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साँप

रत्नकुमार सांभरिया
सुबह के साढे आठ बजे थे। सेठ मुकुंददास दुकान चले गये। मिलन नहा-धो, नाश्ता-पानी कर सार-श्ाृँगार कर चुकी थी। साडी की सलें चुटकी से पकडे पिन बाँध रही थी, फोन घनघना उठा। उसने झटपट पिन लगाई और लपक कर चोंगा उठाकर कान से लगाया-‘‘हेलो।’’
‘‘यस, मिलन मैं बोल रही हूँ, एस.पी. धर्मकँवर।’’
‘‘जी मेम, नमस्कार। कहिएगा।’’
‘‘मिलन खुशी भरी खबर है, हम दोनों के मनचाही।’’
‘‘जी मेम, बताएँ?’’ वह गद्गद हुई।
एस.पी. ने कक्ष में लगी तस्वीरों की ओर देखा। आँखें गोल कीं। उत्साहभरी साँस खींची और बताने लगी-‘‘मिलन आपने सूचना दी थी न, ‘लखीनाथ का कुत्ता बदमाशों को भगाकर लौटा तो वह अपना मुँह चाट रहा था।’
‘‘जी मेम।’’
‘‘आपकी वह सूचना बलवाइयों तक पहुँचने का महत्त्वपूर्ण सोर्स रही।’’
‘‘मैं समझी नहीं मेम, प्लीज बताएँ?’’
‘‘उसी बेस पर मैंने हॉस्पिटल में सर्च कराई, रात कुत्तों के काटने के कितने पेशेंट रैबिज वार्ड में भर्ती हुए?’’
‘‘फिर?’’ वह चौकन्ना, पर जिज्ञासु थी।’’
‘‘सिविल हॉस्पिटल के रैबिज वार्ड में चार लोग भर्ती मिले। दो को कुत्तों ने काटा, एक को रीछ या भालू ने पंजे मारे और एक को बंदर ने पंजा मार कर घायल किया।’’
‘‘वाह मेम, वाह। आपकी मेधा को दाद दूँ।’’
‘‘थैंक्स। मिलन एक बात और जो काबिलेगौर है।’’
मन में उल्लास लिए उसने पूछा-‘‘बताएँ मेम?’’
‘‘पुलिस रिपोर्ट के आधार पर बात पुख्ता हुई, डेरों में की गई आगजनी एम.एल.ए. और निलंबित थानेदार धारसिंह की रंजिशभरी साजिश थी।’’
‘‘यही न, भयभीत डेरे वहाँ से उठकर कहीं चले जाएँ। हवालात में बंद थानेदार और वे दोनों लुटेरे, जो पार्टी के कार्यकर्ता और एम.एल.ए. के अजीज हैं, गवाहों के अभाव में कानून के शिकंजे से बच निकलें।’’ मिलन ने कहा।
‘‘यस मिलन। यू आर हण्ड्रेड पर्सेंट राइट। एकदम दुरुस्त फरमाया आपने। अब उनके शिकंजे की नॉट (गाँठ) और कस गई है।’’
‘‘वह कैसे मेम?’’ मिलन के रोम-रोम में खुशी की फुरेरी उठी।
‘‘आज के अखबार पढे आपने?’’
‘‘सॉरी मेम। आज नौकरानी नहीं आई और मुझे ऑफिस निकलना है। टाइम नहीं मिल पाया।’’
‘‘मिलन।’’
‘‘जी मेम, फरमाएँ?’’
‘‘एम.एल.ए. की वह करतूत पार्टी की साख के लिए ताबूत की कील साबित हुई। अपनी छवि बचाने के लिए पार्टी ने उसे सोकॉज नोटिस सर्व करवाया है। पाँच साल के लिए पार्टी से निष्कासित भी किया जा सकता है, उसे।’’
‘‘वाह, वाह।’’ वह और प्रसन्न हुई।
‘‘एक बात और है मिलन।’’
‘‘जी।’’
‘‘वह यह कि अपने पद और सेवानिष्ठा से गद्दारी करने वाले निलंबित एस.एच.ओ. को बर्खास्त करने का एक्शन पुलिस महकमा बाकायदा ले रहा है।’’
जैसे घुमडते मेघ हवा के झोंकों से फट कर तितर-बितर हो जाते हैं, मिलनदेवी के अंतस की घनीभूत चिंता एस.पी. की खबर के बाद क्षीण हुई। कहने लगी-‘‘अपना मार्ग निष्कंटक हुआ मेम, वरना ये लोग रोडा बनते।’’
‘‘मैं भी तो वही कहने जा रही हूँ, मिलन। आप अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो जाएँ। धर्म का काम है। मैं तन-मन से साथ हूँ, आफ।’’
‘‘मेम अगर उन खानाबदोशों के स्थाई आवास का बंदोबस्त हो जाता है तो शनैः शनैः संसाधन जुटते जाएँगे और गरीबी का उनका लबादा झीना होता जाएगा।’’ मिलन का मन मगन और तन गगन हुआ जाता था। वह तराशी भौंहों पर हल्के-हल्के अँगुली फेरती रही।
‘‘मिलन वाह। आपने तो मेरे ही मुँह की बात ले ली है। मिलन, नेकियाँ मेरा धर्म रहा है। वीरानों की वाजिब समस्या पर वक्त की काई इतनी घनी हो गई, उनका घुमक्कडपन सोसायटी और गवर्नमेंट को नेचूरल लगने लगा है।’’
‘‘मेम। अफसर खूब हैं, आप बेहतर इंसान हैं। आपकी शुभकामनाएँ मेरे साथ हैं। मैं आज से ही अपने काम को अंजाम देने जुटती हूँ।’’
‘‘निःसंकोच मिलन। बेगानों का कोई तो दीवाना हुआ।’’
‘‘ओ.के.।’’
मिलन खडी-खडी फोन कर रही थी। उसने रिसीवर ऋेडिल पर रख दिया। ज्यों-ज्यों लक्ष्य निकट दिखाई देता था, उसकी ‘वह’ चाह बढती जाती थी। गोडों पर सिर रखकर गोल हुई बैठ गई। खुद में खो गई। कभी भंवर, कभी भभूल्या। लखीनाथ की हथेली पर अपनी अँगुली से लिखा ‘वादा’ और सोने की डिबिया में रखा लखीनाथ की मूँछ का वह बाल उसकी याददाश्त की बही में द*ार् है, मोटे-मोटे आखरों में। पन्ने पलट-पलट उसकी आँखों के सामने आते। उसने स्वयं को बाँहों में भर लिया। कुछ सकुचाई-सी, कुछ लजाई-सी, कुछ शरमाई-सी, कुछ रिझाई-सी वह कभी बदली बन इठलाती, कभी बूँद हुई पूर्णता पाती। रीझ-सीझ दिल की घुमडन उठती-बैठती। अजीब निवेश से वह कभी निथरती, कभी डूबती थी। उसका ‘वादा’ लखीनाथ का ‘इरादा’ और एस.पी. का उत्साहवर्द्धन।
कोख। आबरू। परहित।
कोख! कोख बूंद होती है, जात नहीं।
वह अपनी हथेली पर अँगुलियाँ फेरने लगी थी, मानो कुदरत की खिंची लकीरों को मिटाकर खुद की इबारत लिखेगी। विचारती रही, विचारती रही। विचारती-विचारती विचारों में गुम गई।
‘दुनिया का कोई कार्य पाप-पुण्य की तुला पर एकसार नहीं होता। सत्कर्मों का पलडा सदैव भारी और दुष्कर्मों का पलडा उठा रहता है। चाह को न हहराता समन्दर डूबो सकता है, न आग की फरफरातीं लपटें उसे जला सकती हैं। न उसे आँधी उडा सकती है, न मेह भिगो सकता है। आँगन में खिले पुष्प को देखकर कौन अभागा खुश नहीं होगा।
एक लक्ष्य से दो कार्य सधते हैं। ज्ञात-अज्ञात। ज्ञात दीन-दुखियों की सेवा है। परमार्थ है। अज्ञात खुद का स्वार्थ है। मनोरथ है। वंश...........।
उन घुमन्तुओं को देखकर मन बेचैन होता है। दिन-रात का अंतर दिखाई देता है। वहाँ भूख-प्यास है, यहाँ व्रत-उपवास के चोंचले हैं। उनकी उम्मीदों पर इतना पानी फिर गया ओर-छोर तल दिखाई नहीं देते। *ांदगी और मौत का इतना कडा मुकाबला। जिन लोगों ने गुलामी को प्राण-वायु माना वे राजा-महाराजा हो, महल-प्रासाद पा गए। जिन्होंने पराधीनता से टक्कर ली, वे वीराने-कंगाल, दर-दर के रह गए। बेगानों का भूतकाल बेगारी और शोषण में गु*ार गया, वर्तमान बदहाली में बीत रहा है।’
ध्येय का बीडा उठाए वह उठ खडी हुई थी। कुहनियाँ उठा कर ऐसी अंगडाई तोडी, वर्जनाएँ तोडेगी। आँखें घुमाईं। भवें चढाईं। आवक्ष आईने के सामने आई। साडी की सलें नाखूनों की चुटकी से सूत लीं।
वह होंठों पर लाली लगाए थी। माँग भरे थी। सिल्क की जैसी साडी, वैसी ही गुलाबी बिन्दी माथे पर चिपकी थी। कलाइयों में उसी कलर की चूडियाँ थीं। बैग और सैंडिल का रंग भी वही था। वह गैराज की ओर जाती ऐसी लग रही थी, मानो भानूदय की अरुणिमा उतरी जाती हो।
जेठानी सूरतदेवी चौक में किताब पढने बैठी थी। उसने कनखियाँ फिराकर मिलन को एडी से चोटी तक देखा। होंठ बिचका कर बडबडाई-‘‘दो कौडी के सूगला से सपेरे से आँखें चार क्या हुईं, बनाव-ठनाव खोई रहती है। देखना हवेली की आबरू डुबोएगी, एक दिन।’’
मिलन के अंतस में दोहरा हर्ष जरूर था। मन ऊहापोह से घिरा था। ऊँच-नीच की चकल्लस तन बौराया था। लजाई चाल सहमी-सहमी थी।
उसने गैराज से गाडी निकाल ली। वह गाडी चलाती जा रही थी, मन सपने के आगोश में था। कलरव विहीन नदी के किनारे-किनारे, सूरज के तेज के साथ-साथ, जल में झिलमिल दिखती उसकी परछाईं उसे सुहानी लगती है कि मेघ छा जाते हैं।
जन मन समिति का दफ्तर आ गया था। मिलन ने आज की मीटिंग स्थगित कर दी। बाबू गणेशीलाल को साथ ले लिया और गाडी चलाती ‘‘बनजारा टी स्टाल’’ पहुँच गई। उसने गाडी वहीं पार्क कर दी और आंकी-बाँकी वही पगडण्डी पकड ली, जो डेरों की ओर निकलती थी।
सुबह का टेम रहा। घुमन्तू अपने-अपने जीव-जिनावर लिए धंधा-पानी चले गये थे या फिर जाने को थे। असामाजिक तत्त्वों ने यहां दो डेरे फूंक दिये थे। मिलन और गणेशी जले पडे उन डेरों के सामने से गु*ारे। धुएँ का कसैलापन उनकी नाक में चढा। गणेशी लपकते कदमों आगे बढ गया, मिलन अफसोस करती निकली।
बहुरूपिया थानेदार का रूप धरे था। डेरे में रहते खान-पान और रोटी-लत्ता का तोडा भले पडा था, थानेदार का किरदार, उसका रौब डाटे नहीं डटता था। गबरू बहुरूपिया के गरूर का नशा असल थानेदार से कहीं डटकर था। खाकी वर्दी पर तीन-तीन स्टार लगाए, सिर पर कैप पहने, हाथ में चिकना-सा डण्डा लिए डेरे से निकल रहा था, मिलन आ गई। डेरे आते-जाते या ‘‘बनजारा टी स्टाल’’ पर मिलन से उसकी भेंट थी।
वह पहली दफा ‘‘बनजारा टी स्टाल’’ पर मिलन से मिला था। सेठ के भेस में था, उस दिन। पहचानते सिर चकरा गया था, मिलन का। उसके मातुल (मामा) कहाँ आ बैठे, यहाँ?
थानेदार! वह मिलन के सामने सीना तान कर खडा हो गया था। मुट्ठी भिंचे डण्डे को हवा में मारा। गुस्सा के मारे फडकते होंठों कडक कर बोला-‘‘जिन हुडदंगियों ने दो डेरे फूंके हैं, गिरफ्तार कर जेल में डाल देगा।’’
थानेदार का रौब देख साडी का पल्लू सिर पर खींचती मिलन हल्की-सी हँसी-‘‘थानेदार साहब, उन सब पर कार्रवाई हो चुकी है। बदमाशों को पुलिस हिरासत में ले लिया गया है। नाराज न हों, निश्चित रहें, आप।’’
बहुरूपिया ने पैर धमक कर सेल्यूट किया और मिलन के चरण-कण लिए। सीधा सट्ट खडा हो गया और डण्डा बगल में दबाकर बोला-‘‘वाह, बहन जी वाह। घणो मोटो काम हुयो यो तो, म्हारी आबरू रही।’’
मिलन यहाँ आने का मकसद उसे बताने लगी-‘‘भाई बहुरूपिया डेरों का सर्वे करने आए हैं, हम। अपनी समिति के माध्यम से रिपोर्ट सरकार को भेजेंगे। मेरी मंशा है, जहाँ जिसका डेरा है, वह वहीं स्थाई आवासी हो। सरकार सहानुभूतिपूर्वक गौर करे और सरकारी तौर पर पट्टे अलाट हो जाएँ। आखिर आप लोग भी तो समाज के अभिन्न अंग हैं। वक्त ने उथल फेंका बात अलग है। घुमन्तू रहेंगे, फाका बना रहेगा। कितना बडा त्रासद है, तन-बदन पर पहना लत्ता-कपडा और गोल बिस्तर ही आप लोगों की चल-अचल संपत्ति है।’’
बहुरूपिया के शरीर सनाका-सा उतरा। मिलन की आँखें नम हो गईं। गणेशी देखता रहा।
बहुरूपिया ने सामने खडी खाट बिछा दी। दावण टूटी झंखाड-सी यह वही खाट थी, जिस पर बैठ कर वह वार-वार नया रूप धरता है। उसने खाट थपकी और मनुहार की-‘‘बैठो बहन जी।’’
मिलन खाट पर बैठी, बहुरूपिया उसके सामने नीचे बैठ गया, उकडू। आ*ा*ा-सा। उसके दोनों हाथ जुडे थे। डोरोंभरी आँखें याचना टिमटिमाएँ थीं। पीढी-दर-पीढी घर का सपना संजोए चली गईं। सर्वे की बात पर वह इस कदर बिसूरा मानो अन्त्योदय की पाँत का सबसे योग्य पात्र वही है।
मिलन गणेशी से मुखातिब हुई- ‘‘गणेशी जी आप डायरी में नोट करते चलें।’’
‘‘उसन बहुरूपिया से पूछा- ‘‘आपका शुभ नाम क्या है?’’
उसके भीतर बिजली-सी कौंध गई। चिनगारी-सी चटकी। तन-मन खलबली मची। उसका नाम? उसके तो नाम, जात, धर्म, कर्म सब बहुरूपिया हैं। बाहर-भीतर, डेरा-डगर बहुरूपिया कहवैं। वक्त के साथ रुल गये अपने नाम को उसने रौल-रौल संवारा। पूछा-‘‘मेरो नाम बहन जी?’’
‘‘हूँ।’’
‘‘सहाद्दीन वल्द रुकादीन उमर तीस बरस। जात मुसलमान।’’
गणेशी डायरी लिए खडा था। बहुरूपिया उतावली में बोल गया। गणेशी याद नहीं रख पाया। फिर पूछा- ‘‘अरे भई धीरे-धीरे बताओ, लिख पाऊँ।’’
‘‘सहाद्दीन वल्द रुकादीन उमर तीस बरस। जात मुसलमान।’’
गणेशी ने लिखा और कहा-‘‘ठीक है।’’
पुलिसकर्मी जिसको एस.पी. ने यहाँ सुरक्षा की दृष्टि से भिजवाया था। वर्दी पहने, हाथ में डण्डा लिए घूमता-घामता आ गया था। रिटायरमेंट के नीडे था। पत्ता सरीखा उसका बदन, हवा हिले। मधुमेह का मरीज, रोज सुई लगे। दारू की लत, कोढ में खाज। ऊँचे धड पर शुतुरमुर्ग-सी लम्बी गर्दन। नाक ऊपर चढी थी। आँखें भले बडी-बडी थीं, सूझती कम थीं। ढीले-ढंकल कपडों में वह खेत में खडे बिजूका-सा लगता था। ना नौकरी करने का कायदा, ना रहने का शऊर। महकमा नाराज। जहाँ भर्ती हुआ, वहीं का वहीं था। कांस्टेबल।
सिपाही को आया देख बहुरूपिया झट खडा हो गया था। डण्डा हाथ में पकडे था। सिपाही घबराया। विलम्ब हुआ, दरोगा साहब उससे पहले आ गए। उसने चढी साँसें रोकीं। डण्डा बगल में दबा लिया और बहुरूपिया को *ाोरदार सेल्यूट किया-‘‘हुकुम।’’
बहुरूपिया के *ोह्न में झेंप और होंठों पर पुलक थीं, ‘थानेदार के भेस पुलिसियो गच्चो खा गयो। सलाम ठोक्यो, पैर धमक के।’
काँस्टेबल के इस मतिभ्रम पर मिलन और गणेशी के दाँत निकल पडे थे। सिपाही को संदेह हुआ। गली-कूचे स्वांग दिखाता बहुरूपिया है स्साला, दरोगा नहीं। आत्मग्लानि हुई और गुस्सा के मारे ताव आ गया। डण्डा उठाते हडक मारी- ‘‘स्साले बहुरूपिया पुलिस की वर्दी पहन कर पुलिस को बेवकूफ बनाता है।’’
मिलन ने उससे कहा- ‘‘अरे-अरे यह क्या करते हो, तुम? रुको।’’
बहुरूपिया न कतई डरा, न तनिक घबराया। अपने अंदाज बाअदब सेल्यूट किया- ‘‘जी हकम।’’
जलती आग पर पानी डालने पर वह बुझ जाती है और राख भरा गीला धुआँ उठता है। सिपाही ने ऋोध बुझी गंधाती साँस मारी।
काँस्टेबल ने मिलन से कहा-‘‘मेम, एस.पी. साहिबा ने यहाँ भिजवाया है, मुझे। हुक्म फरमाएँ।’’ सिर से पैर तक की उसकी थकान चेहरे पर उडती हवाइयों के रूप में मौजूद थी।
मिलन ने उसे हिदायत-सी दी-‘‘आप तो बस इतना-सा सहयोग करें। हमारे साथ रहें।
‘‘जी।’’
वे आगे बढे। अगला डेरा रोशनी का था।
रोशनी मैली-कुचैली ऊँची-सी घाघरी, झिनी-सी कुरती पहने थेगलियाँ लगी लूगडी सिर पर डाटे नंगे पैरों खडी थी, डेरे के बाहर। मंगती हो। तेईस की उसकी काया की मादकता को घर का अभाव और पति की उपेक्षा खा गये। पति की बेवफाई के कारण दिन-रात आँसू बहते। ना विधवा। ना सधवा। मरद दूसरी से था और महीने में एकाध बार डेरे आता। औरत जात जल्दी सीझती है। वह उसे बहलाता-फुसलाता और उसकी कमाई मार ले जाता। बेचारी खिलौने वाले के वहाँ खिलौने बनाकर अपना पेट भरती। खिलौने वाले विधुर कुचबंदे ने कई बार सैन की, ‘उसके रह जा। दोनों कमा-खा मौज करगा।’ वह अपने सत रही। नाड हिला दी, साफ।
वह अभी-अभी खिलौने बनाकर लौटी थी। हाथ मिट्टी सने थे। उसके सांवले चेहरे पर कई जगह मिट्टी के टप्पे थे। खिलौने बनाते, लूगडी संगवाते अँगुलियाँ छू गईं। माटी की सरद-गरम, न केवल उसके पैरों में ही, हाथों में भी बिवाइयाँ फटी थीं।
सिपाही समेत चार जनों को सुबह-सुबह डेरे आया देख, उसका कालजा जगह छोडने लगा था। हाथ जुड गये। घबराहट थामती बोली- ‘‘पिधारो। निमसकार। राम-राम।’’
‘‘नमस्कार। तुम्हारा नाम क्या है?’’ मिलन ने उससे पूछा।
‘‘रोसनी। रोसनी बाई।’’
‘‘पति का नाम ?’’
बहुरूपिया ने उसकी ओर एकटक देखा।
वह शर्म खा गई। खुद में लुकी। बहुरूपिया की ओर निगाह भरी-‘‘बता दे ना, खडो-खडो दीदा काढा।’’
बहुरूपिया ने उसकी ओर हास से नेत्र टिमकाए और गणेशी की ओर देखते हुए बोला-‘‘माँडो, बोलाराम, बाप हमीराराम, जात कुचबंदा, उमर पचीस।’’
उसने गणेशी की ओर सवालिया निगाह देखा और क्षुब्ध साँस मारी-‘‘पर बाबूजी, वो तो घणो बदमाश है। घणा-घणा दिनां में एकाध दिन इके पास आवै। पिसा की खातर मूंज-सी ऐसी कूटे। बिचारी डांगर की नाईं ढा-ढा रोवै।’’
रोशनी की वेदना पलकों रिस आई। आँखें निकालकर बोली-‘‘दारीका चुप रह तू। मेरो मरद। मैं जाणूं, वो जाणै। दाल-भात में मूसलचंद तू कौण।’’ और उसने पति की बदचलनी के आँसू अपनी लूगडी के पल्लू में ले लिए थे।
मिलन भाँप गई थी, ‘खुदा ना खास्ता उसका मिशन सफल रहा, वह हरामी मरद पट्टा बेच खाएगा और यह फिर बेवारसी रह जाएगी।’ वह गणेशी से बोली-‘‘इसी का नाम लिख दो। रोशनी वाइफ ऑफ बोलाराम। एज ट्वेंटी थ्री। कास्ट कुचबंद।’’
वे सब आगे बढ गये थे। रोशनी खडी-खडी उनकी ओर देखती रही, ‘के काम आया, नाम, उमर, जात मांडी?’
अगला डेरा सूना पडा था। थान सरीखा। रहवासी मदारी का रीछ कई दिनों से बीमार था। डेरे में बस दो ही प्राणी थे। विधुर मदारी और रास बंधा बेबस रीछ। वह आज रीछ को लेकर धंधा-पानी निकला था।
बहुरूपिया ने सूने डेरे के तहमद लटके गेट की ओर निगाह मारते गणेशी की ओर देखा-‘‘माँडो। मैं मंडवाऊँ। सीकाराम बाप दरियाराम उमर, सितालीस, जात मदारी।’’ उसने मिलन को बताया-‘‘इसकी घरवाली सरग सिधार गई। एक छोरी है। बियाह, थाह दी। दूसरी जगहां रहवै।’’
उसने सामने की ओर अँगुली का इशारा करते हुए कहा-‘‘सामना वालो डेरो उकां ही छोटा भाई को है। घरवाली ने रस्सी से इसो मारा करतो नील उपड जाती बेचारी के। मरी ने करी। दूसरा के जा बैठी। टाबर-टीकर भी ना हुया।’’ वह लापरवाह हँसी हँसा-‘‘आधो-अधूरो रह गयो स्सालो। रानो हो रह्यो है। छलिया, छिनाला के पाछे हांडे।’’
मिलन ने गणेशी से कहा-‘‘रहने दो। मत लिखो। ऐसे आदमी का क्या, जिसका पत्नी और चरित्र से वास्ता नहीं रहा।’’
अगला डेरा भी मदारी का था। बहुरूपिया की उससे ‘कट’ थी। उसने आँखें चढाईं। नाक पर खोर की। सुडसुडाया। कदम आगे बढाता कहने लगा-‘‘आओ।’’
डेरा छोड कर निकलते बहुरूपिया को काँस्टेबल ने हडक दी-‘‘अरे बहुरूपिया टापरी छूट गई एक। रुक।’’
बहुरूपिया ने ऐसा बुरा-सा मुँह बनाया मानो उसी का कुछ जाता हो। मरे-मरे मन गणेशी की ओर देखा-‘‘समोतर वल्द दामोदर। जात मदारी। उमर अठारा-उन्नीस। उका भालू ने कीडो (जहरीला साँप) काट गयो। अब मरद-बीर दोनों मजूरी करन सहर जावै। रात पड्या आवै।’’
सुकरादास नांदिया को लेकर निकला ही था, चौक से। छोटे कद की उसकी पत्नी जिसका नाम छुटकी था, उसके पीछे-पीछे चली। नांदिया पूँछ हिलाता। सिर डुलाता। घण्टी की टन-टन-टन उठाता चला। छुटकी के हाथ में सोंटी थी। सुकरादास के कँधे से झोली लटकी थी। उसके लम्बे कुरते की चार जेबें थीं।

बहुरूपिया ने उसे टोका-‘‘अरे सुकरादास रुकना तो, काम है एक।’’
सुकरादास और छुटकी दोनों ने नांदिया को एक साथ पुचकार दी। तीनों ठिठक कर खडे हो गए, वहीं।
गणेशी ने उसकी ओर मुँह किया-‘‘आपका नाम क्या है?’’
नांदिया पशु जरूर था। कर्म-जोग उसमें सयानापन आ गया था। मुँह उठाकर सिर हिला-हिला कर घण्टी बजा दी थी। कहता हो -‘‘नांदिया।’’
‘‘काम बताओ ?’’ सुकरादास ने गणेशी की ओर जिज्ञासावश देखा।
बहुरूपिया खुशी के मारे उतावला था। मिलन या गणेशी बताते वह बीच में ही बोल पडा-‘‘बहन जी, सरवो करन आई है, सहर से। जी जगहाँ जीको डेरो पड्यो है ना, उको पट्टो डेरावाला के नाम हो जावै। सिर पे पक्की छाया बण जावै। बिना कण दियो, मण मिलेगो हमने।’’
‘‘वाह! हमने पहली बार सुनी, हाँडता-फिरता गुजर करता को भी ठोर-ठिकानो हुवै।’’ वह आसमान की ओर थोडा हुचका। सिर का पग्गड उठा लिया और खुजलाता कहने लगा-‘‘मेरो नाम सुकरादास है। बाप का नाम रामदास है। जात नंदी। उमर तिरपन साल है। हाँ, म्हारा नंदी को भी धियान दियो।’’ छुटकी ने ऊपर की ओर हाथ जोडे-‘‘वो सबकी भली करेगो।’’ उसके दोनों हाथ जुडे और नेत्र देर तक मिंचे रहे।
गणेशी ने लिखा।

उसने चढते सूरज की ओर देखा और नांदिया को टटकार मार दी-‘‘चल।’’
नांदिया ने सिर हिलाया और मंथर-मंथर आगे बढता गया। उसकी गर्दन से बँधी घंटी चलते वक्त पाँचवें पैर पर बार-बार लगती थी। घण्टी की टन-टन-टन की आवा*ा उठती गई।
अगले दो डेरे घीघाराम और मीघाराम दो भाइयों के थे। वे डेरे दोनों एक-दूसरे से ऐसे सटे थे, सहोदर हो। घीघाराम की चल सम्पत्ति बंदर था। मीघाराम की बंदरिया। बंदर-बंदरिया का जोडा बनाकर महीने में पन्द्रह दिन घीघा खेल तमाशा दिखाने के लिए निकलता। पन्द्रह दिन मीघा। जैसे दो किसान अडा-सडा1 अपने खेत जोता करते।
आज मीघा की बारी थी। वह चौखाना की लुंगी और लम्बी जेब का नीचा-सा कुरता पहने था। फेंटा बंधे सिर के बाल कँधे झूलते। पैरों में हवाई चप्पलें पहने था। कँधे से झोली लटकाए था। बाएँ हाथ से बंदर-बंदरिया की रासें पकडे था। दाएँ हाथ में थमी लाठी कँधे पर धरी थी। वह डेरे से दो कदम आगे बढा, बहुरूपिया के साथ तीन जने उसके सामने थे।
शहर से आई मेम साहब, सिपाही और मुनीम से दिखते आदमी को देखकर वह चौंका। डर-सा लगा। लाठी बगल से सटाकर खडी कर ली। रास पकडे हाथ जोड कर राम-राम की। फिर हाथ कलेजे पर रख लिए। धुक-धुक डाट हों।
गणेशी ने उससे पूछा- ‘‘आपका नाम?’’
‘‘घीघियो।’’
‘‘बाप का नाम?’’
‘‘पीछियो।’’
‘‘जाति?’’
‘‘कलंदर।’’
‘‘उम्र?’’
‘‘ठेठ ना कह सकूँ। चालीस के नीडे-गोडे हूँ।’’
जैसा घीघा वैसा मीघा। एक आवां के दो बासन सरीखे। दरिद्रता की जुडवई।
मीघा, घीघा से सटा खडा था। घीघा ने उसके कँधे पर हाथ धरा- ‘‘यो मेरो छोटो भाई है। एक कोख जायो। पर बाप अलग-अलग है, म्हारा। इको नाम घीघीयो, बाप को नाम सीपीयो है। उमर में दो साल छोटो है, मेरा से।’’
गणेशी ने डायरी में माँड दिया और बहुरूपिया की ओर आँखें चलाकर कहा- ‘‘आगे चलें।’’
मीघा थोडा तेज-तर्रार था। हवा खाया था। वक्त समाया था। उसने बहुरूपिया का कंधा पकड कर वहीं रोक लिया और बूझती निगाह उसकी ओर देखा। वह उसका मन ताड गया था। बताने लगा-‘‘बहन जी सहर से आई है। म्हारा इन सब डेरां को सरवो करेगी। रपट सिरकार तक भिजावेगी। जमीन को पट्टो मिल जावै अर पक्को ठीयो हो जावै, अपणो, सबको।’’
इतना कह वह अगले डेरे की ओर बढ गया था। मीघा की घरवाली ने पति के कँधे पर ठोला देकर तंज किया-‘‘अँधा की गली में काँच (आईना) बेचण जिसी निरी बात करे।’’
‘‘बावरी, बडा आदमी अच्छो बुरो जो करे, अच्छो ही करे। बडा को मिखोल ना उडाया करे। पडी रह।’’

जिस डेरे के आगे वे चारों खडे हुए थे, वह गुलाबी का था। उसके आदमी के हाथ-पैर से पौन (लकुवा) निकली थी। इतनी-सी आसंग (क्षमता) रही, उठता-बैठता जंगल हो आता। पत्नी की मदद नहा-धो कपडे बदल लेता।
गुलाबी पगडण्डी को पीठ दिए घाघरी जाँघों चढाए उघाडे मगर चिकनी मिट्टी मले नहाने बैठी थी। साबुन, शैम्पू दूर मुलतानी मिट्टी तक नहीं थी। माटी का रूवा-सा एक बासन उसके पास धरा था। वह मटके के टुकडे से खोर-खोर, खुरच-खुरच, मसल-मसल मैल उतारे जाती, गिलास भर-भर ऊपर पानी ढूलती। देह का फूला मैल बह-बह नीचे गिरता।
महिला को चौडे में इस तरह नहाते देख मिलन को तरस आया और रोश हुआ। नेत्र वक्र हुए, ‘हम शहरी महिलाएँ बाथरूम की सिटकनी चढा कर इस सजगता से कपडे उतारती हैं, स्नान करते अँगुली नहीं देख पाए। यहाँ खुले आँगन उघाडे बदन महिलाएँ नहाती हैं। सरकार है कि वह महिलाओं की निजता की सुरक्षा की डींगें हाँकती नहीं थकती।’
मिलन, बहुरूपिया, गणेशी और सिपाही के पैर वहीं ठिठक गए। बहुरूपिया ने खाँस की।
गुलाबी को मालूम था, मरद-खाँस है। अनसुनी कर दी। जब से उसके आदमी को पौन निकली है, मरद उसके डेरे के सामने से खाँस-खखर कर निकलते हैं।
जहाँ चटनी-रोटी तक तोडा हो, तौलिया ताड-पत्ता। गुलाबी ने गीले बदन कपडे पहन लिए। घाघरी, कुरती, लूगडी। गीला कपडों पर उतर आया था। वे चारों के चारों उसके सामने जा खडे हुए थे।
चौबीस बरस की गुलाबी श्यामल देह भले थी। मृग जैसे लुभावने नयन थे उसके। पतला चौका (चेहरा) था। ठोडी उठी थी। कंधे खडें थे। गर्दन ऊँची थी और ललाट थोडा उभरा था। उसके रूप आँखें खिंचती थी। मरद की कमतरी उसकी गोद (कोख) सूनी थी। ममता की लौ चेहरे पर हताशा की झांईं थी।
बहुरूपिया ने उससे पूछा-‘‘भाभी डेरो अपने नाम करवागी या भाई खगरा के नाम?’’
‘‘मैं समझी ना।’’ पानी टपकता मुँह और आँखें लूगडी से पोंछ लिए थे, उसने।
‘‘बहन जी आई है सहर से। म्हारै डेरां को सरवो करे। डेरा की जगहाँ उसकी हो जावै, आज के दिन जो रहवै।’’
‘‘हाँ बहन।’’ मिलन गुलाबी की ओर देखती रही।
‘‘बता नाम मंडवाऊ,ँ।’’ सहाद्दीन बहुरूपिया ने फिर कहा।
कृष्ण-कृषकाय खगराराम डेरे के कोने में गूदडी बिछाए कच्छा पहने एक करवट लेटा था। पराई आवा*ों सुनकर वह उसी हाल बाहर निकल आया। लाठी टेकता, हिलता, खुद को गिरने-पडने से रोकता-थामता। सताईस की वय चालीस का दिखता। उसके समूचे बदन पर मैल-रेत जमी थी।
उसका न केवल एक हाथ और एक पैर पोलियो ग्रस्त थे, आधा ओठ और एक आँख बेडोल हो गये थे।
वह पत्नी गुलाबी का कँधा पकड कर खडा हो गया था। दुनिया के इस दीन पर मिलन की आँखें ज्यादा टिकी नहीं रह सकीं। करुणाभरी आँखें झपकाईं। दयाभाव उससे पूछा-‘‘भैया नाम क्या है, आपका?’’
उसके टेढे होंठ बोलते थर-थर करते रहे। बताया-‘‘ख-ग-रा-राम।’’
गणेशी ने पूछा-‘‘बाप का नाम?’’
‘‘चम-ना।’’
बहुरूपिया ने पूरा किया- ‘‘चमनाराम।’’
‘‘उम्र ?’’
‘‘सिताइस।’’ गुलाबी बोल पडी।
बहुरूपिया ने बताया-‘‘जात करनट है।’’
गणेशी ने डायरी में लिखा और मिलन की ओर विनम्र न*ारों देखा- ‘‘आगे बढते हैं ?’’
अगला डेरा।
आठेक साल की एक लडकी डेरे के बाहर आधे कपडों में बैठी थी। मोटे डबोट बंधी आधी घाघरी। ऊपर फटी-सी बनियान। झुतरैले बालों में लीकें-जूएँ थीं। उसकी मुट्ठी में दो-तीन दिन का चूजा था। रात चूजे की माँ को घर का फाका खा गया। चूजा चीं-चीं-चीं किए जाता था, ‘भूखो हूँ, मैं। माँ कहाँ गई मेरी? चुग्गो लाती।’
लडकी उसकी चोंच अपनी जीभ पर रख कर खा-खा-खा करती कहती-‘‘ना घर में रोटी का एक टुकडा है, ना नाज का एक दाना है। यो जीभ तेरी महतारी ने खा गई। तू जीभ खा।’’
चार जनों को डेरे के सामने आया देख लडकी ने चूजे को अपनी छाती से चिपका लिया और डर कर खडी हो गई थी।
बहुरूपिया ने बताया- ‘‘यो संतूराम रेबारी को डेरो है। मरद-बीर दोनों मजूरी निकल गया।’’
‘‘उसके बाप का नाम क्या है?’’ गणेशी ने पूछा।

बहुरूपिया ने लडकी की ओर मुँह किया-‘‘गुड्डो, तेरा दादा को नाम बता, के है?’’
‘‘पिरभाती लाल रेबारी।’’
‘‘उम्र?’’
‘‘बतीस बरस।’’
जहाँ वे अब खडे हुए थे, वह एक बुझक्कड का डेरा था। बुझक्कड डेरे से निकला हुआ था। वह डेरों के बीच बसर करता, पंडित हुआ था। जन्म-मरण, शादी-ब्याह की रस्में पूरी कराता। मंत्र-मौली, पूजा-पाठ करता। पंडिताई करता, सो थोडा ऊँचा रहता था।
गेट पर लटका तहमद हवा के झोंके से एक ओर सरक गया था। डेरे का भीतर प्रकट था। मिट्टी-गोबर लिपी-पुती दीवार के साथ देवी-देवताओं की मूर्तियाँ खडी थीं। तेल-सिंदूर लिथडी मूतियों पर चढाई मालाएँ सूखी पडी थी। रेत की ढूह में खोंसी अगरबत्ती शनैः शनैः सुलग रही थी। आठ फीट वर्गाकार डेरे के आमने-सामने की दो लकडियों पर रीढ से टिके बाँस पर खप्पचियों और पन्नियों की पूर थी। बाँस से एक पिंजरा लटका था, पिंजरे में तोता था। दो कटोरियाँ रखी थीं। एक में घुघरी का चुग्गा, दूसरी में पानी था। यहाँ न कोई बिल्ली रखवाली थी, न कुत्ता पहरेदार था। पिंजरा ही उसका रक्षक और सुरक्षा कवच था।
घने-गहरे हरे रंग का वह सुवा पिंजरे की फड पर चोंच मारे जाता था। ठक-ठक-ठक। कष्ट होता पंजे पर रगड कर दम भरता। वह जानता था। पिंजरा कच्चा आम नहीं है, नोच-कुतर देगा। लेकिन चोंच मारने की अपनी आदत भूलना नहीं चाहता था।
बाहर खडे लोगों को देखकर उसने गर्दन मारी और मुँह खोलकर टें-टें-टें की, फिर टाँय-टाँय करने लगा। ‘टें-टें-टें’ं का आशय था, ‘मैं डरा हूँ।’ ‘टाँय-टाँय-टाँय’ का मतलब रहा, ‘घर पर कोई नहीं है, मेरे सिवाय।’
तोता आय का जरीया रहा। बुझक्कड तोते के पंजे से बंधी डोर को अपनी कमीज के काज से बाँध उसे अपने कँधे या हाथ पर बैठाये बूझा काढने निकलता। जेब में ताश के पत्ते रखता। ढेरी बिछा कर तोते की चोंच से एक पत्ता निकलवाकर ग्राहक को शुभ-अशुभ दर्शाता। रंगदास नाम का वह बुझक्कड अगले की भावना भुनाने की रग और अंधविश्वास के बौपार से पैसा कमाने का गुर बखूबी जानता था। दारू पीते नहीं मानता था।
बहुरूपिया ने डेरे की ओर अँगुली का इशारा किया और मिलन की ओर देखा-‘‘बहन जी यो रंगदास को डेरो है। बूझागर है बडो। तोता से बूझा काढे। तीन महीना पहलां उकी घरवाली सरग सिधार गई। टाबर-टीकर हुया ना, अकेलो रह गयो। रंडक-भंडक। काल चालतो-चालतो खुद गढा में गिर पड्यो। हाथ-पैर में घणी लागी। सकारे-सकारे डाकदर के जातो बता रह्यो, ‘दर्द से सारी रात कुन्हायो।’
गणेशी ने उससे पूछा-‘‘रंगदास के बाप का नाम याद है, आपको?’’
‘‘बस अभी मर्यो छह मीना पहल्यां। नेवलो कह था, उने। आप तो नेवलदास माँड लो जी।’’
‘‘रंगदास की उम्र?’’
‘‘जियादा ना बस पचीसेक है।’’
‘‘जात?’’
‘बूझा काढे, बूझागर हुयो।’
अगला डेरा। बाहर-भीतर चौपट। गेट पर परदा तक नहीं। गूदड-गाबा, बरतन-भाण्डा एक कोने में पडे थे। डेरे के भीतर सफेद रंग के कबूतर-कबूतरी गुटर-गू, गुटर-गू, गुटर-गू करते पर फडफडा-फडफडा किलौल रहे थे। एक-दूसरे को चोंच मार-मार, पियार-परीत इतने डूबे थे, मालूम नहीं आहट हुई।
गेट के बीचों-बीच काले भूरे रंग की बिल्ली बैठी थी। कबूतर बिल्ली की दाढ लगा पक्षी है। पालतू थी। जातीय फितरत नदारद थी, उसकी। असल खतरा मादा बा*ा का था, जो दरख्त पर बैठी आँख इधर लगाए थी। कबूतर-कबूतरी गुटर-गू, गुटर-गू, गुटर-गू करते, वह चोंच बढाकर पंजे नापती। वह कुत्ते से नहीं बिल्ली से भय खाती थी। अगर, उसने कबूतरों पर झपट्टा मारा, बिल्ली पेड पर चढकर उसका घोंसला उटकेर देगी।
बिल्ली ने पंजा हिला कर म्याऊँ-म्याऊँ की- ‘‘डेरे पर कोई नहीं है दो कबूतरों और मेरे सिवाय। आयें, आना।’’
बहुरूपिया ने बताया- ‘‘बहन जी, यो धर्मदीन करनट को डेरो है। उकी छोरी थाली में बैठ के रस्सी पे सरकती-सरकती खेल-तमाशो दिखावे थी। भभूल्यो आ गयो। झोल खा, गिर पडी। पैर ना टूट्यो। चोट आई घणी। सोजन है। मरद-बीर तडके उठके पहलवान के ले गया, उने। बाप पद्दी (पीठ) बैठाये था। दूसरा गाम ले जावेगो, तीन कोस।’’
‘‘अरे-अरे।’’ मिलन ने सहानुभूति प्रकट की- ‘‘कंगाली में आटा गीला वाली कहावत हुई, यह तो ?’’
‘‘हाँ बहन जी।’’
गणेशी ने उससे पूछा-‘‘धर्मदीन के पिता का नाम क्या है, बहुरूपिया ?’’
‘‘अजबदीन। उमर अडतालीस बरस मांडो। कौम मुसलमान लिखो।’’
डेरे के भीतर से फिर गुटर-गू-गुटर-गू-गुटर-गू करने और पंख फडफडाती आवा*ों आईं। मिलन की न*ारें टिकी रहीं। कबूतर गर्दन फुलाए गुटर-गू- गुटर-गू करता कबूतरी को चोंच मार देता था। वह उर्वरा (धरती) की ओर गर्दन नवाए थी। नर-मादा। अपनी-अपनी नियति।
संतति सुख के लिए कपोत जोडे की केलिक्रीडा निस्संतान मिलन की हृदय-कलिका से होती उसकी कोख में जा समाई थी। बिना आँखें मीचे उनकी ओर देखती रही। देखती रही, एकटक। बादल सरसा।
ऊपर चढ आया सूरज डेरों की फूस-पन्नी दीन-सा लग रहा था। खेतों पर फैली रेत पर वह सुनहरा-सा दिखता था। हरे-भरे खेतों पर हरा लग रहा था। डेरे के बाहर सिर उघाडे बैठी बुढिया के सफेद बालों पर चाँदी-सा चिलक रहा था, वह।
बहुरूपिया ने बताया-‘‘ऊपर तले ब्याह-शादी है, इन दिनों। मंडलियाँ साही पर गईं। डेरा सूना है, डोकरी अर टाबरां के सिवा।’’ उसने एक साथ पांच-छह डेरों की ओर हाथ किया- ‘‘बहनजी ये सब सपेरा का डेरा है।’’
दुकान की खुदती नींव में नाग निकल आया था, तो सेठ मुकुंददास सपेरे की तलाश में यहाँ आये थे। उनके कुछ दिन बाद मिलनदेवी भी यहाँ आईं थीं। दोनों ने पायलों और घुंघरुओं की एकरस झंकार सुनी थी। दोनों की एक ही मंशा थी, अगर उनके घर-आंगन खुशी आई तो इसी कालबेलिया पार्टी को जलवे पर बुलायेंगे। आज न झंकार थी, न खंजरी की ढपढपाढप-ढपढपाढप-ढपढपाढप थीं, न बीन का लहरा उठा था, न कोकिला कंठ थे, न पायलों की झंकार के साथ नृत्य की मोहकता थी। मैले कुचैले, नंग-धडंग बच्चे नाक सुडसुडाते-सुडसुडाते रेत-रेत खेल रहे थे। गरीबी की पौध से ये बच्चे समय के साथ पेड बनते अपने बाप-दादाओं से मिली विरासत संजोयेंगे।
मिलन ने विचार किया, ‘लखीनाथ सपेरा इन डेरा की दाई-माई है। बहुरूपिया अब बेवजह साथ है। अपने काम-धँधे जाए। उसने पर्स से एक रुपया निकाला और उसकी ओर बढाती बोली- ‘‘लो सहाद्दीन जी, आपका मेहनताना। खोटी हुई है, आपकी।’’
बहुरूपिया विभोर हुआ, आँखें गीली हो आईं। हाथ जोड दिए- ‘‘बहन जी, आप म्हारो इतनो बडो काम कर रही हो, इका पीसा लूँ, कीडा की कुण्ड पड्यो सडूँ।’’
उसमें फिर किरदार लौट आया था। मूँछें सूती। गरूर से खखरा और गाँवों की ओर जाने वाली पगडण्डी पकड ली थी।
मिलनदेवी, सिपाही और गणेशी तीनों लखीनाथ के डेरे आ गए थे। न बकरी मिमियाई, न कुत्ते ने कान खडे किये, न नेवला दोनों पैरों पर उठकर चौकन्ना हुआ।
लखीनाथ बनियान पहने डेरे के बाहर बैठा तावडा सेंक रहा था। लूँगी घुटनों चढाए पट्टी बंधा पैर फैलाए पूंगी (बीन) बजा रहा था।
कोड मीठी बोली रा
डाकरियै नैणा री लागै अवलूंडी 2।
हाँ जी जोडी रा आंगणियै3 खुदावां कुवां बावडी।
उसने गले में पतली-सी सटक डाल रखी थी, सूत की माला हो। सामने टोकरी खुली रखी थी। उसमें नाग था। भारी-भरकम। एकदम डरावना। वह मधुमक्खी के छत्ते-जैसा फन काढे था। लखीनाथ उसके सामने बीन हिलाता। नाग का फन बीन के बिम्ब डोलता।
तीनों के तीनों थोडा दूर खडे रह गये। गणेशी और सिपाही डर गये। मिलन सहज थी। लखीनाथ के गले में पडी सटक देखकर मिलन को वह घटना स्मरण हो आयी। वह सिर में सांप घुसने का बहाना लिये थी। लखीनाथ को बुलाया गया। इसी शातिर लखीनाथ ने अपनी टोकरी से सटक निकाल कर उसकी गर्दन में डाल दी थी। यह सटक वही तो नहीं है ?
तीन जनों को आया देख लखीनाथ ने बीन बंद कर नीचे रख दी। नाग टोकरी में बन्द कर दिया। सटक दूसरी टोकरी में बंद कर दी और दोनों टोकरियाँ दूर सरका दीं।
बकरी का बच्चा छलांगता-छलांगता तीनों के बीच आ खडा हुआ। मिलन ने उसे गोदी में उठा लिया। सिर पर हाथ फेर कर पुचकार दी और नीचे छोड दिया था। बच्चे ने कुलांच भरी और लखीनाथ के पास पहुँच गया। लखीनाथ ने उसे गोदी में उठाया, उसके मुँह से अपना मुँह भिडाया, दुलारा और छोड दिया।
आदमी पद, पैसा, जात, बिरादरी से चाहे बडा हो या छोटा। मोहब्बत दोनों दिल एकसार धडकती है। मिलन का लखीनाथ की हथेली पर लिखा ‘वादा’ और लखीनाथ की मूँछ का वह बाल। न लखीनाथ सपेरा, न मिलन सेठानी। उनकी आँखें मिलीं कि साँसें चढने-उतरने लगीं।
मिलन एक अजीब उलझन में थी। वह उलझन उसने लालसावश खुद पैदा की थी। मकडी अपनी लार से जाला पूरते-पूरते खुद उलझ जाती है
‘‘कैसे हो, लखीनाथ?’’ मिलन ने लजाई-सी आवा*ा में पूछा।
‘‘ठीक हूँ।’’ लखीनाथ के कंठ लरज थी।
मिलन ने झेंपते-झेंपते उसे बताया- ‘‘लखीनाथ मैंने डेरों का सर्वे शुरू कर दिया है। हमने सहाद्दीन बहुरूपिया के सहयोग से दूसरे डेरों की सूची तैयार कर ली है। सपेरों के डेरे बाकी हैं। कितने हैं ?’’
‘‘आठ।’’ लखीनाथ ने बताया।
गणेशी ने लखीनाथ से कहा- ‘‘आप एक-एक डेरे के वाशिंदे का नाम, पिता का नाम, आयु और जाति लिखवाते जाएँ।’’
मिलन बोली- ‘‘लखीनाथ पहले खुद से शुरुआत करो। तुम्हारा नाम तो लखीनाथ है ही। पिता का नाम बताएँ?’’
‘‘देवानाथ जाति सपेरा-कालबेलिया।’’ उसने तपाक से बताया।
‘‘उम्र?’’ डायरी में लिखते जा रहे गणेशी ने पूछा।
‘‘तेबीस बरस।’’
मिलन ने अपनी जिज्ञासा का शमन करना चाहा- ‘‘यह सपेरा-कालबेलिया एक ही हैं या दो भिन्न जातियाँ हैं?’’
वह बोला- ‘‘एक बेल का दो तूमडा जैसी बात है, बस। और कुछ भेद फरक ना है।’’ उसकी न*ारें मिलन के स्निग्ध रूप लावण्य पर टिकी नहीं रह सकी, जैसे काँच से बूँद फिसलती है।
‘‘तुम एक-एक कर धीरे-धीरे बताते जाना, मैं लिखता जाऊंगा।’’ गणेशी ने कहा।
‘‘मांडो।’’ उसने गणेशी की ओर देखा।
‘‘उपरानाथ बाप रामनाथ उमर बियालीस बरस। वेदानाथ बाप नीरजानाथ उमर पिचपन बरस। बलवीरी देवी विधवा रामनाथ उमर चौंतीस साल। महावीरानाथ पिता सोजीनाथ उमर तीस बरस। रमियानाथ पिता सुमरानाथ उमर बावन साल। समरानाथ बाप को नाम पिरभाती नाथ उमर सितावन बरस।’’
गणेशी ने गिन कर बताया-‘‘आप समेत सात हुए। आठवाँ छूटा, किसका है वह ?’’
लखीनाथ ऋोध और कुण्ठा के मारे साँप की तरह मुरेडी मार गया था। सबसे बडा बैर जोरू से जुडा होता है। ‘म्हारी बीरबानी की इ*जत पे हाथ डाले इसा कलमुँहा मानस को भलो करां।’ लखीनाथ के दाँत किटकिटा उठे थे।
‘‘लिखाओ न लखीनाथ, आठवाँ डेरा किसका है?’’ मिलन ने बल देते हुए पूछा।
गुमदाया लखीनाथ इधर-उधर न*ार घुमाता रहा।
रमतीबाई भीतर थी। वह डेरे का फर्श लीप रही थी। एक कोना बाकी रहा था। उसके कानों में बात पडी। बात बेरीत लगी उसे। माथे पर *ाोर दिया, ‘नाथ खुणस खायो है। यो मर्यो ना लिखवावेगो सपरानाथ को डेरो।’’
वह गोबर-मिट्टी भरे हाथ लिए बाहर निकली, झट। सिर का दुपट्टा गोबर माटी सनी चिकोटी से पकडकर माथे तक सरकाया। मिची-मिची आँखों लखीनाथ से बोली- ‘‘वो रह गयो ना, सपरानाथ। नाम मंडवाओ उको!’’
लखीनाथ को पतंगी-सी लगी। मरोड का गोला-सा उठा। बरौनियाँ बल खा गईं। उसने रमती की ओर खा जाने वाली न*ारों देखा- ‘‘आबरू को घाव इतनी जलदी भूल गई तू ?’’
‘‘हुई सो थूक। उकी करनी उके साथ। म्हारी करनी म्हारे साथ। दूसरां को बुरो चेतां, अपनो बुरो हुवै।’’
लखीनाथ के भीतर बिजली-सी कौंध गई। क्रोध की लपटें उठीं। होंठ से होंठ काटे, सोचा, ‘पहल्या दोनवां की सगाई हुई थी। सगाई टूट गई पर दिल की डोर बंधी की बँधी है। हया उतर गई। वो स्सालो सपरो दारू पी के नहाती नीडे आ गयो। खूब पिटवायो। फिर उनै ही चाहवै। वाह रे तिरिया चरीत।’’
मिलन ने लखीनाथ की ओर दबाव बनाती आँखों देखा- ‘‘जब डेरा है तो उसका नाम लिखवाने में गुरेज क्या है ?’’
वह शर्म खा गया। सिकुडी आँखों सिपाही की ओर टका- ‘‘होलदार जी, म्हारो छोरो सकूल गयो। मेरा पैर में अपरेसन हुयो। म्हारी बीरबानी घूँघट बनावै।’’
‘‘तो?’’ सिपाही ने उससे पूछा।
लखीनाथ ने इशारा करते हुए बताया- ‘‘वो-वो पचासेक कदम आगे एकलो सो डेरो पड्यो है। उके माय या फेर सामे, सपरो पड्यो मिलेगो, दारू पीयोडो। बुला लाओ उने। यूं मत कहियो मैंने हेल्यो। बता दियो, सहर से मेम आई है, वो बुलावै।’’
सिपाही डण्डा घुमाता गया और सपरानाथ को बुला कर डण्डा घुमाता लौट पडा था।
बीन का लहरा उठता आया।
अठैरी4 उडियोडी रेखा म्हारी कठै धाडौ5 दीयो...
थनै मारवां ने आवै म्हारी रेखा परी उडै नीं अे।
थारै रे कारणियै रेखा,
म्हारी भगवा वसतर लीन्हा अे....
थनै मारवा ने आवै म्हारी रेखा परी उडै नीं अे..
हां जी ओ ढोला अवलूंडी आई ओ थांरै देस में
धिया बाई ने रमवा6 रो कोड जिलती7 जोडी रा..
क्रोधभरे नाग में विष बढता है और फन उठाकर भयानक फुकारता है। सपरानाथ पूंगी की आवाज सुनकर लखीनाथ का गुस्सा बेकाबू हुआ। नथूने फडकने लगे, बेतहाशा।
सपरानाथ एकलाँगी धोती घेर कर बाँधे, गेरुवा रंग का नीचा-सा कुरता पहने था। एक पैर उभाना (नंगा) था। दूसरे में चप्पल थी। फेंटा बँधे सिर लम्बे-लम्बे गरदभरे बाल कंधों गिरते थे। गले में पहनी काँच और रुद्राक्ष की मालाएँ मैल चढी थीं। वह आडे-तिरछे पाँव धरता, घूमता, झूमता बीन बजाता आ गया था। गले में काला नाग पडा था।

रंध्र बीन का सुर साधते हैं। दारू में धुत्त सपरा की अँगुलियों से छिद्र ठीक से दबते-उठते नहीं थे। धुन बेसुरी थी। एकदम कर्कश। कर्णकटु।
लखीनाथ का सपेरा जाग गया था। उसने नीचे रखी बीन उठा ली। वही धुन पकडी जिसे सपरा बजाये था। सधती अँगुलियाँ बीन बजने लगी। धुन रमी।
थमै मारवां ने आवै म्हारी रेखा परी उडै नीं अे..
जोगीडा ले जावै म्हारी रेखा परी उडै नीं अे.......
अठैरी उडियोडी म्हारी रेखा
कठै न धाडौ करियौ अे........
लखीनाथ की बीन की सधी-पगी धुन सपरा के लिए नसीहत थी, ‘वेवकूफ सपेरा है तू, धुन बिगाड मत। यूं बजा बीन।’
लखीनाथ की होड सपरा की बीन का लहरा और ऊँचा उठता गया। मिलन, गणेशी और सिपाही का रौआं-रौआं काँप उठा।
सपरा लखीनाथ के पास खडा हो गया। लखीनाथ की ओर बीन घुमाता *ाोर-*ाोर से बजाने लगा। लखीनाथ ने दम भरा और कण्ठ उठाया। उसकी बीन कहीं तेज और सुरीली बजने लगी थी। दोनों के गाल फूले थे। दोनों के बीच होडम-होड बीन युद्ध चलता रहा। सपरानाथ के गले में पडा नाग आधा खडा हो गया था, फन लहराता, दोहरी जीभ लपलपाता।
थककर चूर-चूर हुआ सपरा लखीनाथ के पास बैठ गया। बीन नीचे रख दी। हारा हथियार रख देता है। एक समय सपरानाथ नामी-गिरामी बीनबाज था। बाध8 खेलता था। दारू कला खा गई।
लखीनाथ की बीन का उठता लहरा अभी भी सपरा को चुनौती दे रहा था, ‘बजा, बजा और बजा।’
उसने लखीनाथ को बाँहों भर लिया और गले लगकर मिलने लगा। सपरानाथ के गले से लिपटा नाग लखीनाथ की गर्दन से भी लिपट गया था, जैसे एक साथ खडे दो पेडों के तनों से लता लिपट जाती है। लखीनाथ और सपरानाथ दोनों के बीच बैरी भाव चल रहा था, दो बाघों जैसा। रमती के कारण पैदा हुई यह दुश्मनी उनके भीतर साँप की तरह कुंडली मारे थी। सपरा इसी जोग लखीनाथ से लाठी-लाठी पिटा और महीनों खाट काटी थी। वे दोनों एक दूसरे से ऐसे मिले मानो खडग समाये दो म्याने मिली हों। उनके गले भले मिले थे, मन मैल से आँखें लाल थीं। तन का मैल नहाने-धोने से उतर जाता है, मन का मैल मरते रहता है।
डर के मारे रमतीबाई की घिग्घी बंध गई थी, वैसो ही जहर भर्यो नाग है, उको आदमी डसो। वो बेवा हो गई। सपरा को बुलवा कर वह घणी पछताई। आ बैल मुझे मार वाली कर दी। दोनों अब नाग लडावैगा। उसने सयानपत (सयानापन) दिखाई। लखीनाथ के पास रखी नाग की टोकरी उठाकर भीतर रख आई।
लखीनाथ ने फन फनफनाते, दोहरी जीभ लपलपाते नाग का मुँह भींचा और दूर हटा दिया था।
सपरा बीन उठाकर उठ खडा हुआ था। नाग उसके गले से रस्से-सा लटक रहा था। गंदे-संदे कपडे पहने, दारू पिया सपरानाथ इस वक्त नफरत का पुतला-सा लग रहा था, सबको।
रमतीबाई कलेजा थामे अंदर चली गई थी। सपरानाथ उसकी पीठ देखता रहा।
पेन डायरी लिए खडे गणेशी भले घिन लिए था। काम अपनी जगह रहा। उसने मिलन की ओर देखा फिर सपरा की ओर संकेत करके पूछा- ‘‘क्या नाम है तेरा?’’
‘‘सप-रा-ना-थ।’’
‘‘बाप ?’’
‘‘दु-ब-ला-ना-।’’ उसके होंठ फिर फडफडाए।
‘‘दुबलानाथ?’’ गणेशी ने पूछा।
‘‘हुँ।’’ सपरा ने हाँ की।
‘‘उम्र?’’
‘‘..सिताइस बरस।’’ वह ज्यादा नहीं बोल पाया।
‘‘जाओ अब।’’
वह बीन का लहरा उठाता, लडखडाते कदमों अपने डेरे की ओर बढ गया था। उसके गले से लटका साँप फिसलता-फिसलता नीचे गिर पडा था। सांप परती पडे खेत में सर-सर-सर-सर करता भागने लगा। बिल ढूंढे, घुस जाये। एक बिल में मुंह तक घुस गये सांप को सपरानाथ ने फुरती से पकडा और झट गले में डाल लिया था, माला के गिर पडने पर उसे उठाकर फिर गले में पहन लेते हैं।
गणेशी ने संशय लिए मिलन की ओर देखा- ‘‘मेडम, यह तो बेकार-सा आदमी है। इसका नाम रखें या हटाएँ ?’’
मिलन बोली- ‘‘रमतीबाई ने कहा है।’’
लखीनाथ को चपडकी लगी।
मिलनदेवी ने लखीनाथ की ओर सी-ऑफ करता छोटा-सा हाथ हिलाया और ‘बनजारा टी स्टाल’ की ओर बढ गई थी।
सिपाही और गणेशी पीछे चले।
यह उपन्यास वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-१९७२ से पूर्व प्रारम्भ होता है।