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आदरणीय कवि प्रदीपजी

बी. एम. व्यास
मेरे बडे भ्राता के समान कविवर आदरणीय प्रदीप जी के बारे में मैं बहुत कुछ कह सकता हूँ। लिखना मेरे लिए जरा मुश्किल है, क्योंकि मैं एक मामूली कलाकर हूँ, लेखक नहीं हूँ। फिर भी कुछ संस्मरण उनके बारे में मेरे पास हैं। उन्हें अपनी टूटी-फूटी भाषा में लिखने का प्रयत्न करता हूँ।
आदरणीय प्रदीप जी को कौन नहीं जानता! पर मेरी नजदीकी उनके साथ तब हुई जब मैंने भी अपना मकान बसंत विलेपार्ले जुहू स्कीम में बनवाया। प्रदीपजी का भी पंचामृत बंगला विलेपार्ले (वेस्ट) में एसवी रोड पर ही था। चूँकि मेरे बडे भ्राता पं. भरत व्यास का मकान भारत भवन जुहू स्कीम से लगता हुआ ही था, सो कवि प्रदीप जी, भरत जी के यहाँ शाम को प्रायः आते थे। उस समय पं. मुखराम शर्मा भी होते थे।
मैं अपने भाई भरत जी के यहाँ अक्सर जाया-आया करता था। इसलिए प्रदीपजी भी मुझे छोटे भाई की तरह प्यार करने लगे। प्रदीप जी मजाकिया स्वभाव के थे और ऐसा मजाक करते थे, जो अर्थपूर्ण होता था।
शनैः शनैः मैं भी प्रदीप जी के घर आने-जाने लगा। तब मैंने एक चित्र के दिग्दर्शन का भार अपने सर पर लिया था। चित्र का नाम था छठ मैया की महिमा। इस चित्र की निर्मात्री थी कलकत्ते की महुआ डे। उन्होंने प्रदीप जी से गीत लिखवाने की इच्छा व्यक्त की। मैंने निर्मात्री से कहा कि वह पैसा अधिक लेंगे। तुम मेरे भाई भरत जी से गीत क्यों नहीं लिखवा लेतीं? मेरे दिग्दर्शन के चित्र में मैं अपने भाई को तो मना सकता हूँ, किन्तु प्रदीपजी को कहना मेरे लिए जरा मुश्किल होगा। फिर भी मैं प्रयत्न करता हूँ।
मैंने प्रदीप जी से कहा तो कहने लगे तेरे दिग्दर्शन के चित्र में मैं पैसों के लिए नहीं रुकूँगा। और, उन्होंने मेरी निर्मात्री के अनुसार पैसों पर गाने लिखने की स्वीकृति दे दी। हालाँकि वह चित्र मैंने अधूरा ही इसलिए छोड दिया कि निर्मात्री ने कलकत्ते में चित्र पूरा करने के लिए कहा। जो कलकत्ते में बार-बार लाईट चले जाने के कारण मुश्किल था। मेरे संगीत दिग्दर्शक भूपेन हजारिका थे- हजारिका जी प्रदीप जी के साथ काम करना चाहते थे इसलिए कलकत्ते से मुंबई आकर चित्र के तमाम गीत रेकार्ड किये गये।
दूरदर्शन पर तबस्सुम ने जब मेरा इंटरव्यू लिया, तो कहने लगी कि आफ मित्र प्रदीप जी से भी उनका इंटरव्यू लेने की स्वीकृति दिलवाइये। मैंने प्रदीपजी से कहा कि दूरदर्शन वाले आफ घर पर ही आपका इंटरव्यू रेकार्ड करना चाहते हैं।
वह कहते थे, मेरा परिचय तो मेरे गाने हैं : बस, वह टाल जाते थे।
वह तो उनकी बेटी मितुल ने बाद में मृत्यु से पहले उन्हें सम्मानित होने के लिए जोर दिया, तब कहीं वह दादा साहेब फालके एवार्ड के लिए तैयार हुए। दुःख इस बात का है कि जब उनका अमर गीत ए मेरे वतन के लोगों... गाया और गवाया जाता है तो लताजी का ही नाम लिया जाता है। उनके नाम का उल्लेख नहीं किया जाता, जबकि पंडित नेहरू ने इस गाने पर आँसू बहाये थे। तो क्या लताजी की आवाज सुनकर उनकी आँखों में आँसू आये? या गाने के बलों ने नेहरूजी को रुलाया। लताजी ने भी प्रदीप जी को एक लाख का पुरस्कार दिया। प्रदीपजी मुझसे कहा करते थे कि एक बार मैं लताजी के घर गया और उनसे कहा कि तुम अब हमारे छोटे बजट के धार्मिक चित्रों में हमारे गीत तो गाओगी नहीं। लता जी ने कहा, प्रदीपजी भगवान मुझे पैसे तो खूब देता है, दे रहा है। मैं पैसों के लिए आफ गीत नहीं ठुकराऊँगी। और लताजी ने बीके आदर्श की फिल्म हरिश्चन्द्र तारामती में प्रदीप के लिखे गीत गाये- मैं एक छोटा बच्चा हूँ..., टूट गयी है माला मोती बिखर गये, दो दिन रह कर साथ न जाने किधर गये... ओ जाने वाले बेटे तू मुझे छोड के न जा, मैं तेरी अभागिन माँ हूँ, मुझे छोड के ना जा... आदि उनके कई प्रसिद्ध गीत लताजी और आशाजी ने गाये हैं।
मेरे चित्र छठ मैया की महिमा में एक मुजरा गीत था। मैंने प्रदीपजी से कहा, लोग कहते हैं कि यह आप नहीं लिख पाओगे। उन्होंने कहा, लोग ठीक कहते है। तुम एक काम करो, अन्य फिल्मों के मुजरा गीतों के सेट लाकर मुझे सुनवा दो। मैंने वैसा ही किया और प्रदीप जी ने बडा ही सुन्दर मुजरा गीत लिखा जिसे आशा जी से गवाया गया।
प्रदीपजी का अभाव मुझे इसलिए अधिक खटकता है कि वह उम्र में बडे होते हुए भी मेरे मित्र समान हो गये थे। अपने दिल की हर बात कह देते थे। वह लगातार सिगरेट पीते थे। भरतजी की मृत्यु के बाद उन्होंने सिगरेट छोडी और मुझे कलेंडर दिखाते हुए बताते कि आज सिगरेट छोडे हुए इतने दिन हो गये। आखिर उन्होंने धूम्रपान की आदत छोड ही दी। हरिश्चन्द्र तारामती, तुलसी विवाह आदि कई उनके चित्रों में मैंने भी भूमिकाएँ की थीं। भरतजी के चले जाने के बाद शाम को हमें एक साथ विलेपार्ले की किसी-न-किसी सडक पर चलते अकसर लोग देखते थे। उनकी शवयात्रा में मैं गया तो लोग मुझसे कहने लगे कि आफ साथी चले गये।
मैं उनके गीत की ये पंक्तियाँ सुना देता-
टूट गयी है माला मोती बिखर गये
दो दिन रहकर साथ न जाने किधर गये।
अब बस उनके बंगले के उस सूने पिंजरे को देखता रहता हूँ, जिसमें बैठकर वह सडक पर चलते लोगों को निहारते रहते थे। उन्होंने लिखा भी था कि पिंजरे के पंछी रे, तेरा दरद न जाने कोय- मैंने लिखा- दर्द लिये पिंजरे का पंछी उड गया रे आसमान में, अपने तीक्ष्ण गीतों को उसने रख लिया दिल की म्यान में।
मृत्यु अवश्यंभावी है। पर ऐसे लोगों का जाना बहुत खलता है। और मैं तो पहले भरत जी और फिर प्रदीपजी के चले जाने के बाद बहुत ही सूना-सूना महसूस कर रहा हूँ। ऐसी महान आत्माएँ आती हैं, चली जाती हैं। पर उनकी कृतियाँ अमर हो जाती हैं। भगवान उन्हें फिर इस धरती पर जन्म दे।
प्रदीपजी का मेरा साथ १९६१ से शुरू हुआ और उनके मरते दम तक रहा। उनके संस्मरण अगर मैं लिखने बैठूँ तो एक ग्रंथ बन सकता है।
बाम्बे टाकीज के एक चित्र में हीरोइन का नाम आशा था। उसी चित्र में प्रदीप जी के गाने थे। हीरोइन आशा के नाम को लेकर एक गीत उन्होंने लिखा था जो मुझे बेहद पसंद है। गीत था- ओ मेरी आशा, मैंने पढ ली आज तुम्हारे नयनों की भाषा।
नयनों की भाषा का प्रयोग और आशा का काफिया भाषा, कितना सुंदर लगता है। वैसे तो प्रदीपजी के सभी गीत अच्छे और अर्थपूर्ण होते थे, परन्तु कुछ गीत तो मस्तिष्क को झंकृत कर देते हैं। जैसे हरिश्चन्द्र-तारामती का यह गीत-
सुरज रे जलते रहना तथा ऊपर गगन विशाल, इस देश को रखना मेरे बच्चो सम्भाल के, आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की आदि। प्रदीप जी ने अपने बंगले के आगे के वरंडे को ग्रिल से कवर किया था और जब वह उस ग्रिल से ढके हुए वरंडे में बैठते थे तो वाकई पिंजरे के पंछी ही लगते थे। उनकी चारपाई पर एक छोटा रेडियो और दैनिक अखबार हरदम रहते थे। हारमोनियम रखते थे, पर बजाना नहीं आता था- दो बजे दिन में नहाते थे - उनके कपडे और कोई भी चीज उनकी पत्नी तथा बेटियाँ ही लाती थी। पूजा-पाठ वह अपने गीतों से ही करते थे। चूंकि अच्छे गायक भी थे, इसलिए अपने गीतों की धुन भी वह स्वयं ही बनाते थे। मैंने उन्हें गीत बनाते हुए देखा है। वह किसी पुराने, कोई भी हिट साँग के सुरों को ही अधिक पकडते थे। जय संतोषी माता फिल्म के ज्यादातर गीत उन्हीं के अपने-पुराने गीतों के स्वरों का ही चमत्कार था- जैस- यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ है संतोषी माँ या मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की। यानी सभी हिट गीत थे। उन्हीं गीतों को लेकर उस चित्र ने शोले जैसे चित्र को टक्कर मारी थी। प्रदीप जी मुझे बृजमोहन के नाम से ही बुलाते थे। उनकी बैठक पं. प्रियदर्शीजी के यहाँ भी रहती थीं, जहाँ हम तीनों घंटों बैठते थे। अब तो बस उनकी याद रह गयी है।
प्रदीप जी की याद
दर्द लिए पिंजरे का पक्षी उड गया रे आसमान में
अपने तीक्ष्ण गीतों को उसने रख लिया दिल की म्यान में
दूर हटों ए दुनिया वालों हिंदुस्तान हजारा है,
कवि प्रदीप ने ही पहले, यहाँ दुश्मन को ललकारा है।
तभी लिखा एक गीत कवि ने, वीरों की यहाँ शान में।
जब तक पिंजरे में बैठा था, दर्द के गीत सुनाता रहता
बुरा मान ले कोई माने, सच्ची दिल की बातें कहता
याद में उसकी पिंपरारोये नहीं आता पहिचान में
अब उस सूने पिंजरे से दर्द गया और पंछी गया
देख-देखकर दिल रोता है, कवि प्रदीप तू कहाँ गया
जब जब दखूं उस पिंजरे को तुम आते हो ध्यान में
रोज-रोज मेरे घर आते कभी घूमने संग ले जाते,
जिनको प्यार किया करता था, जला दिया शमशान में!
रचयिता बी.एम.व्यास
यह संस्मरण प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता बी.एम. व्यास की पुत्री श्रीमती यामिनी-अजय जोशी के सौजन्य से साभार।