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अथ किन्नर गाथा

अमृता चतुर्वेदी
कि’ और ‘नर’ ये वे दो शब्द हैं जिनसे मिलकर ‘किन्नर’ शब्द बना है। बोलचाल की भाषा में इन्हें ‘हिजडा’ कहा जाता है। ये शब्द दिमाग में आते ही इनके रहन-सहन, चाल-ढाल एवं आचार-व्यवहार की छवि सामने आ जाती है। केवल किन्नर कह देने से ही इनकी व्यथा या दर्द कम नहीं हो जाता है। किन्नरों को चार वर्गों में बाँटा गया है- बुचरा, नीलिमा, मानसा और हंसा।
वास्तविक हिजडों को बुचरा कहा जाता है जो जन्म से ही न पुरुष होते हैं और न ही स्त्री, इन्हें जन्म-जात हिजडा भी कहा जाता है। नीलिमा स्वयं ही हिजडे बनते हैं। मनसा कोटि के हिजडे किसी कारणवश स्वेच्छा से ही हिजडे बन जाते हैं एवं हंसा शारीरिक कमी के कारण होते हैं।
सृष्टि के निर्माता तो ईश्वर ही हैं, उन्हीं के द्वारा मनुष्यों में नर, नारी एवं उभयलिंगी की रचना की गई है। लेकिन यहाँ उभयलिंगी यानी हिजडों को हम मनुष्य ही हाशिये पर रखते चले आ रहे हैं। समाज में इन्हें आदर सम्मान देना तो दूर की बात है एक गाली के रूप में इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है जो काफी दर्दनाक एवं हृदय को भेद डालने वाला शब्द है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए कुछ बुद्धिजीवी लेखकों ने इन्हें हाशिये से ऊपर उठाकर समाज में एक स्थान दिलाने के लिए ‘किन्नर’ शब्द का प्रयोग किया है।
साहित्यिक दृष्टिकोण से आज अनेक विमर्शों पर चर्चा हो रही है जैसे स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि परन्तु किन्नर विमर्श या कहा जाए की इस समुदाय के विषय में कोई बडी चर्चा नहीं दिखाई दे रही है और न ही सुनाई दे रही है। हालांकि ऐसा नहीं है कि साहित्य में इस विषय (किन्नर) पर पहली बार कुछ लिखा गया है, पौराणिक काल से ही ये समाज के अन्दर चर्चित रहे हैं आज से सैकडों साल पहले रचित रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में भी इनका उल्लेख किया गया है। जब रामचन्द्र अपने पिता दशरथ की आज्ञा का पालन करने हेतु सीता और लक्ष्मण के साथ वन की ओर प्रस्थान करते हुए चित्रकूट आ गए थे तब उन्हें वापस अयोध्या लाने के लिए भरत एवं अयोध्यावासियों के साथ किन्नर भी वहां गए थे। प्रभु राम ने उन सभी से वापस जाने को कहा लेकिन किन्नरों से वे कुछ भी नहीं बोले। तब किन्नरों ने उनके वापस आने यानी चौदह वर्ष तक की प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया। जब वनवास पूर्ण करके प्रभु राम अयोध्या वापस लौट रहे थे तब उन्होंने चित्रकूट में किन्नरों को अपनी प्रतीक्षा करते हुए पाया। रामचन्द्र ने उनसे वहां रुकने का कारण पूछा तब बडे ही निश्छल भाव से किन्नरों ने उन्हें बताया कि जब हम आफ भाई भरत के साथ आपको वापस ले जाने के लिए यहाँ आये थे, तब आपने कहा था-
जथा जोगु करी विनय प्रनामा,
विदा किये सब सानुज रामा।
नारी-पुरुष लघु मध्य बडेरे,
सब सनमानी कृपानिधि फेरे ।।
प्रभु ने इस निश्छल और निःस्वार्थ प्रेम को देखकर उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में तुम राज करोगे, तुम जिन्हें आशीर्वाद दोगे उनका कभी अनिष्ट नहीं होगा।
महाभारत महाकाव्य में भी एक ऐसे ही पात्र शिखंडी की चर्चा की गई है। वे भी किन्नर थे। अर्जुन ने भी अपने एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान बृहन्नला किन्नर का रूप धारण कर समय व्यतीत किया था।
किन्नरों का उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी मिलता है। कुछ ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार हिन्दू और मुस्लिम शासकों द्वारा रानियों की पहरेदारी के लिए किन्नरों को ही नियुक्त किया जाता था ।
इन्हीं पौराणिक रीति एवं किन्नरों को सम्मान देने हेतु कई देशों ने नए कानून बनाकर एवं पुराने कानूनों को संशोधित कर किन्नरों के जीवन को सरल करने का प्रयास किया है। हमारे देश में इन्हें (किन्नरों को) पहचान देने की पहल सरकार द्वारा बहुत पहले ही की जा चुकी थी। सन् 1871 यानी अंग्रजी शासनकाल में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत इन पर कई प्रतिबन्ध लगाये गए पर सन् 1897 में इसमें संशोधन करते हुए इन्हें अपराधियों की कोटि में रखा जाने लगा और इनकी गतिविधियों पर नजर रखते हुए एक रजिस्टर तैयार करने को कहा गया। धारा 377 के अंतर्गत इनके कृत्यों को गैर जमानती अपराध घोषित किया गया। जब इन्हें आजादी मिली तब इनका नाम त्रि*मिनल ट्राइब्स एक्ट में से तो हटा दिया गया था, पर धारा 377 की तलवार इनके ऊपर लटकती रही। नवम्बर 2॰॰9 में भारत सरकार ने पुरुष एवं महिलाओं से अलग इनकी पहचान की स्वीकृति प्रदान की एवं इनका उल्लेख मतदाता पहचान पत्रों एवं निर्वाचन सूची में अन्य के तौर पर भी किया गया। 2॰15 में उच्चतम न्यायालय ने तीसरे लिंग के रूप में इनके अधिकारों को मान्यता दी एवं सभी आवेदनों में तीसरे लिंग का उल्लेख अनिवार्य कर दिया। इतना ही नहीं इन्हें बच्चा गोद लेने का अधिकार भी दिया, साथ ही साथ इन्हें चिकित्सा के माध्यम से स्त्री या पुरुष बनने का भी अधिकार दिया। केंद्रीय कैबिनेट ने 19 जुलाई, 2॰16 को ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल 2॰16 को मंजूरी दे दी। भारत सरकार की कोशिश इस बिल के जरीये एक व्यवस्था लागू करने की थी जिससे किन्नरों को भी सामान्य जीवन, शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में आजादी से जीने के अधिकार मिल सकें और जब धीरे-धीरे हर कानूनी व्यवस्था में इनकी भलाई हेतु संशोधन होने लगे तब साहित्य में भी इनका उल्लेख बुद्धिजीवी लेखकों द्वारा किया जाने लगा।
परन्तु यह कहना अनिवार्य होगा कि हिंदी साहित्य और समाज की मानसिकता में अभी भी किन्नर विमर्श अपरिपक्व अवस्था में है। समाज की विचारधारा इन्हें स्वीकार करने में हिचक रही है। फिर भी यह माना जा सकता है कि दिन प्रतिदिन विकसित हो रहे समाज ने अब इन्हें भी थोडी सी ही सही, पर जगह देना शुरू कर दिया है और शीघ्र ही हम यह देखना चाहेंगे कि ये भी समाज के सामान्य लोगों की भांति अपने मानवाधिकारों के साथ जीवनयापन कर सकें।
आज के हालात कुछ और हैं। हमारी पौराणिक कथाओं में भी इनका सम्मान करने का वर्णन मिलता है परन्तु इतना सब कुछ होने के बावजूद भी आज हमारा समाज इन्हें स्वीकार करने में हिचकिचाता है, और इन्हें हेय दृष्टि से देखता है। ये आज भी जब बिना बुलाये अपने आप ही उन जगहों पर पहुँच जाते है जहाँ कोई शुभ कार्य हो जैसे नवजात शिशु का जन्मोत्सव हो या कोई शादी विवाह का माहौल हो तो समाज में उन्हें सम्मान देना तो दूर उनके सामने जाने से भी कतराते हैं और कोई न कोई बहाना बनाकर उन्हें भगाने की कोशिश करते हैं। जब वे नहीं जाते हैं और दरवाजे पर नाच गाना शुरू कर देते हैं तब गृहस्थ लोगों को ऐसा महसूस होता है या कहा जा सकता है कि वे डर जाते हैं कि यदि इन्हें जल्द से जल्द यहाँ से कुछ देकर नहीं भेजा तो शायद कहीं उनके द्वारा दिए हुए श्राप से हमारे परिवार का अहित न हो जाये। तब उनके द्वारा मुँह माँगी रकम को साग-भाजी की तरह मोल-भाव कर उन्हें वह रकम देकर उनकी विदाई ऐसे करते हैं मनो बला टली। उनकी रकम की दरमुलाई करते समय शायद हम ये भूल जाते हैं कि हमारे द्वारा जो दिया जाता है, या कह सकते हैं कि यही उनकी आमदनी का एक मात्र जरीया होता है। इसी से वे अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। इन्हीं सबको लेकर वरिष्ठ लेखिका चित्रा मुद्गल के उपन्यास पोस्ट बॉक्स नं. 2॰3 नाला सोपारा में इनका (किन्नरों) का चित्रण बहुत संजीदगी से किया गया है।
हमें इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए इस सोच से ऊपर उठकर आना है। हम यानी समाज हैं। समाज तो हमसे ही बना है अतः हमें पहल करनी चाहिए। हम पहल करेंगे तो समाज भी उसका पालन करेगा। समाज के साथ शहर भी और फिर यह देश शायद किन्नरों के रहने लायक एक सुखद सम्मानजनक एवं सुरक्षित जगह बन जाये। इसी आशा के साथ मेरे इन शब्दों के माध्यम से शायद आप सबके भीतर किन्नरों के प्रति दयालुता एवं उनकी रक्षा हेतु भडकी हुई ज्वाला शांत हो सके।