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चार कविताएँ

नीतेश व्यास
मार्कण्डेय
क्या तुम हुए थे
व्याकुल
जब प्रलयावर्तक प्रचण्ड
सप्त आदित्यों ने
शोष लिया था जल समग्र पृथिवी का
और
घनघोर मेघमाला ने
लील लिया था
पृथिवी को

हे मृकण्ड सुन !
तुम एकाकी तैर रहे थे
एकार्णव में
क्या हुआ था तुम्हें भय?

तुमने देखा वृक्ष
महावट का
जिसकी चौडी भुजा तुल्य
शाखा पर
था सुन्दर पलंग
लेटा था, उस पर
श्रीवत्सांकित,
अलसी के फूलों की भाँति श्यामवर्ण
बालक
लीलामानुषविग्रह बन
तब त्रिकालज्ञता खो गयी थी
तुम्हारी
शायद कहीं
तुम्हें आश्चर्य था
कि भय
या थकावट

अनायास ही तुम
प्रविष्ट हुए थे
उस बाल के मुख विवर में

भीतर तुमने देखी
वही सृष्टि
समग्र
तुम भीतर ही थे
‘भी’ से ‘तर’ गये थे तुम

जो भी’तर हो गया
वह मुक्त हो गया
भय से
स्वयं से
समय से

आदि-अनादि
कौन कहता है प्रलय होता है मन्वन्तरान्त में
कहता हूँ मैं
वह हो रहा इसी क्षण में
पूरक श्वास ही तो है आरम्भ सृष्टि का
रेचक श्वास में घटित प्रलय प्रतिपल
कुम्भक ही है सकल सृष्टि विस्तार निरन्तर
जिया है जीवन ने कितने ही प्रलयों को
कितने ही मन्वन्तर मैंने काटे हैं
पर जो मनु है वह तो उत् आसीन है
हिमगिरि के उतुंग शिखर पर
नहीं व्यापता प्रलय वहाँ नहीं सृष्टि है
बिन्दु चरम वह, वहीं सनातन दृष्टि है
वाणी-मन-बुद्धि हाँप गये
प्राणों के अन्तर काँप गये
वो हाँप गये
और हाँप के जब वह कुछ पल को
अन्दर ठहरे
भीतर और भी उतरे गहरे
तो गह्वर में उस अक्षर के
देखे प्रकाश उर अन्तर के
वो मनु जो दिखता था उतुंग
वो जन्मों से था मेरे संग
और था मुझमें
मुझ से भी निकट
उस नित असंग के
संग में रहकर
होकर विस्मित देखा
नहीं थी सृष्टि नहीं था प्रलय
बस एक सनातन लय

कितने रंग बिखेरे तुमने

कितने रंग बिखेरे तुमने
रूप के
कविताओं में अपनी
दूर छाँव में बैठ के
धूप पे कविताएँ लिखने
का अजब यह
हुनर है पाया
तुमने कहाँ से?

वह मर गया

वह ‘मर गया’
जब ये सुना तो नहीं हुआ कोई अचरज
क्या वो *ान्दा था?

गन्ध बचपन की नहीं रही उसकी मिट्टी में
क्या पिया था उसने यौवन का रस कभी
स्वयं के स्पर्श से शून्य थी उसकी त्वचा
हवा के कब था उसका रिश्ता
क्या सूर्य के तेज में
कभी दिखा था उसे स्वयं का चेहरा
शब्द तो कई सुने
पर आकाश का शब्द
नहीं घुला था उसके कानों में
सूख गयी थी उसकी तरलता
फिर भी कहना कि वो मर गया
‘क्या मैं *ान्दा हूँ?’


अन्धेरा था

अन्धेरा था
और उन्हें
बाँटे जा रहे थे शरीर
आगे की यात्राओं हेतु
उनमें से
किसी ने
चुरा ली मेरी देह