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कात्यायनी : रणनीतिक प्रतिरोध की कविता

शशिभूषण मिश्र
ईमानदारी की तरह जहाँ कविता की बुनियादी शर्त बनती है, वहीं से कात्यायनी की काव्य-यात्रा शुरू होती है। इस काव्य-यात्रा में एक साथ बीसवीं शताब्दी की हिन्दी कविता का उपसंहार और इक्कीसवीं सदी की कविता की भूमिका निबद्ध है। रेखांकित किया जाना चाहिए कि कात्यायनी ने जिस शिद्दत से कविता के फार्म को तोडा है उससे कहीं अधिक मेहनत से जीवन-रूढियों को तोडा है। उनके यहाँ जितना निषेध प्रचलित काव्यात्मकता का है उतना ही ठहरी हुई मान्यताओं का भी। रचनाशीलता की इस यात्रा में सात भाइयों के बीच चम्पा, इस पौरुषपूर्ण समय में, जादू नहीं कविता, राख अंधरे की बारिश में, फुटपाथ पर कुर्सी और एक कुहरा पारभाषी तक की आमद दर्ज हो चुकी है। कविताई में व्यक्तिगत और सामूहिक प्रतिपक्ष को चिह्नित करने वाली इस कविता में तीन दशकों के परिवर्तनों की चहलकदमी को महसूस किया जा सकता है। सात भाइयों के बीच चम्पा (1994) में वह स्त्री जीवन और साहित्य के बीच एक जरूरी रिश्ता कायम करती हुई हिन्दी कविता को हॉकी खेलती हुई लडकियां, सात भाइयों के बीच चम्पा, इस स्त्री से डरो जैसी अप्रतिम कविताएँ देती हैं। वह इस पौरुषपूर्ण समय में के विरुद्ध बिगुल फूंकती हुई कविता को एक ऐसे आवां में तब्दील करती हैं जहाँ समय का पहिया खदबदाता हुआ पूरे इतिहास को चुनौती देता है। वह जादू नहीं कविता के माध्यम से व्यवस्था के रहस्यीकरण के साथ-साथ कविता के रहस्यीकरण को तोडती हैं और फुटपाथ पर कुर्सी के बहाने वह कविता को एक नए आनुभूतिक प्रस्थान की ओर ले जाती हैं।
वैचारिकता और शिल्प के स्तर पर हिन्दी कविता लगातार समृद्ध हुई है, लेकिन अंतर्वस्तु के स्तर पर इसमें दुहराव की प्रवृत्ति बढी है। इस सन्दर्भ में कात्यायनी से सीखा जाना चाहिए कि किस तरह बिना दुहराव के कविता को जुझारू विचारों की शक्ति से लैस किया जाता है। उनकी सोच का रसायन कहन की तलस्पर्शी साफगोई और जुझारू विचारशीलता से बनता है। उनके लिए कविता एक निर्णायक लडाई में सन्नद्ध अंतहीन यात्रा है जिसका लक्ष्य मनुष्यता-विरोधी शक्ति-केन्द्रों को ध्वस्त करना है। कात्यायनी के कवि की प्रतिबद्धताएँ बेहद स्पष्ट हैं; उनकी कविता धारा के विरुद्ध तैरते उन लोगों का साथ कभी नहीं छोडती ‘जिन्होंने इस अँधेरे दौर में भी न सपने देखने की आदत छोडी है और न लडने की।’ उनके लिए कविता मनुष्य के विवेक को समृद्ध करने का माध्यम तो है ही, उससे कहीं ज्यादा व्यवस्था के छद्म को भेदने का उपक्रम है। अपनी कविताओं के बारे में लिखते हुए वह स्वीकार करती हैं कि कविता जो स्वयं मानवीय जरूरत रही है, मानवीय जरूरतों की तडप पैदा करती हुई, वह प्रकृति से वर्चस्व विरोधी होती है, एक औ*ाार भी होती है राज्य के रहस्य को भेदने समझने का। उनके लिए लिखना, संघर्ष के तमाम रूपों में से एक रूप है। वह उनके लिए जीने का तरीका है। कहना न होगा कवि की इस संकल्प-दृढता में उसकी रचना-दृष्टि या कहें जीवन-दृष्टि के कई सूत्र तलाशे जा सकते हैं -
एक अँधेरे समय में ही
हम सयाने हुए
प्यार किया
लडते रहे ताउम्र
हालाँकि अँधेरा फिर भी था
मगर हमारे जीने का
यही एक अंदा*ा हो सकता था
फिक्र जब सिर्फ एक हो
कि दिल रोशन रहे।
कात्यायनी के लिए कविता जीवन से उपजी एक ऐसी परियोजना है जिसके द्वारा समय-समाज को देखने-परखने और हस्तक्षेप का नजरिया विकसित होता है। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि, मौत की दया पर जीने से बेहतर है, *ान्दा रहने की ख्वाहिश के हाथों मारे जाना। उन्हें गहरे तक अहसास है कि जब तक ताकतवरों द्वारा रची दुरभिसंधियों को नहीं तोडा जाएगा तब तक आम अवाम की जिन्दगी में खुशहाली नहीं आ सकती। प्रतिरोध कात्यायनी की कविता का स्थायी भाव है। प्रतिरोध का यह स्वर किसी वैचारिकता से नहीं जीवन की विसंगतियों, विडम्बनाओं और विभ्रमों के गर्भ तक धंसने और उन्हें चीन्हने से उपजा है, इसीलिए यह इतना विश्वसनीय लगता है-
बा*ाार की निर्बंध कृत्याओं की चपेट में
अपनी जगह जमीन से उजडते ग्रामीणों
और कारखानों से बाहर धकेले जाते
मरते और लडते लाखों कामगारों के लिए
फिलहाल पराजित
पर जीवित सपनों के लिए गाओ।
कात्यायनी की कविता सत्ता और पूंजी की कारगुजारियों के खिलाफ आवा*ा ही नहीं उठाती ‘सत्ता और पूंजी’ की नाभिनालबद्धता को प्रश्नांकित करती है। वह दिखाती हैं कि जिसे हम भूमंडलीकरण कहते हैं, वह वास्तव में पूंजीवादी शक्तियों का ही नव साम्राज्यवादी प्रसार है। वह इस सच को भी उभारती हैं कि हमारा समकाल राजनीति की साम्प्रदायिक सोच का ही समकाल नहीं, उसकी कारोबारी लिप्साओं का भी समकाल है, जिसमें विकास कारोबार प्रायोजित है। इस विस्तार में कारपोरेट ताकतें पूरी दुनिया में अपनी मंडिया बना रही हैं और दूसरी ओर किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। खेती-किसानी विरोधी नीतियों से मुकाबला करते-करते किसान थक चुका है और वह अपने खेतों से पलायन के लिए मजबूर होकर दूसरे शहरों में काम की तलाश में मारा मारा फिर रहा है। कात्यायनी इस समूचे संकट की मर्मस्पर्शी निशानदेही करती हैं-
आओ हुतात्माओं
देखो गंगा यमुना ब्रह्मपुत्र के मैदानों में
अपने *ारखेज खेतों से बेदखल
बेघर-बेदर किसान
चिमनियों से उठते काले धुएँ
की काली छतरी के नीचे
भटक रहे हैं।
कात्यायनी ने यथार्थ घटनाओं और व्यक्तित्वों पर कई कविताएँ लिखी हैं; मसलन यह आर्तनाद नहीं एक धधकती हुई पुकार है, फिलिस्तीन 2॰15, 2॰1॰ में निराशा प्रेम उदासी और रतजगे की कविता के बारे में कुछ राजनीतिक नोट्स, 2॰॰7, भगत सिंह के लिए एक गद्यात्मक सम्बोध गीत, गुजरात-2॰॰2, कुस्र्क के कैप्टन की अंतिम चिट्ठी पत्नी के नाम मुक्तिबोध के लिए, गोयबल्स 1994 आदि। यथार्थ घटनाओं और चरित्रों पर कविता लिखना जोखिम भरा काम है क्योंकि सूचनाएँ चारों ओर से दबाव बनाती हैं और कविता किसी गहरे विश्लेषण के बजाए सूचनात्मक घेरेबंदी में सिमट जाती है, पर कात्यायनी की ये विशेषता है कि वो सूचनाओं से निश्चित दूरी बनाकर घटनाओं और चरित्रों द्वारा उनके सांस्कृतिक आयामों तक पहुँचने का प्रयास करती हैं-
भारत की एक स्त्री, एक स्त्री कवि
सचमुच तुम्हें याद करना चाहती है भगतसिंह....
और सबसे पहले, सबसे पहले पूछना चाहती है
कविता की दुनिया से बहिष्कृत
शब्दों को निस्संकोच इस्तेमाल करते हुए यह सवाल
कि किस प्रकार, किस प्रकार
ते*ा की जाती है क्रान्ति की तलवार
विचारों की शान पर
किस तरह से विचार जनसाधारण के व्यवहार में
रूपांतरित होकर
प्रचंड भौतिक शक्ति बन जाते हैं
और किस प्रकार दुनिया को बदलते हुए लोग
स्वयं को बदल लेते हैं।
हिन्दी की स्त्री कविता का राजनीतिक सन्दर्भ कात्यायनी के यहाँ बेहद परिपक्व है। इन रचनाओं में ‘व्यापक सामाजिक चिंताएं’ और ‘राजनीतिक चेतना’ इस तरह गुत्थमगुत्था हैं कि उन्हें आपस में अलगाना कठिन है। दरअस्ल वह राजनीति की नहीं राजनीतिक दृष्टि की कवयित्री हैं। एक बात और जो उनमें उल्लेख्य है कि जोखिम उठाने के न्यूनतम चलन के बीच वह बराबर जोखिम उठाती हैं। गरीब-गुरबों के पक्ष में निर्भीकता से डटी रहने वाली कविता की तादाद यहाँ बेशुमार है। वह ऐसी कविता की प्रस्तावना लिखती हैं जो किसी भी अन्याय और दमन के समक्ष तनी हुई मुट्ठियों की तरह दिखाई देती है-
एक बर्बर समय के विरुद्ध
युद्ध का हमारा संकल्प
अभी भी बना हुआ है
और हम सोचते रहते हैं कि
इस सदी को यूं ही व्यर्थ
नहीं जाने दिया जाना चाहिए।
वह नागरिक समाज में उभरी प्रवृत्तियों और नागरिकता-बोध पर आसन्न संकट की खबर लेती हैं। इस संकट का मूल कारण है-नागरिकता का अपनी ही खोल में सिमटकर रह जाना। संकट की तस्दीक करते हुए वह उस केन्द्रीय समस्या तक पहुँचती हैं जिसके चलते समाज में बर्बरता बढी है। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि बर्बरता कायर समाज में ही फैलती है और बर्बर हमेशा कायरों के बीच रहते हैं। उनका निष्कर्ष है कि- एक कायर के भीतर अक्सर एक बर्बर छिपा बैठा रहता है। कात्यायनी के भीतर इस क्रूर और बहुरूपिया समय को लेकर गहरा क्षोभ है जिसे वह बारम्बार पाठक से शेयर करती हैं-
डोमा जी उस्ताद अब एक भद्र नागरिक हो गया है
कई अकादमियों और सामाजिक कल्याण संस्थाओं
और कला प्रतिष्ठानों का संरक्षक, व्यवसायी
राजनेता और प्राइवेट अस्पतालों-स्कूलों का मालिक।
मुक्तिबोध के काव्यनायक ने
जिन साहित्यिक जनों और कलावन्तों को
रात के अँधेरे में उसके साथ जुलूस में चलते देखा था
वे दिन-दहाडे उससे मेल-जोल रखते हैं
और इसे कला-साहित्य के व्यापक हित में बरती जानेवाली
व्यावहारिकता का नाम देते हैं।
कात्यायनी की रचनाशीलता पर बात करते हुए उनके अद्यतन संग्रह एक कुहरा पारभाषी को अनदेखा नहीं किया जा सकता। कात्यायनी के सभी संग्रह और उनमें छपी अधिसंख्य कविताएँ पढ चुकने के बाद इतना तो जरूर कह सकता हूँ कि एक कुहरा पारभाषी संग्रह, जिसे हाल ही में केदार सम्मान मिला है, की अधिकांश कविताएँ एक गझिन गद्यात्मकता का शिकार हुई हैं। कविता में गद्य का आना बुरा नहीं है पर उससे कविता की लय बिखर जाए; यह बेहतर बात तो नहीं है। रेखांकनीय है कि उनके पहले संग्रह सात भाइयों के बीच चम्पा में जो संकेतात्मक शिल्प है, इस पौरुषपूर्ण समय में और फुटपाथ पर कुर्सी में कहन की जो अर्थ-गर्भिता है, जादू नहीं कविता में जो समृद्ध अभिव्यक्ति-संक्षिप्तता है उसे इस संग्रह में वह बरकरार नहीं रख पातीं। बहरहाल, कात्यायनी कविता की भाषा के बजाए समाज में कविता की जरूरत को लेकर चिंतित दिखाई देती हैं-
दुनिया के तमाम देशों के तमाम आम लोगों तक
पहुंचेगी कविता
अलग अलग रास्तों से होकर
अलग अलग भेष में
और बताएगी उस सबसे सुन्दर दुनिया के बारे में
जो अभी भी हमने देखी नहीं है।
हिन्दी की स्त्री कविता पर बात करते हुए इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि स्त्री मुक्ति के प्रश्न पर कात्यायनी के साथ सविता सिंह, अनामिका, निर्मला गर्ग, गगन गिल, अनीता वर्मा, नीलेश रघुवंशी से लेकर सुमन केशरी, शुभा, लीना मल्होत्रा राव, संध्या नवोदिता, सुजाता, बाबुषा कोहली, स्वाति मेलकानी, शुभम श्री आदि तक ने अपने अपने स्तर पर मुठभेड की है। पहल के 115वें अंक में मीना बुद्धिराजा ने कात्यायनी की कविताओं का मूल्यांकन करते हुए दो अतिरेकी निष्कर्ष दिए हैं जिनकी ओर ध्यान आकर्षिक करना चाहूँगा। वह लिखती हैं कि- समकालीन कविता में निःसंदेह वह अकेली रचनाकार हैं जो बदलाव के कई मोर्चों पर सक्रिय हैं। वह आगे लिखती हैं- कात्यायनी हिन्दी में एकमात्र कवयित्री हैं जिन्होंने एक नयी वर्ग चेतना अर्जित करते हुए अन्यायग्रस्त, संघर्षरत, सर्वहारा समाज को कविता से जोडा है। जहाँ तक आन्दोलनधर्मी कविता का सवाल है वहां कात्यायनी के बराबर शायद ही कोई स्त्री कवि ठहरे, पर निःसंदेह वह अकेली रचनाकार नहीं हैं जो ऐसा कर रही हैं। दूसरी बात ये कि कात्यायनी ने जिस मात्रात्मकता और गुणात्मकता के साथ वर्ग-चेतस कविताएँ लिखी हैं उनका कोई शानी नहीं; पर अन्यायग्रस्त और संघर्षरत सर्वहारा समाज को कविता से जोडने वाली वह एक मात्र कवयित्री नहीं हैं। इस सन्दर्भ में हम नीलेश रघुवंशी की उन तमाम कविताओं को, जिनमें अन्यायग्रस्त और आपदग्रस्त सर्वहारा समाज की पीडाएँ गहरे तक जज्ब हैं, उन्हें कैसे भुला सकते हैं। इस सन्दर्भ में उनकी ढाबा श्ाृृंखला की कविताएँ जरूर पढी जानी चाहिए -
ढाबे पर सिंकती रोटियों की महक
और तपेले से उठती सब्*ाी की भाप से
चलती थी हमारी साँसें
बने इसी भाप से बच्चों के खिलौने
तपते थे आग में हमारे चेहरे
थकते पाँवों के साथ-साथ कंधे
पानी के भारी बर्तनों के बोझ से
हमारे थके चेहरे देख पिघलती थी माँ की आँखें
सिहरता था कहीं अंदर ही अंदर ढाबा
हिन्दी की स्त्री कविता में वर्ग-चेतना का दूसरा उदाहरण अनामिका की ब्रह्ममुहूर्त में ईंटों की लारी, भूख, घरेलू नौकर, खुरदुरी हथेलियाँ आदि कविताओं को देखा जाना चाहिए। जिनके लिए लिखी जाती हैं कविताएँ कविता का एक अंश साझा कर रहा हूँ-
आगजनी, बाढ और तूफान
दंगे, महायुद्ध, वक्त के थपेडे
वे अपने हाथों पर मलकर
खैनी-चूने की तरह फांक जाते हैं
बा*ा वक्त जब वे उठाते हैं सर
काँप जाते हैं कलेजे
चट्टानों के।
एक स्त्री कवि के रूप में स्त्री विमर्श का विषय उनके लिये जितना व्यक्तिगत है उतना ही सामाजिक। सात भाइयों के बीच चम्पा, हाकी खेलती लडकियां, इस स्त्री से डरो, स्त्री का सोचना एकांत में, अपराजिता, देह ना होना, वह रचती है जीवन, भाषा में छिप जाना स्त्री का आदि कई कविताओं में वह पितृसत्ता से लगातार टकराती हुई स्त्री विमर्श के स्वीकार्य ढाँचे से आगे बढती हैं-
चैन की एक सांस लेने के लिये
स्त्री अपने एकान्त को बुलाती है
संवाद करती है उससे
जैसे ही वह सोचती है
एकान्त में
नतीजे तक पहुंचने से पहले ही
खतरनाक घोषित कर दी जाती है!
इन कविताओं में कात्यायनी स्त्री अस्मिता, संघर्ष और पुरुषसत्ता की जटिल संरचना से जुडे कई अहम सवालों से मुखामुखम होती हैं। मंगलेश डबराल की इस स्थापना में बहुत बल है कि-कात्यायनी नारीवाद और माक्र्सवाद के बीच एक जटिल रचनात्मक रिश्ता कायम करती हैं। उनका स्वर मूल रूप से एक स्त्री स्वर है लेकिन उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और समाज को बदलने की बेचैनी भी उतनी ही सच्ची है। यह एक प्रतिबद्ध आवा*ा है जिसमें एक स्त्री की पीडा भी उतनी ही मूलभूत है। उनमें एक उत्पीडित मनुष्यता का संघर्ष है जिसे एक स्त्री के शिल्प में व्यक्त किया गया है और इस शिल्प में एक गहरी लोकतांत्रिक चेतना है जो स्मृति और स्वप्न के पारम्परिक बिंबों को भेदती हुई, कविता को *यादा आमफहम, ज्यादा सामाजिक बनाती है।
आने वाले समय में जब जब वर्ग-चेतस और संघर्षधर्मी कविताओं की बात होगी, जब-जब जुझारू और आन्दोलनधर्मी कविता का सन्दर्भ व्यक्त किया जाएगा और जब मनुष्यता के पक्ष में लडते हुए किसी संघर्षशील व्यक्ति के कंधे कमजोर पडेंगे वहाँ कात्यायनी की कविता उसके पक्ष में खडी होगी और उसे लडने का नया साहस देगी।