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प्रकाश मनु : आलोकित चिंतन

नितिन सेठी
किसी भी विधा में जब प्रचुर मात्रा में सृजन होता है, तब उसके सृजनात्मक पक्ष के साथ-साथ आलोचनात्मक पक्ष पर भी दृष्टि जाती है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। समालोचना के पाश में सृजन व्यवस्थित और नियमबद्ध रहता है। सृजन-समालोचना के साथ ही एक तीसरा पक्ष भी है, जिसकी महत्ता इन दोनों से कमतर नहीं आँकी जा सकती। वह पक्ष है ऐतिहासिक पक्ष। किसी भी भाषा के साहित्य को सृजन-समालोचना-इतिहास, ये तीनों मिलकर एक ऐसा दर्पण प्रदान करते हैं जिसमें साहित्य अपने वर्तमान सृजन को देखता हुआ, अतीत के इतिहास से साम्य स्थापित करता हुआ, समालोचना की सहायता से उज्ज्वल भविष्य की राहें निर्धारित करता है। विभिन्न भाषाओं के साहित्य समालोचना और इतिहास ग्रंथ इसका ज्वलंत प्रमाण है। हिन्दी भाषा के लिए भी उपरोक्त कथन पूर्णतया सत्य है।
इसी ऋम में आता है हिन्दी भाषा का बाल साहित्य। हिन्दी के बाल साहित्य के इतिहास पर यदि दृष्टि डाली जाए, तो इस दिशा में अनेक सार्थक प्रयास हमें दिखाई देते हैं। सर्वप्रथम निरंकार देव सेवक का ग्रंथ बालगीत साहित्य किताबमहल प्रकाशन से सन् 1966 में प्रकाशित हुआ था। तब से अब तक लगभग पचास से अधिक ग्रंथ इस दिशा में अग्रगामी रहे हैं। हालाँकि इनमें से अधिकांश ग्रंथ किसी एक विधा विशेष को लेकर ही रचे गये हैं। विषय का एकांगी विवेचन इनकी सीमाओं को निर्धारित कर देता है। हिन्दी के बाल साहित्य के लिए यह नितांत गौरव की ही बात मानी जानी चाहिए कि प्रख्यात बाल साहित्यकार प्रकाश मनु द्वारा रचित हिन्दी बाल साहित्य का इतिहास प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से वर्ष 2॰18 में प्रकाशित हो चुका है। प्रकाश मनु हिन्दी साहित्य का एक जाना माना नाम हैं। प्रौढ साहित्य और बाल साहित्य- दोनों में ही आपकी उज्जाग्रत् प्रतिभा का लोहा पाठकों ने माना है। बच्चों के लिए तो आपकी कलम से अनेक सुंदर-सुंदर कहानियाँ, कविताएँ, नाटक, उपन्यास आदि प्रकाशित हो चुके हैं। इसी ऋम में आफ अनेक विचारोत्तेजक लेख भी बाल साहित्य के चिंतन और सृजन को पर्याप्त मात्रा में समृद्ध करते रहे हैं।
प्रकाश मनु ने प्रस्तुत कृति हिन्दी बाल साहित्य का इतिहास लिखने से पूर्व भी एक इतिहास की पुस्तक लिखी है- हिन्दी बाल कविता का इतिहास। वर्ष 2॰॰3 में प्रकाशित यह पुस्तक कुल 387 पृष्ठों में हिन्दी बाल कविता का विस्तृत और व्यापक लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। अपने आप में यह पहला और अनूठा प्रयास ही माना जाता है। उसी अनूठे प्रयास को प्रकाश मनु ने और अधिक शक्ति-भक्ति-युक्ति की त्रिवेणी में डुबकी लगाकर, हिमालय से ऊँचे-उज्ज्वल पवित्र बाल साहित्य को और उसके विस्तृत इतिहास को, सामान्य पाठकों तक ले जाने का सफलतम भगीरथ प्रयास किया है। हिन्दी बाल साहित्य का इतिहास में प्रकाश मनु आठ अध्यायों के अन्तर्गत अपनी इतिहास दृष्टि स्पष्ट करते हैं। बाल साहित्य का काल विभाजन करते समय अनेक बातों को ध्यान में रखना पडता है। प्रकाश मनु हिन्दी बाल साहित्य को कुल तीन कालखंडों में विभाजित करते हैं। प्रारंभिक युग, गौरव युग, विकास युग की विभिन्न विकास धाराओं को विस्तार देते हुए लेखक ने इनकी युगीन विशेषताओं का सविस्तार वर्णन किया है।
बाल कविता की विकास-यात्रा में प्रकाश मनु अनेक बाल कवियों की कविताओं की बानगी प्रस्तुत करते हैं। एक महत्त्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं, हिन्दी बाल कविता की सबसे बडी शक्ति उसकी मौलिकता है और इस लिहाज से वह हिन्दी बाल कहानियों, उपन्यासों तथा बच्चों के लिए लिखे गये विज्ञान लेखन आदि को मीलों पीछे छोड देती है। हिन्दी बाल कविता अपने जन्म के प्रारम्भिक चरण से ही आजाद तबीयत की, स्वच्छंद और आगे की ओर उन्मुख यानी प्रगतिशील मि*ााज की थी, जिसमें भारतीय समाज और जीवन की गाढी छायाएँ शुरू से देखी जा सकती हैं। लगभग चार सौ कवियों की चर्चा, उनके प्रसिद्ध बालगीतों को उदाहरणस्वरूप देना और इन सबका समीक्षात्मक विवेचन करने में प्रकाश मनु ने नितांत सफलता पाई है। बाल कहानी का भी अपना जादू होता है। बच्चों को कहानियाँ सुनना बहुत अच्छा लगता है। कहानी सुनते या पढते समय बच्चे इसके पात्रों में खुद को ढूँढने लगते हैं। तब से अब तक की कहानी में बहुत बदलाव आये हैं। जैकब और विल्हैम ग्रिम बंधुओं ने विश्वभर की लोककथाओं का अनूठा संकलन तैयार किया था। बाल कहानी के स्वरूप और विकास पर प्रकाश मनु खुली दृष्टि से देखते हैं। मनोरंजन, रोचकता, कौतूहल के साथ-साथ ज्ञानवर्द्धन और शैक्षिक उद्देश्य भी कहानी के मूल प्रेरक तत्त्व होते हैं। सौभाग्य की बात है कि हिन्दी बाल कहानी इन सभी तत्त्वों को एक साथ लेकर चलती है। पशु-पक्षियों की कहानियाँ, लोककथाएँ, पौराणिक-सांस्कृतिक कहानियाँ, वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य की कहानियाँ, हिन्दी में अनूदित बाल कहानियाँ, गरीब-कमजोर तबके की कहानियाँ, महिला बाल कथाकारों की कहानियाँ जैसे उपखंड कहानी का इतिहास और विकास जानने-समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। प्रकाश मनु का अध्ययन विस्तृत और व्यापक रहता है। इसी ऋम में बाल कहानियों के संग्रह और महत्त्वपूर्ण सम्पादित ग्रंथ, इन सबकी भी एक विस्तृत विवेचना वे करते हैं। स्वयं प्रकाश मनु बहुत अच्छ कथाकार हैं। प्रौढ साहित्य के साथ-साथ बाल साहित्य पर उनकी सर्जनात्मक और समीक्षात्मक दृष्टि- दोनों का उचित समन्वय और संतुलन यहाँ दिखाई देता है। एक विचार जो प्रकाश मनु इस संदर्भ में अभिव्यक्त करते हैंेे, निश्चयतः उल्लेखनीय है, आज की कहानी में किस्सागोई और भाषा की रवानी तो दादी-नानी की परम्परा वाली हो, पर भाव और संवेदना आधुनिक जीवन और मूल्यों से जुडी हुई। आज बाल साहित्य लेखकों को ही दादी-नानी बनकर लिखना होगा।
कहानी की तरह ही उपन्यास भी कथा साहित्य होता है। इसमें कुछ बडे फलक पर, अधिक पात्रों के साथ कथासूत्र बुने जाते हैं। बाल साहित्य का सौभाग्य रहा है कि उसे अनेक स्वनामधन्य उपन्यास लेखक प्राप्त होते रहे। प्रकाश मनु उपन्यास को कही-अनकही बातों का खजाना कहते हैं। उपन्यास की विकास यात्रा से लेकर आधुनिक युग तक का व्यापक अध्ययन प्रकाश मनु ने किया है। बाल कविता और बाल कहानी की तरह ही बाल उपन्यास का फलक अनेक रंगों से रंगा गया है। कौतूहल, मनोरंजन, फंतासी, कल्पना, वैज्ञानिकता के साथ-साथ प्रेरणा और शैक्षिक मूल्य जैसे तत्त्व यहाँ अपने पूरे प्रभाव के साथ उपस्थित रहे हैं। परम्परागत उपन्यासों के साथ-साथ आधुनिक विज्ञानबोध को भी बाल उपन्यासकारों ने उचित महत्त्व प्रदान किया है। हिन्दी में अनूदित बाल उपन्यासों का विवरण प्रकाश मनु ने बडी ही गंभीरता और सजगता के साथ दिया है। इतिहास दृष्टि को बालक की दृष्टि तक लेकर आना और फिर इन कृतियों की विवेचना करना, मनु जी का मुख्य लेखकीय गुण है। बाल उपन्यासों की इतनी लम्बी सूची को समग्रता के साथ विश्लेषित करना उनकी ही कर्मठ कलम की करामात है।
कहानी, उपन्यास, गीत-कविता पढने की वस्तु है, जबकि नाटक देखने की वस्तु है। सामाजिक रूप से कई व्यक्तियों के साथ ही इसकी रंगमंचीय प्रस्तुति होती है और इसी रूप में यह देखा भी जाता है। बच्चों को तो नाटक और भी अधिक पसंद आते हैं। आचार्य धनंजय अपने ग्रंथ दशरूपक में नाटक को अवस्था की अनुकृति बतलाते हैं- अवस्थानुकृतिनाटकम्। बच्चों को भी किसी बात या घटना की नकल को देखना बडा अच्छा लगता है। प्रकाश मनु बाल नाटकों को भी तीन चरणों- आरम्भिक युग, गौरव युग, विकास युग के अन्तर्गत रखते हैं। यह देखना भी सुखद है कि बडे साहित्यकारों ने भी बाल नाटकों की रचना की है। हास्य-व्यंग्य पर आधारित नाटकों पर भी बाल साहित्यकारों का ध्यान गया है। प्रकाश मनु बाल नाटकों के परिप्रेक्ष्य में लिखते हैं, बाल नाटकों के जरीए बच्चों को नया, खुशहाल समाज बनाने के सपने और नए विचारों को जोडने की बहुत अच्छी और सृजनात्मक कोशिशें भी हुई हैं। इनमें बच्चों की दबी हुई त्रि*एटिव ऊर्जा को खुलकर सामने आने का मौका मिला। बच्चों के साथ खेल-खेल में लिखे गए ऐसे नाटकों का भी चलन बढा, जिनके संवाद बच्चों द्वारा ही लिखे गए और यहाँ तक कि उनका कथानक भी खुद बच्चों ने ही गढा।
आज के वैज्ञानिक युग में ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी साहित्य की आवश्यकता बलवती हो उठी है। केवल परम्परागत बातों और परी-जिन्नों की कथाओं से बच्चों का आज की बदलती दुनिया में सम्यक विकास नहीं हो सकता। दुःख की बात है कि हिन्दी बाल साहित्य में अभी ये तत्त्व पूरी तरह नहीं स्थान प्राप्त कर पाए हैं। प्रकाश मनु अपनी चिंता इन शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं, बच्चों के लिए लिखा गया ज्ञान-विज्ञान साहित्य प्रामाणिक होना चाहिए, दिलचस्प भी और कुछ इस ढंग से लिखा गया हो कि बच्चे के मन में भी नया सोचने और समझने, जानने की इच्छा जाग्रत् हो, ताकि उसकी कल्पना और जिज्ञासा के बंद कपाट खुलने लगें। विदेशी भाषाओं में बच्चों को विज्ञान की जानकारी देने वाली पुस्तकें इतनी खूबसूरत भाषा में और इतने आकर्षक ढंग से छापी जाती हैं कि वे बच्चों को खेल-खिलौनों से कम नहीं लगतीं। ज्ञान-विज्ञान का संसार विविधता भरा संसार है। नदियों की कहानी से फिल्मों तक, आओ बच्चों खेलें खेल, अनोखी फंतासी से जुडी विज्ञान कथाएँ जैसे खंडों में प्रकाश मनु ने बाल साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के समन्वयन को परिलक्षित किया है।
बाल जीवनी के सम्बन्ध में भी प्रकाश मनु जी महत्त्वपूर्ण विवरण देते हैं। भारत के गौरव श्ाृँखला की नौ खंडों में प्रकाशित सीरीज अत्यन्त उपयोगी हैं। बाल साहित्य में कहानी-कविता-नाटक पर तो खूब सृजन मिलता है। परन्तु आत्मकथा, संस्मरण, डायरी, पत्र लेखन, यात्रा-निबंध जैसी विधाओं पर कुछ कम ही काम हुआ है। पहेलियों को भी प्रकाश मनु बाल साहित्य की महत्त्वपूर्ण विधा मानते हैं। ज्ञातत्व है कि पहेलियाँ लोक-काव्य का भी महत्त्वपूर्ण अंग रही हैं। बाल पत्र-पत्रिकाओं की विकास यात्रा को मनु जी हिंदी बाल साहित्य में एक अनिवार्य योगदान मानते हैं। वे लिखते हैं, सच पूछिए तो बाहरी कलेवर में छोटी नजर आती, इन बाल पत्रिकाओं ने बाल साहित्य की सर्वाधिक मूल्यवान थाती को संभाले रखा, जिससे आगे चलकर बाल साहित्य का इतिहास लिखे जाने की नींव पडी।
हिन्दी बाल साहित्य का इतिहास को प्रकाश मनु विधागत रूप में प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक विधा के अन्तर्गत आने वाले प्रमुख ज्ञात-अज्ञात साहित्यकार, उनका सृजन और विशिष्टतायें, यहाँ परिलक्षित की गई हैं। निश्चयतः मनु को अनेक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कठिनाइयों का सामना भी इस दुष्कर कार्य में करना पडा है। उन्हीं की कलम से, सच पूछिए तो हिन्दी बाल साहित्य का इतिहास लिखने में मैं जिस तरह के अनुभवों से गु*ारा, उनके बारे में लिखने बैठूं, तो वह एक अलग ‘इतिहास’ बन जायेगा। इस काम को हाथ में लेने के बाद ही जिस तरह की उपेक्षा और व्यंग्यपूर्ण मुस्कानों का सामना करना पडा, उनके बारे में तो यह कहे बगैर नहीं रह सकता कि वे जरूर हमारे समाज के एक बीमार समाज होते जाने की निशानी हैं, जहाँ बच्च की बात करना या बाल साहित्य की बात करना कहीं न कहीं खुद को हीन साबित कर लेना है। वास्तव में उपरोक्त कथन प्रत्येक बाल साहित्यकार के सृजन-मनन-चिंतन को प्रतिबिम्बित करता है। साहित्य में आज बच्चे नहीं हैं और बच्चों के लिए आज साहित्य नहीं है। विभिन्न वादों-विमर्शों के नाम पर साहित्य को बाँट दिया गया और इसे समाज से, पाठकों से दूर कर दिया गया। बच्चों के नाम पर भी जो कुछ लिखा जा रहा है, उसे भी बाल साहित्य नहीं कहा जा सकता है। अपने इस इतिहास ग्रंथ में मनु केवल अतीत की गौरव गाथा का ही बखान नहीं करते अपितु वर्तमान के सृजन की रूपरेखा भी इसमें निर्धारित करते हैं और बाल साहित्य का भविष्य उज्ज्वल बनाने हेतु कटिबद्ध भी होते हैं। बाल साहित्य की साझी विरासत को बच्चों से लेकर बडों तक पहुँचाने में प्रकाश मनु का योगदान कमतर नहीं आँका जा सकता।
एक कमी अवश्य यहाँ खलती है। प्रकाश मनु स्वयं भी बहुत सजग-सफल समीक्षक रहे हैं। अपने इतिहास ग्रंथ में उन्होंने हिंदी बाल साहित्य की समीक्षा-आलोचना वाला हिस्सा छोड दिया है, जबकि आज इस दिशा में भी पर्याप्त काम हो चुका है । आशा है कि इस भाग पर भी मनु कुछ लिखने का मन बनाएंगे। प्रकाश मनु के ‘हिन्दी बाल साहित्य का इतिहास’ ग्रंथ की उपादेयता इसलिए भी कुछ विशिष्ट है कि इसमें बच्चों की दृष्टि को सामने रखकर विभिन्न विधाओं की कृतियों को इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखा गया है। बाल साहित्य का सबसे बडा समीक्षक-आलोचक तो बच्चे का कोमल हृदय और निर्मल मन ही होता है। दीपक देहरी न्याय से प्रकाश मनु ने जहाँ अपने अंतर के बाल साहित्यकार को एक नवीन ऊर्जा दी है, वहीं बाहरी बाल साहित्य के संसार को भी अपनी रोशनाई से नव्यालोक प्रदान किया है। बाल साहित्य और बालमन दोनों ही, प्रकाश मनु की सतरंगी दिव्य चमक से प्रकाशित हो उठे हैं।