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ए मेरे वतन के लोगों....

लता मंगेशकर
प्रदीप जी के गुजर जाने की खबर मिली और पाँच दशकों की यादों ने कुछ ही पलों में मुझे घर लिया। प्रदीपजी से मेरी पहली मुलाकात यों तो १९४८ में हुई लेकिन उनसे पहले ही संगीत-निर्देशक अनिल विश्वासजी से मुझे उनके बारे में बहुत कुछ बातें सुनने को मिलती रहती थी। प्रदीपजी शुरू-शुरू में बॉम्बे टॉकिज के गीतरचना का कार्य किया करते थे। बॉम्बे टॉकिज की फिल्में, उन दिनों बडी प्रतिष्ठित मानी जाती थी। इसलिए उन फिल्मों मेंगीत बडे सुपरिचित हुआ करते थे। १९४८ में अनिल विश्वास, गर्ल स्कूल नामक फिल्म का संगीत दे रहे थे। उस फिल्म के गीत प्रदीप ने लिखे थे। इस गीत की रिकॉर्डिंग के दौरान उनसे बातचीत का अवसर मिला। प्रतिभासम्पन्न कवि के रूप में प्रदीप जी की ख्याति तो थी ही, रिकार्डिंग के दौरान उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को करीब से देखने-परखने का अवसर मिला। पहली ही मुलाकात में हमारे सुर मिल गये और उन्हें पण्डित जी बुलाने का हक मुझे मिल गया। पण्डित जी कवि थे और उनकी सुर और ताल की जानकारी उत्तम थी। जहाँ तक मुझे मालूम है, शास्त्रीय संगीत का उन्होंने अलग से कोई अध्ययन-प्रशिक्षण नहीं लिया था, लेकिन संगीत उनकी रगों में था, इसलिए बढिया धुन ढूँढने में वे उस्ताद थे। वे खुद बढिया गाते भी हैं। आओ बच्चो तुम्हें दिखायें, और देख तेरे संसार की हालत- ये गीत उन्होंने खुद गाये थे। किसी भी गीत की धुन इतनी सहज होनी चाहिए कि आम आदमी उसे गुनगुना सके, यह उनकी मान्यता थी। इसीलिए धुन को ध्यान में रखकर ही वे कविता लिखा करते थे। पण्डित जी के साथ काम करने वालों संगीत निर्देशकों ने, कुछ गीतों को अपवादस्वरूप छोड दें तो, अधिकांशतः उनकी ही धुनों को बरकरार रखा है। इससे यह पता चलता है कि पंडितजी को संगीत का ज्ञान कितना था। रिकॉर्डिंग के दौरान वे खुद उपस्थित रहा करते थे। गायक-गायिकाओं के सुर की ओर वे बडी बारीकी से ध्यान दिया करते थे। अगर उनका सुर जरा भी बिगड जाता तो वे तुरन्त रिकॉर्डिंग रोक देने का आदेश दिया करते थे। ऐसे वक्त, वे इस बात का लिहाज नहीं किया करते थे कि गायक-गायिका कितने बडे या बढिया गानेवाले माने जाते हैं। प्रदीपजी बडे गर्ममिजाज व्यक्ति थे। कोई गाना अगर ठीक से रंग न जमा पाता तो वे बगैर किसी लाग-लपेट के गानेवाले की गलती पर उँगली रख देते।
पण्डितजी ने फिल्मों के लिए बहुत गीत लिखे लेकिन साथ ही उनके देशभक्ति के गीतों को भी बडी लोकप्रियता मिली। ए मेरे वतन के लोगो... गीत का उनके कार्यकाल की तरह ही मेरे कार्यकाल में भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। १९६३ के जनवरी महीने का वक्त था। मेरी बहन मीना का ब्याह बहुत करीब आ गया था। ११ फरवरी को कोल्हापुर में शादी होने वाली थी इसलिए उसकी तैयारियों में मैं बहुत व्यस्त थी। ऐन उसी दौरान मेरे द्वारा आनंदघन नाम से संगीत-निर्देशित मोहित्यांची मुंजळा नामक फिल्म रिलीज होने वाली थी। उस फिल्म के निर्देशक भालचन्द्र पेंढारकर ने रिलीज के पहले की कुछ जम्मेदारियाँ मुझे सौंप रखी थी। इसलिए मीना की शादी और उस फिल्म के अलावा और किसी भी बात पर सोच-विचार करने की मनःस्थिति में मैं नहीं थी। इसी बीच, दिल्ली में गणतंत्र दिवस की तैयारियाँ चल रही थी। इस वक्त होनेवाले कार्यक्रम में पूरे सिनेमा जगत् के कलाकार भाग लेने वाले थे। राजकपूर, दिलीफमार, देव आनन्द से लेकर शंकर-जयकिशन, मदनमोहन आदि सभी दिग्गज कलाकार अपना कला-कौशल उस वक्त दिखाने जा रहे थे। मीना के विवाह की वजह से, उस कार्यक्रम में भाग लेने की इच्छा के बावजूद मैं जा नहीं सकती थी। एक दिन हेमन्तकुमार ने इस कार्यक्रम में मेरी सहभागिता की पूछताछ की, तब मैंने उन्हें मीना की शादी के बारे में बताया। वैसे उस वक्त मेरी तबीयत ठीक नहीं थी, लेकिन हेमंत कुमार के बडे आग्रह की वजह से मैंने गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में भाग लेने की मंजूरी दी। हाँ, लेकिन यह भी शर्त रखी कि इस कार्यक्रम में शंकर-जयकिशन, मदनमोहन और अन्य कई श्रेष्ठ संगीतकार भाग लेंगे, लेकिन मैं किसी के भी साथ कोई गाना नहीं गाऊँगी। तब हेमन्त कुमार ने पूछा कि फिर क्या गाओगी? अल्लह तेरो नाम मैंने जवाब दिया तो हेमन्त कुमार ने कहा, ठीक है, कोई बात नहीं। दूसरे दिन पण्डित जी की ओर से संदेश आया कि मैं सी.रामचन्द्र से तुरन्त मिलूँ। और मैं, सी रामचन्द्र और पण्डित जी मिले। उस वक्त ऐ मेरे वतन के लोगो... गीत पहली बार सुनने को मिला। पहली ही बैठक में मुझे वह गीत बहुत अच्छा लगा। लेकिन मैंने पहले वाली वजह बताते हुए गीत गाने में असमर्थता जतायी। तब सी. रामचन्द्र ने मुझसे कहा, इस बार तो तुम मना न करो। पण्डितजी ने भी ऐसी ही प्रतिक्रिया दिखायी। इन दोनों के बडे आग्रह की वजह से आखिरकार मैं वह गीत गाने को तैयार हुई। लेकिन चूँकि वह गीत बडा महत्त्वपूर्ण था इसलिए मैं और आशा दोनों मिलकर गायें तो बेहतर होगा, ऐसी मेरी मान्यता थी। मेरी बात पूरी हूई न हुई कि प्रदीपजी का स्वाभाविक गुस्सैल स्वभाव प्रकट हो गया। वे करीब-करीब चिल्लाकर बोले, तुम दोनों साथ-साथ नहीं गाओगी; यह गीत सिर्फ तुम गाओगी। मैंने इंकार कर दिया तो पण्डितजी ने लता नहीं तो गीत ही नहीं चाहिए। यों ध्रुवांत की मुद्रा धारण कर ली। बाद में आशा ने भी इसे गाने का इरादा रद्द कर दिया। बडी भाग-दौड में इस गीत का निर्माण हुआ सो हमें तैयारी के लिए काफी समय नहीं मिल पाया। केवल दो बार हमने मुंबई में इस गीत की रिहर्सल की होगी। पूरा गाना टेप करके सी. रामचन्द्र ने मुझे दिया था। उसे मैंने मुंबई-दिल्ली यात्रा के दौरान सुना। गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में पं. जवाहरलाल नेहरू उपस्थित थे। उस वक्त मैंने पहले अल्लाह तेरो नाम.... भजन गाकर फिर ऐ मेरे वतन के लोगो.... गीत गाया। इसके बाद का इतिहास सभी जानते हैं। इसलिए उसके बारे में विस्तार से मैं कुछ नहीं कहूँगी। बाद में इस गीत की हर ओर बडी सराहना हुई। पंडितजी स्वयं इस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं रह सके थे। उन्हें इतना प्रसन्न, इतना खुश मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मैं बहुत डर गया था, तुमने मेरी जान बचा ली। कहकर उन्होंने मेरी पीठ थपथपायी।
ऐ मेरे वतन के लोगों... गीत को रसिकों की जो प्रशंसा मिली, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मैंने अब तक दुनिया के कोने-कोने में जो अनेकानेक कार्यक्रम किये हैं उन सब में इस गीत को जो सराहना मिलती है, वह अवर्णनीय है। मैंने अभी हाल ही में अमरीका का दौरा किया। इस दौरे में हमने कुल सात कार्यक्रम किये। इन सातों कार्यक्रमों की शुरुआत ऐ मेरे वतन के लोगो... से हो ऐसी माँग कार्यक्रम में उपस्थित श्रोताओं की हुआ करती थी। आखिरकार हर बार मुझे यह कहना पडता कि अगर इस गीत को मैं शुरू ही में गा दूँगी, तो बाद में आप सभी उठकर चले जाएँगे। १९९५ में न्यूयार्क के दौरे के वक्त भी अनूठा अनुभव हुआ। यह गीत चूँकि अधिकांश कार्यक्रमों में गाया जा चुका था, सो रसिकजन इससे ऊब चुके होंगे सोचकर मैंने वह गाना नहीं सुनाया। लेकिन जब कार्यक्रम का समापन होने लगा तो रसिकों की ओर से फिर उसी गीत की माँग होने लगी। मैंने वक्त समाप्त हो गया यों कहा तो उन्होंने कहा कि आप बस इस गीत की एक पंक्ति भी गा देंगी तो हमें संतोष हो जाएगा। मुझे नहीं लगता कि किसी भी गीत को रसिकों की इतनी अधिक सराहना मिली होगी। रसिकों की यह सराहना मेरे गायन के लिए नहीं वरन् पण्डितजी के शब्दों की शक्ति के लिए है जो बार-बार उन्हें इसकी ओर आकर्षित करती है।
पण्डितजी का और मेरा इतने वर्षों से स्नेह-संबंध है कि स्वाभाविक ही लोगों को लगता है कि हमारी अनेक बार मुलाकातें होती रही होंगी, लेकिन अचरज की बात यह है कि पाँच दशकों के स्नेह-भाव के बावजूद पण्डितजी के घर मैं सिर्फ एक या दो बार ही गयी हूँगी। सिनेमा की दुनिया में रहते हुए भी वे ग्लैमर से दूर रहा करते थे। इसलिए उनके आचरण में मुझे कभी औपचारिकता की गंध नहीं आयी। हमारी मुलाकातें बहुत कम बार हुई हों, तो भी हमारे स्नेह-सूत्र बडे मजबूत थे। शुरुआत में मैं उन्हें पण्डितजी कहा करती थी तो बाद-बाद में महाकवि भी कहा करती थी। वे उम्र में मुझसे बहुत बडे थे लेकिन कभी अचानक कह बैठते- तुम छोटी हो, लेकिन मैं तुझे नमस्कार करता हूँ।
पण्डितजी की कविता की वजह से मेरे गायन-कौशल को प्रतिष्ठा और अभिवृद्धि मिली। लेकिन मैं पण्डित के लिए कुछ न कर पायी इसकी पीडा बरसों से मुझे रही थी। यह चुभन कुछ मात्रा में दूर करने के लिए दो साल पहले मैंने उन्हें एक लाख रुपये की मदद की। उस वक्त मेरे इस काम पर प्रचार-माध्यमों ने टीका-टिप्पणी की थी, लेकिन मेरे मन में किसी प्रकार का खोट नहीं था। इसीलिए मैं बडे साफ दिल से उनसे मिल पायी। इस बार भी मुझसे मिलकर पण्डितजी बहुत खुश हुए। बुढापे की वजन से वे काफी कमजोर गये थे। बीमार होने की वजह से ठीक से बोल नहीं पा रहे थे। उनकी श्रवण- शक्ति भी कम हो गयी थी। फिर भी मुझसे वे बडे प्रेम से बोले। मेरी मदद के बारे में उठी उल्टी-सीधी बातें उन तक भी पहुँची होंगी। उन्होंने कहा, बेटी तूने तो मेरी इज्जत रख ली। सिर्फ तुम्हें मेरी याद रही। इस बार की मुलाकात में भी फिर से ऐ मेरे वतन के लोगो... पर बात चली। इस गीत को असीम लोकप्रियता तो अवश्य मिली, लेकिन इस गीत को लोगों तक पहुँचाने वालों ने पण्डित जी को नजरअंदाज किया, इस पर पण्डितजी ने रंजिश जाहिर की। इस मुलाकात के दौरान मैंने पण्डित जी से आग्रह किया कि उन्हें ए मेरे वतन के लोगो... जैसा एकाध गीत और रचना चाहिए। तब पण्डितजी ने कहा कि देश को आजादी मिलने पर मैंने जो सपने देखे थे वे अभी भी साकार नहीं हो पाये हैं सो मैं नयी रचना कर नहीं सकता। हाँ, पर उन्होंने जोर देकर यह कहा कि अब मैं जो लिखूँगा वह बहुत ही तीखा होगा। अगले ही क्षण, मुझे मत कहो, अभी कुछ लिखने को कहते हुए पण्डितजी का स्वर ही बदल गया था।
उस दिन बहुत देर तक हम लोग बातें करते रहे। बातों के बीच में अचानक मेरी माँ - माई की बात चली। यों तो पण्डितजी और माई में कोई खास परिचय नहीं था। पण्डितजी ने फिर भी उन्हें याद किया और मैंने माई के लिए कुछ लिखा है- यों कहते हुए माई पर लिखी गयी कविता की तीन-चार पंक्तियाँ भी सुनाई। फिर थोडा रुककर यह तुम्हें रिकार्ड करना है... यह कहना भी वे नहीं भूले। उस कविता के ऐन शब्द तो मुझे याद नहीं लेकिन उनकी बेटी से वह कविता हासिल करने की मैं कोशिश कर रही हूँ। वह कविता मिल गयी तो सचमुच ही उसका कैसेट बनाने की मैं सोच रही हूँ। सिर्फ माई, पर की कविता ही क्यों पण्डितजी की अन्य अप्रकाशित कविताओं को भी रसिकों तक पहुँचाने का प्रयास मैं भविष्य में करूँगी।
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शब्दांकन : मंदार जोशी
अनुवाद : डॉ. राजम नटराजन पिल्लै

एक कवि प्रदीप से साभार