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सात कविताएँ

अनिरुद्ध उमट
एक

जिस शहर कभी गया ही नहीं था
उससे वापस लौटते मेरे कदम उदास हैं।

मैं लौटने में हर घर की दहलीज पर रह गया हूँ।
हर घर तुम्हारा घर है, हर पेड, हर राह, हर मोड, सब तुम्हारे घर से है।
एक घर मुझ में है जिसमें से मुझे जाना पड रहा है।

तुम्हें कहीं देखा नहीं मगर हर ची*ा तुमसे है।
पता नहीं किस दरवाजे के पीछे तुम हो और मेरे जाने को सफेद खामोशी में देख रहे हो।
इस शहर में मैं इस कदर रह गया हूँ कि तुम किसी और शहर में नहीं रह सकोगे।
मेरे लौटने की मुद्रा तुम्हारी नींद में एक गीली खामोश हिचकी है।

तुम्हारे शहर को जिसे मैंने कभी खूब निहारा था वह दर्पण में बाल की तरह मेरे मन पर हिलता है।
दो.

रेल जब चली थी बीकानेर से तब भी इंदौर ही था
रेल जब किसी भी स्टेशन पर रुकती
तब भी इंदौर ही होता
रेल जब पानी पीने जाती या इधर से उधर करवट बदलती तब भी इंदौर ही होता था
कई स्टेशन निरीह ऐसे भी आए
जहाँ रेल बहुत बेगानी-सी मुँह ऊँचा किये
धडधड करती गुजर गई वह स्टेशन भी इंदौर ही था । उस रेल का रंग पोहे जैसा।
हम हर उस स्टेशन पर बैठे हैं
हर उस रेल में बैठे हैं।
इस दिगंत से दिगंत की यात्रा में
हम ख्याल रखते हैं कि अरे, इंदौर आ गया यह कहते कहीं सपने में दौडती रेल से उतर न जाएं
या हकबका कर चैन न खींच लें।
खिडकी-खिडकी जंगल चाँद तारे नदियाँ पर्वत समंदर उचक उचक देखते हैं।

अभी एक बैंच प्लेटफॉर्म पर दिखनी है जहाँ सकोरे में रखी चाय से भाप उठ रही होगी।

तीन

खाली है अभी रेल
मगर पटरियाँ भीग रही हैं
सपने भीग रहे हैं
तारे भी

कौन है जो भीगे बिना भीगा है

चार

पानी में गहरा तनाव है
तनाव की गाँठ में
प्यास

प्यास में गहरा तनाव है
तनाव की गाँठ में
तृप्ति

तृप्ति में गहरा तनाव है
तनाव की गाँठ में
सपना

सोने में गहरा तनाव है
तनाव की गाँठ में
नींद

नींद में गहरा तनाव है
तनाव की गाँठ में
छल-छल
छल
छल-छल

पाँच

उसके लिए धरती की सबसे नरम निर्मल माटी ली
उसके लिए मेरे मन के झरने का जल उतरा
हर साँस मैंने माटी को गिलोया

नेह के पल जब वह
प्रस्तुता उतरी
प्यार के धनुष की तरह
सेज पर बिछी

उसकी पीठ पर
शहदीले हाथों रोम-रोम को जगाते

एन उसकी साँसों की आवाजाही बीच
पीठ पर चुम्बन का खरगोश उतरा

उसकी सिहरती देह के ताप पर
भीगी कोमल माटी के लेप से
स्पर्श
स्पर्श

पीठ आकाशगंगा
जिस में मैं उतर
नहा रहा


छह

किस तरह रेखा दम तोडती है
किस तरह
साँसों में मद्धम लकीर

बुझता दीप
सूखते आँसू
दम तोडता हृदय

किस तरह
आधी रात गए
एक यंत्र अपने भीतर
तुम्हारी मृत्यु का माप लेता है

उफनती रेखा अचानक
दम तोडती
शव-सी बिछ जाती

‘इन्हें ले जाइए
आपने बहुत विलम्ब किया
इन्हें लाने में’

किस तरह
किस तरह

सात

मगध सुनो बहरे हो अँधे हो तो निहाल रहो
कौशल में विचारों के केशों को जलाया जा रहा है

रसातल

सुनो द्रौपदी
ऐसा परिहास न देखा

चिताओं पर निर्लज्ज पताकाएँ