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कवि प्रदीप : सहजता का सौन्दर्य

ब्रजरतन जोशी
कब दो श्रेणियाँ बँट गईं नहीं मालूम। एक श्रेणी कवियों की, एक गीतकारों की। गीत लिखने की न्यूनतम अर्हता कविता लिखना है। गीत लिख पाना साधना की चरम परिणति है। हर कविता की इच्छा अंततः गीत बन जाना है। - कवि अरुण कमल
हम समय के उस कालखण्ड में जी रहे हैं कि जिसमें उसकी गति पूरे इतिहास में अब तक की सबसे तेज गति रही है। यह अनावश्यक, संयम रहित, सहजता के सौन्दर्य से वंचित गति जीवन के आकार और व्याकरण को विकृत करती जा रही है। पर ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि जीवन विकास के लिए असाधारण या असहज गति-मति की नहीं वरन् साधारण और सहज की अनिवार्य उपस्थिति काम्य होती है।
साहित्य का इतिहास भी इस तेज गति के चलते कुछ विस्मृति का शिकार हुआ है। कुछ साहित्य विधाओं की राजनीति, कुछ आलोचकों और लेखकों की राजनीति के चलते हमारे समय के कुछ ऐसे व्यक्तित्व हमारे ही स्मृतिकोश से हटते जा रहे हैं, जो कि हमारी धरोहर हैं। ऐसी ही एक धरोहर हैं कवि प्रदीप। कवि प्रदीप ने अपनी काव्य यात्रा कविता से शुरू की, पर उसकी यात्रा कविता से काव्य तक ही सिमटकर नहीं रह गई, वरन् उसकी परिणति गीत तक गई।
गीत के बारे में सामान्यतः यह माना जाता है कि वे राग भरे आवेश की रचना है। यानी इस जटिलतम समय की संश्लिष्ट अनुभूतियों को उसमें गूँथा जाना एक कठिन काम है। गीत विधा के साथ एक दिक्कत यह भी रही कि आलोचकों ने न तो इस विधा ओर न ही उसके किसी प्रमुख गीतकार की ओर अधिक ध्यान दिया। पर इससे गीत की अन्तरात्मा और सांगीतिक सौन्दर्य की अनुभूति की कोई क्षति नहीं हुई। गीत हमें अनुभूति के जिस स्तर पर ले जाता है, वह अपने आप में विलक्षण अनुभव है। नवगीत के दौर में कुछ में भी एक त्रासदी यह रही कि गीत की एक परम्परा बनते-बनते रह गई। हम देखते हैं कि जिस समय प्रदीप गीत रच रहे हैं, वह समय हिन्दी फिल्मों में उर्दू के प्रभाव का है। चालू गीतों के चलन का रहा है। पर कवि प्रदीप के इसमें प्रवेश करते ही परिदृश्य में एक बडा बदलाव आता है और पं. भरत व्यास, इंदीवर आदि सरीखे अमर गीतकार उस वातावरण को और मजबूत बनाते हैं, जिसकी बुनियाद में कवि प्रदीप का गीतकाव्य है। परिणामस्वरूप हम पाते हैं कि उस समय के जनकंठ के हार उन्हीं गीतकारों के गीत थे। बल्कि यह कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वह समय इन्हीं गीतकारों का था। कवि प्रदीप के एक प्रभात गीत द्रुम द्रुम गूँज रही शहनाई गीत में हम देखते हैं कि कैसे एक कवि दो संस्कृतियों के शब्दों की परस्पर टकराहट से एक नई काव्यानुभूति या काव्य संस्कार को जन्म देता है। हम देखते हैं कि द्रुम और गज शब्द तो हिन्दी के तत्सम शब्द हैं और शहनाई फारसी का है। अच्छा गीतकार शब्द के सौन्दर्य को उजागर करते समय लय के सौन्दर्य का भी उतना ही ध्यान रखता है जितना शब्द के सौन्दर्य का। इस गीत में कवि प्रदीप एक संकेत दे रहे है कि कि सुबह का वातावरण मंगलमय होता है। प्रकृति का प्रांगण उल्लासमय होता है। यह मांगल्यता और उल्लासमयता ही हमारे संपूर्ण जीवन का केन्द्र है। उस दौर के कवि प्रदीप ने कोमल गीत बहुत लिखे। परिणामस्वरूप उनकी एक बारह कविताओं की चर्चित कृति गीतमंजरी प्रकाशन में आई।
कवि प्रदीप के गीत काव्य में विलक्षण सरसता एवं ऋजुता है। उनमें छायावदी गीतों की-सी स्वप्निलता, वायवीयता और चटकीले दिवास्वप्न नहीं है। उनके गीतकाव्य में अप्राप्ति से जनित पीडा और कुण्ठा के स्थान पर मनुष्यता, देश, सम्पूर्ण समाज के प्रति विनयी भाव है। हम कह सकते हैं कि उनका प्रकृत क्षेत्र राष्ट्रीय, सामाजिक, समरसता और मनुष्यता के विलयन में रसा-पगा है। शिल्प की दृष्टि से देखें, तो उनके काव्यगीत कविता की तरह ही संक्षिप्ता और संगुफ्तिता को अपने कलेवर में लिए हैं। उनका लघुपद विन्यास जितना उदात है, उतना सम्प्रेष्य भी। उनका गीत साहित्य हमें बोध देता है कि उनका रचनाकार केवल कल्पना में विचरण नहीं करता वरन जमीनी यथार्थ और सामाजिक विद्वेष के प्रति पूर्ण सजग और संवेदनशील है। स्वच्छ सामाजिक व्यवस्था के लिए समर्पित उनका समूचा गीतकाव्य विद्रोह, विश्वबन्धुत्व, दिशा संवेदना से भरा-पूरा है। भले ही बोध की दृष्टि से यह सहवर्ती काव्य सरणियों से पूरक जान पडता है, पर शिल्प में वही मुक्त छन्द, लयगति संयुक्त ओर सपाटबयानी से लबरेज है। वे स्वस्थ समाज की खोज में निकले अनथक धावक है। जो निरन्तर बिना किसी सामाजिक दबाव, प्रभाव के अपनी दिशा में आगे बढ रहे हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि कवि प्रदीप के गीत भारत की रसभूमि के केन्द्र से उठे हैं। एक तरह से वे भारतीय लोक जीवन के रस-प्राण हैं। नीरज ने नयी कविता और गीत के सम्बन्ध में कहा था कि नयी कविता और गीत एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। एक-दूसरे के पूरक हैं। नयी कविता से जो कुछ छूट गया है उसे वाणी दी है गीत ने। कवि प्रदीप के गीत साहित्य के संदर्भ में भी यही तथ्य उचित जान पडता है कि उस समय की काव्य संवेदना की अभिव्यक्ति में जो कुछ छूट रहा था, कवि प्रदीप जैसे गीतकार ने उस रिक्तता को भरने की भरपूर कोशिश की।
उनके गीतों की संक्षिप्ता संकीर्णता की द्योतक नहीं है, वरन् वह उनके गीत के कसाव के लिए जरुरी जागरूकता को व्यक्त करती है। उनके गीतों में भारतीय जीवन के प्रति अभिव्यक्त आत्मीयता एक नयी रसज्ञ वाणी का विधान रचती है। कवि प्रदीप के गीत इस तथ्य का शानदार उदाहरण है कि कैसे महानगर जीवन में रहते हुए भी वे लोक जीवन, प्रकृति और मनुष्य जीवन की अनुभूतियों और सुख-दुख से नाभिनालबद्ध जुडे रहे। जबकि प्रायः देखा-पाया यह गया है कि फिल्मी और लोकप्रिय गीत की मुख्यधारा में जाने के बाद गीतकार अपनी विधा के आधारभूत मंतव्यों से भटक जाते हैं। पर उनमें यह भटकाव नहीं आया। प्रश्न उठ सकता है कि ऐसा क्यों? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि अपनी विधा और विचार को लेकर उनकी दृष्टि साफ और स्पष्ट थी। वे कहते थे कि फिल्म हो या राजनीति गंदी बातों को एक दिन जनता उठाकर फेंक देती हैं। उनके अर्न्ततम में छिपी इस प्रवृत्ति को महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने पहचानकर ही फरवरी 1938 के माधुरी अंक में कवि प्रदीप पर एक लेख नवीन कवि प्रदीप शीर्षक से लिखा। जिसमें उन्होंने लिखा कि आज जितने कवियों का प्रकाश हिन्दी में फैला हुआ है, उनमें कवि प्रदीप का दीपक अत्यन्त उज्ज्वल और स्निग्ध है। हिन्दी के हृदय में प्रदीप की रागिनी कोयल और पपीहे को परास्त कर चुकी है। मैं काव्य में जिन गुणों के लिए विरोधियों से वर्षों विवाद करता रहा हूँ प्रदीप ने अपनी रचना कुशलता और आवृत्ति से क्षणमात्र में उस धारा की पुष्टि कर दिखायी है। 12 जनवरी 1942 को कवि प्रदीप को लिखे एक पत्र में प्रख्यात गीतकार शिवमंगल सिंह सुमन ने लिखा कि- आज तो तुम्हारे गाने दसों दिशाओं में गूँज रहे हैं। उसके विषय में जितना भी कहूँ थोडा है।
कवि प्रदीप व्यापक जीवन में फिल्मों की प्रभावी भूमिका को भली-भाँति जानते थे। एक स्थान पर स्वयं उन्होंने लिखा है राष्ट्रीय एकता तथा हिन्दी प्रचार के महत्त्वपूर्ण कार्यों में संलग्न फिल्मों ने अनपढ जनता तक पहुँच कर देश और समाज की बडी सेवा की है। जनतंत्र के अनुकूल आज उत्तरदायित्व पहचान कर फिल्मी लोग राष्ट्र का बडा भला कर सकते हैं। संस्कार और सदाचार को भी यदि मनोरंजन का अंग मान लें, तो इतिहासकार उनकी सेवाओं का स्मरण करते रहेंगे। अपने दीर्घ फिल्मी जीवन की यात्रा में आ रही गिरावट के बारे में वे न केवल सजग थे बल्कि उसके बारे में उनकी राय पूर्णतः पारदर्शी और साफ थी। वे कहते हैं - पहले संगीतकार एक दर्जी की तरह था, जो गीतों के आकार-प्रकार को देखते हुए उनके नाप का कपडा सीता था। यानी धुन बनाता था। अब संगीतकारों ने रेडीमेड गारमेन्ट की दुकान खोल ली है। वह रेडीमेड धुन गीतकार को देते हैं और कहते हैं कि इसमें अपने गीत के शरीर को घुसाओ। कपडा घटे या शरीर को कष्ट हो, इसकी परवाह उन्हें नहीं।
इसलिए उनका गीतकार सभी तरह के घटाटोपों और आडम्बरों से बचता हुआ कहता है -
चल-चल रे नवजवान
दूर तेरा गाँव और थके पाँव
फिर भी तू हर दम, आगे बढा कदम
रूकना तेरा काम नहीं, चलना तेरी शान
चल-चल रे नवजवान
एक सुखद संयोग यह भी है कि मुझे भी अपने बचपन में अमर गीतकार कवि प्रदीप के साथ लगातार सात दिन सहचर्य का अवसर मिला। 1986 की गर्मी की छुट्टियों में हमारा परिवार बम्बई की यात्रा पर था। वहाँ हमारा आवास मेरा ननिहाल प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता बी.एम.व्यास के यहाँ था। उस समय मेरी आयु तेरह वर्ष थी और मैं कक्षा आठ का विद्यार्थी था। कवि प्रदीप प्रतिदिन शाम के निश्चित समय मेरे ननिहाल विलेपार्ले स्थित वसंत विला में संध्या भ्रमण के लिए आते थे। वे आते और नानाजी के साथ चाय-पान करते और फिर दोनों एक-साथ घूमने को निकल पडते। मुझे याद है कि उन दिनों ननिहाल में मैं और मेरी बहन ललिता ही छोटे बच्चे थे। वे मेरी माँ और पिताजी से बेटी-दामाद की तरह पेश आते और पिताजी से संवाद करते हुए उन्हें कुछ जीवन सूत्र सलाह के रूप में देते। हम दोनों भाई-बहनों के सिर पर हाथ फेर कर बतियाते। और यह कहना नहीं भूलते कि पढ-लिख कर बडा आदमी नहीं बडा इंसान बनना है। हम नित्य उनकी गोद में अपना सर झुकाकर उनका स्नेहिल स्पर्श पाते। दो बार तो वे हमारे लिए खाने-पीने का कुछ सामान भी लेकर आए। और हाँ, सैर पर रवाना होते वक्त हाथ हिलाकर हमें विश करना कभी नहीं भूलते। उस समय मुझे और मेरी छोटी बहन को यह किंचित ही अहसास नहीं था कि हम जिस व्यक्ति का सहज, स्नेह और सहचर्य पा रहे हैं वह हिन्दुस्तान के इतिहास गगन का एक अनूठा नक्षत्र है। पर आज मैं आपार प्रसन्नता अनुभव कर रहा हूँ कि मुझे उस महान आत्मा पर अपने पाठक वर्ग को विशेष सामग्री देने का सौभाग्य मिल रहा है। और इस तरह उनके और नजदीक जाने का और उनकी रचना प्रक्रिया जानने का भी अवसर मिल रहा है।
मधुमती परिवार का यह प्रयास रहेगा कि आगे भी हम हमारे समय में निरन्तर प्रासंगिक होते जा रहे बडे जीवन और व्यक्तित्वों पर कुछ विशेष सामग्री अपने पाठक वर्ग के लिए प्रस्तुत करें।
हमेशा की तुलना में यह अंक आकार में थोडा बडा है। अतः इस अंक में आपको ग्यारह लेख, दो कहानियाँ, एक ललित निबन्ध, एक स्मृत्यालोचन, डायरी अंश, तीन कवियों की कविताएँ, अनुवाद और दो समीक्षाओं के साथ नियमित कॉलम साहित्यिक परिदृश्य, प्राप्ति स्वीकार और सूचना मिलेगी। अंक पर आपकी राय का इंतिजार रहेगा। वसंत की शुभकामनाओं के साथ-