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काल में महाकाल की यात्रा

सवाई सिंह शेखावत
असल
कहाँ है असल
जिसकी नकल समझता
बदहवास है समय
सत्यापित कराने मुझे

समय खुद किसकी नकल है-
असल है वह अगर
मैं नकल कैसे हूँ

समय से कहो
मुझसे पहले
खुद का सत्यापन करा ले वह
अपनी असल लाये
दस्तखत मुझसे करवा ले जाय
-अगर मैं ही नहीं हूँ
असल उसकी।

नंदकिशोर आचार्य

वरिष्ठ कवि-नाटककार-आलोचक-चिंतक नंदकिशोर आचार्य की कविता असल हमारे समय के सर्वाधिक विवादास्पद प्रत्यय समय की निगूढ व अन्तर्वर्ती पडताल करती है। इन दिनों लगभग सभी को केवल मैं समय के साथ हूँ-जैसा भरम हो गया है। इस मुगालते के चलते कोई किसी दूसरे के पक्ष को समझने-बूझने तक को तैयार नहीं है। अलबत्ता हर शख्स खुद को समय का सच्चा और एकमात्र वारिस सिद्ध करने की लगभग बदहवास कोशिश में मुब्तला है।

एक उदाहरण के रूप में बात करें तो विचारधारा के विश्वव्यापी आतंक के चलते पिछली सदी में अनुभव की विरल निजता को खारिज करते हुए जिस तरह के चतुर प्रस्ताव पारित किए गए वे अंततः चीजों की हमारी इकतरफा समझ को दर्शाने वाले ही अधिक साबित हुए। जब कि जाहिर सी बात है कि विचार और भाव दोनों ही अस्तित्व की अनुपूरक इकाइयाँ हैं। एक संरचना में वरीयता के ऋम में वे मुख्य अथवा गौण हो सकते हैं-होते हैं, पर होंगे दोनों ही। वैदिक मनीषा ने इसे ही भाव की ओर झुकी बुद्धि और बुद्धि का अनुगामी भाव कहती आई है। ऐसे में मूल की अवधारणा को लेकर बुद्धिवादी या फिर भाववादी किसी का भी एक-दूसरे को कमतर बताना क्या सरासर गलत नहीं है?

कविता के पहले अनुच्छेद में कवि कहता है- कहाँ है असल/जिसकी नकल समझता/बदहवास है समय /सत्यापित कराने मुझे-अर्थात् वह मूल किसे कहा-माना जाए, जिसकी नकल समझते हुए समय मुझे प्रमाणित करने की अधीर कोशिश में जुटा है। अज्ञेय ने अपने महत्त्वपूर्ण काल-ग्रन्थ संवत्सर में कहा है-काल की नदी दिग्विहीन बहती है। बात को आगे बढाते हुए वे यह भी कहते हैं कि हमारी चेतना में विचार इतनी तेजी से उठते हैं कि उन बुलबुलों का पीछा करते हुए हमें गति व दिशा का आभास होता है। वह दौडना ही यथार्थवाद की इति मान ली जाती है,पर जिस चित्त में ये बुलबुले उठते हैं वह वैसा का वैसा रहता है। हमारे लिए कन्दरा से फूटा सोता महत्त्वपूर्ण हो जाता है,पर जिस अशेष मंजर से वह निकला है उसका हमारी दृष्टि में कोई मोल नहीं।

आचार्य की कविता के सन्दर्भ के खुलासे के लिए यहाँ हमंश उनकी ही एक अन्य कविता हवा है वह के आशय में जाना होगा। अस्तित्व की निष्पत्ति को लेकर कवि कहता है कि- लहर नहीं है/ जल/रूप उसका जो दिखता है/हवा है वह/जल से अपनी बेचैनी कहती हुई। लहर और जल के उदाहरण के मार्फत कवि यहाँ अस्तित्व से जुडी उस बुनियादी बहस में जाता है जिसे वैदिक मनीषा ने सद-असद आख्यान कहा है। सद है और रहेगा-जल की तरह। पर बिना हवा के सहयोग के उसमें आकृति मूलक अस्तित्व की गुंजाइश नहीं बनती। जिसे सृजन कहा जाता है वह जल तथा आकार रचती हवा दोनों के साझे सहकार का परिणाम है। दोनों में एक अकेला कोई कुछ नहीं रच सकता।
वेद विज्ञान कहता है यह सृष्टि जल में निबद्ध है। जल और हवा के संसर्ग से मिट्टी बनी। मिट्टी-हवा के घात-प्रतिघात से कंकड, फिर पत्थर, फिर लोहा,फिर सोना आदि-इस तरह यह अष्टधातुमयी पृथ्वी अस्तित्व में आई।अब इसे लेकर बहस इतनी भर हो सकती है कि दोनों में मूल या असल कौन है? अलबत्ता कवि की दृष्टि साफ है कि खुशबू फूल का/सुर है/या मूरत है फूल/खुशबू की? इतना ही नहीं प्रश्न की गहन पडताल करते हुए वे उस अवधारणा तक भी जाते हैं जिसमें कहा गया है कि-शुरू में शब्द था केवल/शब्द जो मौन को आकार देता है/ इसीलिए मौन को पूर्ण करता हुआ भी। पर आचार्य यहीं तक ठहर जाने वाले सर्जकों में नहीं हैं वे आगे बढकर उस महाप्रश्न तक भी जाते हैं जिसे लेकर उनकी ही एक अन्य कविता में पूछा गया है कि-पर सृष्टि में पूरा हुआ जो था किसका अधूरापन?

इस बहस में जाते हुए मुझे भारतीय मनीषा द्वारा प्रस्तावित नारदीय सूक्त की वह बुनियाद बहस याद आई में जिसमें सृष्टि के मूल की तलाश करते हुए अंधकार से ढके अंधकार, अस्तित्व-अनस्तित्व, अमरता-मृत्यु,धरती-स्वर्ग इन सबको रचने वाले वायु-शून्य आत्मावलम्बी श्वास-प्रश्वास युक्त एक ब्रह्म कल्पना की गई है जो सबका रचना आधार बना होगा। किंतु उस समूची गुरु गंभीर बहस में जाते हुए भी वेद का ऋषि अंत में उस चरम प्रश्न को यह कहते हुए अनिर्णीत छोड देता है कि यह सब उसी ने रचे, पर अपनी ही रची इस सृष्टि के बारे में हो सकता है वह कुछ जानता हो, नहीं जानता हो, कुछ कहा नहीं जा सकता। अधकचरे समकालीनों की तरह वह इस प्रश्न से जुडी छूँछी बहस में नहीं उलझता।आचार्य अपनी कविताओं में शुरू से उस कारणधर्मा मूल की प्रशस्ति गाते हुए अपने कवि धर्म का निर्वाह करते दिखाई देते हैं-निरर्थक ध्वनि ही तो है वह/जिसे अपना अर्थ दूँगा मैं/मेरी कहन होगी वह।

बात को आगे बढाते हुए दूसरे अनुच्छेद में कवि कहता है- समय खुद किस की नकल है? क्योंकि असल तो वह होता है जो अपनी कालातीतता में(भूत-भविष्य और वर्तमान तीनों में)सम है। समय जो हर क्षण पर परिवर्तित हो रहा है उसे असल कैसे कहा/माना जा सकता है? ऐसे में जो स्वयं किसी की नकल है, तो फिर वह किसी दूसरे पर नकल होने और अपने असल होने का दावा कैसे कर सकता है? पर यहाँ भी असल-नकल की इस सनातन बहस में कवि किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता और न ही किसी प्रकार की पहेली बुझाता-वह इतना भर कहता है कि इस सारी बहस के बावजूद समय असल है वह अगर/(तो फिर?)मैं नकल कैसे हूँ! क्योंकि हर अस्तित्वधर्मी का अपना विशिष्ट समय शिल्प है-कोई किसी के अनुरूप नहीं है। बल्कि प्रश्न की गहरी पडताल में कवि उन कथित एडवांसवादियों से कहीं अधिक आगे और कहीं अधिक गहरे तक जाता है गुम हूँ उस खोज में/जो कहीं खोकर/मुझे/गुम है खुद! इस अनंत बहस के सन्दर्भ में कवि अपनी एक अन्य कविता में यह कहने का माद्दा भी रखता है कि- समय होगा तो मिल लूँगा/समय से भी/माफी चाहता हूँ अभी!

इस समूची गहन पडताल और समय होगा तो मिल लूँगा समय से भी की अनूठी अलगरज घोषणा के बाद समापन अनुच्छेद में कवि उस पराकाष्ठा तक जाता है जो एक कवि के आत्मविश्वास और निर्भ्रांत समझ दोनों का परिचायक है। समय से कहो/मुझसे पहले/खुद का सत्यापन करा ले वह। अर्थात फिर भी यदि केवल समकाल से जुडे समय को अपने ही असल होने का गुमान है तो बेहतर यही रहेगा कि मुझे सत्यापित करने की हडबडी को स्थगित कर वह खुद अपना सत्यापन कराले। यह कथन एक चुनौती की तरह है समयवादियों और खुद एक कवि-सर्जक के लिए भी।

निरवधि महाकाल के महावृत्त में सावधि काल एक छोटे बुलबुले-सा ही तो है। आचार्य की कविताओं को खंगालते हुए हम हैं कि वे इस प्रश्न की पडताल अपनी कविताओं में बहुत शुरू से करते रहे हैं। तलाश है वहाँ शीर्षक अपनी कविता में वे समय के सबसे बडे प्रतिमान को सम्बोधित करते हुए कहते हैं- इतिहास मकबरा है/पूजा जा सकता है जिसको/जिसमें पर जिया नहीं जाता/जीवन इतिहास बनाना है/चाहे जितना/साँसें भविष्य की लेता है वह। अज्ञेय भी संवत्सर में यही कहते हैं कि-इतिहास के आधार पर काल का पुनर्निर्माण नहीं किया जा सकता।क्योंकि इतिहास तो स्वयं थिगलियाँ जोडकर बनाया गया कथा मात्र है। कवि इसे लेकर अपनी कविताओं में यह कहने की हद तक जाता है कि-कभी निकाल बाहर करूँगा मैं/समय को/हमारे बीच से अरे,कभी तो जीने दो/हमको भी अपने में/ठेलता ही रहता है/जब देखो जाने कहाँ?

वैदिक मनीषा जीवन को गति व स्थिति दोनों भावों के बीचों-बीच पाती रही है।कहते हैं भगवान शिव ने पार्वती को जीवन-रहस्य के बारे में समझाते हुए कहा था- साँस आती है/साँस जाती है/हे पार्वती, तू दोनों के मध्य ठहर जा/अमृत को उपलब्ध हो जाएगी! जो लोग काल की तथ्यात्मकता को लेकर कुछ *यादा ही आश्वस्त हैं वे इस पर भी गौर करें कि अब तो वैज्ञानिक शोधों में भी काल-धारा के साथ काल-कण, गत्वर काल,स्थिर काल जैसी अन्य असंख्य संभावनाएँ सामने आई हैं।ऐसे में हम किस समय के साथ हैं यह तो तय करना पडेगा ही।अपनी गतिमयता में जो स्थिति भाव को उपलब्ध हो गया है क्या उसी समय को साधना श्रेयस्कर नहीं है? अर्थात् जो अटल है और विहारी भी। क्योंकि जो स्थिर है,वही तो जीवन की बहुविध गतियों का स्रोत हो सकता है।आचार्य भी अपनी एक कविता में कहते हैंर्आतना/जैसे आती है साँस/जाना/जैसे जाती है साँस/पर रुक भी जाना/कभी/जैसे वह रुक जाती है।

अपनी इस निर्भ्रांत समझ से भरे आत्मविश्वास के चलते ही कवि कविता के विनम्र स्वर का साक्षी होने और यह कहने-मानने के बावजूद कि न सही/ तुम्हारे दृश्य में/ मैं कहीं/ अंधेरों में सही। कविता के अंत में यह घोषणा करने की हद तक चला जाता है कि वह अपनी असल लाए/ दस्तखत करवा ले जाए/-अगर मैं ही नहीं हूँ असल उसकी कहने की पराकाष्ठा तक जाने का दुःसाहस दिखा पाता है।नहीं,यह निरा कवि-दंभ नहीं है-यह जीवन विवेक भरी उस अर्थवत्ता का स्वीकार है जिसमें सावधि जीवन जीते हुए भी हम जीवन के महति निरवधि लक्ष्य की ओर उन्मुख रहें। कवि ने अपनी ही एक अन्य कविता में कहा भी है-

इसीलिए खोजने दो
अपने में
अपने मैं को मुझे
शब्द है वह भी!
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जयपुरर्‍302039
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