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परिवेश का जीवन्त चित्रण

ललित श्रीमाली
युवा कहानीकार तराना परवीन का पहला कहानी संग्रह है ‘एक सौ आठ’। इसमें ग्यारह कहानियाँ संकलित हैं जो लगभग 1॰9 पृष्ठों में फैली हुई हैं। इन कहानियों में शहरी परिवेश में फैली बेरोजगारी, असमानता और भेदभाव का चित्रण बडी सफलता से किया गया है। अपने परिवेश का जीवन्त चित्रण ही लेखिका की पहचान है। लेखिका अपने परिवेश के प्रति इतनी संवेदनशील है कि जिन लोगों से हम दिन में कई बार मिलते हैं लेकिन उन्हें नोटिस में नहीं लेते, उन्हीं लोगों को इन्होंने पात्र के रूप में चुना है। इसमें एक सौ आठ का ड्राईवर महेश है तो क्ले मॉडल बने कान्ति बा भी है, एक रद्दी वाला और लिफ्ट मैन भी। हमारी इन सभी से मुठभेड हमेशा होती रहती है लेकिन ध्यान इनके जीवन की तरफ नहीं जाता। लेखिका ऐसे पात्रों के जीवन की पडताल का प्रयास करते हुए इनके जीवन के माध्यम से इंसानियत का चित्र खींचने में पूर्णतया सफल हुई है।
संग्रह की प्रतिनिधि कहानी ‘एक सौ आठ’ एक ऐसे एम्बुलेंस ड्राईवर की कहानी है जो अपनी इस नौकरी से उकता गया है, इस मुर्दों की दुनिया से बाहर निकलकर ऑटो चलाकर अपना गुजर-बसर करना चाहता है। वह कहता है, इन मुर्दों में तो मरते ही इंसानियत खत्म हो जाती है, दिन में मेरे साथ चलते हैं और रात को भी साथ नहीं छोडते, नींद में ऐसे डराते हैं जैसे इनको मैंने ही मारा है। रो*ा-रो*ा का लोगों का रोना-धोना, घायलों का चीखना-चिल्लाना- ये गाना अजीब लगने लगा है। रोज वो ही डायलॉग कि अरे मुझे छोड के कहाँ चला गया, मेरा लाल, मेरे मुन्ने का बापू, मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगी। और उसी औरत को एक साल बाद ही दूसरे मरद का बच्चा जनने के लिए अस्पताल ले जाता हूँ। क्या धरा है इस 1॰8 में, बस रोते ही रहो। इससे तो टेम्पो ठीक है। मनपसंद फिल्मी मौज में गाने चलाओ और फर्राटे से दौडाओ, कोई टेंशन नहीं। (पृ. 12) लेकिन जब वही ड्राईवर ऑटो चलाने लगता है तो सप्ताह भर में ही घबरा जाता है। उसे जिन्दा लोगों की दुनिया रास नहीं आती। दिन भर सवारियों की झिक-झिक, झंझट, गुण्डागर्दी, पुलिस की दादागिरी से परेशान हो जाता है। वो सोचता है, मुर्दे तो सिर्फ डराते ही थे, दिन को रात को सपने में आकर रात की नींद ही तो खराब होती थी। ये साले जिन्दा लोग तो नींद ही नहीं लेने देते। मुर्दे चुपचाप पडे रहते थे, धमकाते तो नहीं, चाकूबाजी तो नहीं करते..... लानत है। साले इंसानों पर, सालों ने जीते जी इंसानियत छोड दी। इनसे तो मुर्दे ही अच्छे। (पृ. 16) और अंत में वह ड्राईवर एक घायल महिला को ऑटो में डालकर हॉस्पीटल ले जाकर अपनी इंसानियत को जिन्दा रखता है।
चतुर्थ श्रेणी कहानी के माध्यम से एक प्राइवेट स्कूल द्वारा सफाईकर्मी की भर्ती के विज्ञापन के माध्यम से गरीबों के साथ रचे गए छद्म से परिचित कराया गया है। यह हमारी व्यवस्था की खामी है जिसमें गरीब पिस रहा है और अमीर ज्यादा अमीर होता जा रहा है। सफाईकर्मी की भर्ती के लिए सभी अभ्यर्थी सुनहरे सपने देखते हुए हाडतोड मेहनत करके पूरे विद्यालय को साफ करते हैं और उन सभी को एन.एफ.एस. (नन फाउण्ड स्यूटेबल) घोषित कर दिया जाता है। बेरोजगारी केवल युवकों की ही समस्या नहीं रही है, यह अब बुजुर्गों को भी अपनी जद में ले रही है, इसका जीता-जागता उदाहरण ‘झुर्रियों के दाम’ कहानी के कान्ति बा हैं। वो अपनी झुर्रियों के माध्यम से कमाकर परिवार की माली हालत सुधारना चाहते हैं। इस उम्मीद में अपनी प्रेक्टिस के चक्कर में असामाजिक तो बनते ही हैं साथ ही अपना चेहरा भी भावना और संवेदना में ही बन जाता है और वे एक जीते-जागते मॉडल मैन से क्ले मॉडल में बदल जाते हैं और इसी चक्कर में अपनी जान गँवा बैठते हैं।
वी.जी.आर. (विक्टिम ऑफ गैंग रेप) कहानी लेखिका की प्रगतिशील सोच की परिचायक है। इन्होंने अनछुए विषय को कहानी में ढालकर अपने साहस का परिचय दिया है लेकिन उन्हें कहानी पूरी करने की हडबडी भी है। भारतीय समाज अभी इतना एडवांस नहीं हुआ है जितना कहानी का अंत करते समय उन्होंने बताया है। क्योंकि कहानी के भीतर एक जगह वो कहते हैं ‘‘हमारे देश में तो शादी सिर्फ लडका-लडकी यानी एक्स प्लस वाई (ङ्ग+ङ्घ) में नहीं होती, वह तो (*क्चष्ट ङ्ग+ष्ठश्वस्न ङ्घ) के बीच तय होती है। माँ-बाप, दोस्त, रिश्तेदार सभी को लडकी पसंद आनी चाहिए।’’ (पृ. 46) कहानी के अंत में सुधीर अचानक ही सुनिधि से शादी के लिए तैयार हो जाता है। ‘सबक’ कहानी वास्तव में नन्दू की मम्मी ही नहीं हम सभी के लिए सबक है। हम कुत्ते, गाय, बिल्ली, मछली, चिडियाँ सभी के खाने की व्यवस्था को अपनी जिम्मेदारी समझते हैं लेकिन भूखे और गरीब इंसान से नफरत करते हैं, हम उसे रोटी नहीं देते हैं। ‘राजू शायर’ कहानी के माध्यम से लेखिका ने पर्यटक स्थलों पर काम करने वाले बाल-म*ादूरों के जीवन के यथार्थ से परिचित करवाने का प्रयास किया है। भारतीय समाज में भेदभाव, ऊँच-नीच की जडें कितनी गहरी हैं इसको ‘यह तेरा बक्सा, वह मेरा बक्सा’ में उजागर करने का प्रयास किया गया है। मरने के बाद मोर्चरी के बक्सों में बंद शव भी ऊँच-नीच की ही बातें कर रहे हैं।
डिब्बा बंद कहानी लिफ्टमैन की कहानी है जब हम मॉल में जाते हैं, तो सोचते हैं कि लिफ्टमैन की जिंदगी कितनी अच्छी है। उन्हें कुछ भी नहीं करना पडता लेकिन वास्तविकता कुछ अलग ही होती है जिससे परिचित कराने का प्रयास लेखिका ने किया है। इन कहानियों के माध्यम से तराना परवीन एक युवा और संभावनाशील कहानीकार के रूप में हमारे सामने आती हैं। उन्होंने भारतीय समाज से उन लोगों को कहानियों का माध्यम बनाया जो निम्न मध्यमवर्गीय लोग हैं। ये लेखिका की संवेदनशीलता को दर्शाता है। इस कहानी संग्रह का स्वागत है।