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तोहफा कैसा लगा मीता?

नीलिमा टिक्कू
बस तेज रफ्तार से चली जा रही थी, साथ ही उसका मस्तिष्क भी तीव्रगति से विगत में हिचकोले खाने लगा था। माँ-पिताजी और भैया के साथ कितना खुशहाल परिवार था उसका। भैया..... कितना प्यार, लाड-दुलार करते थे उससे। छुट्टी के दिन वे हमेशा देर तक सोते थे। माँ उन्हें बार-बार उठाने की कोशिश करती पर वह अपनी सुबह की नींद को किसी कीमत पर खोना नहीं चाहते थे। हाँ, राखी के दिन जब माँ उनसे कहती- अब उठ भी जा बेटा, मीता ने सुबह से कुछ नहीं खाया-पीया है, तो वह तुरन्त उठकर जल्दी-जल्दी शरीर पर पानी उँडेल कर बाहर आ जाते। उसे भूखी-प्यासी बैठी देख गुस्सा करते।
‘‘मीता यूं सुबह से भूखी-प्यासी बैठकर ये ढकोसला मत किया कर, खा-पी लिया कर। राखी मुझे बंधवानी है। मैं तुझसे कह रहा हूँ, आगे से इतनी देर तक निराहार मत बैठा कर। चल जल्दी से बाँध दे राखी।’’ उनके बनावटी गुस्से में असीम प्यार छिपा रहता था। राखी बंधवा कर मिठाई खाते हुए वह चुफ से उसके हाथ पर उसका मन पसंद उपहार रख देते थे और वह खिल उठती थी। ये अलग बात है कि उस उपहार के लिए पिताजी उन्हें अलग से पैसे दिया करते थे।
खुशहाल बचपन देखते ही देखते व्यतीत हो गया और शीघ्र ही उसके विवाह की घडी आ पहुँची। विदाई की वेला में माँ-पिताजी की आँखें नम थीं। अपने से पाँच वर्ष बडे भैया को उसने अपनी विदाई पर पहली बार *ाार-*ाार रोते देखा था और वह भी तो तब कितनी दहाडें मार-मार कर रोयी थी। ऐसा दृश्य देखकर संदीप सहम गये थे।
‘‘इन्हें ब्याह कर ले जा रहा हूँ, लगता है बहुत बडा अपराध कर रहा हूँ। इस विवाह-उत्सव में इस समय मैं अपने आपको अचानक से एक खलनायक की भूमिका निभाते हुए देख रहा हूँ।’’
उनकी बात सुनकर विदाई की उदास वेला में भी सभी के चेहरों पर मुस्कराहट उभर आयी थी।
पिताजी के बहुत कहने पर भी बडे भैया मुझसे पहले विवाह के लिए रा*ाी नहीं हुए थे। मेरे विवाह के साल भर बाद ही भैया ने विवाह किया था।
कुछ वर्ष तक तो मैं हर राखी पर पीहर जाती थी और भैया को बडे चाव से राखी बाँधती थी किन्तु जबसे भैया ने व्यवसाय के सिलसिले में विदेश में अपना ऑफिस खोल लिया था तब से संयोगवश राखी के त्योहार पर हमेशा वे विदेश में ही होते और मैं उन्हें वहीं राखी भेजती थी। फिर भाभी भी वहीं चली गई, वहीं उनके एक प्यारा-सा बेटा हुआ। मैं भी दो बेटों की माँ बन गई थी। पारिवारिक व्यस्तताएँ बढने लगी थीं।
त्योहार पर मेरी राखी जब भी भैया को मिलती उनका फोन आता, ‘‘मीता तेरी राखी तो मिल गई लेकिन उसे बाँधने वाला यहाँ कोई नहीं है। तेरी भाभी है वह बांध नहीं सकती’’ और ठहाका लगा कर हँस देते। हर राखी पर विदेश में बैठे भैया मुझे फोन पर ‘फूलों का तारों का सबका कहना है, एक हजारों में मेरी बहना है...’’ पूरा गाना सुनाते और मेरी आँखें सजल हो उठतीं।
माँ और पिताजी का आपसी तालमेल बहुत अच्छा था। दोनों ही मस्त-मौला स्वभाव के थे। भैया भाभी के विदेश चले जाने पर उन्होंने अपनी सामाजिक गतिविधियाँ बढा दी थीं और उनकी सुखद व्यस्तता की वजह से मैं भी निश्ंचत थी।
समय का चक्र तेजी से घूम रहा था। गत वर्ष माँ और पिताजी, भैया-भाभी के पास विदेश घूमने गए हुए थे वहीं अचानक दिल का दौरा पडने से पिताजी का देहांत हो गया और माँ अकेली रह गई थीं। मैं पिताजी के अंतिम दर्शन भी नहीं कर सकी थी। मन बेहद दुखी था, मन ही मन मैं भैया से नाराज थी। अब पूरे एक वर्ष बाद भैया-भाभी अपने बेटे के साथ माँ को यहाँ छोडने आए थे। ऐसा मेरा अनुमान था। संयोगवश राखी का त्योहार भी आ पहुँचा था। बच्चों की परीक्षा चल रही थी इसलिए उन्हें पति के पास छोडकर मैं अकेली ही बस में बैठकर सबसे मिलने जा रही थी। क्षुब्ध मन से मैं सोच रही थी, भैया अपने परिवार के साथ विदेश में बस गये हैं, माँ अब नितांत अकेली रह जाएंगी। मुझे पता था कि मैं कितना भी जोर लगा लूं माँ अपना घर छोडकर कभी मेरे पास आकर नहीं रहेंगी। बेटी के ससुराल में रहना आज भी पसंद नहीं किया जाता है। इसी चिंता में डूबती उतरती मैं उदयपुर पहुँच गई थी।
बस के रुकते ही सामने भैया को खडा पाया तो दिल धक से रह गया। उनके बालों में सफेदी उतर आयी थी। पहले से काफी कम*ाोर न*ार आ रहे थे। मुझे देखते ही उनकी आँखों में चमक आ गयी। मेरे हाथ से बैग लेकर मुझे नीचे उतारते भैया के गले लगने से मैं अपने आपको रोक नहीं पायी और हिलक-हिलक कर रोने लगी। भैया की आँखों में भी नमी तैरने लगी थी। मैं फुसफुसाई थी, ‘‘भैया पापा हमें छोडकर क्यों चले गये?’’
भैया ने मेरे कंधे थपथपाते हुए ढाँढस बँधाया, ‘‘ये क्या मीता, तू अभी भी छोटी बच्ची की तरह रोती है। नियति के आगे हम कितने मजबूर हो जाते हैं। देख मीता माँ के सामने ये सब मत करना।’’
रास्ते में गाडी चलाते भैया से मैंने एक ही सवाल किया था, ‘‘भैया अब माँ का क्या होगा?’’
भैया चुप बैठे थे। उनकी तरफ से कोई जवाब ना पाकर मैंने भी मौन धारण कर लिया था। घर पहुँचकर पिताविहीन घर मुझे काटने को दौड रहा था। मैं घर में घुसते हुए निरीह, बिन्दी-आभूषण विहीन माँ की कल्पना करती रोआंसी सी हो उठी थी। कैसे निकालेंगी माँ अपना आगे का जीवन.... भाभी आकर मुझसे लिपट गई थीं। तभी राहुल के साथ स्क्राइबल खेलती माँ पर मेरी न*ार पडी। माँ ने मैहरून रंग की साडी पहन रखी थी। हाथों में चूडियां और माथे पर बिन्दी लगाये माँ बिल्कुल वैसी ही लग रही थीं, जैसे पिताजी के समय में रहा करती थीं। माँ को सहज रूप में मुस्कराते देख मैंने मन ही मन चैन की सांस ली। अपनी आँखों में उमडे आँसुओं को जब्त करती मैं उनसे गले मिली थी। माँ की आँखें भी नम हो आई थीं। भैया का संकेत समझ मैं बाथरूम में नहाने के बहाने अपने सारे आंसू बहाकर सहज रूप धर बाहर आ गयी थी। हमेशा की तरह भैया हमारे बचपन के किस्से भाभी और राहुल को सुना रहे थे। माँ के साथ-साथ सभी हँसते-हँसते लोट-पोट हो रहे थे तभी अचानक भैया को याद आया, ‘‘मीता, कल राखी है तू मेरे लिए राखी लायी है कि नहीं !?’’
मैं भैया के लिए बहुत प्यारी सी राखी लायी थी। हालांकि राखी खरीदते समय मन में एक डर-सा था कि पता नहीं माँ की मानसिक स्थिति कैसी होगी, लेकिन भैया-भाभी ने घर का वातावरण इतना सहज बना रखा था कि मेरे मुँह से बेसाख्ता निकल गया, ‘‘लायी हूँ भैया, बहुत प्यारी सी राखी लायी हूँ, आफ लिए। कितने वर्षों बाद मौका मिल रहा है रक्षाबंधन पर अपने हाथों से आपकी कलाई पर राखी बांधने का।’’
मेरी बात सुनकर भैया का चेहरा खिल उठा, बोले- ‘‘फिर ठीक है मैं भी तुझे तेरा मनपसंद उपहार दूंगा’’,
मैंने बुझे मन से कहा, ‘‘भैया अब बचपन की बातें छोडो, मुझे किसी उपहार की जरूरत नहीं है।’’
भैया शरारत से मुस्कराये, ‘‘ठीक है वह तो कल ही पता चलेगा, मेरा दिया उपहार तुझे पसंद नहीं आये तो तू इंकार कर देना।’’
वैसे तो मुझे माँ को देखकर तसल्ली हो गई थी फिर भी मैं उनसे अकेले में बात करना चाहती थी। सोचा था रात को सोते समय उनसे बातें करूँगी लेकिन राहुल और माँ का बिस्तरा एक ही कमरे में लगा था। माँ ने ही बताया था तेरे पिताजी के जाने के बाद से राहुल मेरे कमरे में ही सोता आया है। माँ की बात सुनकर मुझे अच्छा लगा था लेकिन कुछ दिन बाद जब ये सब चले जायेंगे तब माँ का क्या होगा, इसी उधेड-बुन में मुझे देर रात तक नींद नहीं आयी। दूसरे दिन सुबह आशा के विपरीत भैया ने मुझे जगाया, ‘‘मीता कब तक सोती रहेगी, भई मुझे चाय की तलब हो रही है अब तो उठ जा।’’ मैं आश्चर्यचकित रह गई। भैया अभी तलक पुराने नियमों का पालन कर रहे हैं। नहा धोकर शीघ्र ही बाहर आई। भैया को पाटे पर बिठाकर उनका तिलक किया और उनकी कलाई पर राखी बांधी। मिठाई का टुकडा मुँह में डाल कर भैया बोले, ‘‘तेरे लिए इस राखी का उपहार क्या है तुझे बताता हूँ...’’
मैंने उनकी बात काटते हुए पुनः अपनी बात दोहरायी,
‘‘भैया मुझे किसी उपहार की जरूरत नहीं है।’’
‘‘अरे मेरी बात पूरी सुन तो ले, तुझे पसंद नहीं आये तो मना कर देना।’’
माँ और भाभी को मंद-मंद मुस्कराते देख मैं हैरान-सी भैया का मुँह देखने लगी, भला ऐसा भी क्या उपहार है?
भैया बडे स्नेह से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, ‘‘सुन मीता, कल तू ने कार में मुझसे ये सवाल पूछा था ना कि अब माँ का क्या होगा? पगली, क्या माँ केवल तेरी ही है हमारी नहीं? मीता मैं विदेश से अपना काम समेट कर यहीं अपने देश में वापिस आ गया हूँ। एक साल का समय इसीलिए लगा। अब हम माँ के पास यहीं रहेंगे अपने इसी घर में। यही तेरा राखी का उपहार है।’’
कुछ रुककर भैया शरारत से मुस्कराये, हाँ अगर तुझे एतराज हो तो बता दे...
मैं फिर से छोटी बच्ची की तरह भैया के गले लग कर आँसू बहाने लगी थी।
भैया ने अपनी जेब से रूमाल निकालते हुए कहा, ‘‘तेरा मनपसंद उपहार दिया है फिर भी आँखों से गंगा-जमुना बहा रही है।’’
राहुल हमारे वार्त्तालाप के बीच में कूद पडा, ‘‘पापा ये तो खुशी के आंसू हैं।’’
भैया मुस्करा उठे, ‘‘बुआ के चमचे!’’
शाम की बस से मुझे वापिस जाना था। मैं भाभी से लिपटी पडी थी। सच में ऐसे भाई-भाभी हैं तो मुझे माँ की कोई चिन्ता नहीं। मैं पूरी तरह से निश्ंचत थी। राखी का ये उपहार अनमोल था। एक बार फिर मैं बस में सवार हो कर अपने घर जा रही थी, मधुर यादों के साथ बिना किसी गिले शिकवे के....।