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कृष्णा सोबती और विस्थापन का दर्द

ममता
समकालीन हिन्दी साहित्य में कृष्णा सोबती एक चर्चित नाम है। 18 फरवरी 1925 को गुजरात पाकिस्तान में जन्मी कृष्णा सोबती हिंदी साहित्य जगत् में अपना अलग ही स्थान रखती हैं। 25 जनवरी 2॰19 को उनका निधन दिल्ली में हुआ। उनका जाना हिन्दी साहित्य जगत् व उनके अपनों के लिए बेहद दुखद क्षण था। वह स्वतंत्र भारत की आधुनिक महिला लेखिकाओं में से एक थीं। काफी लम्बे साहित्यिक अनुभवों के साथ वह हिन्दी साहित्य जगत् से जुडी थी। सोबती लाहौर में पली-बढी और विभाजन के बाद अपने परिवार के साथ भारत आ गई। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी एक मजबूत साहित्यिक पहचान बनाई। साहित्य में वह अपनी संयमित भाषा व अभिव्यक्ति के जरीए अपनी रचनाओं को नए मुकाम पर ले गईं। ‘*ांदगीनामा’ उपन्यास सोबती का चर्चित उपन्यास है, जिसके लिए उन्हें 198॰ में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1996 में इन्हें साहित्य अकादमी अध्येतावृत्ति से सम्मानित किया गया। डार से बिछुडी, मित्रो मरजानी, यारों के यार, तीन पहाड, सूरजमुखी अंधेरे में, *ांदगीनामा, ऐ लडकी, दिलोदानिश, सिक्का बदल गया जैसी रचनाएँ उन्होंने लिखी। उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें 2॰17 ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ दिया गया।

कृष्णा सोबती का आखिरी उपन्यास ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान’ था जो सन् 2॰17 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में विभाजन, शरणार्थी, राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया से जुडी रियासतों का मानसिक द्वंद्ध तथा भारतीय समाज का चित्रण लेखिका ने बखूबी किया है। यह उपन्यास पढकर लगता है जैसे हम कोई संस्मरण पढ रहे हों। संस्मरणात्मक शैली के साथ-साथ इसमें उपन्यास के गुण भी हैं, जो इसे उपन्यास की श्रेणी में रखता है। कहा जा सकता है कि यह सोबती जी की आत्मकथा ही है। आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया यह उपन्यास एक 2॰-21 वर्ष की लडकी की कहानी है जो गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान में शरणार्थी के रूप में आई है। उपन्यास में जिस युवा लडकी का *ाऋ है वह स्वयं लेखिका है। कृष्णा सोबती विभाजन की भोक्ता व दर्शक दोनों ही थी। उन्होंने जो पाया वही लिखा और बडे ही मार्मिक ढंग से बताया है। यह उपन्यास स्वानुभूति का उपन्यास है इसलिए इसमें आत्मकथात्मक गुण भी दिखते हैं।
सोबती का साहित्य उनके किरदारों व कथा संसार के लिए हमेशा स्मरणीय रहेगा। उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ के किरदार को हिन्दी साहित्य में एक आधुनिक स्त्री के रूप में जाना जाता है जो समाज के नियमों को तोडने की बात करती है। पवित्रता के सवालों से झूझती हुई खडी होती है और समाज के दोहरे मापदंडों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। सोबती मित्रो के किरदार के द्वारा एक स्त्री की शारीरिक जरूरतों जैसे अहम प्रश्नों को उठाती हैं जो आज भी समाज में उपेक्षित समझे जाते हैं। स्त्री मन की गाँठों को उनकी रचनाएँ बखूबी खोलती हैं। जो भी उनके जीवन अनुभवों ने उन्हें दिया, उसे वह बार-बार अपनी स्त्री पात्रों में खोजने का प्रयास करती रहीं। वह अपने पात्रों, अपने समाज, समय व प्रकृति का चित्रण करते समय व लोकसंस्कृति के हर क्षेत्र में वह रम-सी जाती हैं। ऐसा लगने लगता है कि लोक-गीतों की धुनें उनके साहित्य से निकल कर जीवित हो उठती हैं। लोकगीतों व लोकोक्तियों की भरमार उनके साहित्य की विशेषता है। *ांदगीनामा कृति तो संपूर्ण पंजाब व उसकी संस्कृति के परिदृश्य को आँखों के सामने ले आती है। वर्णन सजीव हो उठते हैं और हम उस काल विशेष के एक अंग बन जाते हैं जो अब तक कथा का हिस्सा थी अब मानो हमसे ही वार्त्तालाप कर ही हों। सोबती जी अपनी कथाओं में इतना सूक्ष्म चित्रण करती हैं कि कभी-कभी कथा में वह अनावश्यक-सा प्रतीत होने लगता है तथा कथा लंबी होने लगती है परन्तु कथा की यह लंबाई पूरा एक माहौल तैयार करती है जिससे पाठक न केवल मानसिक रूप से कथा का हिस्सा बन जाता है बल्कि सशरीर भी अपने को कथा में पाता है।
सोबती एक नई ता*ागी के साथ एक ऐसे कथा संसार को गढती हैं जो उपन्यास के जरीये जीवन जीने की उस जिजीविषा को भी दिखाती हैं जो कितने ही कष्टों, बिखरावों के बाद भी मनुष्य को फिर से *ामीन बनाने के लिए प्रेरित करती है। एक स्त्री के अस्तित्व से जुडी यह *ांदादिली न केवल मानव बल्कि मानव के संपूर्ण जीवन व एक सभ्यता को नए आयाम देती है।
लेखिका ने अपने उपन्यास ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान’ में जिस विषय को उठाया है वह शरणार्थी होने की पीडा को व्यक्त करता है। आ*ाादी के बाद जो विभीषिका हिन्दुस्तान ने दो मुल्कों के रूप में बँटकर झेली उस त्रासदी को व्यक्त करते हुए एक स्त्री की मानसिक दशा का वर्णन करते हुए लेखिका कहती हैं- हाँ, यह भी किस्मत की मारी। इसके परिवार का कोई नहीं बचा। लाशों के ढेर तले जाने कैसे पडी रहती है। बस रात हुई नहीं कि छाती पीट-पीटकर बकारा करने लगती है।
कृष्णा सोबती जी जब शरणार्थी के रूप में भारत आईं तो उन्हें भी शरणार्थी होने के दर्द को झेलना पडा। एक शरणार्थी के रूप में उन पर लोगों का विश्वास न करना, उस पीडा को और बढा देता था जो विस्थापन के कारण लेखिका ने झेली। अपनी जडों से अलग होकर दूसरे देश व समाज में रच बस जाना इतना आसान नहीं होता।
कथा में जुत्शी साहिब द्वारा सोबती को शरणार्थी के रूप में संबोधित किया जाता है। वह शरणार्थियों की नई परिभाषा गढते हुए कहते हैं, आप शरणार्थी होने का फार्म भर देंगी तो राशन मुफ्त मिल जाएगा। ओढने को कम्बल। रजाइयाँ भी। शरणार्थियों के प्रति उस समय का समाज किस प्रकार की मानसिकता व अविश्वास लिए हुए था। एक शरणार्थी की पीडा को केवल एक शरणार्थी ही समझ सकता है। इस कथन व अन्य कई संवादों के जरीये यह स्पष्ट होता है कि लेखिका को जगह-जगह पर बार-बार शरणार्थी शब्द से संबोधित किया गया। जुत्शी साहिब सोबती से कहते हैं कि- शरणार्थी के पास यह कीमती कलम। कहीं से मिली होगी। बार-बार कहे गए ऐसे शब्दों से कृष्णा अपने को हिन्दुस्तान में रहकर अपने को अपमानित महसूस करती हैं लेकिन वह अपने मन को समझाते हुए कहती हैं- हमें अब पुराने नहीं, नए मुल्क का पानी पीना है। पुराना वतन छोडना होगा। नई सरहदों को पार करना होगा। ये सरहदें इंसानों द्वारा ही खींची जाती हैं जब देश के टुकडे कर उसे दो भागों में बाँट दिया जाता है। अपने घर से दूर जाकर शरणार्थी के रूप में नयी पहचान बनाना व अपने लिए नई जमीन खोजना पडता है। ‘पानी भी कहीं ओर का पीना होगा’ यह दर्द अपनी जडों से कटने का दर्द है। प्रत्येक शरणार्थी अपने शहर को हमेशा नए शहर में खोजता है। वह कहता है कि यह शहर मेरे शहर जैसा नहीं है, मेरे शहर में ऐसा नहीं होता, वैसा नहीं होता। कृष्णा सोबती दिल्ली में पीछे छूट चुके लाहौर को ढूँढ रही थीं, जहाँ उन्होंने अपने जीवन के लगभग 2॰ वर्ष गुजारे।
भारत भले ही आ*ााद हो चुका था परन्तु मानसिक रूप से हम अभी भी अपनी स्त्रियों को कुएं का मेढक ही बनाए रखना चाहते थे। कई अन्य संवादों के जरीये लेखिका के पहनावे पर भी अंकुश लगाया जाता है। सोबती की मौसी और सोबती के बीच चले संवाद से यह स्पष्ट होता है कि हमारा देश दो हिस्सों में ही नहीं बँटा बल्कि लोगों के दिलों का भी बँटवारा हो गया।
‘मौसी- तुम क्या मुसलमानी कपडे पहने रहती हो। गरारा कमीज, जहाँ तुम्हारा काम लगा है, उन्हें यह पसंद नहीं आएगा। वह हिन्दू रियासत है। बँटवारे के बाद भला हम क्यों पहनें उनकी पोशाकें।
सोबती- मौसी ये कपडे की लडाई नहीं। रोटी-रोजी, खेती और नौकरियों की लडाई थी।
मौसी- देखो अगली बार यहाँ आओ तो गरारे की जगह सलवार पहनकर आना।
सोबती ने तेवर चढाकर कहा- फिर तो मैं यहाँ कभी न आऊँगी। मैं अपनी मनपसंद पोशाक बदलने से रही। हमारी धार्मिक भेदभाव की नीति की सीमाओं में हमारा रहन-सहन व पहनावा भी आता है और यह अलगाव भारत विभाजन के बाद की परिस्थितियों में और बढ गया। लेखिका लाहौर छोड दिल्ली आ चुकी थी। उन्होंने इस विस्थापन को स्वीकार कर लिया परन्तु *ोह्न में उठते प्रश्नों को रोक न पाती। वे कहती हैं कि पुराने ठिये से उखडना, पुराने लगावों से दूर होना और वतन को पीछे छोडना क्या एक ही बात है? विस्थापन के इस दर्द को अलग-अलग उपन्यासकारों ने अपनी कथा में जगह दी। यशपाल का झूठा-सच विभाजन की त्रासदी को दिखाने वाला बडा ही मार्मिक उपन्यास है। भीष्म साहनी ने अपने उपन्यास तमस में हरनाम सिंह व बन्तो के जरीये इस पीडा को दिखाया है। जब हरनाम सिंह बचपन में साथ खेले दोस्तों द्वारा मुसीबत की घडी में अकेला छोड देने से दुखी होता है। हरनाम सिंह भी अपनी जडों, अपने यार-दोस्तों से अलग होने, अपनी *ांदगी की पूँजी खो देने और उन सब से भी बढकर विस्थापित होने से दुखी है। भीष्म साहनी ने तमस में हरनाम सिंह का जबरन हुए विस्थापन व उससे उपजे सांप्रदायिक दंगों का जिस दर्द के साथ चित्रण किया है वैसा चित्रण कृष्णा सोबती जी अपने उपन्यास में नहीं दिखा पाई।
कृष्णा सोबती ने अपने उपन्यास में विस्थापन के दर्द को नए समाज में बसने की व पुराने समाज को छोडने के दर्द की मानसिक पीडा को दिखाया है। इस विभाजन ने हमें व हमारे समाज को सांप्रदायिकता भरी वह क्रूर मानसिकता दी और सांप्रदायिकता को एक औ*ाार ही बना दिया जिसमें मनुष्य अपनों का ही खून करने से नहीं झिझका। लेखिका कहती हैं- अब तो हम तेज किए हुए चाकू हैं। हम आग का पलीता हैं। हम दुश्मनों को चाक कर देने वाली गरम हिंसा हैं। हम दुल्हनों की बाँहें काट देनेवाले टोके हैं। हम गंडासे हैं। अब हम नहीं हैं, हथियार हैं।
लेखिका विभाजन के इस समय में राजनीति की भूमिका को भी स्वीकार करती हुई कहती हैं, अब बचाने वाले और भूखे कुत्ते एक हो गए हैं, तो पुलिस का खाता कौन खोलेगा। अर्थात् रक्षक व भक्षक एक ही भूमिका में आ गए हैं।
कृष्णा सोबती आ*ाादी के उन प्रश्नों को भी उठाती हैं जिसके लिए हमने आ*ाादी चाही। भारत आ*ााद हुआ था एक सुनहरे कल के लिए, परन्तु विभाजन की त्रासदी व नए भारत में युवाओं के टूटते सपने, चाहे वह रो*ागार, भ्रष्टाचार या देश में गरीबी हटाने का प्रश्न हो, ये प्रश्न आज भी आजादी के 7॰ वर्षों बाद भी प्रासंगिक हैं व जस के तस पडे हुए हैं, तो इन हालातों में आ*ाादी के क्या मायने रह जाते हैं? आज भी समाज को तोडने का कार्य किया जा रहा है। भारत-पाक विभाजन हिन्दू मुस्लिम के बीच अलगाव के कारण हुआ। देश आ*ााद हुआ लेकिन झगडे खत्म नहीं हुए। अशिक्षा, बेरोजगारी, जाति व्यवस्था जैसे पिछडेपन के ये मुद्दे कहीं छुप गए हैं। जाति व्यवस्था को देश में एक ऐसे मुद्दे के रूप में लेखिका देखती हैं जो आ*ाादी के पहले व बाद में भी देखने को मिलता है। वे लिखती हैं- क्या है यह पिछडापन, अशिक्षा। बँटवारा क्यों हुआ। यहाँ बनिया, ब्राह्मण, राजपूत का मसला है- वहाँ हिन्दू-मुसलमान का था। कृष्णा सोबती जाति व्यवस्था को सामने लाती हैं उन्हें उनके तीखे मि*ााज का कारण पूछते हुए पूछा जाता है कि- वह क्या हैं? बनिया या ब्राह्मण? लेखिका अपने स्वभाव व जाति के संबंध को खारिज करती हैं, तथा आधुनिक व आ*ााद भारत के लिए जाति को आवश्यक नहीं मानती तथा कहती हैं- अब आ*ााद देश में यह विभक्तियाँ नहीं चलेंगी।
लेखिका उपन्यास में यह बताने का प्रयास करती है कि आ*ाादी से पूर्व हिन्दू-मुस्लिम अंग्रेजों के खिलाफ लडते रहे और यही आपसी एकता के कारण ही अंग्रेजों को भारत छोडकर जाना पडा, अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो की नीति ने जहाँ न केवल हिन्दू-मुसलमान दंगे करवाए बल्कि आ*ाादी के नाम पर वह हमें बँटवारा दे गए। भीष्म साहनी के उपन्यास तमस में अंग्रेजी अफसर रिचर्ड अपनी पत्नी लीजा से कहता है कि हुकूमत करने वाले यह नहीं देखते कि प्रजा में कौन- सी समानता पाई जाती है। उसकी दिलचस्पी तो यह देखने में होती है कि किन बातों में एक-दूसरे से अलग हैं।

कथा में सोबती जी कहती हैं कि आ*ाादी से पूर्व व बाद में हम हिन्दू-मुसलमान के झगडों में उलझे रहे और आ*ाादी के बाद जाति-व्यवस्था जैसे झगडों में उलझे हुए हैं। आ*ाादी से आखिर देश को क्या मिला? इन प्रश्नों का उत्तर खुशवंत सिंह 1956 में प्रकाशित अपने उपन्यास पाकिस्तान मेल में लिखते हैं कि आ*ाादी के मायने मजदूरों व दलितों के लिए उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं लाए। वे लिखते हैं कि पहले गोरे उन पर राज करते थे। अब काले उन पर शासन करेंगे, उनकी आर्थिक, सामाजिक स्थिति जस की तस ही रहने वाली है। 1956 में खुशवंत सिंह जिन सवालों को खडा करते हैं। 2॰17 में कृष्णा सोबती अपने उपन्यास के जरीये उन्हीं मसलों को उठाती हुई दिखती हैं। आ*ाादी के बाद भी *ामीनी बातें वहीं की वहीं हैं, देश में आज भी विस्थापन की समस्या है। पहले देश के विभाजन की परिस्थितियों से विस्थापन हुआ, आज उद्योगीकरण, बाँध निर्माण के कारण, खनन व अन्य कारणों से आदिवासियों को अपने जल, जंगल, *ामीन को छोड पलायन करना पड रहा है।
विभाजन के कारण विस्थापित होने के बाद भी लोगों का एक विश्वास अब भी नहीं टूटा, वे अब भी अपने धर्म को मानते थे, लोग भले ही तन ढकने के लिए कपडे के अलावा अपने साथ कुछ न लाए हों परन्तु धर्म की पोटली वे अपने मन मस्तिष्क में संजोकर ले आए थे। सोबती की नानी अपने भगवान की मूर्ति किसी दुर्जन के हाथ नहीं लगने की प्रार्थना करती हैं। वे अपना सब-कुछ छोड आई, परन्तु धर्म उन्हें उस मोह को छोडने नहीं देता जिससे मनुष्य की आस्था जुडी है। नानी कहती हैं- हे समुद्र देवता, अपने पोथी-पत्रों और शालिग्राम को पीछे छोड मैं घर से निकल पडी। नदियों के रखवाले सागर देव, मेरे गुनाह माफ करना। कुछ ऐसा करो कि मेरे पवित्र पत्रे और शालिग्राम किसी दुर्जन के हाथ न लगे।

लेखिका उपन्यास में भारतीय स्त्री के भीतर के संस्कारों, धर्म, रीति-रिवाजों को दिखाती है जो जीवन भर के लिए उससे जुड जाते हैं चाहे स्थान बदले या काल, परिस्थितियाँ बदलने पर भी धर्म मनुष्य को अपनी जडों से अलग होने नहीं देता। मेरे गुनाह माफ करना जैसे वाक्य भारतीय संस्कृति में मोक्ष की कामना हेतु प्रयोग में लाए जाते हैं। लेखिका कथा के माध्यम से इतनी सरलता से उन तत्त्वों का उल्लेख करती हुई चलती है जिनकी आधारशिला भारतीय धर्म और यहाँ की संस्कृति है।
लेखिका ने आ*ाादी के बाद बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को भी उपन्यास में जगह दी है, लोगों के महात्मा गाँधी के प्रति बदलते विचार इस ओर इशारा करते हैं कि विभाजन को न रोक पाना गाँधी जी की बहुत बडी भूल थी। समूचा जन मानस उनकी इस भूमिका की आलोचना कर रहा था। लेखिका पात्रों के द्वारा अपने भीतर के रोष को व्यक्त करती हैं। पात्र कस्तूरीलाल कहता है- जिसने मुल्क बँटवा दिया, लाखों बंदों को मरवा दिया, भला उसके दर्शन करने चली हो!
लोगों में बढता महात्मा गाँधी के लिए यह रोष उस समय की सामाजिक व राजनीतिक हकीकत को दिखाता है। गाँधी की मृत्यु के बाद उन्हें लोगों से खोया हुआ प्यार व सम्मान पुनः मिला। उपन्यास में गाँधी की मृत्यु के प्रसंग को उठाते हुए लेखिका यह भी प्रश्न उठाती है कि गाँधी की मृत्यु के लिए जिन पर शक गया वह या तो शरणार्थी थे या मुसलमान अर्थात् देश में अल्पसंख्यकों पर अविश्वास के भाव व उससे जन्मी पीडा को भी जाहिर करती हैं हालाँकि गाँधी को एक हिन्दू ने मारा था। जितना दुख भारतीयों को गाँधी की मृत्यु से हुआ उतना ही दुख पाकिस्तानी आवाम को भी था।
यह उपन्यास न केवल शरणार्थी के रूप में हिन्दुस्तान की नई पृष्ठभूमि सजाती है बल्कि यह लोकतांत्रिक भारत के निर्माण की कथा भी कहती है। कथा में ऐतिहासिक प्रसंगों का भी सहारा लिया गया है। राज्यों के पुनर्गठन की नीति के असर का भी लेखिका उपन्यास में वर्णन करती है।
लेखिका तत्कालीन सरकार व राजनीति को इस विभाजन के लिए जिम्मेदार मानती हैं। अपने वजूद से अलग करने, नई सीमाएँ बनाने व अपने क्षेत्रों से सिमटकर रह जाने जैसी सरकारी नीतियों की बखिया उधेडते हुए वह लिखती हैं- जाती सरकार ने सजा दी हमें और आती सरकार ने हमीं से कर वसूली की।
विभाजन के इस दर्द को हाल ही के वर्षों में हिन्दी सिनेमा ने भी बखूबी उठाया है। बेगमजान, भाग मिल्खा भाग, पिंजर जैसी फिल्में जहाँ लेखिका की कथा से भिन्न हैं वहीं फिल्मांकन और उपन्यास में अंतर दिखता है। बेगमजान फिल्म में प्रशासन व बेगमजान के बीच एक कोठे को लेकर विवाद के सहारे फिल्मकार ने अपनी *ामीन से अलग होने के दर्द व संघर्ष को दिखाया है। भाग मिल्खा भाग में मिल्खा सिंह में विभाजन के कारण पनपे उस मानसिक अवसाद को दिखाने का प्रयास किया है जो पूरी *ांदगी उसे बेचैन किए रहती है। पिंजर उपन्यास अमृता प्रीतम द्वारा लिखा गया है। कृष्णा सोबती और अमृता प्रीतम दोनों ही विभाजन की भोक्ता रही हैं। दोनों के स्वयं अर्जित अनुभवों की झलक उनके उपन्यासों में भली-भाँति देखने को मिलती है। लेखिका ने उपन्यास को संस्मरणात्मक शैली में लिखा है जबकि प्रीतम ने पिंजर में स्त्री की दशा का बडा ही करुण चित्रण किया है। बलात्कार, स्त्रियों की खरीद-फरोख्त, परिवारों द्वारा अपहरण की गई लडकियों को न अपनाना जैसे मुद्दों को अमृता जी ने अपनी रचनाओं में सजीव रूप से प्रस्तुत कर सफलता हासिल की है। कृष्णा सोबती ऐसे मानसिक अवसाद को दिखाती है जो बाह्य न होकर भीतरी अधिक है। यह पीडा भी उस पीडा से कहीं कम नहीं है जो अमृता प्रीतम की स्त्री चरित्रों ने भोगी, परन्तु सोबती जी के उपन्यास में उसका रूप अधिक बीभत्स नहीं दिखता जितना कि अमृता प्रीतम के उपन्यास विशेषकर पिंजर में दिखता है।
कृष्णा सोबती की लेखन शैली की यह विशेषता है कि उनकी कथाएँ मनुष्य को भीतर तक महसूस होती हैं, चूंकि उपन्यास में कहीं सस्पेंस, टर्निंग प्वाइंट या क्लाइमेक्स नहीं आता दिखता परन्तु उपन्यास ऐसे संवेदनशील मुद्दों को लेते हुए चलता है जिसे सहृदय पाठक ही आत्मसात् हो पाता है। कृष्णा सोबती उपन्यास के वातावरण का वर्णन इस प्रकार से करती हैं कि पाठक एक कथन को दूसरे से जोडते-जोडते कहीं और खो जाता है। उनकी लेखन शैली इतनी विस्तृत व प्रगाढ है कि सामान्य पाठक उसमें नए संसार को गढने में कठिनाई महसूस करेगा परन्तु यह लेखक की नहीं बल्कि पाठक के स्तर पर प्रश्न उठाती है।
लेखिका की क्षेत्रीय भाषा, विशेषकर लाहौर की पंजाबी भाषा का प्रयोग उपन्यास में जगह-जगह दिखता है। उनके पहनावे व संस्कृति का असर उनके पात्रों में दिखता है। लेखिका के पात्र सजीव व जीवंत तथा परिवेश में स्वयं रचे बसे दिखते हैं। वहीं इस उपन्यास में अपने अस्तित्व को बनाए रखने व नई पहचान को अपनाने का द्वंद्व भी न*ार आता है। यह उनके संस्मरणात्मक उपन्यास की विशेषता है।

लेखिका ने छोटे-छोटे संवादों का प्रयोग किया है जिससे वातावरण सजीव को उठा है तथा पात्र जो कहना चाहते हैं उसमें यह तीखापन व ता*ागी दिखती है जो उनके अन्य उपन्यासों के पात्रों में भी दिखती है। संवाद छोटे होने के बावजूद अपनी सारगर्भिता लिए हुए हैं। संवाद परिवेश में घट रही घटनाओं का हमारे सम्मुख मूर्त रूप प्रस्तुत करते हैं, जो लेखिका की खूबी है।
इस उपन्यास में लेखिका कृष्णा सोबती ने स्वअर्जित अनुभवों का उल्लेख विभिन्न पात्रों के माध्यम से किया है। विभाजन का दुख व एक शरणार्थी के रूप में भारत आने की पीडा को वह अपने वक्तव्यों के जरीये बखूबी उभारती है। उनके जाने के बाद उनकी कमी हिंदी जगत् को हमेशा ही खलेगी, हालाँकि उनका समृद्ध साहित्य हमें उन्हें भूलने नहीं देगा।