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नवीन कवि प्रदीप

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
आज जितने कवियों का प्रकाश हिंदी म फैला हुआ है, उनमें प्रदीप का प्रकाश अत्यंत उज्ज्वल और स्निग्ध है। हिंदी के हृदय से प्रदीप की दीपक-रागिनी कोयल और पपीहे के स्वर को भी परास्त कर चुकी है, यह युक्तप्रान्त के अधिकांश श्रोताओं को मालूम हो चुका है। इधर 3-4 साल से यहाँ के अनेक कवि सम्मेलन प्रदीप की रचना और रागिनी से, नवीन आभा से, उद्भासित हो चुके हैं। लोगों को अच्छी तरह मालूम हो चुका है, नवीन क्या है-वह प्राचीन को छोडकर भी लिए हुए आगे कहाँ तक पहुँचा है। मैं काव्य के जिन गुणों के लिए विरोधियों से वर्षों विवाद करता रहा हूँ प्रदीप ने अपनी रचना-कुशलता और आवृत्ति से क्षणमात्र में उस धारा की पृष्टि कर दिखाई है। केवल आलोचकों को अच्छी तरह मनन करके देख लेना है। जिस श-ण-व-ल- स्कूल के लिए मैं अपने मित्रों से कह चुका हूँ कि इसकी वर्ण-मैत्री हिंदी के प्राणों से मैत्री नहीं करती- वह कृत्रिम है,- मैं लिख भी चुका हूँ कुछ उसके विरोध में, वह स्कूल कितना सफल है-उसके प्रवर्तक और अनुसरण -कारी कितनी सफलता से आवृत्ति कर सकते हैं, प्रदीप को सामने, साथ करके देख लें, यद्यपि उन्हें यही उत्तर पठन और लेखन-कौशल से प्रदीप के पहले भी बार-बार मिल चुका है, और बार-बार उनका हठ और परास्त मौन न मानने की ओर ही उन्हें बरगलाता रहा है। आवृत्ति के सम्मुख समर में यदि वे न आना चाहें तो घर बैठकर भी, काव्य-विचारण-प्रणाली से, प्रदीप के काव्य के साथ अपने काव्य की धारा की जाँच कर लें कि कौन प्राणों के अधिक निकट है, किस वर्ण-मैत्री से हिंदी का कंठ-स्वर अधिक मिलता है, किसमें भाव रस, अलंकार और ध्वनि की उष्णता और अकृत्रिमता है। यह मैं किसी प्रचार के विचार से नहीं लिख रहा, केवल सत्य के लिए- जिसे मैंने अपना पूर्ण यौवन अर्पित किया है, लिख रहा हूँ। नवयुवक प्रदीप के साथ काव्य की इस धारा को मैं इसलिए रख रहा हूँ कि इसी से मुझे काव्य का कल्याण मालूम देता है। इस धारा के हिंदी में अनेक कवि और हैं, लेकिन चूंकि उनके प्रमुख यदा-कदा मुझ पर लेख और समालोचनाएँ लिख चुके हैं, इसलिए उनका जिक्र, साहित्यिक दृष्टि से विधेय होने पर भी, मैं नहीं कर रहा, नहीं किया और शायद करूँगा भी नहीं, जब तक कोई साहित्यिक प्रश्न न होगा। काव्य जब असली जगह से निकलता है, तब, केवल जातीय नहीं-सामूहिक-भिन्न, भाषा-भाषियों के कण्ठों से भी साफ अदा होता है, यानी उसका स्वर समस्त विश्व के स्वरों से मैत्री कर सकता है। कोई मनुष्य, वह कहीं का हो, उस स्वर को सुनकर यह न कहेगा कि इसमें कर्णकटुता है-यह आत्मा में अस्वाभाविकता पैदा करता है। यही स्वर पढते वक्त विकृत नहीं होता। श-ण-व-ल-स्कूल वाले यहीं अंटाचित हैं। पढते वक्त कभी नक्की स्वरों में बोलते हैं, कभी गला बैठाकर। कभी खाँसी आने लगती है, कभी घिग्घी बँध जाती है। मैंने आज तक एक कविता सहज स्वर में पढते हुए श-ण-व-ल स्कूल के किसी प्रवर्तक को भी नहीं देखा-सुना। जब पढने लगे, कभी पिनपिनाये, कभी स की जगह म निकला। बात तो यह नहीं कि जितने बेसुरे होते हैं, श-ण-व-ल-स्कूल में नाम लिखाते हैं, प्रदीप को मैंने इसलिए उदाहरण के रूप में रखा है। प्रदीप को मैं तब तक नहीं जानता था, जब तक वह आधुनिक प्रदीप की तरह प्रकाशित नहीं हुए। वह या और लोग-जिन्होंने मुझ पर लिखा है, मेरे अनुयायी हैं, यह कहना प्रतिभा का अपमान करना है। और, अगर किसी को ऐसे न्याय के बिना संतोष ही न होता हो तो, उसे और वैसे विचार के लोगों को कहना चाहिए कि जितने श्रेष्ठ कवि संसार में हो गये हैं, हैं और आगे होंगे, वे सब निराला के अनुयायी थे, हैं और होंगे। सही बात यह है कि भाषा जब स्वाभाविक रूप से निकलेगी, इसी रूप से निकलेगी,- इसका पठन स्वाभाविक और आनन्दप्रद होगा। यह किसी व्यक्ति की संपत्ति नहीं है। प्रदीप स्वयं इस संपत्ति के अधिकारी होकर आये हैं। मैं उन्हें विगत युद्ध के फल के तौर पर रख रहा हूँ। लोगों ने मुझ पर अनेक तरह के मन्तव्य जाहिर किये हैं। मैं भी लिखकर-पढकर और कुछ आलोचना कर अपनी पुष्ट-से-पुष्ट सफाई दे चुका हूँ। लेकिन मैंने देखा है, अधिकांशतः फल उलटा हुआ है। अभी-अभी मेरे एक आलोचक ने लिखा है, अगर निराला ने आलोचनाएँ न लिखी होती, तो इतनी ही प्रतिभा, अध्ययन और रचनाओं से हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि मान लिये गये होते। वास्तव में मेरे आलोचक मित्र मुझ पर सदय हैं। पर उन्होंने मुझे जितने स्थूल रूप से देखा है, हिंदी की कविता को उतने ही सूक्ष्म रूप से देखते, तो मेरे और उनके लिए लाभ की गुंजाइश अधिक होती। कुछ ऐसे भी अपोगंड हैं, जिन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में मेरे मर जाने का प्रचार किया है, कुछ ऐसे प्रोगे*सिव, जिन्हें मेरी चीजों में चारों ओर प्रतिक्रया ही देख पडी है। ऐसे मनुष्यों को, मैं आधुनिक से आधुनिक और उच्च से उच्च जो साहित्य मुझे मिला है उससे, देख चुका हूँ, और जानता हूँ, किराये के टट्टू की चाल उससे अधिक नहीं होती। काव्य की जिस प्रणाली की चर्चा कर रहा था, उससे आयी हुई चीजों किसी भी भाषा की चीजों के मुकाबले फीकी नहीं पडेगी। उर्दू की इस देश में बडी तारीफ है, लेकिन हम लोग कृतियों से और आवृत्ति से जो उत्तर दे चुके हैं, वे और वैसे कभी किसी उर्दू के कवि पंडित से नहीं मिले। उर्दू कहाँ है, इसके विवेचन का यह समय नहीं। मुख्य बात स्वाभाविक उच्चारण-धारा की है, जहाँ से उर्दूवाले हिंदीवालों का मजाक करते हैं,फिर भी जहाँ के बहुतों पर आश्चर्य की दृष्टि डाल चुके हैं- प्रदीप ऐसे ही एक हिंदी के कवि हैं। काव्य शब्दमय है। शब्द का आकाश से सबंध है। यह सबसे सूक्ष्म तत्त्व है। शब्द का परिष्कार आकाश का साफ होना है- यह आकाश मन का आकाश है। प्रकृति में भी यह सबसे सूक्ष्म है। शब्दों का ही समन्वय भिन्न-भिन्न अर्थ से काव्य में होता है। जब यह निर्दोष होता है, तब पढा भी अच्छी तरह जा सकता है, और अपर हृदयों पर इसका प्रभाव भी यथोत्पादित पडता है। संसार की प्रकृति को आनंद देने की यहीं और यही कुंजी है। श-ण-व-ल वाले यहीं से च्युत हैं।

प्रदीप की कुछ उल्लेखनीय रचनाएँ

स्नेही की बाट
स्नेह की यह बाट री सखि, स्नेह की यह बाट!
अबल हम, यात्रा हमारी परिधिहीन विराट!
प्राण-सा पतवार कंपित!
पाल जर्जन, दीप झंपित!
अगम तमसावृत निशा भी
प्रबल झञ्झा से प्रकंपित!
पोत हलका जीर्ण, सम्मुख अतल जल का पाट
री सखि, स्नेह की यह बाट!
स्वप्न तज, उठ जाग री सखि!
ध्वनित सैन्धव राग री सखि!
प्रणय की दुखमय डगर पर-
हर जगह है त्याग री सखि!

नियति डमरू डिमडिमाती खोल नयन-कपाट!
री सखि, स्नेह की यह बाट!
दो घडी हँस बोल लें हम
खेल लें, कल्लोल लें हम!
प्रेम-पादप के तले अलि!
दो घडी हिंडोल लें हम!
कौन जाने दो घडी का हो हमरा ठाट!
री सखि, स्नेह की यह बाट!
आज सखि, मधुमास आया!
नयन में उल्लास छाया!
आज तो हम सिक्त कर लें!
स्नेह-सर में स्निग्ध काया!
अश्रु से सिंचित हमारा हो मिलन का घाट!
री सखि, स्नेह की यह बाट!
मैं मधुप मधुमत्त आली!
तुम बनो मकरन्द - प्याली!
हम मना लें आज अंतिम
बार जीवन में दिवाली!
तुम बनो अभिसारिका, टुक भिक्षु मैं सम्राट्!
री सखि, स्नेह की यह बाट!
दूर जलनिधि का किनारा!
दूर अपना देश प्यारा!
दृष्टि स ओझल हुआ सखि,
ध्येय-ध्रुवतारा हमारा!
हम पथिक निर्वाण पथ के दूर अपना हाट!
री सखि, स्नेह की यह बाट!

प्रवासी

आज मत जाओ, प्रवासी!
यह मधुर रस-प्राण राका
मत करो श्रीहत अमा-सी!
कर रहा स्मर अमर प्रवचन,
सुन हुए जग-जन मगन-मन,
गगन के अगणन नयन से
झर रहा अनुराग अमरण,
लसित वसुमति रस सजी-सी
बनी शशधर-चरणदासी!
यामिनी छाया मधुरतम,
यह प्रणय का पर्व, प्रियतम,
मिलन के अनुपम निमिष में,
तुम चले किस ओर निर्मम!
छा रही ज्योत्स्ना निमज्जित
आज मधु की पूर्णमासी!
जब जगत् रतिरास तन्मय,
स्नेह सर में स्नात मधुमय
तब, सदस्य, क्यों सज रहे हैं
ये विदा के साज असमय,
मान लो, टुक ठहर जाओ,
शाप-सी हर लो उदासी!

मुरलिका के प्रति

मुरलिके, छेड सुरीली तान!
सुना सुना, अयि मादक अधरे,
विश्व विमोहन गान!
प्रात जगा सोयी विभावरी,
खगकुल ने छेडी असावरी,
तू ध्वनि विरहित पडी बावरी,
उठ, अब सत्वर तू भी सजधज
कर ले स्वर-सन्धान!
उठ प्रसुप्ति का क्रोड छोड री
युग-युग का गुरु मौन तोड री,
झण-भर अलसित तन मरोड री
अंगडाई ले रोम-रोम से
फूटे नाद महान!
निज सुर में कोमल स्वर भर-भर
रुचिर रागिनी के विमान पर
विचर-विचर री सजनी सत्वर,
नाच उठे तब स्वर लहर पर
नियति प्रकृति के प्राण!
तेरे शाश्वत स्वर का कंपन
भर दे निखिल सृष्टि में जीवन
व्याकुल को कर दे मुकुलित-मन
ओ निराश मानव के मुख पर
अंकित मृदु मुस्कान!
सखि, कर ऐसा सुखमय अभिनय,
सुना रागिनी मनहर मधुमय,
निखिल जगत् होवे ज्योतिर्मय
फिर तन्मय हो तेरी लय में
होवे अंतर्धान!

कहो कौन?
तुम हो कहो, कौन?
अब तो खुलो, प्राण,
मुंद कर रहो यों न!
मेरे गगन में घिरी थी सघन रात
तुमने किरन तूलि से रंग दिया प्रात,
मुकुलित किये स्पर्श से म्लान जलजात,
मैं था चकित, तुम चपल-कर पुलक-गात
मैं कुछ उठा पूछ, तुम हँस हुए मौन!

जीवन-डगर पर गया मैं दिशा भूल,
तब एक तुम ही रहे संग अनुकूल
जग से मुझे प्राप्त पग-पग हुए शूल,
तुमने सदा, पर, समर्पित किये फूल,
जग मैं थका, बन बहे तुम मलय पौन।

तुमने निकट से सुनाये सदा गान,
भ्रम था कि तुम दूर के दूत अनजान,
इतने दिनों बाद मुझको हुआ ज्ञान,
मेरी परिधि की तुम्हीं हो मुखर तान,
ध्यनिमय तुम्हीं ने किया है हृदय मौन!

मैंने विवेचकों के देखने और समझने के लिए प्रदीप की कई पूर्ण रचनाएँ उद्धृत कर दी हैं। अपनी ओर से उनकी आलोचना इसलिए नहीं करूँगा कि उनका सौन्दर्य यों ही समझदारों की दृष्टि में और बढेगा। वे मेरी पहली बातों का भी मिलान करके देखेंगे। खडी बोली की कविता को रोटीवाद में जलकर देखनेवालों के लिए अवश्य यहाँ बहुत कुछ न मिलेगा, यद्यपि हम लोगों ने इस वाद पर भी बहुत कुछ लिखा है, और तब लिखा जब हिन्दी-साहित्य में रोटीवाद, समाजवाद और इस तरह के विभिन्न वादों का प्रचलन न हुआ था। कुछ हो, रोटीवाद भी यदि गाता है, आनन्द मनाता है, तो वे रोटीवाद की बातों से गीत अवश्य नहीं, वे केवल काव्य की पंक्तियाँ हैं। वंशी की आवाज को कोई रोटीवाद के भिन्न स्वर में नहीं बदल सकता। इस तरह प्रदीप की कविता किसी रोटीवाद में प्रसन्नता ला सकती है या नहीं, देखना यह है। प्रदीप गुजराती ब्राह्मण हैं। यहाँ 7-8 साल से हैं। प्रयाग के क्रिश्चियन कॉलेज से एफ.ए. पास करके, लखनऊ विश्वविद्यालय में बी.ए. में भर्ती हुए। इस समय शिक्षकों के ट्रेनिंग-कालेज में हैं, यानी आगे शिक्षक होंगे। इससे बढकर दुर्भाग्य हमारे लिए और क्या होगा कि हमारे अच्छे-से-अच्छे कवि इस प्रकार रोटी के प्रश्न में पडकर अपनी असलियत से हाथ खींच रहे हैं, या हाथ खींचने को विवश हो रहे हैं। प्रदीप की आर्थिक अवस्था उतनी अच्छी नहीं, जितनी अच्छी उनके हृदय की अवस्था है। हिन्दी के श्रीमान् जितने उलझे हैं, उतने सुलझे नहीं। इसलिए प्रदीप का भविष्य ईश्वर उज्ज्वल करे। प्रदीप का स्वर ईश्वरदत्त है। उन्हने स्वर की शिक्षा नहीं पायी। पर इतना अच्छा स्वर मैंने हिन्दी में दूसरा नहीं सुना। इसीलिए स्वाभाविक कवि और खडीबोली की, सच्ची कविता कैसी हो सकती है, इसकी जाँच के लिए लोगों को आहूत किया था। यदि ‘प्रदीप’ की संगीत-शिक्षा की व्यवस्था शांति-निकेतन में कर देने के लिए हिंदी के कोई धनी प्रेमी अग्रसर होते, और उनके आर्थिक प्रश्न को कुछ दिनों के लिए हाथ में लेते, तो निःसंदेह ‘प्रदीप’ से हिंदी को एक से एक श्रेष्ठ उपहार मिले होते। आशा है, प्रचार-पन्थी हिन्दी-साहित्य सम्मेलन भी इधर ध्यान देगा, क्योंकि उसके लिए यह साधारण प्रचार नहीं। पंडित रामचंद्र दुबे आपका नाम है।
यह मध्य भारत बडनगर, उज्जैन के रहने वाले, 21-22 साल के नवयुवक हैं।

कवि प्रदीप पर लिखा महाप्राण निराला यह का यह लेख निराला रचनावली भाग-5 में पृ.सं. 430 पर हैं। पहले पहल यह लेख माधुरी के फरवरी 1938 अंक में प्रकाशित हुआ था।