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केदारनाथ सिंह : मैं की चेतना का विस्तार

जितेन्द्र निर्मोही
आदमी के मैं का फलक बडा व्यापक है। वह इस मैं से व्यष्टि से समष्टि तक की यात्रा करता है। मैं ब्रह्य भी हो जाता है और सृष्टि भी बन जाता है। मैं का लघुतम हो जाना और उसका फैलाव दोनों मनुष्य की प्रकृति है। समयानुसार मैं में बदला तू आता है। सांसारिक दृश्यों से मैं विविध रंगों में बदल जाता है। केदार नाथ के ‘मैं’ से दुनिया याद होती हैः-
उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए
यहाँ मैं के साथ वो जुड गया है जिससे सुंदरता आ गयी है। जब वो जुडा तो दुनिया दिखी, जिसको हम अपनी नजर से देखना चाहते हैं। दुनिया कभी सुंदर लगती भी है और कभी नहीं भी। दुनिया तो दुनिया है। दुनिया की हलचल से कितनी ही कविताएँ जन्म लेती हैं। एक आँधी तूफान आने के बाद दुनिया शांत हो जाती है। लगता है जैसे कुछ हुआ नहीं
आँधी तूफान के बाद सवेरा-
देख रहा हूँ
एक समूची उथल पुथल के बाद
सभी कुछ सहज शांत है।
धीरे-धीरे सब कुछ निथर गया है सब कुछ
सारा जहर पचा कर
आसमान भी चुप है।
आदमी का मैं साँसों में उलझा हुआ है। मैं हूँ /मेरे ऊपर साँसों का पहरा है/ लौट रहे लोग/हुई संझावत बेला/और अधिक सूनेपन को गहरा करता है/ मुझसा ही दूरी पर का/वह ताड अकेला। यह अकेलापन ही यहाँ नीरवता है, जिसे हर मनुष्य भोगता है कवि केदार नाथ सिंह फिर क्यों नहीं? वो कहते हं-
मेरा प्रारम्भिक जीवन ठेठ गाँव में बीता है, मेरा परिवार कृषि व्यवसाय से जुडा था, इसलिए घर में जो माहौल था, वह बिल्कुल वैसा ही था जैसा कि एक किसान परिवार का होता है। साहित्यिक माहौल गाँव में बिल्कुल नहीं था, पर लोक जीवन की स्वतःस्फूर्त रचनाशीलता होती है, वह मेरे गाँव में थी। इस लोक जीवन की रचनाशीलता से ही ग्रामीण परिवेश के रचनाकार बडे रचनाकार हुए हैं। सच तो यह कि गाँव की यह सुगंध और हल्दी की पवित्रता उसके रंग की उजास उन्हें एक खूबसूरत सा दिन नवाजने के लिए प्रेरित करते हैं:-
खोल दूं वह आज का दिन/
जिसे मेरी देहरी के पास कोई रख गया है/
एक हल्दी रंगे/ताजे/दूर देशी पत्र सा।
और यह गाँव की खुशबू, रोटी, बैल, जमीन, आलू, मैदान, खेल आदि की प्रकिया से जोड देती है जो वह टमाटर बेचने वाली बुढिया की हलचल से पाते हैं:-
मुझे लगता है बुढिया अपनी टोकरी से/अपनी जगह बदल रही है/मैं काँपने लगता हूँ/यह देखकर कि टमाटर इस कार्य में बुढिया की मदद कर रहे हैं।
कवि कविता से स्वयं महसूस करता है और एक बहुत बडे वर्ग को महसूस भी कराता है। टूटा हुआ ट्रक ऐसी कविता है- शाम हो रही है/ टूटा हुआ एक ट्रक उसी तरह खडा है/और मुझे घूर रहा है/ मैं सोचता हूँ/ अगर इस समय/वो वहाँ नहीं होता/ तो मेरे लिए कितना/ मुश्किल था पहचानना कि यह मेरा शहर है/ और ये मेरे लोग/ और वो/ मेरा घर
सच तो यह कि कवि इस बहाने शहर का भूगोल और अपने घर का इतिहास बता देता है। आम ग्राम्य जीवन इससे अधिक तो नहीं। थाना ग्राम्य परिवेश का डर है। उत्तर प्रदेश के लोगों का सामान्यतया इस थाने से पाला पड जाता है। थाने जाना किसको अच्छा लगता है। इसके बावजूद लोग थाने जाते हैं।
कवि की थाने पर कविताः-
मुझे थाने से चिढ है/
मैं थाने की धज्जियाँ उडाता हूँ/
मैं उस तरफ इशारा करता हूँ/
जिधर थाना नहीं है
जिधर पुलिस कभी नहीं जाती/
मैं उस तरफ इशारा करता हूँ
यह समय बाजार से प्रभावित है। इस समय में कवि मकान नहीं घर चाहता है पर कहाँ मिलता है अपना घरः-
दुनिया के उस/ महान नक्शे में
मुझे नहीं मिला/नहीं मिला/अपना घर
क्योंकि कवि तो माँ की तुलसी के बिरवे वाला घर चाहता है। हरी-भरी घेर-घुमेर प्रकृति से बात करता हुआ उसका घर। कवि वैचारिक द्वंद्व से बताना चाहता है वो कैसा खुलापन अपने मन में रखे हुए है। उसे बंद द्वार अच्छे नहीं लगतेः-
हम बढाएं हाथ/ तो खुल जाए
बाहर रास्ते की ओर/कोई द्वार सहसा
बहुत-सी कविताएँ द्वि-अर्थी होती हैं, बहुत-सी विविध अर्थी। उनकी समकालीन कविता बहुत सी जगह मुहावरों-सी भी बहने लगती ह। निम्न कविता के सकारात्मक अर्थ भी लगाए जा सकते हैं और नकारात्मक भी, पर कविता का सौंदर्य जस का तस रहता हैः-
ईश्वर/यह कैसा चमत्कार है/
मैं कहीं भी जाऊँ/
फिर लौट आता हूँ/
इस समय में ना उम्मीदी चारों ओर फैली हुई है। मनुष्य चाहे कितने ही हाथ-पैर मारने के बाद वहीं लौट आता है जहाँ से वो चला थाः-
मेरी उम्मीद/ उसका पीछा नहीं करती/ सिर्फ कुछ देर तक चील की तरह मंडराती है/ और छपट्टा मार कर ठीक उसी जगह बैठ जाती है/जहाँ पे वो चला गया था।
मनुष्य अपनी संवेदना को मरने कहाँ देता है, यह संवेदना ही है जिसके आगे बडे-बडे पुल छोटे पड जाते हैं वो संवेदना में डूब जाते हैं चाहे वो माँझी का पुल ही क्यों नहीं हो। कवि कहता हैः-
मैं खुद ही पूछता हूँ/
कौन बडा है/ वह जो नदी पर खडा है
माँझी का पुल/ या वह जो टंगा है लोगो के अंदर।
मैं व्यवस्था से भी जूझता है और स्वच्छता से भी। बदलाव की इस प्रत्रि*या में चादर के बहाने कवि बदलाव लाना चाहता हैः-
सुबह हुई है/
और उसने सोचा/
दुनिया बदलने से पहले/
मुझे बदल डालनी चाहिए अपनी चादर/
जो कि मैली हो गयी है
जीवन में वैचारिक द्वंद्व है, मनुष्य का अपना दृष्टिकोण है। वह किसे छोडता है, किसे अपनाता है। कभी वह कठोर वस्तु को छोडकर कोमलता को अपनाता है कभी कमोलता को छोड कर कठोर से लगाव रखता है। यह उसका ‘स्व’ है या मैं जो इसका निर्धारण करता हैः-
सर्दियों की रात में/
बुद्ध के बारे में सोचते हुए/
मुझे लगा यह करुणा नहीं/
अपने कम्बल के बारे में सोचना है
विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कहते हैं केदार नाथ सिंह की कविताओं मे मैं की चेतना देखी जा सकती है जो कवि की कविताओं को एक आत्मपूरक निजात प्रदान करती है। इनके पहले संकलन में हमारे संस्कारों की एक छोटी हर बडे फलक वाली कविता है जहाँ वो अपने को अलग खडा होना घोषित कर देते हैः-
छोटे-से आँगन में/ माँ ने लगाये हैं/
तुलसी से बिरवे दो।
पिता ने लगाया है/ बरगद छतनार/
मैं अपना नन्हा गुलाब/ कहाँ रोपूँ।
सच तो यह है बकौल दुष्यंत अंगारों को मुट्ठी में लिए पूछ रहा था कोई मुझको इनकी तासीर बता दे। यही हाल अन्य कवियों का भी है। यों केदार भी इन में शामिल हैं:-
मुट्ठी में प्रश्न लिए/दौड रहा हूँ वन वन/
पर्वत पर्वत/लाचार
उनका अकेलापन यह बताता है कि वो एकाकी है, वो स्वयं कहते हैं मैं ज्यादा मेल-जोल नहीं करता, एकाकीपन अच्छा लगता है। वे जब हवाओं से गुजरते हैं तब भी अकेले होते हैं। विश्वनाथ प्रताप तिवारी, केदारनाथ सिंह कविताओं में मैं का इस्तेमाल अभी बिल्कुल अभी काव्य संग्रह की कविताओं -प्रत्रि*या, हस्ताक्षर कर देता हूँ, अपनी छोटी बच्ची के लिए एक नाम, एक पारिवारिक प्रश्न, पिता से, खोल दूँ, यह आज का दिन, कमरे का दानव, मैं नहीं हुआ हूँ द्रष्टा। इसके अलावा भी संग्रह की अल्प कविताओं, अप्रकाशित कृतियों में भी उनकी इस मैं को भली भाँति देखा जा सकता है।
शमशेर को नीला आँगन पंसद है, केदार का नीला पत्थर -
जाने कहाँ/ कौन पर्वत है/ जिससे रोज लुढककर मेरे पास चला आया है नीला पत्थर/जब भी मैं कभी अकेला/ बहुत अकेला होता हूँ।
समय का एकाकीपन है जहाँ वो कहते है-
ठहरा नहीं जाता कहीं भी हर घडी हर वक्त खतरा लगा रहता है। आजकल की अस्त-व्यस्त जिंदगी सर्वविदित है- घरों में जाता हूँ/ इधर उधर बिखरी/बेराक्ल पडी चीजों को /हलके उठाता हूँ/ फिर सबको /सजाता हूँ/
कविता इस निराश बेरहम रूखे समय में भी निराश नही होती। यहाँ वह मैं एक नई चेतना से भरा हुआ है जो नई सुबह लाना चाहता हैः-
कल उगूंगा मैं/
आज तो कुछ भी नहीं हूँ।
पेड, पत्ती, फूल, चिडिया, घास, फुनगी/
आह कुछ भी तो नहीं हूँ/ कल उगूंगा मैं।
केदारनाथ सिंह का बचपन वहाँ खडा होता है जहाँ गाँव है, माँ है, चक्की है, आटा हैः-
मैंने कहा/चक्की के अन्दर माँ थी/ पत्थरों को रगड और आटे की गंध से / धीरे-धीरे छन रही थी/ माँ की आवाज/ सिर्फ चक्की चलती रही/ और माँ की आवाज/रातभर
इस तरह से मैं का प्रारंभ ही परत दर परत संघर्ष है फिर वह है समाज है तालस्ताय और साइकिल उसमें भी वो मैं है। मैं के विविध आयामों के बाह्य में दिखाई देता है जहाँ वो कहते हैं:-
क्योंकि
सिर्फ मैं ही जानता हूँ
मेरे समय पर
मेरे समय के पंजों
के कितने निशान हैं
कवि में पृथ्वी के दर्द क शिद्दत तक महसूस करने की चेतना है क्योंकि पृथ्वी के अस्तित्व से मनुष्य का अस्तित्व है। यह सृष्टि हैः-
मुझे विश्वास है/यह पृथ्वी रहेगी/ यदि और कहीं नहीं तो मेरी हड्डियों में/ यह रहेगी जैसे पेड के तने में रहती है दीमक/
यह हमारे देश का सांस्कृतिक चिंतन भी है, यहाँ की मिट्टी धूल,नदी,नाले, पर्वत,पेड सभी के साथ जुडना आम आदमी पसंद करता है। यह हो जाना उसका परिवर्तित स्वरूप है। वह और उसकी व्यापकता भी है कि वह पेड हो जाए, मुक्ति के लिए पानी, केदार नाथ सिंह की कविता मुक्ति :-
मुक्ति का कोई रास्ता जब नहीं मिला
मैं लिखने बैठ गया हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ पेड
यह जानते हुए कि लिखना पेड हो जाना है
मैं लिखना चाहता हूँ पानी
केदारनाथ सिंह का मैं होना एक पुरबिहा का आत्म कथ्य है जो गीता की शैली में है। भगवान श्रीकृष्ण पर्वतों में हिमालय है, नदियों मे गंगा, वृक्षों में पीपल उसी तरह पुरबिहा केदारनाथ सिंह पर्वत में अपने गांव का टीला है, नदियों में उल्टी दिशा में बहने वाली नदी चम्बल व वृक्षों में काँटेदार बबूल है। यह उनका मैं है। उनका मैं यह बताता हैः-
पर्वतों में मैं अपने गाँव का टीला हूँ
पक्षियों में कबूतर, भारत में पूरवी दिशाओं में उत्तर
वृक्षों में बबूल हूँ,
अपने समय के बजट में दुखती हुई भूल
नदियों में चम्बल हूँ,
सर्दियों में एक बुढिया का कम्बल
इस समय यहाँ हूँ, पर ठीक इसी समय
बगदाद में जिस दिल को, चीर गई गोली
वहाँ भी हूँ, हर गिरा खून अपने अंगों से पूछता
मैं वही पुरबिहा हूँ जहाँ भी हूँ।
यह केदारनाथ सिंह के मैं का होना है, जिसका फलक बडा व्यापक है, बडा विस्तृत। जहाँ भी दृष्टि जाए वहाँ कवि ही कवि नजर आये। क्योंकि वे कथाओं के देश में एक व्यथा भी हैं। कथाएँ कभी भी समाप्त नहीं होती चाहे वो नदी की व्यथा हो, बाघ की, पर्वत की या किसी ओर की। कथाओं का विस्तार अनंत है।

सम्पर्क : बी. 422 आर. के. पुरम्,
कोटा (राज.)।
मो. 9413007724