाब निर्मित होता है जिसमें अंतर्द्वन्द्व के सारे अवशेष बह जाते हैं। गाँधी बनाम अंबेडकर या नेहरू बनाम पटेल की जो भावनात्मक बाइनरी आज खडी की जा रही है वह इसी का उदाहरण है। आज की कहानियों में अंतर्द्वन्द्व के क्षणों के खत्म याकि कम होते जाने का कारण वर्तमान समय का यह यथार्थ भी हो सकता है। लेकिन मेरा मानना है कि सत्ता जनमानस को अंतर्द्वन्द्व से मुक्त करने की लाख कोशिश करे, कहानियों में इसकी जगह खत्म नहीं होनी चाहिए।
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सम्पर्क : काँटी थर्मल,
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