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गाँधी की राजनीतिक दृष्टि

मिथिलेश
गाँधी जब राज व्यवस्था पर अपने विचार प्रकट करते हैं तो वे यह सवाल उठाते हैं कि क्या कोई अहिंसक राजनीतिक व्यवस्था भी हो सकती है जो प्रेम के नियम को पुष्ट करती हो? एक ओर जब राज्य को वह शक्तिसंपन्न और हिंसा का संगठित रूप कहते हैं, तब राज्य की क्या कोई दूसरी कल्पना उनके मन में थी, यह देखना बहुत प्रासंगिक है। राज्य जो मूल रूप से हिंसक होता है, जिसकी प्रवृत्ति हिंसा की होती है सामान्यतः राज्य के नागरिक उसे हिंसा के तौर पर नहीं देखते हैं। वस्तुतः उसे उसकी अनिवार्य लागत के तौर पर देखते हैं, क्योंकि राज्य उनके हितों की रक्षा करता है तो उसकी हिंसा को वे चुपचाप सहन करते हैं। इसी तरह संसदीय लोकतंत्र, जिसे लोकतंत्र का एक स्वरूप माना जाता है, क्या वह अपने आप में लोकतंत्र के मूल्यों पर खरा उतरता है? यह सवाल गाँधी बार-बार उठाते हैं कि क्या संसदीय लोकतंत्र में लोगों के हितों को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है या दल के हितों को? यह सवाल आज भी प्रासंगिक है।

क्या संप्रभुता की कोई अहिंसक अवधारणा हो सकती है? क्या अहिंसक संप्रभुता हो सकती है? क्या केंद्रीकरण, जो राज्य का मूल स्वरूप होता है, क्या वह भी विकेंद्रित राज्य में तब्दील हो सकता है? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जो गाँधी की राजनीतिक दृष्टि में मौजूद हैं। गाँधी उनके विकल्पों पर विचार करते हुए एक विकल्प हम लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं। सामान्यतः राज की अवधारणा एक पिरामिडीय संरचना के तौर पर देखी जाती है जिसमें केंद्र राज्य की शक्ति में केंद्रित होता है और जिसके आधार में लोग रहते हैं। व्यक्तियों के बारे में नीति केंद्र द्वारा बनाई जाती है जहाँ यह आवश्यक नहीं है कि उनसे कोई पूछताछ की जाए या उनसे उनके बारे में कोई जानकारी प्राप्त की जाए। गाँधी इस संरचना का विरोध करते हुए होरिजॉन्टल पावर की बात करते हैं जिसे वह महासागरीय वलय की अवधारणा भी कहते हैं। इस अवधारणा में सत्ता एक केंद्र में नहीं बल्कि समान स्तर पर बैठे रहती है। सभी महत्त्वपूर्ण होते हैं लेकिन एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। सत्ता सभी के सहयोग से ही बनी रहती है। वस्तुतः यह राज्य की सत्ता की अवधारणा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन के तौर पर देखा जाना चाहिए। यहीं पर गाँधी केंद्रीकरण को विकेंद्रीकरण में परिवर्तित करते हैं। यहाँ संप्रभुता का एक समान स्तरीय बंटवारा होता है और लोग सशक्त होते हैं। आज जिसे हम जनसहभागिता या लोक भागीदारी कहते हैं वह गाँधी की इसी अवधारणा का एक सशक्त और प्रत्यक्ष उदाहरण है।

संप्रभुता की इस अवधारणा (महासागरीय वलय) में व्यक्ति महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं और अपने आप में संप्रभु भी। स्वराज वस्तुतः ऐसे ही संप्रभु व्यक्तियों द्वारा संभव है। स्वराज, जिस पर गाँधी बहुत बल देते थे, वह संप्रभुता की अवधारणा ही सही लोकतंत्र को परिभाषित करती है। ऐसी संप्रभुता, जिसमें हर व्यक्ति संप्रभु हो और परस्पर अन्योन्याश्रित प्रक्रिया के द्वारा ही लोगों से जुडा हुआ हो। वे स्वयं चेता हो, लेकिन दूसरों के हितों की भी परवाह अपने हितों के बराबर करता हो। गाँधी की यह अवधारणा वास्तविक विकेंद्रीकरण की अवधारणा को प्रस्तुत करती है। इसी बिंदु पर गाँधी राजनीति का उद्देश्य स्वराज की स्थापना भी मानते हैं और ग्राम स्वराज्य के सिद्धांत को प्रस्तुत करते हैं। इसे उनके राजनीतिक सिद्धांत के तौर पर भी देखना चाहिए, जो राजनीतिक संप्रभुता की समस्तरीय संरचना का सबसे व्यावहारिक उदाहरण कहा जा सकता है। यहाँ राज्य मिट नहीं जाता है बल्कि अपनी भूमिका को बदलकर शासन के स्थान पर सहयोगी संस्था के रूप में हो जाता है और विभिन्न स्तरों पर समन्वय संस्था के तौर पर कार्य करता है।

वस्तुतः गाँधी के राजनीतिक दृष्टि का आधार मनुष्य की उनकी अवधारणा ‘मनुष्य मूलतः अच्छा है और प्रकृति के नियम के हिसाब से वह अहिंसा का पालन करता है’ से समझा जा सकता है। आज राजनीतिक दृष्टि का उद्देश्य भी इसी अनुसार बनना चाहिए। राजनीति का उद्देश्य मनुष्य की इसी अच्छाई को प्रेरित करने वाला होना चाहिए। ऐसे संस्थान बनाए जाने चाहिए जो उसे अच्छाई की ओर प्रेरित कर सकें और मनुष्य के समाज में जो बुराई उपस्थित है उसे कम से कम किया जाना चाहिए और ऐसा करते हुए भी अहिंसा के साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिए। गाँधी के राजनीतिक दृष्टि का मूल इन बिंदुओं में ही खोजा जा सकता है।



गाँधी एवं स्वराज

उनके राजनीति दर्शन को समझने के लिए ‘स्वराज’ की उनकी धारणा को समझना होगा। गाँधी जब स्वराज की बात करते हैं तब उनका लक्ष्य संसाधनों पर समस्त लोगों के समान अधिकार को मानना होता है, बजाय इसके कि कुछ लोगों का संसाधनों पर नियंत्रण रहे। ऐसा करते हुए वह बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में कोई भेद नहीं करते हैं। गाँधी के अनुसार वस्तुतः राज्य का उद्देश्य शासन करना नहीं होता है बल्कि सत्य की खोज करना हो जाता है। उस सत्य की खोज करना जहाँ सभी व्यक्ति मूल रूप से अच्छे हैं और उनके बीच परस्पर सौहार्दपूर्ण संबंध हैं। इन्हीं संबंधों को बनाए रखना तथा उसके लिए सहयोग करना ही राज्य का उद्देश्य हो जाता है और इसे प्राप्त करने की कला सत्याग्रह है। सत्ता के विकेंद्रीकरण से लोग सशक्त होते हैं, नीति स्पष्ट होती है और नियम लोगों के हितों के अनुकूल बनते हैं जो सामूहिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। राज्य शक्ति का न्यूनतम प्रयोग करता है। लोग आपसी हितों के आधार पर अपने विवादों का निपटारा करते हैं। समाज मजबूत बनता है। इसीलिए गाँधी एक अराजकतावादी की तरह कहते हैं कि सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए। समुदाय को सशक्त होना चाहिए और अपने लोगों के हितों को इस तरीके से पूरा करना चाहिए कि अविरोध की स्थिति उत्पन्न न हो।

‘स्वराज’ की परिकल्पना में उन्होंने सरकार की जरूरत को स्वीकार किया, लेकिन उनके अनुसार ऐसी सरकार के कार्यकलाप नाममात्र के ही होने चाहिए। उनका विचार था कि समाज के सबसे ऊपर और सबसे निचले वर्ग के कुछ ही लोग ऐसे हैं, जिन्हें नियंत्रित कर लिया जाए, तो सरकार का काम पूरा हो जाता है। देश के अधिकतर लोगों के लिए सरकार की कोई जरूरत नहीं है। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ सकती है, जब प्रत्येक व्यक्ति अपनी अंतश्चेतना के आधार पर स्वतः ही संचालित होगा। ऐसी स्थिति में किसी को भी सरकार की जरूरत नहीं होगी। यह उनके चरम आदर्श ‘रामराज्य’ की कल्पना थी।1 उनके लिए स्वराज्य दूसरों पर शासन न होकर आत्मानुशासन है। जिसमें व्यक्ति स्वतंत्रता को महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसलिए वे अपने को टालस्टाय की भांति अहिंसक अराजकतावादी भी कहते हैं। गाँधी के लिए स्वाधीनता से बढकर स्वराज का महत्त्व था।

‘आज स्वाधीनता से हम यह समझते हैं कि अपनी जाति के अधीन एक शासन, जो शासन समाज के सारे जीवन का नियंत्रण करना चाहता है। स्वराज्य का अर्थ है, एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ प्रत्येक मनुष्य के अपने जीवन पर उसका अधिकार अनेकांश में अक्षुण्ण है। समाज के बडे काम करने के लिए वह अन्य लोगों के साथ स्वेच्छा से सहयोग करता है और सहयोगिता की जो व्यवस्था बन जाती है, वह शासन या दंड के द्वारा मनुष्य को नहीं चलाती है।’2

गाँधी के यहाँ अधिकार प्राप्ति के लिए कर्त्तव्य का पालन जरूरी3 है। गाँधी की नजर में अधिकार कर्त्तव्य के पीछे-पीछे चलते हैं। इसलिए उन्होंने अधिकार से ज्यादा कर्त्तव्य पर *ाोर दिया क्योंकि उनके अनुसार कर्त्तव्य के जरीये ही अधिकार की प्राप्ति हो सकती है।

गाँधी के लिए महज राजनीतिक स्वतंत्रता की प्राप्ति ही पर्याप्त न थी। इसलिए जब देश भर में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था, गाँधी ने उन समारोहों में हिस्सा नहीं लिया। जब हिंदुस्तान की सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग का एक अधिकारी गाँधी के पास उनके संदेश के लिए आया तो उन्होंने जवाब दिया कि ‘मैंने मैदान छोड दिया है।’ जब उनसे फिर से आग्रह किया गया तो उन्होंने कहा, ‘मुझे कोई भी संदेश नहीं देना है। यदि ऐसा करना बुरा है तो होता रहे।’4 इससे स्पष्ट है कि गाँधी सीमित अर्थों की इस आजादी से संतुष्ट नहीं थे। माक्र्सवादी लेखक राजनीपाम दत्त भी लिखते हैं कि, ‘साम्राज्यवाद और राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग दोनों का हित इसी में था कि जनसाधारण की क्रांति को रोका जाए। इन दोनों के बीच सौदेबाजी का नतीजा था माउंटबेटन समझौते का सुलहवादी स्वरूप। इस वजह से आजादी के स्वरूप और उसकी शर्तों को शुरुआत में ही बडे गंभीर रूप से सीमित होना ही था। ऐसा ही हुआ भी। गाँधी ने वास्तव में इस समझौते को यह कहकर खारिज कर दिया कि यह स्वराज की उनकी धारणा के अनुकूल नहीं है। उन्होंने अगस्त 1947 के जश्नों में भाग तक नहीं लिया।5 हत्या के चार दिन पूर्व 1948 के गणतंत्र दिवस के अवसर पर गाँधी ने कहा, ‘26 जनवरी का यह दिन गणतंत्र दिवस है। इसे मनाना तब बडा सही था जब हम उस आजादी के लिए लड रहे थे, जिसे न हमने देखा था न ही जिसका संचालन किया था। अब हमने इसका संचालन कर लिया है और हमारा मोहभंग हो गया है, कम से कम मेरा तो हुआ है, आपका भले ही न हुआ हो।’6 क्योंकि गाँधी के लिए स्वराज्य का अर्थ अंग्रेजों की अनुपस्थिति मात्र नहीं था।

गाँधी राजनीतिक आजादी को अधूरा मानकर चुप नहीं बैठते। 26 जून, 1947 को दिल्ली में उनसे मुलाकात करने आए दो लोगों से अपनी बातचीत में वे कहते हैं कि, ‘आज जो आजादी हमें मिलने ही वाली है, उससे मैं तनिक भी संतुष्ट नहीं हूँ; कारण, मेरे आजादी की कल्पना बिलकुल भिन्न है। मैं केवल राजनीतिक दृष्टि से ही आजाद होना नहीं चाहता।’7 इसलिए गाँधी देश के हर नागरिक को ‘राजनीतिक तालीम’ देने की बात करते हैं। और इस तालीम में आने वाली सरकारी दखलअंदाजी अथवा रुकावटों से भी दो-दो हाथ करने8 की बात करते हैं। वे जनता के राजनीतिक तालीम की पहचान बुनियादी हक के रूप में करते हैं और वे मानते हैं कि, ‘इस बुनियादी हक के बिना स्वराज्य मिल ही नहीं सकता।’9 जो लोग गाँधी पर मध्यवर्ग, पूँजीपतियों-सामंतों-जमींदारों का पक्षधर होने का आरोप लगाते हैं, उन्हें गाँधी के राजनीतिक दर्शन को भली-भांति समझना होगा।

राष्ट्रीय रंगमंच पर आए हुए अपने पूर्ववर्ती राजनेताओं से गाँधीजी इस अर्थ में भिन्न थे कि उन्होंने चुने हुए कुछ विशिष्ट लोगों की राजनीति को ठुकराकर जनांदोलन की कुंजी लाकर सामने रख दी। वे एक ऐसे नेता थे, जिनका जनता के दिल और दिमाग से गहरा संफ था, जो उसकी व्याख्या करने के साथ ही साथ उसे अपने विचारों के अनुरूप ढाल सकता था। वे यदि लहर के उत्तुंग शिखर थे तो वह लहर स्वयं जनता ही थी।1॰ जनता पर उनका असीम भरोसा था। विकेन्द्रीकरण, कर्त्तव्य पर *ाोर, व्यक्ति स्वतंत्रता सहित रामराज्य की उनकी कल्पना के पीछे जनता में उनकी अगाध श्रद्धा ही थी। वे शासन-सत्ता के मुखापेक्षी बने रहने के बजाय जीवन के हर क्षेत्र में आम जनता की अहिंसक पहलकदमियों को इतना बढा देना चाहते हैं, ताकि सत्ता का औचित्य ही समाप्त हो जाय।

गाँधी का लोकतंत्र

गाँधी लोकतंत्र के प्रचलित स्वरूप से संतुष्ट नहीं थे। उनके लोकतंत्र में गांव को इकाई माना गया है। उनका सच्चा लोकतंत्र केंद्र में बैठे बीस लोगों के द्वारा नहीं चलाया जा सकता। इसका संचालन तो नीचे से, हर गाँव के लोग करेंगे।11 वे लोकतंत्र में जनता की इच्छा को सर्वोपरि12 मानते थे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पुरजोर वकालत करते हुए वे कहते हैं कि, वाणी और लेखनी की स्वतंत्रता स्वराज की आधारशिला है। अपनी पूरी ताकत लगाकर वे इसकी रक्षा करने की बात कहते हैं। इसी कारण वे मुट्ठी भर लोगों द्वारा सत्ता प्राप्ति के बजाय जनता में प्रतिरोध का सामर्थ्य विकसित करते हुए स्वराज्य प्राप्त करना चाहते हैं।13 और उनके लिए स्वराज का अर्थ है सब लोगों का शासन, न्याय का शासन। इस शासन में, मंत्री चाहे हिंदू हों, मुसलमान हों या सिख हों और विधानसभाओं के सदस्य चाहे केवल हिंदू हों, केवल मुसलमान हों अथवा किसी अन्य समुदाय के हों, सबको निष्पक्ष न्याय14 करना होगा। गाँधी के लिए ‘स्वराज का अर्थ है सरकार के नियंत्रण से मुक्त होने का सतत प्रयास, यह सरकार विदेशी हो अथवा राष्ट्रीय।’15 सत्ता द्वारा जनता पर किसी प्रकार के नियंत्रण को वे व्यक्ति स्वतंत्रता में बाधक मानते हैं।

आमतौर पर यह माना जाता है कि जनता को सत्ता विधायिका के जरीये प्राप्त होती है। इस मान्यता के विपरीत गाँधी सत्ता का मूल स्रोत जनता में निहित मानते हैं। वे मानते हैं कि, ‘सत्ता जनता के बीच रहती है, जनता की होती है और जनता समय-समय पर अपने प्रतिनिधियों की हैसियत से जिनको पसंद करती है, उतने समय के लिए उसे सौंप देती है।’16 जनता से भिन्न अथवा स्वतंत्र विधायिका की किसी सत्ता को गाँधी वैध नहीं मानते। गाँधी सत्ता के अधिकतम विकेन्द्रीकरण के पक्षधर थे। केंद्रीकृत सत्ता से निरंकुशता का खतरा बना रहता है। सत्ता के विकेन्द्रीकरण से उत्तरदायित्व की भावना बढती है। इसलिए गाँधी ने ग्राम स्वराज्य की स्थापना पर *ाोर दिया था। इस ग्राम स्वराज्य में सत्ता और राज्य का दखल कम से कम हो। गाँधी मानते थे कि राज्य से मनुष्य की व्यक्तिगत विशेषता को क्षति पहुँचती है।

गाँधी के लिए दलीय लोकतंत्र ही लोकतंत्र का अंतिम स्वरूप नहीं है, उसमें विकास की गुंजाइश है। चर्चित साहित्यकार जैनेन्द्र उम्मीद करते हैं कि, ऐसा कुछ यदि भारतवर्ष संभव करके दिखा सका तो गाँधीजी से आरंभ हुई परंपरा सफल हुई मानी जायेगी।17 लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसके विपरीत आज दुनिया के सभी देश दुर्बल वर्ग के प्रति अहसान दिखाने का ढोंग करते हैं।.... जनतंत्र की गाँधी की धारणा में दुर्बल से दुर्बल व्यक्ति को वही अवसर मिलेगा जो बलवान से बलवान व्यक्ति को मिलता है।18 गाँधी अब्राहम लिंकन के लोकतंत्र का अर्थ बताते हुए कहते हैं; ‘जनता के लिए जनता द्वारा जनता का शासन’ का अर्थ है- ‘शुद्ध अहिंसात्मक शासन।’ हिंसात्मक जनतंत्र हिंसात्मक उपायों द्वारा समस्त विरोध पक्ष को दबा देता है या समाप्त कर देता है। इसमें व्यक्ति की स्वाधीनता की गुंजाइश नहीं।19 इसलिए प्रचलित लोकतंत्र से गाँधी संतुष्ट होकर चुप बैठने के बजाय इसे वास्तविक अर्थों के लोकतंत्र में तब्दील करने के लिए अंत तक प्रयत्नशील रहते हैं।

अपने इन्हीं विचारों के कारण गाँधी संसदीय लोकतंत्र को अंतिम आदर्श मानने को तैयार नहीं थे। बल्कि उन्होंने तो ब्रिटिश पार्लियामेंट, जिसे पार्लियामेंटों की माता कहा जाता है, को ‘बांझ’ और ‘वेश्या’ तक करार दिया। वैसे संसदीय लोकतंत्र को अन्य विद्वानों और दार्शनिकों ने भी शक की निगाह से देखा है। लेकिन गाँधी ने उसे भिन्न न*ारिए से देखने-समझने और अहिंसक जनांदोलनों के जरीये बदलने की कोशिश की है। आजादी के बाद संसदीय किस्म की शासन व्यवस्था को उन्होंने तात्कालिक अनिवार्यता के रूप में ही कबूल किया था। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि, चूंकि पार्लियामेंट्री शासन व्यवस्था में निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं इसलिए यह परस्पर अनुकूल समूहों में ही ठीक-ठीक काम देता है। लेकिन भारत में जहाँ अंग्रेजी हुकूमत ने सांप्रदायिक आधार पर जनता को विभाजित कर मतदाताओं के अलग-अलग गिरोह खडे कर दिये हुए हैं और बनावटी दीवारें बना दी हैं वहाँ पार्लियामेंट्री शासन-पद्धति का दिखावा ही किया जा सकता है। गाँधी कहते हैं कि, ‘ऐसी अलग-अलग और बनावटी इकाइयों को, जिनमें आपसी मेल नहीं है, एक ही मंच पर एक-से काम के लिए इकट्ठा करने से जीती-जागती एकता कभी पैदा नहीं हो सकती।’2॰ गाँधी बहुमत की तानाशाही के स्थान पर एक ऐसे नवीन ग्राम गणराज्य, जिसे अक्सर भारत के पुराने ग्रामीण शासन से जोड दिया जाता है, जो सही नहीं है, के माध्यम से एक ऐसे शासन की स्थापना करना चाहते हैं जिसमें अल्पमत की आवाज को भी सही होने के बावजूद महज बहुमत के आधार पर दबाया न जा सकेगा। वे दूसरों द्वारा थोपे गए अनुशासन के बजाय आत्मानुशासन के हिमायती थे।

वस्तुतः गाँधी सरकार को जनता के अधिकार में लाकर असली गणतंत्र की प्रतिष्ठा करना चाहते थे।21 सरकार की, पुलिस की या फौज की ताकत, फिर वह कितनी ही जबर्दस्त क्यों न हो, थोडे ही लोगों को दबाने में कारगर होती है। लेकिन जब समूचा राष्ट्र सब कुछ सहने को तैयार हो जाता है, तो उसके दृढ संकल्प को डिगाने में किसी पुलिस की या फौज की कोई जबर्दस्ती काम नहीं देती। 22 आधुनिक युग में ऐसी सरकारों का अभाव नहीं है जो बहुत खुले तौर पर उच्च वर्ग द्वारा शासन का उपकरण हैं जैसा कि उन आर्थिक रूप से पिछडे देशों में है जहाँ एक अशिक्षित, असंगठित और उत्साहहीन कृषक वर्ग पर भूस्वामियों का प्रभुत्व है।23

गाँधी अपने को अहिंसक अराजकतावादी बताते हुए राज्य का खात्मा चाहते हैं। उनकी कल्पना के स्वराज्य, जो ग्राम स्वराज्य अथवा ‘रामराज्य’ के रूप में अभिव्यक्त हुआ है, वह राज्य शक्ति का लोप चाहता है। गाँधी सत्ता और शक्ति को इतना विकेंद्रित कर देना चाहते हैं कि राज्य अपने आप अपनी अहमियत खो देगा। साम्यवाद जहाँ अंतिम तौर पर सरकारों का संसार से सम्पूर्ण रूप से लोप का हिमायती है, वहीं गाँधीजी राजशक्ति का सम्पूर्ण रूप से लोप चाहते हुए भी सोचते हैं कि जब तक पृथ्वी पर मनुष्य-समाज है, तब तक शायद राज्य शक्ति की भी आवश्यकता रहेगी। इसलिए गाँधी इस बात के लिए प्रयत्नशील रहे कि किस प्रकार स्वेच्छा से निर्माण की हुई संस्थाएँ संसार में बढा दी जाएँ और सरकार की नियंत्रण करने की शक्ति को कम किया जाय।24 गाँधी राज्य को हिंसा का मूल स्रोत मानते हैं। गाँधी का स्वदेशी भी अपने मूल रूप में भारत में नये अर्थात् भारतीय राज्य की स्थापना का सिद्धांत है। गाँधीवादी चिंतक राजीव वोरा लिखते हैं कि, उसे महज आर्थिक क्षेत्र का या उसके एक पक्ष, अर्थात् टेक्नोलॉजी तक ही सीमित करके देखने का चलन पिछले कुछ दशकों से रहा। परिणामस्वरूप स्वदेशी में किसी प्रकार की शक्ति का संचार नहीं हुआ। गाँधीजी का कहना कि स्वदेशी के बिना स्वराज की कल्पना नहीं की जा सकती तथा स्वराज एवं रामराज्य एक ही है। यह स्पष्ट करता है कि स्वदेशी का विचार राज्य स्थापना का सिद्धांत है। किसी भी सभ्यता पर जब विदेशी राज्य की स्थापना हो जाती है, तब अपने राज्य की स्थापना का इच्छुक समूह संघों की रचना करता है। उसी प्रकार गाँधीजी ने भी अपने समय में अनेक विविध संघों की रचना तो की, लेकिन उनके निधन के बाद दृष्टि के अभाव में उन संघों की शक्ति का लोप हो गया।25 फलस्वरूप जनता पर सत्ता हावी होती चली जा रही है। गाँधी सत्ता संचालन में आमलोगों की प्रत्यक्ष भागीदारी को स्थान देते हैं। उन्होंने सर्वोदय दर्शन के आधार पर समाज के अंतिम व्यक्ति को केंद्र में रखते हुए ऐसे समाज निर्माण का सपना देखा था।

व्यक्ति स्वातंत्र्य

गाँधी के राजनीतिक चिंतन में व्यक्ति स्वतंत्रता की काफी अहमियत है। उनकी स्वतंत्रता की अवधारणा में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रतिभा का उपयोग करने की आ*ाादी की बात की गई है। किंतु किसी व्यक्ति को अपनी प्रतिभा से होने वाले लाभों के मनमाने उपयोग का अधिकार उन्हें स्वीकार नहीं था। वे व्यक्ति को राष्ट्र अथवा, अपने चहुंओर विद्यमान सामाजिक संरचना का अंग मानते हैं। इसलिए व्यक्ति को अपनी प्रतिभा का उपयोग केवल स्वहित में न कर उस सामाजिक संरचना के हित में करना चाहिए जिससे वह सम्बद्ध है।26 गाँधी के भारत की आजादी की आकांक्षा में दुनिया की हरेक प्रजाति की आ*ाादी की भावना निहित है।27 इस अर्थ में गाँधी की स्वतंत्रता की आकांक्षा अत्यंत ही व्यापक हो जाती है। वस्तुतः वे भारत की मुक्ति के जरीये दुनिया की सभी तथाकथित दुर्बल प्रजातियों को पाश्चात्य शोषण से मुक्त कराना चाहते हैं।28 गाँधी हर व्यक्ति की स्वतंत्रता तो चाहते हैं किन्तु उनका यह व्यक्ति स्वातंत्र्य नैतिक अर्थों में किसी दूसरे की स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं करता।

गाँधी के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल भौगोलिक अथवा राजनीतिक स्वतंत्रता मात्र नहीं है। उनके लिए मनुष्य की स्वतंत्रता का अर्थ उसके अधिकतम स्वावलंबन से है। उनके अनुसार यदि मनुष्य को स्वतंत्रता का आनंद लेना हो तो ‘प्रत्येक मनुष्य को रो*ामर्रा के उपयोग की जिस ची*ा की जरूरत हो, उसे स्वयं पैदा करना सीख ले।’ वे इतने पर ही नहीं रुकते बल्कि आगे बढकर कहते हैं कि, ‘जो ची*ा आदमी खुद पैदा न कर सके, उसके बिना काम चला लेना चाहिए। इससे स्वावलंबन बढेगा और वह उत्तरोत्तर प्रगति करेगा।’ गाँधी की दृष्टि में स्वावलंबन स्वतंत्रता की बुनियाद है और परावलंबन गुलामी की निशानी। वे आवश्यकताओं को बढाने पर आधारित पूंजीवादी अर्थनीति को मनुष्य को परावलंबी और अंततः गुलाम बनाने वाला मानते हैं। उनके अनुसार पूंजीवाद का नाश एक तरफ इसके खिलाफ शोर मचाकर और दूसरी तरफ अपनी आवश्यकताओं को बढाते जाने से नहीं हो सकता। बल्कि गाँधी तो अपनी आवश्यकताओं को कम करने तथा अधिकतम स्वावलंबन में ही पूंजीवाद का नाश29 देखते हैं। यही कारण है कि गाँधी पूँजीपतियों का जबर्दस्ती नाश करने में न तो किसी प्रकार के त्याग का दर्शन ही कर पाते हैं और न ही इसमें कोई बहादुरी3॰ ही देखते हैं।

गाँधी अपने आध्यात्मिक प्रयोगों31 के जरीये ही राजनीतिक क्षेत्र में प्रेरणा ग्रहण करते हैं। दास्तोएव्स्की ने भी रूस के संदर्भ में लिखा है कि, ‘अंततः हम समझने लगे हैं कि हम स्पष्टतया परिभाषित और मौलिक चरित्र के राष्ट्र हैं और हमारी समस्या एक नई जीवन-पद्धति विकसित करने की है, जो हमारी मिट्टी की उपज हो और लोक परंपराओं से जीवनी-शक्ति लेती हो।’32 दास्तोएव्स्की यूरोप की भौतिक प्रगति में तबाही का अक्स देखते हैं। वे कहते हैं, ‘ये ईश्वरविहीन देश। ये मनुष्य निर्मित ईश्वर के देश, संपदा, हिसाब-किताब, विज्ञान के साथ अपनी कृत्रिमता के बोझ से दफन हो रहे हैं। मुक्ति की तलाश जन से शुरू होनी चाहिए- उन सीधे सरल रूसी जनों से, जिनमें शैशव की आस्था आज भी विद्यमान है और इतिहास के द्वार पर प्रहार करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।’33 दास्तोएव्स्की लिखते हैं कि, ‘पश्चिम ने क्राइस्ट को खो दिया है।.... यही कारण है कि पश्चिम मर रहा है। अन्य कोई कारण नहीं।’34 गाँधी भी भारत में नई जीवन शैली और नई राजनीति के अग्रदूत थे। इसी परिप्रेक्ष्य में उनके रामराज्य को समझने की जरूरत है।

पाश्चात्य स्रोतों पर राजनीतिक चिंतन की इमारत खडी करने के बजाय गाँधी ने लोकप्रिय धार्मिक प्रतीकों का सहारा लिया था। ‘गाँधी की सफलता का जितना बडा कारण राजनीति में एक नए मुहावरे का इस्तेमाल था उतनी ही बडी वजह यह भी थी कि गाँधी को भारतीय समाज की संरचना की सही समझ थी और उनको व्यक्ति की सामाजिक वफादारियों की गहरी पहचान भी थी तथा वे जानते थे कि इन वफादारियों का उपयोग राजनीतिक कार्रवाई के लिए कैसे किया जा सकता है। गाँधी के पूर्ववर्ती तथा समकालीन राजनीतिज्ञों में से अधिकांश भारतीय समाज को एक संश्लिष्ट समाज मानकर चल रहे थे, इसलिए वे व्यापक जनाधार वाले राजनीतिक आंदोलन खडे नहीं कर पाये। वे भारत की असली तस्वीर को देख रहे थे, चूंकि वह समझ रहे थे कि यह देश तरह-तरह के वर्गों, समुदायों और धार्मिक समूहों का एक जमघट है, इसलिए वे इस उपमहाद्वीप के लोगों में ‘न भूतो न भविष्यति’ कोटि की जागरूकता पैदा कर पाये।’35

यही कारण है कि गाँधी अपने अर्थों के धर्म का राजनीति से अनिवार्य संबंध स्थापित करते हैं। उनके आंदोलनों का धार्मिक पहलू तो जगजाहिर रहा है, किन्तु उसे ठीक संदर्भ में शायद ही समझा गया हो। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की दृष्टि में असहयोग आंदोलन राजनीतिक चेतना, सुधारवाद, परंपरावाद और धार्मिकता का अद्भुत सम्मिश्रण था। जहाँ धार्मिक परंपरा पर आश्रित खिलाफत की पुष्टि उसका लक्ष्य था, वहाँ कतिपय धार्मिक परंपराओं को सुधारकर अस्पृश्यता निवारण उसके कार्यक्रम का महत्त्वपूर्ण अंग था। स्वराज्य के निमित्त राजनीतिक चेतना का विस्तार और खिलाफत संबंधी धार्मिक भावनाओं की पुष्टि, दोनों ही उसके महत्त्वपूर्ण कार्य थे।36 असहयोग आंदोलन ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं तथा जनता में प्रतिरोध की भावनाओं को पुष्ट किया तथा देश को गाँधीजी का नेतृत्व और स्वतंत्रता-संघर्ष का नया उपकरण प्रदान किया। पर खिलाफत आंदोलन ने मुसलमानों में जितनी राजनीतिक जागृति पैदा की, उससे अधिक उनमें धार्मिक भावनाओं को पुष्ट किया और दोनों ने उग्र सांप्रदायिक राजनीति का रूप धारण कर लिया।37 वस्तुतः यह गाँधी के इस आंदोलन के कारण हुआ, ऐसा मानना तर्कसंगत नहीं है। गाँधी के सर्वधर्म समभाव ने तो देश में सांप्रदायिक एकता लाने में ऐतिहासिक भूमिका ही अदा की थी। ब्रिटिश हुकूमत की फूट डालो और राज करो की नीति एवं निहित स्वार्थी सांप्रदायिक संकीर्णतावादी ताकतों ने ही देश में सांप्रदायिक विद्वेष उत्पन्न कर इस कडी को छिन्न-भिन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। गाँधी के रामराज्य में नस्ल, जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग अथवा आर्थिक आधार पर भेदभाव का पूर्णतः निषेध किया गया है।