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लाली

रश्मि शर्मा
गीले बालों को तौलिये से अंतिम बार झटकाए और पलंग के पायताने रख, कमर तक लंबे बालों को छितराकर ठीक पंखे के नीचे बैठ गई सौम्या। सामने से छोटा टेबल खींचकर आलता रंगे पैर धरे और उंगलियों से बिछिया सरकाकर उसके नीचे नए बने सफेद निशान को सहलाया। उँगलियाँ भी कसे जाने पर बेचैन होकर छटपटा रही थी ।
‘उफ! कितनी गर्मी है...’ होठों ही होठों में बुदबुदाकर तांत के लाल पाड वाली साडी के आंचल से चेहरा पोंछा। बहुत देर के बाद उसे एकांत मिला था। इतने गहने-कपडे पहनकर कैसे रहती हैं सभी औरतें, उसे आश्चर्य हो रहा था। उससे तो एक दिन नहीं संभल रहा यह पहनावा।
अपनेआप से बतियाती सुनयना का बदन अचानक सिहर उठा। एक हथेली उसके बालों को सहला रही थी। कोई तो नहीं था कमरे में...ये किसका हाथ है?
पलटी तो उसे देखा।
‘तुम्हारे बाल बहुत सुंदर हैं... मुझे छूने दो न!’

पहचानने की कोशिश में लगा, कि देखा तो है इसे सुबह। मुँह दिखाई की रस्म के समय भीड में यह भी थी। तब गौर नहीं किया था इस पर।
चेहरा तो खूबसूरत था मगर आँखें ऐसी, जैसे आश्चर्य में फैली हों, थोडी विस्फारित सी... दुनिया को टटोलती। मासूमियत के बावजूद कुछ ऐसे भाव थे, जो देखने पर खटक रहे थे सौम्या को। मगर क्या ची*ा है वो, उसे पकड नहीं पा रही थी।
उसने पीले रंग का फ्राक पहन रखा था। बालों को रिबन से बाँधकर दो चोटी बनाई गई थी। वो मुस्करा रही थी, मगर सौम्या को न जाने क्यों उसे देखकर अपने घर में लगे बोनसाई पौधे की याद आने लगी।
जवाब में सौम्या के भी होंठ मुस्कराए। ‘आइये... बैठिये न’ पलंग से गीला तौलिया उठाकर कुर्सी के पुश्त पर टिका दिया। जाने कौन है, क्या रिश्ता है... अभी तो जो मिले उसे सम्मान देना है। शादी के बाद आज पहला दिन है ससुराल में।
‘आप भी आओ न सुम्मी बहु, मेरे पास बैठो’
फिर चौंकी सौम्या। सुम्मी ...इस नाम से तो उसे कोई नहीं पुकारता। फिर यह छोटी लडकी मुझे तो किसी बुजुर्ग की तरह संबोधित कर रही है। मन ही मन उलझती सौम्या बैठ गई पास उसके। फिर उसने बालों में उंगलियाँ फिराई। ‘सुम्मी बहू, तुम्हारी चोटी मैं बनाऊंगी। कितने रेशम से बाल हैं तुम्हारे।’
‘बना दीजिएगा, अभी पहले सूख जाएं।’
वह ऊपर से नीचे तक देख रही थी सौम्या को। उसकी आँखों में अजीब-सी चमक थी। उसने सौम्या के हाथ खींच कर अपने हाथों में लिए।
‘बहुत गहरी मेंहदी रची है। मुझे मेहंदी बहुत पसंद है। क्या तुम लगा दोगी मुझे?’
‘हाँ, लगा दूँगी। आपका नाम क्या है?’
‘मेरा नाम लाली है बहू’ वह फिर बालों को छूने लगी।
न जाने सौम्या को क्यों अजीब-सी घबराहट हो रही थी। अभी तक अकेला कमरा उसे सुकून दे रहा था मगर अब लगने लगा कि कोई आ जाए तो, इस लाली का ध्यान बंटे। अजीब अंदा*ा में घूर रही थी उसे। दिखने में तो छोटी ही है। कद भी दरम्याना। एक झलक देखने से आठ-दस वर्ष की दिखती है। मगर चेहरे पर जो भाव हैं...उफ.. इस छोटी लडकी की नजरें क्यों भेद रही हैं मुझे।
‘आप हमारी कौन हैं लाली? ‘सौम्या से रहा नहीं गया तो उसका अस्तित्व जानने की उत्कंठा में पूछ बैठी।
‘मुझे नहीं जानती हो? किसी ने नहीं बताया मेरे बारे में?’ लाली ने इस अंदा*ा से कहा कि सकपका गई सौम्या। एक बार तो लगा कि कितना गलत सवाल पूछ लिया उसने। बहुत रहस्यमय लग रही थी वो। सोच ही रही थी कि अब क्या बात करे उस लडकी से कि पता चले वो है कौन और उससे चाहती क्या है!
तभी ड्रेसिंग टेबल से कंघी उठाकर लाली उसके पीछे आकर खडी हो गई।
‘आओ मैं कंघी करूं तुम्हारी। देखो तो इतने लंबे बालों को ऐसे ही छोड दिया तुमने। उलझ जाएंगे।’
चुपचाप बैठी रही सौम्या। लाली उसके बालों पर बहुत हौले-हौले कंघी करने लगी, साथ ही कोई लोकगीत गुनगुनाने लगी थी, जो सौम्या के लिए बिल्कुल अपरिचित गीत था। उसे आश्चर्य भी हुआ कि इतनी छोटी लडकी का गला सधा है और उसे फोक याद भी है।
यह सुनयना का ससुराल है और विदाई के बाद आज सुबह इस घर में आई है। नाते-रिश्तेदारों से भरा था घर। मुँह दिखाई की लंबी रस्म और रात भर के जागरण के बाद उसका मन हो रहा था कोई कोना मिले और नींद पूरी कर ले। उसकी छोटी ननद समझ गई उसकी परेशानी। इसलिए बच्चों समेत सभी को कमरे से निकाला और भाभी सौम्या को कहा कि आप नहा कर कुछ देर सो लो।
‘अब कैसे सोएं... ये लाली मेरे बाल छोडे तब न ......’ मन ही मन सोचा सौम्या ने। छोटी बच्ची का बालों से प्रति इतना लगाव उसे असहज कर रहा था। अगर वह उसकी नेलपॉलिश या लिपस्टिक की बात करती, तो स्वाभाविक था। वह तो बडी-बूढियों की तरह बालों के साज-संभाल की बात कर रही थी।
तभी लाली को आवाज लगाती ननद आई। ‘चलो लाली, चाची को आराम करने दो।’
‘नहीं, मुझे इन्हीं के साथ रहना है’ मचल गई लाली। उसके गोरे गाल दहक उठे।
ननद सीमा ने बहलाया। ‘दादी बाहर बुला रही हैं। एक तोता आंगन में आया है। सब बच्चे उसे घेर कर खडे हैं, बस तुम्हारा ही पता नहीं।’
लाली को देखकर लग रहा था कि वह तोता देखने जाना भी चाह रही है और सौम्या का साथ छोडना भी नहीं उसे। दुबारा सीमा ने कहा कि उड जाएगा तोता, देर करोगी तो। यह सुनकर एक नजर सौम्या की ओर देखा...और निकल गई बाहर ।
सौम्या ने लंबी सांस ली। ‘ओ, तो यह राहुल के भैया की बेटी है। मगर इतनी अजीब...’ उसके संस्कार ने यह बात सीमा के सामने कहने नहीं दिया।

राहुल शहर में नौकरी करता है और वहाँ उसे सरकारी क्वार्टर भी मिला है। मगर शादी की सारी रस्में गांव से हुई, इसलिए विदा कर सौम्या भी गांव वाले घर में आई। गांव होने के बाद भी दोमंजिला पक्का मकान है। सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। सौम्या जानती है कि आखिरकार उसे शहर में रहना है, इसलिए थोडी कमी-बेशी को न*ारअंदा*ा करके चलना पडेगा, यह मां ने सीख दी थी उसे।
गर्मी की शादियाँ आफत लाती हैं, यह सोचते हुए सौम्या ने दरवाजा हल्का सा उढका दिया और बिस्तर पर लेट गई। ठीक-ठाक कमरा है। सामने अलमीरा है एक ओर ऊपर छज्जा, जिसमें वैसे समान रखे जाते हैं जो कभी-कभी उपयोग में आते हैं।
आँखों ही आँखों में कमरे का मुआयना करने लगी वह। पूरब वाली दीवार पर राहुल की तस्वीर लगी है ब्लैक एंड व्हाइट, जिसमें बेहद स्मार्ट लग रहा वो। नीचे सीमेंटेड रैक बना है, जिसमें करीने से किताबें सजाई हुई हैं। कुछ कोर्स की तो कुछ उपन्यास भी दिखे, शरतचंद्र, रेणु और निर्मल वर्मा। सौम्या खुश हुई कि खाली वक्त तो काटा जा सकता है यहाँ, इन कहानियों और उपन्यास में डूबकर। इस खयाल ने उसे और खुशी दी कि चलो, हमारी पसंद मिलती है, साहित्यिक चर्चाओं में भी वक्त अच्छा कटेगा।
पश्चिम की दीवार से लगा स्टडी टेबल था, जिसके कोने में था सफेद टेबल लैंप, जो पुराना होने के कारण धुँधला हो चुका था। उसके नीचे लडके-लडकी का एक जोडा है जिसकी पीठ पर लैंप टिका था। कभी बेहद खूबसूरत रहा होगा लैंप शेड। टेबल पर कत्थई रंग का टेबल-क्लॉथ बिछा था जिस पर पीले रेशमी धागे से कढाई की गई थी।
‘च्वायस अच्छी है जनाब की’ मन ही मन बोली सौम्या।
आज इस कमरे में पहली बार आई है और जब तक गांव में है, यहीं रहना होगा क्योंकि यह राहुल का कमरा है। राहुल जब भी गांव आता है, यहीं रहता है। वैसे भी बडे घर में इतने कमरे थे, कि किसी को कमी नहीं थी। उसे अच्छा लगा यह सोचकर कि कभी-कभी उसे गाँव में रहने का मौका मिलेगा। शुद्ध हवा और नीले आसमान पर चमकते लाखों सितारे कभी शहर के आसमान में नहीं दिखते। यह सब गाँव वालों को ही नसीब है। वह लकी है कि शहर और गांव, दोनों जिंदगी का आनंद ले पाएगी। स्वभाव से सभी परिवार वाले उसे अच्छे ही लगे। आगे जाने क्या हो...।
नींद खुली तो शाम ढल गई थी। अहसास हुआ कि बेहद गहरी नींद सोई थी। शादी की थकान और रात्रि जागरण का ही असर था कि नई जगह पर अच्छी नींद आई। अगर ननद नहीं उठाती तो जाने कब तक सोई ही रहती।
उसे उस कमरे से निकालकर ननद ने दूसरे कमरे में बिठा दिया। कई लोग पहले से मौजूद थे और आपस में हंसी-मजाक चल रहा था। उसके लिए चाय भी वहीं आ गयी। पीकर ताजगी का अनुभव हुआ। सौम्या का मन कर रहा था कि वह घर घूम कर देखे कि क्या और कहां है। मगर नई बहू होने के नाते उसे अभी दूसरों के इशारों पर ही चलना होगा, यह जानती थी वो।
लगभग घंटे भर बाद वह अपने कमरे में गई तो सारा हुलिया बदला हुआ था। आँखों में आश्चर्य भरकर कुछ देर तो वह उस कमरे को निहारती ही रही, जिसे अभी कुछ देर पहले छोडकर गई थी।
पलंग पर गुलाबी रेशमी चादर बिछा था और उस पर रजनीगंधा की लडियां सजाई गई थी। यहाँ तक कि पायतानों पर भी रजनीगंधा लिपटी हुई थी। बिस्तर पर लाल गुलाब की पंखुडियों से दिल बना था। कोने-कोने में फूलों के गुच्छे सजाए गए थे। मुग्धा हो गई सुनयना अपने कमरे की सज्जा देखकर। उसे उम्मीद नहीं थी कि गांव में भी ‘पहली रात’ के लिए इतना सुंदर कमरा मिलेगा उसे। जब ननदों ने खिलखिलाते हुए उसे टहोका- ‘किस सोच में डूबी हो भाभी?’ तब जाकर उसकी तंद्रा टूटी।
सीमा ने उसे ड्रेसिंग टेबल के सामने बिठा दिया और जुट गई उसके श्ाृंगार में। अब वह तांत की नहीं, लाल रेशमी साडी पहने हुई थी और उसकी सज्जा फूलों के गहने से की गई थी। फूलों का हार, कान के लटकन और मांग टीका भी। एकदम परी लगने लगी थी सौम्या। वह अपने ही रूप पर रीझ गई थी। कुछ देर बाद वह फूलों की पंखुडियों के बीच खिला गुलाब बनकर बैठी थी, राहुल के इंत*ाार में।
इस दिन केवल घरवाले ही थे, जो आसपास मंडरा रहे थे। राहुल के कुछ दोस्त भी थे जो अलग-अलग कोणों से उसकी तस्वीरें खींच रहे थे। कुछ देर बाद राहुल को भी पकडकर उसकी बगल में बिठा दिया गया। घर वाले आकर कमरे की सज्जा की तारीफ करते और सौम्या की सुंदरता की प्रशंसा कर लौट जाते। बच्चे भी धमा-चौकडी मचाए हुए थे। राहुल बच्चों के प्रिय हैं, इसका तो अनुमान हो ही गया था उसे। छोटी ननद इतना ध्यान रख रही थी कि कोई भी बच्चा बिस्तर पर ऊपर चढकर सजावट बिगाड न दे।
अचानक देखा सौम्या ने कि लाली दरवाजे का पल्ला पकडे जाने कब से खडी है और वैसी ही नजरों से देख रही थी, जिससे वह असहज महसूस कर रही थी दिन में। उसने सोचा एकांत पाते ही राहुल से सबसे पहले लाली के बारे में पूछूंगी कि आखिर ये इस तरह से क्यों व्यवहार करती है। कुछ तो है जो सामान्य नहीं।
वक्त गु*ारा। रात की घडी ने ग्यारह बजाए। सभी चले गए मगर लाली पास वाली कुर्सी से उठी ही नहीं। कमरे में बस तीन लोग बचे थे। सौम्या के साथ-साथ राहुल की भी इच्छा हो रही थी कि उसे एकांत मिले तो वो दोनों आपस में बात करें। यह अरेंज मैरिज थी और उन्होंने फोन पर बातचीत की थी, मगर दूर से बात करना और सामने एक दूसरे को देखते हुए बात करने में काफी फर्क होता है। फिर आज तो जीवन की चिर-प्रतीक्षित रात थी।
राहुल ने कहा- ‘लाली, अब हमें नींद आ रही है। जाओ, तुम भी अपने कमरे में सो जाओ।’
‘मैं यहीं सोऊंगी, चाची के साथ।’
‘नहीं लाली, आज नहीं कल सो लेना। आज मम्मी के पास जाओ।’
‘मुझे नहीं जाना किसी के पास। यहीं सोऊंगी तो बस यहीं सोऊंगी।’
‘अच्छे बच्चे *ाद नहीं करते। जाओ तुम अब।’ ‘मैं अच्छी बच्ची नहीं, कहकर कूदकर बिस्तर पर चढ गई लाली। राहुल रुको-रुको कहता ही रह गया। अब राहुल और सौम्या के बीच लाली बैठी थी। सौम्या ने उसे प्यार से खींचकर गोद में बिठा लिया और समझाने की कोशिश की कि रात ज्यादा हो गई है बच्चों को सो जाना चाहिए। हमलोग सुबह फिर बात करेंगे और शाम को लाली को लेकर घूमने भी जाएंगे।
‘तुम तो चुप ही रहो बहू’ तेज आवाज में एक बार फिर आदेश दिया लाली ने। सच में चुप हो गई सौम्या।
राहुल के समझाने का कोई असर नहीं हो रहा था उस पर। बहुत देर तक जब *ाद पर अडी रही लाली और उनका दरवाजा देर रात खुला देख ननद आई अंदर। लाली को देखकर सब बात समझ गई। पहले तो उसे मनाने की कोशिश की, मगर वह उठी ही नहीं। तब वह जाकर बडी भाभी को बुला लाई।
‘लाली....नीचे उतरो।’
‘नहीं...’ कहकर लाली सौम्या से चिपक गई।
भाभी ने उसका हाथ पकड लिया और खींच कर ले जाने लगी, तो अचानक इतनी जोर से रोई कि सब दंग रह गए। लाली की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे....घबराकर राहुल ने भाभी के हाथ से लाली का हाथ छुडाया और उसे सीने से लगा लिया।
‘देखो ....साँसें चढ गई न। भाभी छोडो, रहने दो यहीं।...’
‘बिगड गई है एकदम... किसी की नहीं सुनती। बेवकूफ लडकी...’ क्रोधित नेत्रों से लाली को घूरती और बडबडाती हुई उसकी माँ बाहर चली गई। राहुल ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। सिसकती लाली एक हाथ से चाची का आंचल पकड के और दूसरे से राहुल का हाथ, बीच में सुबकती रही। यह सारा कुछ मौन भाव से सौम्या देखती रही।
लगने लगा कि लाली नींद में चली गई और राहुल उसे चादर से ढकने लगा तो सौम्या को समझ आया कि आज की रात लाली यहीं सोएगी। यह कैसा अन्याय है। आक्रोशित सौम्या राहुल की ओर देखने लगी, ताकि उसे समझ आए कि सौम्या को लाली का यहाँ सोना पसंद नहीं आ रहा। मगर विवश-से राहुल ने अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।
दोनों जाग रहे थे मगर उनके बीच दस साल की लाली सोई थी। जाने सोई भी थी या सोने का दिखावा कर रही थी। आज पहली रात के बारे में कितना कुछ सुन रखा था सौम्या ने। प्यार की बात तो दूर, वो दोनों एक दूसरे से बात भी नहीं कर रहे थे।
सौम्या परिस्थिति को समझने की कोशिश कर रही थी कि आखिर लाली रात को उनके बीच क्यों मौजूद है और राहुल ने भी उसे ले जाने से मना कर दिया सबको। क्या राहुल के मन में अपनी नई-नवेली पत्नी के लिए सामीप्य की चाहत नहीं ? कहीं राहुल ही तो नहीं चाहता कि वो दोनों अकेले रहें। लाली का राहुल से लगाव तो समझ आता है मगर वह मुझसे इस कदर क्यों चिपक रही है, यह बात सौम्या की समझ से बाहर थी।
अपने मानसिक द्वंद्व से जूझती सौम्या ने पहल की...’ सुनिये, ये सो गई है, इसके कमरे में छोड आइए।’
‘जाग जाने से तंग करेगी। अगर फिर से दौरा पडा, तो फिर रात में हास्पिटल ले जाना पडेगा।’
‘तो क्या आज यहीं रहेगी यह?’
......कोई जवाब नहीं मिला।
करवट बदल लिया सौम्या ने। समझ गई कि लाली को इस बिस्तर से उठाना आसान नहीं। उस रात दोनों में फिर कोई बात नहीं हुई। सौम्या नाराजगी से भरी थी और बेबसी में उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।
उनकी पहली रात यानी सुहागरात में लाली मौजूद थी।
सुबह सबके चेहरे पर शर्मिंदगी का भाव था। सौम्या ने अपनी नाराजगी चेहरे से जाहिर नहीं होने दी, मगर वह इस पहेली को समझ नहीं पा रही थी। लाली राहुल के बडे भाई की बेटी है, तो वह रात को उनके बीच क्यों थी? लाली के मन में ऐसा क्या है जो उसे एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड रही थी। जबकि उसके माता-पिता इसी घर में मौजूद हैं, तो भी सभी इतने बेबस क्यों हैं।
कुछ भी समझ नहीं पा रही थी सौम्या। मगर यह बात उसे बुरी तरह कचोट रही थी कि उसके जीवन का सबसे सुंदर दिन इस लडकी पर कुर्बान हो गया। क्या ये दिन कभी दुबारा लौटते हैं?
आज रसोई छुलाई की रस्म थी। सौम्या को रसोई ले जाया गया, जहां उसने खीर बनाई। घरवालों ने उसकी बनाई खीर खाकर शगुन के पैसे दिए। शादी का घर मेहमानों से भरा था। लाली भी घूमती-फिरती नजर आ जाती। कई बार तो वह आकर जबरदस्ती उससे सट कर खडी हो जाती।
दोपहर भी तमाशा हुआ। उसकी *ाद थी कि उसे खाना चाची अपने हाथ से खिलायेगी, तभी खायेगी। अब अंदर ही अंदर सौम्या को लाली से चिढ होने लगी। ये लडकी तो गले ही पड गई है। सौम्या को बच्चे अच्छे लगते हैं, मगर ऐसे नहीं कि हमेशा उनके साथ ही रहे या उनकी फरमाइश पूरी करती रहे।
दोपहर वह आराम करने गई तो कुछ देर तक राहुल का आसरा देखा कि शायद वो आए। मगर उसका कोई पता नहीं था। उसका जी चाह रहा था कि अंदर से दरवाजा बंद कर सो जाए क्योंकि गुस्से और उलझन में रात उसे नींद नहीं आई ठीक से। एक तो नया घर और बिस्तर... ऊपर से सुहागरात के दिन एक किशोर होती लडकी उसकी बगल में सो रही थी।
एक बार तो उसे शक हुआ कि कहीं यह राहुल की तो संतान नहीं। क्या पता, उससे छिपाकर शादी कर दी गई हो। आजकल किसी का कुछ पता नहीं। बहुत धोखे होते हैं सभी रिश्तों में। दूसरे ही पल खुद को धिक्कारा... असंभव। इतना बडा झूठ बोलकर कोई शादी नहीं करेगा। हो सकता है राहुल वाकई अपनी भतीजी से अपार स्नेह रखता हो।
लाली की पहेली सुलझने के बजाय उलझती ही जा रही थी। क्या पूछे...और किससे पूछे के असमंजस में फंसी रही बहुत देर तक।
शाम को चाय लेकर उसकी छोटी ननद सीमा आई। सौम्या ने पूछा, ‘राहुल नहीं दिख रहे हैं कहीं बाहर गए हैं क्या?’
‘राहुल भैया लाली को लेकर आइसऋीम खिलाने गये हैं। वह *ाद कर रही थी मोटरसाइकिल पर घूमने की।’
अब और बर्दाश्त नहीं हुआ सौम्या से तो पूछ बैठी- ‘सीमा, यह लाली इतनी *ाद्दी क्यों है?’
‘हां भाभी, वह बचपन से ही बहुत *ाद्दी है। जब से उसकी मां नहीं रही, वह किसी से कंट्रोल ही नहीं होती। कुछ मना करो तो रोते-रोते सांस अटका लेती है। डाक्टर ने कहा है कि ऐसे में अचानक कुछ भी हो सकता है। इसलिए हम सबको उसकी बात माननी पडती है।’
अचकचा गई सौम्या ‘तो मोनिका भाभी... क्या वो लाली की मां नहीं?’
‘नहीं भाभी, भैया की दूसरी पत्नी हैं मोनिका भाभी।’
‘ओह.... तो यह बात है। हो सकता है लाली को अपनी मां की कमी खलती हो। राहुल उसे प्यार करते हैं, तो संभव है उसे लगता होगा कि उसे मैं भी प्यार करूंगी, इसलिए मेरे करीब रहना चाहती होगी।’ कुछ कुछ समझ रही थी सौम्या अब, मगर सब कुछ जानने को बेसब्र हो उठी थी सौम्या।
सौम्या ने हाथ पकडकर बिठा लिया सीमा को। ‘सीमा प्लीज... मुझे सारी बात बताइये कि क्या है। मैं कल रात से बहुत परेशान हूँ। लाली मेरे साथ भी अजीब व्यवहार कर रही है जैसे मैं उसके सामने बहुत छोटी हूँ। कुछ समझ नहीं पा रही माजरा क्या है। राहुल ने भी कुछ नहीं बताया... आप सब बताओ....।’
‘कुणाल भैया की पत्नी मोनिका बहुत प्यारी महिला थीं। शादी के तुरंत बाद उनकी बेटी हुई लाली, जो प्यार से पल रही थी। जब लाली तीन साल की तभी एक बार भाभी को बुखार आया, और मामूली बुखार के बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। हमें विश्वास नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है।
कुणाल भैया सबसे विरक्त हो गए। अपनी बच्ची पर भी ध्यान नहीं देते। तब राहुल भैया की नौकरी नहीं लगी थी। उन्होंने ही लाली को संभाला। उसका खाना-पीना... उसे सुलाना और घुमाना। लाली अपने पापा से दूर होती चली गई। राहुल को चाचा कहती थी मगर वह उसके लिए पिता से बढ कर हैं। इसलिए अपने पिता से ज्यादा चाचा से जुड गई है वो। यहाँ तक कि स्कूल जाते समय चोटी बनाना, कपडे पहनाना सब करते थे।’
सीमा विस्तार से सौम्या को सब बताने लगी। वह समझ रही थी कि नई भाभी के मन में बहुत सारे सवाल हैं। जब तक उन्हें जवाब नहीं मिलेगा, बेचैन ही रहेंगी।
‘दो साल ऐसे ही निकले। जमाने से विरक्त भैया को देखकर सबने तय किया कि उनकी दूसरी शादी करा दी जाए। ना-ना करते आखिरकार कुणाल भैया शादी के लिए तैयार हो गये और मोनिका भाभी बनकर हमारे यहाँ आ गई। उन्हीं दिनों की बात है कि राहुल भैया की नौकरी लगी और उन्हें दूसरे शहर जाना पडा।’
इतना ही बता पाई थी सीमा, तभी लाली के साथ राहुल लौट आए। लाली सौम्या के लिए भी आइसक्रीम पैक करा लाई थी। ‘लो सुम्मी... तुम्हारी फेवरेट आइसक्रीम केसर-पिस्ता।’
लाली को मेरी पसंद का फ्लेवर कैसे पता? फिर एक बार आश्चर्य में डूबी थी सौम्या। यह लडकी तो वाकई पहेली है मेरे लिए। फिर सोचा शायद बातों ही बातों में उसने राहुल को बता दिया होगा और उसे खुश करने के लिए राहुल लेकर आया है आइसक्रीम। जो भी हो, लाली की गुत्थी सुलझ ही जाएगी अब।
उन तीनों को छोडकर सीमा चली गई। मन ही मन सोचा सौम्या ने कि जब उसे यहीं रहना है तो लाली के साथ सामंजस्य बिठाना ही पडेगा। राहुल लेट गए थे आकर बिस्तर पर और वह लाली से बातें करने लगी। सामान्य-सी लाली कभी कभी उसे घूरती, तो वही असहजता महसूस करने लगती सौम्या, मगर खुद को ही झिडकती।
सबने मिलकर प्लान बनाया कि आज लाली के कमरे में सोएँगे राहुल और सौम्या, यह बताया जाएगा लाली को, ताकि उसके सोने के बाद वो दोनों अपने कमरे में जा सकें। हुआ भी यही। निश्चिंत लाली सो गई तब सोने का दिखावा करते वो दोनों अपने कमरे में गए।
बिस्तर पर आज पखुंडियां नहीं थीं मगर सजाए गए मोगरे के फूल अब भी सुगंध बिखेर रहे थे। उनके वैवाहिक जीवन की पहली रात राहुल के माफी माँगने और सौम्या के माफ कर देने से शुरू हुई। आज लाली नहीं, बस प्यार की चांदनी बिखरी थी उनके इर्द-गिर्द। कल के शिकवे को खत्म करने की पूरी कोशिश कर रहा था राहुल और सौम्या भी भरपूर साथ दे रही थी। वो नहीं चाहती थी कि नए जीवन की शुरुआत केवल एक रात बर्बाद होने के मलाल के साथ हो। दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हुए प्रेम की नदी में बहने लगे।
सुबह स्कूल जाने से पहले कंघी लेकर लाली राहुल के पास आई कि मेरे बाल बना दो। सौम्या ने कहा मैं बना देती हूँ, तो कहने लगी, ‘नहीं....चाचा ही बाल बनाएँगे मेरे।’
उसके जाने के बाद राहुल ने बताया कि लाली के बाल बचपन में बहुत लंबे थे। जब मैं था तो उसकी चोटी बना दिया करता था। मगर उसे अस्थमा की शिकायत है। पिछले साल वह छुप-छुप कर पानी में भीग जाती, जिससे उसके बाल नहीं सूखते। ऐसे में उसे अटैक आया और महीनों बीमार पडी रही। गुस्से में जाकर कुणाल भैया ने उसके बाल कटा दिए, जिस पर खूब हंगामा किया उसने। मोनिका भाभी उसे प्यार करती हैं मगर लाली ही अपनी माँ से जुडाव महसूस नहीं करती।
ओह... तो यही कारण है कि उसे बालों से इतना लगाव है। वो तो जाने क्या-क्या सोचने लगी थी। अब सौम्या को लाली से शिकायत नहीं रही। राहुल ने जिस बच्ची को पालकर बडा किया है, उसे भला कैसे नहीं प्यार करेगी वो!
शादी के सवा महीने तक उसे अपनी ससुराल ही रहना था। यही उसकी ससुराल की परिपाटी थी। एक सप्ताह के बाद राहुल को फिर से नौकरी ज्वाइन करनी थी। राहुल के जाने की सोचकर ही सौम्या को उदासी ने घेर रखा था, मगर नौकरी की मजबूरी से वाकिफ थी। सौम्या भरसक कोशिश कर रही थी कि राहुल को उदास न दिखे।
शाम ड्रेसिंग टेबल के सामने बाल संवारते यही सब सोच रही थी वो कि बाहर से आई आहट ने उसकी तंद्रा भंग की। जाने कौन है बाहर, सोचा ही था कि आईने में राहुल आता हुआ दिखा।
‘सुनिये मैडम, आज आठ बजे की ट्रेन से जाना है हमें। दो-तीन रो*ा में पक्का वापस आ जाएंगे। आप उदास मत रहना।’
सौम्या। ने जब कोई जवाब नहीं दिया तो उसके करीब आकर कंधे पर हाथ रखता हुआ बोला ‘सॉरी यार, मुझे तुम्हें छोडकर नहीं जाना चाहिए था मगर बहुत अर्जेंट आफिशियल वर्क है और इसमें मेरा पर्सनल इंट्रेस्ट भी। मैं जानता हूँ यहाँ तुम्हें मेरे बिना रहना अच्छा नहीं लगेगा, मगर यकीन मानो, वापस आकर मैं तुम्हारी हर शिकायत दूर कर दूँगा।’

सौम्या को उसका बेचारा-सा मुँह देखकर तरस आ गया लेकिन अपने मन के भाव छिपाते हुए बोली, ‘जाइए हमने कौन-सा आस्तीन पकड कर रोका है आपको। वैसे भी यहाँ रुक कर करना क्या है? जाकर अपना काम कीजिए।’
अपराधबोध से भरे राहुल ने पूछा- ‘आफ लिए कुछ लेता आऊँ शहर से?’
‘ऐसा है राहुल, हम गांव वाले तो हैं नहीं। शहर में जिंदगी गुजारी है अब तक, सो कोई अनूठी ची*ा तो मिलेगी नहीं वहाँ जो आप मेरे लिए लेकर आइए। इसलिए ये चोंचले मेरे सामने तो न दिखाइए।’
कमरे के हल्के अँधेरे में राहुल के खिसियाये चेहरे का मजा लेती हुई उसके पास आई और हाथों में हाथ लेकर बोली- ‘मुझे किसी ची*ा की जरूरत नहीं। बस आप जल्दी आ जाइए मैं इंत*ाार करूँगी।’
राहुल का चेहरा खिल उठा और उसने सौम्या को प्रगाढ आलिंगन में कस लिया। ‘मतलब आप मुझे मिस नहीं करने वाली हैं?’
‘मिस करूँगी तो मन लगाने के लिए आपकी लाइब्रेरी से कुछ पढ लूँगी। वैसे भी लाली है न... उसने तो अभी तक घर की पिछली दीवार पर टंगे घडों का आशियाना ही दिखाया है मेरी सासू मां के प्रिय कबूतरों का। अभी कितना कुछ देखना बाकी है। आप मेरी चिंता मत कीजिए।’
खाना खाकर राहुल चला गया। उसे स्टेशन तक जाने का मन था मगर सबने मना किया कि ट्रेन बहुत कम देर रुकती है। इसलिए कोई फायदा नहीं।
वह नीचे डायनिंग रूम में ही थी तभी सीमा ने कहा कि आज वो साथ सोएगी ताकि उन्हें अकेलापन न लगे। लाली अपनी मम्मी के साथ सोने वाली है।
शायद सीमा ने लाली को चिढाने की गरज से यह बात कही थी क्योंकि यह कहते हुए कनखियों से लाली की तरफ देख भी रही थी। सच में लाली चौकन्नी हो उठी और उसके पास आकर धीरे से बोली- ‘सुम्मी बहू, तुम गुस्सा हो क्या मुझसे?’
उसकी मासूम आँखें देख सौम्या को प्यार उमडा और उसे अपने से सटाकर बोली- ‘बिल्कुाल नहीं। आप तो हमारे साथ ही सोयेंगी।’ लाली खुश होकर सीमा को देखकर मुँह चिढाने लगी। सब लोग इस चुहल से हंस पडे और राहुल के जाने की उदासी छंट सी गई।
कुछ देर बात वह अपने कमरे में थी। सौम्य ने साडी बदल कर गाउन पहना। लाली वहीं बैठकर कार्टून देखने लगी। सीमा को अपनी पढाई करनी थी इसलिए वह यह कहकर चली गई कि पढने के बाद सोने के लिए यहीं आ जाएगी। सौम्या राहुल की छोटी सी लाइब्रेरी से छांटकर कीट्स की ‘कविताओं की मीमांसा’ किताब पढने लगी। इसी बीच राहुल का फोन आया।
‘तुम ठीक हो सौम्या? मुझे नींद आ रही है। सोने से पहले सोचा तुम्हें गुड नाइट कह दूँ।’
‘हां, बिल्कुल ठीक हूँ। आप आराम से सोइए। यहाँ सीमा और लाली हैं मेरे साथ।’
राहुल से बात करने के बाद उसे लगा कि कोई अच्छी सी नॉवेल या कहानी संग्रह पढनी चाहिए। उसने शेल्फ के पीछे की किताबों को तलाशना शुरू किया। एक पुरानी सी जिल्द लगी किताब निकालकर देखी तो वह खुश हो गई कि यह अज्ञेय की सुप्रसिद्ध किताब थी ‘नदी के द्वीप’ जिसे पढने की इच्छा बहुत दिनों से थी उसे।
आज सुकून से अपनी मनचाही किताब पढ पाएगी, इस गरज से वह अपने बेड पर आ गई। सीमा को आने में देरी थी और लाली टीवी देखते-देखते वैसे ही अधलेटी-सी सो गई थी। बेचारी बच्ची...जाने क्यों दया- सी आयी उसके लिए और सौम्या ने उसे ठीक से बिस्तर पर लिटाकर चादर ओढा दिया। टीवी ऑफ किया तो लाली हल्की-सी कुनमुनाकर सौम्या से सटकर सो गई।
अब आराम से तकिए की टेक लगाकर अपनी फेवरेट बुक खोली तो उसके पहले पन्ने को खोलते ही कोने में लाल स्याही से लिखा एक नाम नजर आया ‘जनक दुलारी गुप्ता’, जैसे सौम्या के मस्तिष्क में कहीं टन्न से टकराया यह नाम। उसी वक्त लाली के हाथ का कसाव अपनी बाजू पर महसूस किया उसने। लाली की ओर देखा तो वह गहरी नींद में सो रही थी, मगर उसके होठों से कुछ अस्फुट से स्वर निकल रहे थे। ध्यान देकर सुना तो जैसे वो बडबडा रही थी...‘सो जाओ न सुम्मी...सो जाओ।’ फिर चुप....
उसे लगा लाली से पहले भी कोई उसे इस नाम से पुकारता था... सुम्मी।... कौन पुकारता था? न*ार अचानक किताब पर लिखे नाम पर गई....अरे, जनक दुलारी मैडम यानी उसकी जनक दीदी....उसकी हिंदी की टीचर।
उफ ...
बिस्तर से उतर गई सौम्या। समय देखा, साढे नौ हुए थे। माँ अभी जाग ही रही होंगी। उसने तुरंत मां को फोन लगाया। पहले इधर-उधर की बातें की। राहुल के जाने की बात बताई, फिर सीधे पूछा- ‘अच्छा मां...बताओ, कभी कोई मुझे सुम्मी के नाम से बुलाता था क्या घर में?’
‘नहीं...घर में तो नहीं, मगर जब तुम छोटी थी तो तुम्हारे पापा का तबादला गिरिडीह में हुआ था, वहाँ एक स्कूल टीचर थी, जो तुम्हें सुम्मी कहकर बुलाती थी। वह तुम्हारे ससुराल के आसपास की ही थी....।’
आगे क्या बोला माँ ने, उसे सुनाई नहीं दिया। उसे सब याद आने लगा। वह दूसरी या तीसरी कक्षा में रही होगी तब हिंदी की टीचर जनक दीदी उसे बहुत अच्छी लगती थी। जनक दीदी बहुत खूबसूरत थी दिखने में और गला भी उतना ही सुरीला था उनका। रोज सुबह अपनी मीठी आवाज में स्कूल की प्रार्थना गाती वो और सब बच्चे उनके पीछे-पीछे दुहराते थे।
जनक दीदी भी सब बच्चों से ज्यादा उसका ध्यान रखती। सौम्या के बाल शुरू से ही भूरे और कर्ली थे। सुबह जल्दी-जल्दी नहाने पर गीले बालों को कंघा करना भी कितना मुश्किल काम है, यह बात माँ के झल्लाहट से समझ आ जाती थी। कई बार वह ऐसे ही स्कूल भाग कर चली आती तो जनक दीदी उसके बाल बना दिया करती थी। वह अकेली रहती थी, इसलिए शायद सौम्या को बहुत प्यार करती थी। कभी-कभी उसे टॉफी भी देती थी। दो-तीन बार उनके घर भी आई थीं वो।
उसे याद है माँ को बाबा से कहते सुना था- ‘कितनी अच्छी हैं ये टीचर, मगर भगवान भी कुछ लोगों के साथ बहुत अन्याय करते हैं। पति को लापता हुए कई साल हो गए। कोई बच्चा भी नहीं जिसके सहारे जी ले... ऊपर से ब्रोंकाइटिस की बीमारी......’
एक दिन जनक दीदी अपनी क्लास में नहीं आईं। खाली कक्षा में बच्चे शरारत कर रहे थे मगर सौम्या की आँखें अपनी दीदी को ही तलाश रही थी। अंत में जब रहा नहीं गया तो उनको ढूंढते हुए स्टाफ रूम की तरफ चल पडी सौम्या जो क्लास रूम से दूर पीछे की तरफ था।
उस रोज अजब का सन्नाटा था गलियारे में। वह डरी, मगर चलती रही। कुछ देर में वह स्टाफ रूम के गेट पर थी। अंदर झाँकते ही उसे अजीब तरह से साँस लेने की आवाज सुनाई दी। सौम्या ने देखा कि जनक दीदी जमीन पर पडी हैं और बहुत अजीब ढंग से सांस ले रही हैं, जिससे गों....गों की आवाज आ रही थी। यह देखकर उसकी चीख निकल गई।
आसपास की कक्षाओं से निकलकर लोग उसकी तरफ दौडे। देखते ही देखते सारा स्टाफ रूम भर गया और उसे आगे दिखना बंद हो गया। एक सर की नजर उस पर पडी तो उसने काम वाली दीदी की तरफ इशारा किया और दीदी ने उसे गोद में उठाकर उसके क्लास रूम में बिठा दिया।
उस दिन के बाद जनक दीदी कभी नहीं दिखीं। वह परेशान सी उन्हें तलाशती रहती। माँ ने पूछने पर बताया कि दीदी की तबियत खराब हो गई थी न, इसलिए वह अपने गाँव चली गई हैं। जल्दी ही ठीक होकर वापस आएंगी उसे पढाने।
माँ यह कहतीं और स्कूल के बच्चे आपस में बात करते कि जनक दीदी तारा बनकर आसमान में चली गई हैं। अब वह कभी नहीं आएँगी। कई दिनों तक अबोध सौम्या आसमान के तारों में अपनी जनक दीदी को ढूंढती। इसी बीच उसके पिता का ट्रासंफर हो गया और वक्त के साथ सारी यादें धुंधली पडती गईं। आज एक सिरा मिला तो सब कुछ सिल-सिलेवार याद आने लगा उसे।
भाभी...भाभी....क्या हुआ ? सीमा जोर-जोर से उसका कंधा पकड कर हिला रही थी। तंद्रा भंग होने पर महसूस किया कि वह रो रही थी।
‘क्या हुआ भाभी, भैया की याद आ रही है या घर की याद आ रही है? माँ को बताऊं क्या ...प्लीज आप चुप हो जाइए।’
परेशान सीमा उसके रोने की वजह तलाश रही थी। सौम्या वर्तमान में लौट आई थी। आँसू पोंछकर सीमा को पास बिठा दुलराया और कहा ‘परेशान मत हो। बस मां की याद आ रही थी। अभी उनसे बात किया न... तो दिल भर आया तो रो पडी।’
‘चलो भाभी अब सोओ, बहुत देर हो गई।’ कहते हुए सीमा ने वो किताब उठा ली।
‘अरे भाभी... इतनी पुरानी बुक आपने शेल्फ से कैसे ढूंढ निकाली? जानती हैं...यहाँ अधिकतर किताबें जनक बुआ की हैं। पापा कहते हैं उन्हें बहुत शौक था किताबों का। जब वो नहीं रहीं, तो उनकी सारी किताबें पापा उठा लाए थे उनके घर से। इन पुरानी किताबों को कोई नहीं पढता घर में, हाँ पापा को कई बार फुर्सत के क्षणों में इन किताबों तक जाते जरूर देखा है.... लाली कई बार उठा लाती है इन्हें, एक बार तो उसने जनक बुआ की किसी किताब पर कितनी आडी-तिरछी लकीरें खींच दी थी... ये किताबें खराब न हो जाएँ इसलिए मैंने भैया के शेल्फ में पीछे सजा दी हैं इन्हें। देखो तो महारानी को....कैसे मजे से सोई है आफ बेड पर। ऐसा लगता है जैसे बचपन से इसे राहुल भैया ने नहीं, आपने ही पाला है।’ लाली के चहरे पर फैले सुकून ने उस दिन उसके लिए सौम्या के भीतर एक अनकहा-सा स्नेह रोप दिया था।
सीमा के जाने के बाद सौम्या ने लाली को चादर ओढाई.... नींद में हौले से कुनमुनाने के बाद लाली ने सौम्या की उंगली पकड ली थी।
अगली सुबह सौम्या देर से उठी। उसके चहरे पर एक नई चमक थी, जैसे कई रातों की नींद पूरी होने के बाद जगी हो... संडे के कारण न तो लाली को स्कूल जाना था और न ही सीमा को कॉलेज। बहुत दिनों के बाद गुनगुनाहट थी उसके होठों पर।
सौम्या नहाकर ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठी ही थी कि लाली उसके पीछे आकर खडी हो गई।
‘लाओ सुम्मी, बाल मैं बना दूँ।’
बिना किसी झुंझलाहट के मुस्कराते हुये सौम्या ने कंघी लाली को पकडा दी थी। उसे याद आया जनक दीदी भी तो उसे सुम्मी ही पुकारती थीं। लाली के बोल अब भी उसके कानों में गूंज रहे थे... सुम्मी... जनक दीदी की सुम्मी.... लाली की सुम्मी... सौम्या ने आदमकद आरसी में देखा- लाली बहुत तन्मयता से उसके बाल संवार रही है। उसे लगा जैसे लाली के मासूम चेहरे पर सहज ही जनक दीदी का चेहरा उतर आया है... चौंककर एक बार गहरी निगाहों से उसने फिर से लाली की ओर देखा... वह आपादमस्तक आश्चर्य से भर उठी- लाली... जनक दीदी... जनक दीदी.... लाली.... लाली और जनक दीदी के चेहरे जैसे आपस में घुलमिल से गए थे... अनजाने ही उसकी आँखें छलछलाकर धुंधली-सी हो आईं। उसने आँचल के कोर से अपनी आँखें साफ की... लाली की नन्ही उँगलियाँ बहुत मनोयोग से उसकी चोटियाँ गूँथ रही थीं.... सौम्या का जी हुआ वह लाली को गले से लगा ले....
वह लाली की तरफ मुडना ही चाह रही थी कि उसकी आवाज एक बार फिर से गूंजी- ‘सर मत हिलाओ सुम्मी, चोटी टेढी हो जाएगी’ सौम्या अच्छी बच्ची की तरह सीधी हो गई... उसकी आँखें अब भी भरी हुई थीं।