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पाँच कविताएँ

प्रभात
इस संसार में

फूलों का समय ही
सबसे सुंदर समय है
सरसों के जीवन में

आगे तो पकने और
तेल निकलने का समय है

तेल कीमती है
फिर भी तितली
फूल को ही चाहती है

सरसों के फूल की तो
कोई कीमत नहीं संसार में

पागल
तीन पागल एक खण्डहर में
खाना बना रहे थे

एक को घर की सत्ता ने पागल किया था
दूसरे को गाँव की सत्ता ने
तीसरे को देश की सत्ता ने

सत्ताओं के दमन से कुचले हुए सिर लिए
तीनों पागल
खण्डहर की शांति को सराह रहे थे
जो कि एक सराहने योग्य बात थी
वे अपने खाना बनाने के कर्म को सराह रहे थे
जो कि एक सराहने योग्य बात थी
वे मिलजुल कर रहने खाने को सराह रहे थे
जो कि एक सराहने योग्य बात थी

ऐसी शांति
कर्म का ऐसा सुख
जीवन में ऐसा सौहार्द्र
किसी सत्ताधीश के पास नहीं था

सभी सत्ताधीशों का जीवन
इसी गिनती में जाया हो रहा था कि
उनके पास कितने आधुनिक हथियार हैं
वे कितनी दूरी तक
कितनी संख्या में लोगों को मार सकते हैं
उन्होंने सभी चुनौतियों को मिटाते हुए
कितनी जमीनों पर कब्जा कर लिया है
उन्होंने एक रात के खाने रहने और पीने पर
कितना धन बहाने की क्षमता हासिल कर ली है

पागल चिडियों की आवा*ा निकालते थे
सितारों के नीचे बहती हवाओं में डोलते थे
बारिशों में नग्न खडे हो जाते थे पृथ्वी पर
उन्हें परमवीर चक्र की जरूरत नहीं थी
उन्होंने आसमानी विमानों की निरर्थकता भाँप ली थी
वे घास फूलों की तरह शाश्वत थे
अमर होने की कामना का वे क्या करते ?

मूर्ति
केशों को कंधों पर फैलाए
धूप में स्तन उघाडे क्यों बैठी है
सामने के नीम में बैठे पक्षियों को देखती
क्या देखती है उनमें कि वे उड सकते हैं
या यह कि कैसे बने हैं जोडे उनके
कि कैसे एक तोता दूसरे तोते को नहीं पीटता
एक चिडिया दूसरी चिडिया का घोंसला नष्ट नहीं करती
एक गिलहरी किसी के भी हिस्से की मूँगफली
नहीं खाती
कि लूटपाट छीना-झपटी सब मनुष्यों में ही क्यों है?

सामने के पशुबाडे पर क्यों लगा रखी है टकटकी
क्या देखती है उनमें
कि कैसी भी कमी क्यों न आए चारे की
एक बैल बछडे को सींग मारकर
बाडे से बाहर नहीं करता
एक भैंस अपनी बेटी भैंस को किसी को नहीं बेचती
एक भेडा किसी बकरी के साथ मुँह काला नहीं करता
एक ऊँट दूसरे ऊँट का गला नहीं रेतता
कि हिंसा, क्रूरता, जघन्यताएँ सब मनुष्यों में ही क्यों हैं?

क्या देखती है विलीन कर लेने वाले आकाश में
किसने काला किया है गोरा मुख तेरा
मुँह काला किया है किसने तुझसे
रात भर लटकाए रखा है खूँटी से मुँह में चिथडे भरकर
सोने की बाली के प्रलोभन को मारी है तूने ठोकर

क्या सोचती है सामने के पहाड पर देवी का मंदिर देखकर
पत्थरों में बदला जाता रहा है स्त्रियों को
उनसे यौवन छीनकर
मंदिर बनाए जाते रहे हैं उनके
पूजा जाता रहा है उन्हें सती कहकर
झुण्ड के झुण्ड लोग निकलते हैं सडकों पर
यही करने के लिए साफे बाँधकर नंगी तलवार लेकर

होती करती बात को क्यों इतना तूल देती है
किसलिए खामोश बैठी है
बोलेगी नहीं, सुनेगी नहीं
कहना नहीं मानेगी, काम नहीं करेगी
कोई तुझसे भी बोलेगा नहीं, तेरी सुनेगा नहीं
वह चरवाहा भी कहना नहीं मानेगा तेरा
जिसने किया है तेरा संदेश पहुँचाने का काम

सितारों भरी रातें आईं और गईं
फुहारों भरी बारिशें आईं और गईं
कोहरे भरे दिन आए और गए
रेत भरी आँधियाँ आईं और गईं

अटारी खण्डहर में बदल गई
लाल लँहगे वाली युवती
मूर्ति में बदल गई
कोई नाक तोड जाता है मूर्ति की
कोई कान मरोड जाता है
कोई गाल भींच जाता है
कोई टखना तोड देता है
कोई ऐडी
कोई फोटो खींचता है
कोई लिखता है डायरी

खण्डहर के सन्नाटे में
जब तब गूँजती है हवाएँ
केशों को कंधों पर फैलाए
धूप में स्तन उघाडे क्यों बैठी है
कब से हाथ बढा रहा हूँ मैं
चलकर आती क्यों नहीं है?

आत्महत्या

धडधडाती रेलों के पहियों तले
बिछ जाने की वजहें समाप्त नहीं होंगी मगर
मैंने ये समझने की कोशिश की
रेलें यात्रा के लिए हैं
चार हाथ की रस्सी चारा बाँधने के लिए है
दुर्भिक्ष तो सरोवर पर भी है
वह भी प्रतीक्षा करता है धीरे-धीरे सिमटने की

भूखों, निर्दोष कैदियों और स्त्रियों से
जीने की तालीम लेनी चाहिए
साँस की तरह चल रही हों
मरने की वजहें शरीर में, तो
पागलपन का आश्रय लेना चाहिए

पागलों में होती है यह बुद्धिमत्ता
खाना कपडा रहना न मिले
सारा जगत् ही उपेक्षा करे
तब भी जीवन तो है
उसे बचाया जाना चाहिए
जीवन को बचाने की योजना तो वह योजना है
जो बडे-बडे कार्पोरेट घरानों और बहुमत से बनी
बुद्धिजीवियों से भरी सरकारों के पास भी नहीं है
आओ जरूरी दर्द
आओ जरूरी दर्द
मेरे सिर में रहो
इतनी रात गए
किसके पास जाओगे

जिनके पास जा सकते थे
लोग वे अधिक खाकर अलसा गए हैं
गिर गए हैं मुलायम बिस्तरों पर अधिक पीकर

बुरी खबरो
लोगों ने एसी ऑन कर परदे लगा लिए हैं
यहीं बैठ जाओ मेरी टेबिल पर
क्या करोगी उलझन में डालकर बेतहाशा हँसते हुओं को
विज्ञापनों के सहारे जी रहे लोग निर्दोष और निरीह हैं

पलकों के ऊपर किसकी आँख की हड्डी में
रहोगी असहनीय पीडा
किस किसान को करोगे पसीने से सराबोर दुःस्वप्न
स्त्रियाँ ही क्यों करें उल्टियाँ दिन रात
मुझे ही आओ विषैली उबकाई
मेरी मटकी है अभी आधी भरी

मेरे अखबार पढते-पढते ही बनी हैं
कार्पोरेट हितकारी नीतियाँ
मेरे हस्ताक्षर लेकर ही उजाडी गई हैं
आदिवासी बस्तियाँ
मैंने ही माना है कि
चिथडे पहने जंगलों में खाना ढूँढती औरतें नक्सली हैं
खदानें ढूँढते लोग विकासशील हैं
वे जो कर रहे हैं इस देश के लिए ही तो कर रहे हैं
देश से प्रेम न होता तो
क्यों करते वे शिक्षा और स्वास्थ्य के काम
वे सरकार के काम में हाथ बँटा रहे हैं
सरकार उनके काम में मदद के लिए सेना भेज रही है
पीडितों को ठिकाने लगाने

छियालीस का हो गया हूँ मैं ओ मौत
राजकीय अस्पताल से अपहृत स्त्रियाँ,
युवा और बच्चे ही क्यों आएँ
नाले के पास उगी खरपतवार में बँधकर