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मीराजी

शीन काफ़ निज़ाम

मीराजी- मुहम्मद सना उल्लाह सानी-डार (१९१२-१९४९) उर्दू के उन शाइरों में थे जो अपना रिश्ता आर्यव्रत से जोडते थे। उन का कहना था कि मेरे पूर्व पूर्वज आर्य नस्ल के थे। उन्हीं की प्रतिमा, प्रकृति और स्मृति मुझ तक पहुँची है। ब*ाीर आगा इसीलिए उन की शाइरी को धरती पूजा की मिसाल बताते हैं। कुछ भी, यहाँ तक कि अपने हस्ताक्षर से भी पहले ॐ लिखते थे।

एक बंगाली लडकी मीरासेन से एकतरफा प्यार करने लगे थे। उसे परिवारजन मीराजी कहते थे। इसलिए उन्होंने भी अपना उपनाम मीराजी लिखना प्रारम्भ कर दिया और और इसी नाम से प्रसिद्ध हुए।

यह *ामाना प्रगतिशील आन्दोलन की उठान-उडान का था। जिस के न*ादीक साहित्य समाज और सियासत से इबारत था। इसलिए साहित्य को सांस्कृतिक सरोकार और स्व की तलाश में रहने वाले मीराजी को प्रतिक्रयावादी ही कहा जा सकता था। यही मामला नून.मीम.राशिद के साथ था। मीराजी की मृत्यु के बहुत बाद में सरदार जाफरी आदि ने नई न*म ही नहीं बल्कि न*म में उनके योगदान और महत्त्व को समझा-सराहा।

मीराजी ही ने सब से पहले छन्द पर आहंग को तर्जीह दी। न*म का ड्राफ्ट ही उस का क्राफ्ट है। इसलिए न*म एक सजग पाठक की प्रतीक्षा करती है। नून.मीम.राशिद जहाँ छन्द को अपने ड्राफ्ट में बनाये रखने के पक्षघर हैं मीराजी वहाँ आहंग से अर्थ ही अनुभूति कराते हैं। शब्दों के चयन में वे उनके संस्कार को प्राथमिकता देते हैं। मीराजी ने अपने समकालीन शाइरों की न*मों को खोलने में जिल *ाहानत का सबूत दिया है, वह अपने में एक मिसाल है।

सृजन, संपादन और विवेचन के अलावा मीराजी ने प्राच्य और पाश्चात्य कवियों की कविताओं का उर्दू में अनुवाद भी किया जो मशरिको-मगरिब के नग्मे नाम से प्रकाशित हुआ। पाश्चात्य कवियों में उन्हें बॉदलेयर बहुत प्रिय थे। डिफीट ऑफ दी बॉदलेयर नामक पुस्तक मृत्यु-शैया पर भी उन के पास थी। उर्दू पाठकों को बंगाली के चण्डीदास, मैथिली के विद्यापति और अमारो का प्रामाणिक परिचय सब से पहले मीराजी ही से प्राप्त हुआ।

फिराक साहिब पर लिखते हुए स्व. प्रो.रसीद अहमद सिद्दिकी ने लिखा था फिराक के *ाहन और *ाौक को समझने के लिए हम को उन रास्तों से किसी कदर हट कर सोचना पडेगा जो हम ने अभी तक इख्तियार कर रखे हैं। ठीक यही बात मीराजी के बारे में भी कही जा सकती है। हट कर सोचना-करना जान जोखम का काम है। इसलिए मीराजी पहचाने तो गये, उस तरह स्वीकार नहीं किये गये। हमीद नसीम के शब्दों में इसका कारण यह है कि मीराजी की हिन्दी पौराणिक संदर्भों वाली काव्य-शैली उर्दू बोलने वाली बहुसंख्या के ईथॉस से मेल नहीं खाती। मेल खाये न खाये आज की उर्दू न*म पर, मीराजी का जो प्रभाव है वह इस बात का प्रमाण है कि रवैये को रुज्हान और रुज्हान को रिवायत बनने में सौ साल तो लग ही जाते हैं।



ये सरगोशियां1 कह रही हैं अब आओ कि बरसों से तुम को

बुलाते-बुलाते मिरे दिल पे गहरी थकन छा रही है

कहीं एक पल को, कभी एक अर्सा सदायें सुनी हैं,

मगर ये अनोखी सदा आ रही है

बुलाते-बुलाते तो कोई न अब तक थका है

न आइन्दा शायद थकेगा

मिरे प्यारे बच्चे ‘मुझे तुम से मुहब्बत है, देखो अगर यूं किया तो बुरा मुझ से

बढ कर न कोई भी होगा’ खुदा या खुदा या!



कभी एक सिसकी, कभी इक तबस्सुम2, कभी सिर्फ त्यौरी

मगर ये सदायें तो आती रही हैं

इन्हीं से हयाते-दोरा*ाा3 अबद से मिली है

मगर ये अनोखी सदा जिस पे गहरी थकन छा रही है

ये हर इक सदा को मिटाने की धमकी दिये जा रही है



अब आँखों में जुंबिश, न चेहरे पे कोई तबस्सुम, न त्यौरी

फकत कान सुनते चले जा रहे हैं

ये इक गुल्सितां है, हवा लहलहाती है, कलियाँ चटकती हैं, गुंचे महकते हैं

और फूल खिलते हैं, खिल-खिल के मुर्झा के गिरते हैं, इक फर्शे-मखमल

बनाते हैं जिस पे मिरी आर*ाुओं की परियाँ अजब आन से यूं रवां हैं

कि जैसे गुलिस्तां भी इक आईना है

इसी आईने में हरिक शक्ल निखरी, सँवर कर मिटी और मिट ही गयी फिर न उभरी

ये परबत है खामोश, साकिन

कभी कोई चश्मा उबलते हुए पूछता है कि इस की चट्टानों के उस पार क्या है

मगर मुझ को परबत का दामन ही काफी है....दामन में वादी है

वादी में नद्दी है, नद्दी में बहती हुई नाव ही आईना है

इसी आईने में हरिक शक्ल निखरी, मगर एक पल में जो मिटने लगी है

तो वो फिर न उभरी

ये सह्रा है..... फैला हुआ खुश्क, बेबर्ग सह्रा4

बगोले यहाँ तुंद भूतों का अक्से-मुजस्सम5 बने हैं

मगर मैं तो दूर.... एक पेडों के झुरमुट पे अपनी निगाहें जमाये हुए हूँ

न अब कोई सह्रा, न परबत, न कोई गुलिस्तां

अब आँखों में जुंबिश, न चेह्रे पे कोई तबस्सुम, न त्यौरी

फकत इक अनोखी सदा कह रही है कि तुम को बुलाते-बुलाते मिरे दिल पे

गहरी थकन छा रही है



बुलाते-बुलाते तो कोई न अब तक थका है, न शायद थकेगा

तो फिर ये निदा आईना है.... फकत मैं थका हूँ किसी को बुलाते-बुलाते



न सहरा न परबत, न कोई गुलिस्तां, फकत अब समन्दर बुलाता है मुझको

कि हर शय समन्दर से आई, समन्दर में जा कर मिलेगी

































1. कानाफूंसी 2. हल्की हँसी

3. दो दिन का जीवन 4. बिना पत्ती का

5. मूर्त-प्रतिबिम्ब



यगानिगत1



*ामाने में कोई बुराई नहीं है

फकत इक तसल्सुल2 का झूला रवां है

ये मैं कह रहा ह ः

मैं कोई बुराई नहीं हूँ, *ामाना नहीं हूं, तसल्सुल का झूला नहीं हूँ

मुझे क्या खबर क्या बुराई में है, क्या *ामाने में है और फिर मैं तो ये भी कहूँगा

कि जो शै3 अकेली रहे उस की मं*ाल फना ही फना4 है

बुराई, भलाई, *ामाना, तसल्सुल....ये बातें बका5 के घराने से आई हुई हैं

मुझे तो किसी भी घराने से कोई तआलुक नहीं है



मैं हूँ एक, और मैं अकेला हूँ, इक अजनबी हूँ

ये बस्ती, ये जंगल, ये बहते हुए रास्ते और दरिया

ये परबत, अचानक निगाहों में आई हुई कोई ऊँची इमारत

ये उजडे हुए मक्बरे, और ये मर्गे-मुसल्सल6 की सूरत मुजाविर7

ये हँसते हुए नन्हे बच्चे, ये गाडी से टकरा के मरता हुआ एक अंधा मुसाफिर

हवाएँ, निबातात8 और आस्मां पर इधर से उधर आते-जाते हुए चंद बादल

ये क्या है?

यही तो *ामाना है, ये इक तसल्सुल9 का झूला रवां है

ये मैं कह रहा हूँ

ये बस्ती, ये जंगल, ये रस्ते, ये दरिया, ये परबत, इमारत, मुजाविर, मुसाफिर

हवाएं, निबातात और आस्मां पर इधर से उधर आते जाते हुए चंद बादल

ये सब कुछ, ये हर शै मिरे ही घराने से आई हुई है



*ामाना हूँ मैं, मेरे ही दम से अनमिट तसल्सुल का झूला रवां है

मगर मुझ में कोई बुराई नहीं है

ये कैसे कहूँ मैं

कि मुझ में फना और बका दोनों आकर मिले हैं







1. अकेलापन, 2. निरन्तरता, 3. वस्तु, 4. नश्वरता, 5. अमरत्व,

6. निरन्तर मृत्यु, 7. समाधि-सेवक 8. वनस्पति, 9. निरन्तरता,

1॰. प्रतिवेशी



अंजाम

मुझे गिरिया1 सुनाई दे रहा है

बहुत ही दूर से आती हुई आवा*ा है जैसे

कभी लह्रों में घुल जाए, कभी आगे निकल आए

ये इस सूने समय में किस ने गहरा कर दिया दिल की उदासी को?

नहीं, ये अक्स कब है, दूर की इक बात है....



ये गिरिया तो नहीं है, एक लम्हा है

कि जैसे सुबह का सूरज शफक2 में जा के खो जाए

अगर सूरज शफक में जा के खो जाए तो क्या फिर रात भी

मनमोहिनी होगी?

सितारे तो मगर जिन दूरियों से झिलमिलाते हैं

उदासी को बढाते हैं

शबे-तारीक तो बस जगमगाते चाँद ही से कुछ निखरती है



कहाँ है चाँद? अँधेरी रात, मुझ को

अँधेरी रात में गिरिया सुनाई दे रहा है

ये गिरिया तो नहीं है, एक मामूली सदा है, वक्त के आगोश

में खोया हुआ लम्हा

*ामाना एक बेपायां3 समन्दर है

और उस में किस कदर बेकार आँसू हैं

और उस में साहिले-अफ्सुर्दा4 की कुछ सिसकियाँ हैं

मैं सब कुछ देखता हूँ और फिर हँसता हूँ, रोता हूँ

ये वो लह्रें बढी जाती हैं, उस खोये हुए लम्हे से

टकराती हैं और फिर लौट जाती हैं

कि जैसे एक हिचकी आये और फिर साँस रुक जाये....

मैं क्यूं खोया हुआ हूँ रात की गहरी उदासी में?



मुझे गिरिया सुनाई दे रहा है

यही जी चाहता है पास जा कर भी उसे सुन लूँ

मगर डर है जब उस के पास पहुँचा मैं तो गिरिया खत्म होगा एक गहरी खामुशी होगी







1. आँसू, 2. सवेरे या सायंकाल की क्षितिज पर होने वाली लालिमा 3. तटहीन सागर 4. उदास किनारा



तन्हाई

फ*ाा में सुकूं है

अलमनाक1, गहरा, घना, एक इक शै को घेरे हुए, एक

इक शै को अफ्सुर्दगी2 से मिटाता हुआ बेअमां3

बेमहल, नूर से दूर, फैली फ*ाा में सुकूं है

उजाले की हर इक किरन जैसे ठिठकी हुई है

अँधेरे से बढ कर अँधेरा

लचकती हुई टहनियों की घनी पत्तियों में हवा सरसराने लगी है

हवा सरसराने लगी है

हवा किसलिए सरसराने लगी है

कहीं दूर.... गोले-बयाबां4 की, दिल को मसलती हुई चीख जागी

कहीं दूर गोले-बयाबां...

कहीं दूर....

कहीं दूर क्या है?.... सुकूं है

कहीं दूर कुछ भी नहीं है, सुकूं है

कहीं दूर कुछ भी नहीं है

कहीं दूर कुछ भी नहीं है?

कहीं दूर कुछ भी नहीं है तो फिर कैसे गोले-बयाबां की, दिल को

मसलती हुई चीख जागी

फसुर्दा5-सी कुछ हड्डियाँ हैं, फसुर्दा-सी खाकस्तरे-बे*ाबां6 है

फसुर्दा से कंकर, फसुर्दा फ*ाा में सुकूं है

यहाँ कोई गोले-बयाबां नहीं है

लचकती हुई टहनियों की घनी पत्तियों में घना और गहरा सुकूं है

कहीं दूर....

कहीं दूर गोले-बयाबां....

कहीं दूर गोले-बयाबां की दिल को मसलती हुई चीख जागी

‘ये कैसा फुसूं है?’

‘सुकूं है?’ ‘सुकूं है?’

सुकूं दूर हो जाए, हंगामा पैदा हो, हंगामा शोरे-मुजस्सम7 बने

सामने आये, पल में सुकूं दूर हो जाये लेकिन

मिरे दिल के गहरे सुकूं में हवा सरसराने लगी है





1. दुख बढाने वाला, 2. उदासी, 3. अशान्त, 4. घना गहरा जंगल,

5.मलिन, 6. बे*ाबान राख, 6. मूर्त रूप में शोर

यानी....



मैं सोचता हूँ इक न*म लिखूं

लेकिन उस में क्या बात कहूँ

इक बात में भी सौ बातें हैं

कहीं जीतें हैं, कहीं मातें हैं

दिल कहता है मैं सुनता हूँ

मन माने फूल यूं चुनता हूँ

जब मात हो मुझ को चुप न रहूँ

और जीत जो हो दर्रा1 न कहूँ

पल के पल में इक न*म लिखूं

लेकिन उस में क्या बात कहूँ

जब यूं उलझन बढ जाती है

तब ध्यान की देवी आती है

अक्सर तो वो चुप ही रहती है

कहती है तो इतना कहती है

क्यूं सोचते हो इक न*म लिखो

क्यूं अपने दिल की बात कहो

बेहतर तो यही है चुप ही रहो

लेकिन फिर सोच ये आती है

जब नद्दी बहती जाती है

और अपनी अनंत कहानी में

यूं बेध्यानी में, रवानी में

माना हर मोड पे मुडती है

पर जी की कह के गु*ारती है

सर पर आई सह जाती है

और मन आई कह जाती है

धरती के सीने पे चढती है

और आगे ही आगे बढती है

यूं मैं भी दिल की बात कहूँ

जी में आये तो न*म लिखूं

चाहे इक बात में सौ बातें

जीतें ले आयें या मातें

चाहे कोई बात बने न बने

चाहे सुख हों या दुख अपने

1. स*ाा देना

जातरी



एक आया गया दूसरा आयेगा देर से देखता हूँ यूं ही रात इस की गु*ार जायेगी मैं खडा हूँ यहाँ किसलिए मुझ को क्या काम है याद आता नहीं याद भी टिमटिमाता हुआ इक दिया बन गई जिस की रुकती हुई और झिझकती हुई हर किरन बेसदा कहकहा है मगर मेरे कानों ने कैसे उसे सुन लिया। एक आँधी चली, चल के मिट भी गई आज तक मेरे कानों में मौजूद है सांय-सांय मचलती हुई और उबलती हुई फैलती-फैलती.... देर से मैं खडा हूँ यहाँ एक आया गया दूसरा आयेगा रात उस की गु*ार जायेगी एक हंगामा बरपा है देखें जिधर, आ रहे हैं कई लोग चलते हुए और टहलते हुए और रुकते हुए फिर से बढते हुए और लपकते हुए आ रहे जा रहे हैं इधर से उधर और उधर से इधर जैसे दिल में मिरे ध्यान की लह्र से एक तूफान है वेसे आँखें मिरी देखती ही चली जा रही हैं कि इक टिमटिमाते दिये की किरन *ान्दगी को फिसलते हुए और गिरते हुए ढब से *ााहिर किये जा रही है मुझे ध्यान आता है अब तीरगी इक उजाला बनी है मगर इस उजाले से रिसती चली जा रही हैं वो अमृत की बूँदें जिन्हें मैं हथेली पे अपने संभाले रहा हूँ हथेली मगर टिमटिमाता हुआ इक दिया बन गई है लपक से उजाला हुआ लौ गिरी फिर अँधेरा-सा छाने लगा बैठता बैठता बैठ कर एक ही पल में उठता हुआ जैसे आँधी के तीखे थपेडों से दरवा*ो के ताक खुलते रहें बंद होते रहें फडफडाते हुए ताइरे-*ाख्मखुर्दा1 की मानिंद मैं देखता ही रहा एक आया गया दूसरा आयेगा सोच आई मुझे पाँव बढने से इंकार करते गये मैं खडा ही रहा दिल में इक बूँद ने ये कहा रात यूं ही गु*ार जायेगी दिल की इक बूँद को आँख में ले के मैं देखता ही रहा फडफडाते हुए ताइरे-*ाख्मखुर्दा की मानिंद दरवा*ो के ताक एक बार जब मिल गये मुझ को आहिस्ता आहिस्ता अह्सास होने लगा अब ये *ाख्मी परिंदा न तडपेगा लेकिन मेरे दिल को हर वक्त तडपायेगा मैं हथेली पे अपनी संभाले रहूँगा वो अमृत की बूँदें जिन्हें आँख से मेरी रिसना था लेकिन मिरी *ान्दगी टिमटिमाता हुआ इक दिया बन गई जिस की रुकती हुई और झिझकती हुई हर किरन बेसदा कहकहा है कि इस तीरगी में कोई बात ऐसी नहीं जिस को पहले अँधेरे में देखा हो मैंने सफर ये उजाले अँधेरे का चलता रहा है तो चलता रहेगा यही रस्म है राह की एक आया गया दूसरा आयेगा रात ऐसे गु*ार जायेगी टिमटिमाते सितारे बताते थे रस्ते की नद्दी बही जा रही है बहे जा इस उलझन से ऐसे निकल जा कोई सीधा मं*ाल पे जाता था लेकिन कई काफिले भूल जाते थे अंजुम के दौर यगान2 के मुबहिम3 इशारे मगर वो भी चलते हुए और बढते हुए शाम से पहले ही देख लेते थे मक्सूद का बंद दरवा*ाा खुलने लगा है मगर मैं खडा हूँ यहाँ मुझ को क्या काम है मेरा दरवाजा खुलता नहीं है मुझे फैले सह्रा की सोई हुई रेग का जर्रा *ार्रा यही कह रहा है कि ऐसे खराबे में सूखी हथेली है इक ऐसा तलवा कि जिस को किसी खार की नोक चुभने पे भी कह नहीं सकती मुझ को कोई बूँद अपने लहू की पिला दो मगर मैं खडा हूँ यहाँ किसलिये काम कोई नहीं है तो मैं भी इन आते हुए और जाते हुए एक दो तीन....लाखों बगोलों में मिल कर यूं ही चलते चलते कहीं डूब जाता कि जैसे यहाँ बहती लह्रों में कश्ती हर इक मौज को थाम लेती है अपनी हथेली के फैले कंवल में मुझे ध्यान आता नहीं है कि इस राह में तो हर इक जाने वाले के बस में है मंजिल में चल दूं चलूँ आईये आईये आप क्यूं इस जगह ऐसे चुपचाप तन्हा खडे हैं अगर आप कहिये तो हम इक अछूती से टहनी से दो फूल बस बस मुझे इस की कोई जरूरत नहीं है मैं इक दोस्त का रास्ता देखता हूँ मगर वो चला ही गया है मुझे फिर भी तस्कीन आती नहीं है कि मैं एक सह्रा का बाशिंदा मालूम होने लगा हूँ खुद अपनी नज़र में मुझे अब कोई बंद दरवा*ाा खुलता न*ार आये ये बात मुम्किन नहीं है मैं इक और आंधी का मुश्ताक हूँ जो मुझे अपने पर्दे में यकसर छुपा ले मुझे अब ये महसूस होने लगा है सुहाना समां जितना बस में था मेरे वो सब एक बहता सा झोंका नया है जिसे हाथ मेरे नहीं रोक सकते कि मेरी हथेली में अमृत की बूंदें तो बाकी नहीं हैं फकत एक फैला हुआ खुश्क बेबर्ग4 सह्रा है जिस में ये मुम्किन नहीं मैं क्यूं.... एक आया गया दूसरा आयेगा रात मेरी गुजर जायेगी।