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नन्द चतुर्वेदी : अम्लान रोशनी की तलाश

पल्लव
कवि नन्द चतुर्वेदी के साहित्य के वास्तविक मूल्यांकन के लिए साहित्य सम्बन्धी उनकी प्रतिज्ञाओं को समझना आवश्यक है। नन्द चतुर्वेदी ने अपने परिवेश से अपने काव्य संस्कार अर्जित किये और उन्हें सम्यक विवेक की रोशनी में विकसित किया। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा है- पद्माकर का सुप्रसिद्ध छंद जिसमें पद्माकर ने ‘बालाओं’ को ‘मसाला’ कहा है। मतलब स्त्रियां भी एक मसाला हैं तो उसका उत्तर मैंने बहुत छोटी आयु में छंद लिखकर दिया था जिसकी अंतिम पंक्ति है-
दीजै रंगशाला, रतिशाला को हवाला कहा
बिलखत जे हैं एक-एक निवाला को।
जो एक एक अन्न के दाने, ग्रास के लिए बिलख रहे हैं, उनको दीजै रंगशाला, रतिशाला को हवाला कहा। और यह कोई मैंने माक्र्स की, लोहिया की, गाँधी की या जयप्रकाश की पुस्तक पढकर नहीं लिखा। यह सहज ही पीडादायक उद्गार थे, जो उत्पीडन के विरुद्ध थे। यह कविता पंद्रह-सोलह वर्ष की आयु में लिखी थी। पर बाद में जब मैंने इन्हीं भावों को अपनी कविताओं के लिए चुना तो मुझे लगा कि मेरी कविता की चिंताएँ मूलतः यही हैं। मुझे अब भी वह सारी बयानबाजी, जो समाज से साहित्य को काटने के संदर्भ में दी जाती है, निरर्थक और क्षुब्ध करने वाली लगती है और मेरे पास उसके तर्क भी हैं। मैं दो लक्ष्यों को बार-बार चिह्नित करता हूँ ः मनुष्य की स्वाधीनता और मनुष्य की समता। कहना न होगा कि नन्द चतुर्वेदी का समस्त साहित्य इसी स्वाधीनता और समता की आकांक्षा से उपजा है। याद आता है कि चित्तौडगढ में हुए एक आयोजन में डॉ. सत्यनारायण व्यास ने उन्हें गद्य और पद्य का सव्यसाची कहा था। बहुधा प्रशंसा में ऐसा कह दिया जाता है। लेकिन नन्द बाबू के पाठक और श्रोता जानते हैं कि वे सचमुच साहित्यिक थे। आपादमस्तक कवि। उनका गद्य लेखन आकस्मिक नहीं है। गहन विचार श्ाृंखला से आता और अपने समय व समाज के आवश्यक सवालों से जूझता यह गद्य अपने प्रवाह और प्रभाव में कवि का गद्य ही है। प्रकाश आतुर ने उचित ही लिखा था, नन्द चतुर्वेदी जितने समर्थ कवि हैं उतने ही समर्थ गद्य लेखक भी हैं। कविता के साथ-साथ गद्य लेखन की आवश्यकता अनुभव करते हुए समीक्षाओं के साथ-साथ शिक्षा, दर्शन, राजनीति, साहित्य आदि पर व्यापक मानवीय प्रतिबद्धता के साथ उन्होंने कलम चलाई है। (राजस्थान के कृतिकार ःप्रस्तुति, प्रकाश आतुर, राजस्थान साहित्य अकादमी) यह दो तरह का गद्य है। पहला है- विचार और साहित्य आलोचना का गद्य, दूसरा-संस्मरणों का गद्य।
आलोचक और अपने मित्र प्रो. नवलकिशोर को दिए गए साक्षात्कार में नन्द चतुर्वेदी ने कहा था, बहुत-सी बातें जो कविता में नहीं आती हैं, उन्हें अलग से कहने की आवश्यकता प्रतीत होती है और यह लगातार इन दिनों ज्यादा महसूस होती है। मेरा इधर का बहुत सारा गद्य वैसा गद्य नहीं है, जिसमें साहित्यिक समस्याओं पर चिन्तन-मनन हो, बल्कि वह सामाजिक उथल-पुथल से जुडा है। ऐसे गद्य-लेखन की एक जबर्दस्त जरूरत मैं महसूस करता हूँ। निस्संदेह उसके लिखने में कविता-लेखन से अर्जित साहित्याभ्यास सहायता करता है, लेकिन उसकी तार्किक परिणति अधिक स्पष्ट और उद्देश्यनिष्ठ होती है। समता और स्वाधीनता के आग्रह भी उनमें स्पष्ट हैं और अनेक विषयों में मेरी रुचि भी परिलक्षित होती है। (साक्षात्कार, पृ. 41)
नन्द चतुर्वेदी ने विचार और आलोचना की अनेक गद्य पुस्तकें लिखी हैं। इनमें 1985 में प्रकाशित शब्द संसार की यायावरी सबसे प्रमुख है। राजकमल प्रकाशन से 2॰12 में आई यह हमारा समय इस श्रेणी की दूसरी महत्त्वपूर्ण किताब है जिसमें निबंधकार नन्द चतुर्वेदी के वास्तविक दाय को देखा जा सकता है। राजस्थान के प्रसिद्ध कवि सुधींद्र पर राजस्थान साहित्य अकादमी के लिए उन्होंने एक पुस्तक सुधीन्द्र ः व्यक्ति और कविता शीर्षक से लिखी थी। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान के लिए उन्होंने कविता-पाठ शीर्षक से एक पुस्तिका लिखी थी जिसमें कविता के पठन-पाठन पर शिक्षाशास्त्रीय और साहित्यिक अध्ययन किया गया है। इसके अलावा सम्पादित किताबों में पं. गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ ः व्यक्तित्व और कृतित्व, मीरां-संचयन और सप्त किरण शामिल हैं। इस विपुल गद्य लेखन में नन्द चतुर्वेदी की मूल प्रतिज्ञाएँ और चिंताएँ वे ही हैं जो उनके कवि-कर्म से भी जुडी रही हैं। गद्य लेखन में उन्हें अपने प्रान्त में मौजूद निरक्षरता और अशिक्षा को भी ध्यान में रखना आवश्यक लगता था।
शब्द संसार की यायावरी में कोई डेढ दर्जन आलेख हैं जो अधिकांशतः साहित्य आलोचना और कुछ कवियों के मूल्यांकन के क्रम में लिखे गए हैं। पहले ही लेख साहित्य के बुनियादी सरोकार में वे लिखते हैं- यह सिर्फ बहस की शुरुआत है कि जिससे साहित्य के जरीये मनुष्य की दीनता, पराजय, असहायता, संशय कम हो और क्रूरताओं के प्रति उसकी नारा*ागी और जागरूकता बढे। इस बहस से यह भी लाभ होगा कि हम अपने समय के प्रज्वलित प्रश्नों से जुडकर साहित्य की प्रासंगिक रचना कर सकेंगे और काल को अधिक प्रखर बनाएंगे। (साहित्य के बुनियादी सरोकार, शब्द संसार की यायावरी, पृ. 16) वहीं लिखने की कठिनाइयां शीर्षक से लिखे आलेख में वे दूर तक देख पा रहे थे- आने वाले दिनों में राज्य सत्ताएँ प्रबल और क्रूर हो सकती हैं, संगठन अधिक अनुशासन-कामी, शहर अधिक फैले हुए, शास्त्र और सैन्य शक्ति अधिक उद्दंड, व्यवस्था अधिक अमानवीय और क्रूर, बाहरी दुनिया ज्यादा आकर्षक और वस्तुएं अधिकाधिक मनोहारी, तब रचनाकार को साहित्य लिखने की जटिलताओं और कठिनाइयों का अनुभव होगा। (शब्द संसार की यायावरी, पृ.23) इस पुस्तक में नन्द चतुर्वेदी का एक आलेख है रसज्ञता, इसमें कवि ने हमारी परम्परा में मिले एक काव्य मूल्य को व्यापक और गहरे अर्थ में पुनर्व्याख्यायित करने का सुन्दर यत्न किया है।
पुस्तक में हिंदी और राजस्थान के अनेक महत्त्वपूर्ण लेखकों के मूल्यांकन सम्बन्धी आलेख भी हैं। राजस्थानी भाषा के महाकवि कहे गए कन्हैयालाल सेठिया पर नन्द चतुर्वेदी का आलेख काम का है। यहाँ उन्होंने लिखा है- कविता की जाँच करते समय यह आवश्यक है कि कवि के मन का और स्थूल दुनिया का रिश्ता तलाश किया जाए। स्थूल दुनिया किसी के लिए भी मामूली उत्पादन नहीं है, कवि के लिए तो यह वास्तव में एक गैर मामूली, असाधारण उपादान है। स्थूल दुनिया के सहस्रों आपसी संबंधों से कवि का मन अपना सम्बन्ध बनाता है और अभिव्यक्त करता है। संबंधों के बीच से सम्बन्ध बनाते हुए वह एक ऊंची सी जगह बैठकर फिर इसे आत्मीय करते हैं और ऐसा भी हो सकता है कि अनेक कवि दुनिया के प्रश्न खुद को सम्बोधित करें। (वही, पृ. 95) कहना न होगा कि यह नन्द चतुर्वेदी के सुदीर्घ काव्यानुभव का निचोड है। पुस्तक में नन्द चतुर्वेदी ने गुलेरी और प्रेमचंद जैसे हमारी भाषा के बडे गद्यकारों पर भी विचार किया है तो साहित्य से संबंधित कुछ बहसों-विवादों और धारणाओं पर उनके छोटे छोटे आलेख उनके प्रौढ विचारक और चिंतक का परिचय देते हैं।
यह हमारा समय नन्द चतुर्वेदी की ऐसी पुस्तक है जिसमें संस्मरणों के साथ कुछ आलेख और मूल्यांकनपरक अध्ययन हैं। पुस्तक की भूमिका में नन्द चतुर्वेदी ने लिखा था- गद्य-लेखन के बारे में मैं यह कहना आवश्यक समझता हूँ कि यह ‘स्वतः-स्फूर्त’ सर्जना नहीं है, यह अपने बाहरी दबावों की निष्पत्ति है और एक सुतार्किक निष्कर्ष तक पहुँचती यात्रा है। लेकिन यह कहना उचित नहीं है कि गद्य-लेखन ‘दोयम दर्जे’ की साधना है। अब कविता-भाषा का गद्य-रूप लेना, भाषा की शक्ति का विस्तार और काव्य-भाषा के वर्चस्व की प्रचलित रूढियों को अस्वीकार करना भी कहा जाएगा। आगे उन्होंने लिखा, ‘इस पुस्तक में कई विषयों पर लिखे आलेख हैं जिनमें समय के दबावों, उनको समता और स्वतंत्रता के वृहत्तर उद्देश्यों में बदलने वाले आन्दोलनों की चर्चा है। ‘समता’ ही केन्द्रीय चिंता है, जिसे अवरुद्ध करने के लिए विश्व की नई पूंजीवादी-शक्तियां अपने ‘सांस्कृतिक एजेंडा’ के साथ जुडी हुई हैं। दुनिया के लोग अघाए और शुचितों के बीच बाँट दिए गए हैं। लालची मध्यवर्ग अपनी समृद्धि के सपने देखता पूंजीपतियों की मायावी दुनिया का सहचर हो गया है। (गद्य लेखन का हौंसला, नन्द चतुर्वेदी, यह हमारा समय, पृ 1॰-11)
इस किताब में एक आलेख है भारतीयता की तलाश, जिसमें नन्द चतुर्वेदी इधर लगातार चर्चा में रहे इस विषय पर विचार करते हैं। कहना न होगा कि नन्द चतुर्वेदी की भारतीयता की परिभाषा और व्याख्या दोनों हमारे लिए आवश्यक बन गए हैं।’ भारतीयता के प्रसंग की सबसे जटिल-ग्रंथि तो उसको पहचानने की है। उन विशेषताओं को रेखांकित करने की, जो मौलिक हैं और संशयरहित हैं।.... पहचान के संकट को जानने के लिए हमें समाज के उस चित्त को ही जानना पडता है, जो समय की अनंत उथल-पुथल और अनिश्चयों के बीच, अपनी आस्थाओं और प्रतिज्ञाओं को नष्ट नहीं होने देता। हम ह*ाारों प्रकार की स्मृतियों की छाया-आतप से गु*ारते हुए उस संपदा को इकट्ठी करते हैं, जिसे हम संस्कृति कहते हैं, और जो बाद में, हमारे समूह-चित्त के राग-द्वेष का निर्धारण करती है। राग ही की तरह द्वेष भी, संस्कृति के हिस्से की ची*ा है। ध्यान देने की बात है कि संस्कृति, अनुभवों की विराट् श्ाृंखला है, इसलिए उसमें पुनर्नवा होने या कुछ विलुप्त होने की सारी संभावनाएं मौजूद हैं ः मनुष्य, इसी तरह इसी पराक्रम में अपना समय और संसार बनाते हैं। (पृ.144-45) नन्द चतुर्वेदी आगे फिर कहते हैं- ‘भारतीयता की तलाश करने वालों को यह जानकार हिम्मत बंधेगी कि कट्टरतावाद और मध्ययुगीन सामंतों की स्मृति-कथाओं से सम्मोहित न होने वाले लोग अब भी मूल भारतीय चित्त को जानते हैं जो मनुष्य को आंतरिक विवेक और स्वाधीनता से जोडता है। (वही पृ.146) आश्चर्य नहीं कि नन्द बाबू इस तलाश को भी सर्जना के साथ जोडने के पक्षपाती हैं- भारतीयता की तलाश उसकी पुनर्रचना ही है, वह नयी कविता बनाने की तरह है जिसमें हमारी जानी-पहचानी भाषा अर्थ की नयी दुनिया की तरफ ले जाती है और उसे विश्वसनीयता देती है। पहले भी हम अनेक समुदायों के साथ रहे हैं और अब भी उन सारी संभावनाओं को तलाश करना एक सर्जनात्मक कर्म है। (वही पृ.146)
विख्यात कथाकार स्वयंप्रकाश ने यह हमारा समय की समीक्षा करते हुए लिखा था- पुस्तक के सर्वाधिक उत्तेजक और महत्त्वपूर्ण निबन्ध अंतिम दो निबन्ध कविता के प्रयोजन का पक्ष और आ*ाादी के बाद ही हैं। इनमें नन्द बाबू का चिन्तक अपने सर्वाधिक मौलिक और तेजस्वी स्वरूप में दिखाई देता है और वह अपने पक्ष पोषण के लिए ब्राह्मणवादी संस्कृत सुभाषितों का सहारा भी नहीं लेते। कविता के प्रयोजन का पक्ष में एक जगह वह कहते हैं प्रयोजन के साथ सच्चे मन के साथ जुडने वालों की प्राथमिकता मानव और मानव समूहों की चौपट होती दुनिया की प्रतिष्ठा को बचा लेना है, जो इन दिनों आर्थिक विजय और सांस्कृतिक क्षरण के पाटों के बीच आ गयी है। तीसरी दुनिया की दुर्लभ सांस्कृतिक सम्पदा साहित्य और कला के लिए उपभोक्तावादी महाजनी सभ्यता के पक्षधर लोगों के पास सहानुभूति के वे शब्द हैं जो पिछले पचास पर्षों से अर्थच्युत हो रहे हैं। (मौलिक और मुखर सोच, स्वयंप्रकाश, शुक्रवार साप्ताहिक, 4 अप्रैल, 2॰13, पृ. 6॰)
पुस्तक में धर्म, हिंसा, बा*ाारवाद, संचार साधनों की अपसंस्कृति, युवा पीढी और शिक्षा से सम्बन्धित आलेखों को एक स्थान पर पढना निश्चय ही एक विवेकवान निबंधकार की दृष्टि से अपने को रोशन करना है। हिंदी में कथेतर विधाओं में निबंध विधा सबसे कठिन और अब लुप्तप्राय मानी जा रही है। इस विधा की ऊँचाई नन्द बाबू की यह किताब देती है। स्वयंप्रकाश का निष्कर्ष दुहराना अनुपयोगी न होगा- नन्द बाबू के निबंधों को पढकर पता चलता है कि वे समय के साथ चले हैं और अद्यतन समस्याओं के बारे में भी उनका सोच मौलिक और मुखर है। खासकर ‘धर्म और हिंसा’ तथा ‘सज्जनों का संपत्ति शास्त्र’ जैसे निबन्ध तो वही व्यक्ति लिख सकता है जो जानता है कि अनुभवसिद्ध होने के कारण कडवी होने के बावजूद उसकी बात ससम्मान सुनी जाएगी और विचारणीय भी मानी जाएगी। आम तौर पर एक अवस्था के बाद लोग या तो चुप हो जाते हैं या झींकते न*ार आते हैं कि अब मेरी बात कोई नहीं सुनता। इस मामले में नन्द बाबू आज भी युवा हैं, हर बहस में बराबरी से शरीक होने का उनमें अब भी युवकोचित उत्साह है, और यही उनकी अपार लोकप्रियता का रहस्य है।’ (मौलिक और मुखर सोच, स्वयं प्रकाश, शुऋवार साप्ताहिक, 4 अप्रैल 2॰13, पृ. 6॰)
कवि हेमंत शेष ने उदयपुर में 21 अप्रैल 2॰18 को दिए नन्द चतुर्वेदी स्मृति व्याख्यान में कहा था, यह हमारा समय किताब में वह जिस प्रखरता से वर्ण-व्यवस्था, स्त्री-शक्ति, महिला-स्वातंत्र्य, दलित-प्रश्नों, समाजवाद, शिक्षा, धर्म, हिंसा, बाजारवाद, हिन्दी, संचार-साधनों, पत्रकारिता, मीडिया, भारतीयता आदि गंभीर विषयों पर एक गहरी अंतर्दृष्टि से विचार कर सकते थे, वहीं वह खेदपूर्वक बातचीत या कभी पत्रों में, इस बात को भी रेखांकित करते थे कि इधर अपने समकालीन लेखकों पर ‘संस्मरणात्मक’ लेखन की परंपरा हिन्दी पत्रकारिता में प्रायः चुक-सी गयी है।’ हेमंत शेष ने उचित कहा कि ‘इन सब आलेखों में नंदजी के कवि-मन पर समकालीन जटिल प्रश्नों की गहरी काली छाया है, पर जिससे मुक्ति पाने का सपना भी इन गद्य-रचनाओं में झिलमिलाता है। खुरदरी वास्तविकताओं और जटिल-सामाजिक-राजनीतिक षड्यंत्रों की खोज-खबर लेते उनके कई गद्य-आलेख, हमें किसी तरह भी हताशा का सन्देश नहीं देते, एक आशावादी, उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्ति जागते कर्मठ लेखक के मन-मानस का पता बताते लगते हैं। अकुंठित-आशावाद उनके लेखकीय-चित्त का स्थाई-भाव है। (वही)
कवि सुधींद्र का जन्म 15 मार्च, 1917 को हुआ था और 15 जून, 1954 को उनका निधन हो गया। केवल सैंतीस वर्ष की आयु वाले इस कवि को नन्द बाबू ने निकट से देखा जाना था। वे स्वाधीनता आंदोलन से निकले कवि थे जिनको अपने राह की तलाश पूरी करनी थी। नन्द बाबू ने राजस्थान साहित्य अकादमी के लिए उन पर पुस्तक लिखी जिसका प्रकाशन अकादमी द्वारा 1992 में हमारे पुरोधा श्ाृंखला में हुआ था। विनिबंध सरीखी इस पुस्तक में नन्द चतुर्वेदी ने सुधींद्र पर संस्मरण लिखा है और उनके जीवन यात्रा की तलाश की है। वे सुधींद्र के गाँव गए और वहां लोगों से मिले-बात की। नन्द बाबू का निष्कर्ष है कि ‘सुधींद्र में वह ताकत थी जो एक छलांग भरने वाले हरिण में होती है। वह एक साथ अपनी कृति के दायरों को कूद जाते थे। एक नए क्षेत्र में जाने चले जाने के लिए उनके पास साहस की कोई कमी नहीं थी। राष्ट्रीयता की उग्र रचनाओं से चलकर वे प्रेम और सौंदर्य की रचनाओं तक आ गए थे। इसमें कोई संदेह नहीं था कि वे आज की मानवीय विभीषिका और अदृश्य होती हुई सभ्य परम्परा की शोकांतिका को देखते रहते। (सुधींद्र ः व्यक्ति और कविताएँ पृ. पृ.58)
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान के लिए उन्होंने कविता-पाठ (1975) शीर्षक से लिखी गई पुस्तिका शिक्षक और शिक्षाशास्त्री नन्द चतुर्वेदी का साहित्य अध्यापन के लिए किया गया कार्य है। यह दुर्लभ ही होता है कि एक कवि हृदय को अपनी रुचि और प्रकृति के अनुसार कार्य करने दिया जाए और उसका सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रसार भी हो। इस पुस्तिका में नन्द बाबू ने कविता सरीखे ज्ञान के अनुशासन के अध्यापन की समस्याओं पर विचार किया है। कुल चौदह अध्यायों में विभाजित इस छोटी-सी पुस्तिका में उन्होंने कविता की सामग्री के चयन से लगाकर उनके पाठ और कविता के माध्यम से सृजन शक्ति के विकास की संभावनाओं पर विचार किया है। अच्छा होता यदि आगे वे कभी इस कार्य को और विस्तार दे पाते। तब भी हिंदी शिक्षण के क्षेत्र में यह अभिनव प्रयोग था जिसके लिए नन्द चतुर्वेदी ने अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन किया।
नन्द चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित किताबों में पं.गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ ः व्यक्तित्व और कृतित्व’ और सप्त किरण शामिल हैं। पं.गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ ः व्यक्तित्व और कृतित्व असल में मधुमती का एक विशेषांक था जो 1985 में पुस्तकाकार आया। नन्द बाबू ने सम्पादकीय में लिखा कि पं.गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ विद्वानों की श्रेष्ठ परम्परा का प्रतिनिधित्व करते थे। उनका सृजन द्विवेदीकालीन जीवन मूल्यों की पहचान कराता है।’ (सम्पादकीय, पृ.ङ्कढ्ढढ्ढ, ‘पं. गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ ः व्यक्तित्व और कृतित्व’)
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के आग्रह पर नन्द बाबू ने मीरां-संचयन तैयार किया था जिसमें मीरां के चुने हुए पद और एक गंभीर भूमिका थे। असल में इस पुस्तक का महत्त्व इस बात में है कि अनेक पाठ्यऋमों में होने पर भी मीरां के पदों के ऐसे चयन नहीं हैं जो भाषा, पाठ और तमाम ढंग से सही कहे जा सकें। नंद बाबू का चयन मीरां के विशाल लेखन संसार का प्रामाणिक और प्रतिनिधि चित्र तैयार करता है। इस संचयन की भूमिका भी मीरां को भक्त कवि के रूप में कैद सांचों से बाहर स्वतन्त्रचेता स्त्री की अकुंठ अभिव्यक्ति कर रही कवि के रूप में देखने का नया कार्य करती है। वहीं ‘सप्तकिरण’ एक सहयोगी प्रयास था जो राजस्थान के सात कवियों ने मिलकर किया था। इसका सम्पादकीय नन्द चतुर्वेदी ने लिखा था। यह राजस्थान में पुस्तक प्रकाशन के घनघोर अभावों के समय में किया गया एक सारस्वत कर्म था जिसके लिए स्वयं कवियों ने अर्थभार भी वहन किया था। राजस्थान के कवि (भाग-1) शीर्षक से एक पुस्तक का सम्पादन भी नन्द बाबू ने किया था जिसका प्रकाशन राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा किया गया था।
नन्द बाबू ने संस्मरण लेखन जीवन के उत्तरार्ध में ही किया और उनके संस्मरणों की पुस्तकें भी बाद में ही आ सकी। अतीत राग (2॰॰9) और जो बचा रहा (2॰14) उनकी संस्मरण पुस्तकें हैं। ये दोनों पुस्तकें पिछली शताब्दी में नन्द बाबू के सम्फ में आए लोगों के संस्मरणों से बनी हैं। समाजवादी आन्दोलन के नेता- कार्यकर्ता, हिंदी कवि-गद्यकार और संगी-साथियों से बने इन संस्मरणों में पिछले बरसों का अतीत पुनर्जीवित होता दिखाई देता है। वहीं संस्मरणों के बहाने कवि नन्द चतुर्वेदी की रचना यात्रा और जीवन की भी एक समृद्ध झलक यहाँ मिलती है जो न केवल साहित्य अपितु समाजवादी राजनीति को जानने-समझने का अवसर देती है। नन्द बाबू की प्रतिबद्धता गैर बराबरी के विरुद्ध संघर्ष में रही और उनके लेखन का प्रस्थान बिन्दु भी यही विचार था। यहाँ विचार के चौकन्नेपन में आई रागात्मकता समूची पुस्तक को एकसूत्र करने वाली है, बावजूद इसके कि संस्मरण भिन्न-भिन्न व्यक्तियों-प्रसंगों पर हैं। नन्द बाबू ने बताया है कि यह लेखन मूलतः आकस्मिक ही है, विभिन्न जरूरतों को पूरा करने वाला, श्रद्धांजलि लेख या मूल्यांकन। इस आकस्मिकता की बुनियाद वस्तुतः आत्मीयता में ही निहित है। कवि हेमंत शेष ने उदयपुर में 21 अप्रैल, 2॰18 को दिए नन्द चतुर्वेदी स्मृति व्याख्यान में कहा था, अतीत-राग के आलेख किंचित भावुकता के साथ लिखा उन लोगों का स्मरण है, जिनकी स्नेह-छाया में मैंने अपनी *ान्दगी को ‘पुनर्वासित’ करने की कोशिश की है। मैं आशा करता हूँ कि उनकी मूल्यवान जिंदगियां, हमारे जीवन से संशयों की निरर्थकता का उच्छेदन कर सकने में मददगार साबित हो सकती हैं। हेमंत शेष का यह कथन निराधार नहीं है क्योंकि संस्मरणों की इस अनूठी पुस्तक का प्रारम्भ जवाहरलाल नेहरू पर लिखे संस्मरण से हुआ है, जिसके बाद ऋमशः जय प्रकाश, राममनोहर लोहिया और राजस्थान के अन्य समाजवादी नेता-कार्यकर्ता हैं। ये सभी लोग भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के उज्ज्वल चेहरे हैं जिन्होंने औपनिवेशिक गुलामी के साथ भारतीय पिछडेपन के विरुद्ध भी संघर्ष किया था। जवाहरलाल नेहरू से नन्द बाबू का निजी सम्बन्ध-सम्फ न रहा लेकिन यह संस्मरण दरअस्ल आत्मीय जरूरत और पक्षधरता की उपज है जिसका जिक्र ऊपर हुआ है। नन्द बाबू इसे प्रारम्भ करते हैं- जवाहरलाल नेहरू के साथ मेरी पीढी के लोगों का रिश्ता प्यार और नारा*ागी का है, जो हर उस आदमी के साथ होगा, जिसने सत्ता में आने के पहले हजारों रंगीन सपने दिखाए हों, लेकिन बाद में कई कारणों से और खासतौर पर जुझारू इच्छाशक्ति के अभाव में धुँधला गए हों। (अतीत राग, पृ.13) आगे नेहरू युग को याद करते हुए, गांधी-नेहरू के मतभेदों की चर्चा करते हुए वे निष्कर्ष देते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं कि नेहरू भारतीय इतिहास के सबसे असाधारण समय को जनतन्त्र और समाजवाद का स्वरूप देने वाले बडे राजनेता थे।’ और ‘यह श्रेय नेहरू को देना चाहिए कि वे एक विभाजित और गरीब देश को फिर से हिम्मत और स्वाभिमान देने की अथक कोशिश करते रहे। (अतीत राग, पृ.16)
स्वातन्त्र्योत्तर समाजवादी आन्दोलन को समझने की दृष्टि से नेहरू पर लिखा गया संस्मरण वह भूमिका है जिसके अगले अंश नन्द बाबू ने जे.पी. और लोहिया के संस्मरणों में लिखे हैं। जयप्रकाश पर लिखते हुए वे इस प्रसंग को विस्तार देते हैं कि जब प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता कांग्रेस से जुडने लगे थे। इस संस्मरण में जे.पी. के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए नन्द बाबू जब उनकी वक्तृता का वर्णन करते हैं तब यह एक रोमानी अनुभव प्रतीत होता है। जे.पी.कोटा की एक जनसभा में आए थे, मैंने किसी बडी सभा में पहली बार श्रोताओं में इतने लम्बे समय तक इतने गम्भीर भाषण सुनने की क्षमता को देखा था और पहली बार ऐसे वक्ता को भी, जो अपने श्रोताओं की बुद्धि पर इतना विश्वास करता हो। वे जे.पी. के तारुण्य के दिन तो नहीं थे, तब भी वे सुदर्शन और मजबूत सेनानायकों की तरह लगते थे। उनकी भाषण शैली उन समाजशास्त्रियों, प्राध्यापकों जैसी थी जो प्रायः किसी हडबडाहट में नहीं होते और एक सुतार्किक विवेचना के असीम धैर्य के साथ बोलते हैं। अब मैं समझता हूँ कि नई समाज रचना के लिए यह धैर्य कितना आवश्यक है और तब भी जबकि कुछ हाथ न आए। (अतीत राग, पृ. 2॰-21) चीन से युद्ध के उद्विग्न दिनों को याद करते हुए वे जे.पी. के बारे में लिखते हैं- बहुत से समाजवादी साथियों की दृष्टि में वे संन्यासी हो गए थे। मुझे लगा कि दरअस्ल नया होना कितना मुश्किल होता है, प्रायः लोग एक निश्चित बने-बनाए सिद्धान्त के इर्द-गिर्द घूमते हैं, वे क्रान्तिकारी भी जो बार-बार दुनिया को बदल देने का आग्रह करते हैं, वे तक, अपने पुराने आग्रहों को न बदलते हुए पूर्वाग्रहों से लिपटे मिलते हैं। (अतीत राग, पृ.27) इस नए दौर में भी नन्द बाबू जे.पी. का महत्त्व बताने में नहीं हिचकते- अब जबकि राज्य शक्ति असंख्य तरीकों से अपूर्व बल, अनैतिक आचरण और अवसरवादिता का लज्जाहीन प्रदर्शन कर रही हो, जे.पी. ही बचते हैं जो अपनी विफलता के बीचोंबीच राज्यशक्ति से टकराते हैं और लोक-ऊर्जा, लोक-शक्ति, लोक-नीति को बचाने की बात करते और योजना बनाते हैं। (अतीत राग, पृ.28) लोहिया से हुई उनकी दो मुलाकातों के संक्षिप्त ब्योरे के साथ लिखे गए संस्मरण में यह टीप याद रह जाने वाली है- लोहियाजी को याद करते समय यह सोचना आवश्यक है क्योंकि गांधी के बाद खुले आम जेल चलने का बुलावा देने वाले, सत्ता के आंतरिक क्षय, बडबोलेपन, निरर्थकता, जातिगत अहंकार और कुलीनता के नाटक को निर्भीकतापूर्वक बेनकाब कर देने वाले वे अकेले थे, लेकिन उनकी आवा*ा ऊंची थी। सबसे अधिक बेचैन, आकर्षक और बेशुमार लोगों को एक जोखिम भरे रास्ते पर चलने के लिए उत्प्रेरित करने वाली। लोहिया कोई राजपुरुष नहीं थे। राजपुरुषों के अकृपापात्र थे। वे कोई मोहक रूप-रंग अथवा आभिजात्य का सपना दिखाने वाले जादूगर नहीं थे। वे सिर्फ सत्य और रोशनी के नजदीक ले जाते थे, और शायद इस यात्रा के दौरान वे असंख्य लोगों के मित्र बन गए थे। (अतीत राग, पृ. 32)
नन्द बाबू राजस्थान में समाजवादी आन्दोलन के जमीनी सिपाहियों में रहे हैं। गाँवों-कस्बों में जाने, गैर बराबरी के विरुद्ध अलख जगाने और जोशीले गीतों से वातावरण बनाने जैसे कई काम थे जो उनके साथी और वे किया करते थे। अपने इन साथियों पर लिखते हुए सम्बन्धों की ऊष्मा की आँच नन्द बाबू पाठकों तक पहुँचाते हैं। हीरालाल जैन पर लिखा संस्मरण इसका उदाहरण है। एक सामान्य-नामालूम से समाजवादी कार्यकर्ता हीरालाल जैन पर लिखा उनका संस्मरण जैन को बडे चरित्र के रूप में स्थापित करने वाला है। हीरालालजी ने जिस रास्ते का चुनाव किया वह ‘जोखिम उठाने वाली जिन्दगी’ का रास्ता था। ऊपर से उनकी जिन्दगी विक्षोभ रहित नजर आती है लेकिन अन्दर-ही-अन्दर वहाँ स्थापित व्यवस्था के प्रति असहमतियाँ-ही-असहमतियाँ, राज्य-शक्तियों से टकराने के संकल्प और परिवर्तनकामी शक्तियों के साथ रहने का अदम्य उत्साह है। (अतीत राग, पृ.4॰) इसी संस्मरण में आपातकाल के दिनों का वर्णन करते हुए वे बताते हैं, राजस्थान में जनता पार्टी का नेतृत्व भैरोसिंहजी करते हैं और उनकी कुशल राजनीतिक रणनीति समाजवादियों के सारे रास्ते बन्द कर देती है। दुनिया में जैसे छोटे लोगों के वंश डूब जाते हैं, वैसे छोटी पार्टियों का भी अवसान हो जाता है। पुराने समाजवादियों को लोग ‘खुशनुमा द्वीपों’ की तरह याद करते हैं लेकिन मुझे यह दया हमेशा अपमानजनक लगती है। (अतीत राग, पृ. 41)
समाजवादी आन्दोलन के उत्कर्ष और पराभव पर पुस्तक में आए भिन्न-भिन्न प्रसंग मिलकर आन्दोलन की एक तस्वीर बनाते हैं। यह तस्वीर विश्वसनीयता से भरी हुई है क्योंकि नन्द बाबू इस आन्दोलन से कैसा भी लाभ लेने वाले नहीं रहे, न साहित्य में और न राजनीति में। राजेन्द्र सिंह चौधरी पर लिखे एक संस्मरण का प्रसंग देखिए। ऐसे प्रसंग अब बेहद विरल हो गए हैं। अपनी अकृत्रिमता में इसका सौन्दर्य अनूठा है- मैं इस आदमी को पचास वर्षों से जानता था। लाल टोपी वाले राजेन्द्र सिंह को। मुझे टीचर्स कॉलेज से बुला ले गया था और फाटक के बाहर खडी भैंसों में से एक की पूँछ पकडाते हुए कहा कि कोर्ट चलना है। जंगलात वाले आदमी इन्हें चरनोट की जमीन पर चरने नहीं देते। जब मैंने हील हुज्जत की तब उन्होंने गाली तो नहीं दी, लेकिन कहा कि तुम चिकने (सिल्कन) सोशलिस्ट हो और खींचकर ले गए। यह भैंसों का अद्भुत जुलूस था। शहर के लोगों ने सोशलिस्टों का जलवा मान लिया। (अतीत राग,पृ.51) नन्दबाबू के सुदीर्घ रचना जीवन में आए ज्ञात-अल्पज्ञात साहित्यकारों से पुस्तक में साक्षात्कार करना सुखद है। पं. गिरधर शर्मा ‘नवरत्न’ पर लिखे संस्मरण में नन्दजी ने झालावाड नरेश राणा राजेन्द्र सिंह ‘सुधाकर’ के सान्निध्य में हुए कवि दरबार का वर्णन किया है। ऐसे कवि दरबार को देखने, भागीदारी करने का यह प्रसंग इक्कीसवीं सदी में पढना सचमुच इतिहास में गोते लगाने का सुअवसर ही है। तब बारह वर्ष के रहे नन्द बाबू ने भी इस कवि दरबार में कविता पढी थी। जिन आत्मीय स्मृतियों से इस वृत्तान्त की रचना हुई है वह एक अजाने रहस्यलोक में जाने जैसा अनुभव है। बहरहाल वे पं.गिरधर शर्मा नवरत्न के बारे में लिखते हैं- भाषा की नई रचना के साथ-साथ वह वास्तव में उस बडे देश की रचना कर रहे थे जो हमारे संकल्पों को, विचारों को नई तरह से समझने-समझाने की आधारभूमि बनाता है। पण्डितजी नवजागरण के उन कवियों में थे, जो सांस्कृतिक-बहुलता के रचनात्मक अभिप्रायों को समझते थे। (अतीतराग, पृ.55) नन्द बाबू ने आगे नवजागरणकालीन एक और विभूति पं. रामनिवास शर्मा पर भी लिखा है। जब राजस्थान में ही इन लोगों की स्मृतियाँ विलुप्त होती जा रही हैं तब हिंदी के विराट् संसार से भला क्या शिकायत की जाए। नन्द बाबू ने ऐसे लोगों पर संस्मरण लिख कर हिंदी साहित्य के इतिहास में निश्चय ही कुछ गौरवशाली पन्ने जोड दिए हैं।
बाद के दौर में हाडौती (कोटा-झालावाड) के लोक कवि भैरूलाल काला बादल पर भी उन्होंने लिखा है। नए दौर में लेखकों में जैनेन्द्र, श्यामाचरण दुबे, शिवमंगल सिंह सुमन, अश्क दम्पती, यशपाल, देवीलाल सामर, आलम शाह खान, युगलकिशोर चतुर्वेदी, कवि चित्रकार रामगोपाल विजयवर्गीय, प्रकाश आतुर, भागीरथ भार्गव, कल्याणमल लोढा और कमर मेवाडी पर उनके संस्मरण हैं। मोटे तौर पर ये दो तरह के हैं, कभी त्वरा में लेखक के महत्त्व का उद्घाटन करते औपचारिकता से भरे और कभी आत्मीय मुलाकातों का वर्णन करते अनौपचारिकता में डूबे। नन्द बाबू त्वरा में भी भाषा की रंजकता को जाने नहीं देते और थोडे से इशारे में भी कोई-न-कोई खास बात कह जाते हैं। यशस्वी कथाकार रांगेय राघव पर लिखा एक छोटा सा संस्मरण पुस्तक में है। तरोता*ाा कमल शीर्षक से लिखे गए इस संस्मरण में रांगेय राघव के दृढ व्यक्तित्व और गहरी विद्वत्ता की झलक मिलती है। नन्द बाबू उन्हें काल को जीतने वाला रचनाकार कहते हैं। उनसे हुई कुछ मुलाकातों का वर्णन करते हैं और उनकी असमय मृत्यु पर क्षोभ व्यक्त करते हैं। राजस्थान में पचास वर्षों तक निरन्तर निकलती रही लघु पत्रिका सम्बोधन के सम्पादक कमर मेवाडी पर लिखे संस्मरण में वे कहते हैं, यह अकादमिक बहस का मुद्दा हो सकता है कि लेखक की सहृदयता और निष्कपटता का अच्छे-उत्कृष्ट असरदार साहित्य से कोई नाता-रिश्ता, सम्बन्ध है या नहीं। मनुष्य के चले जाने पर शब्द ही प्रमाण होंगे उसका मानवीय आचरण नहीं, तब भी हमारी साहित्य परम्परा में मनुष्यों के साथ कवि का पडोस, उसका सौजन्य, उसका अपने समय और समाज को बचाने के प्रयत्न - शब्द की अन्तर्ध्वनियाँ होंगे, यह अमिट विश्वास है। (अतीत राग, पृ.154)
पुस्तक के अन्तिम खण्ड में विश्व हिंदी सम्मेलन (1999) के प्रसंग में की गई लन्दन यात्रा का वृत्तान्त और तीन-चार निजी संस्मरण हैं। ‘माँ की गाँव’ में नन्द बाबू ने अपने नाना के बहाने ब्राह्मण परिवारों की कथा लिखी है, जिसे पढना स्मृति के मार्फ त कठोर यथार्थ से रू-ब-रू होना है। दलित आत्मकथाओं जैसे दारुण दुःख और अपमान के समानान्तर इन तथाकथित सवर्ण परिवारों की पीडाएँ कम त्रासदायक नहीं हैं। गरीबी की मार, भांग पीकर गलियाते पुरुष, सूखते भुट्टे के बिस्तर पर चाँदनी रात काटती स्त्रियाँ, मन्दिरों का धुआँ, डाकू, मृत्यु के प्रसंग और फिर ऊँचे होने का दम्भ मिलकर भारतीय ग्राम जीवन को फिर फिर जानने- समझने का नया मौका देते हैं। ये व्यतीत के चित्र इसलिए भी दुर्लभ हैं कि इन्हें उधार के रंगों-कूंचियों से नहीं माँडा गया है। भागीरथ काका अपनी प्रकृति में रेखाचित्र के करीब संस्मरण है और एक बढिया कथा का आस्वाद देता है। भागीरथ काका की निश्छलता के साथ स्त्री शोषण का प्रसंग दग्ध करने वाला पाठकीय अनुभव है। वे कोई बडी क्रान्तिकारी औरतें नहीं हैं, जिन पर नन्द बाबू संस्मरण लिखते हैं, अपितु सामान्य जीवन जीने की कोशिश करतीं, लाचार-गरीब और बार-बार ठगी जाती स्त्रियाँ हैं जो तब भी जीवन की आस छोड नहीं देतीं। नन्द बाबू सत्तर-अस्सी वर्ष पुराने समय और समाज से कुछ चरित्र चुनकर लाते हैं और वस्तुपरकता, ठेठ वातावरण की निर्मिति से सर्वथा भिन्न अनुभव दे जाते हैं। सीएटी कैट, कैट माने बिल्ली इसी श्ाृंखला की एक कडी है। यहाँ भांग के शौकीन नाना का चित्र अपने आवेग में काशी के ‘बहरी अलंग’ की याद दिलाने वाला है। लेकिन इस संस्मरण में आया भैंस की आकस्मिक मृत्यु का वृत्तान्त पाठक को अवसाद में डाल जाता है। वस्तुतः नन्द बाबू ने संस्मरणों में जिन व्यक्ति-घटनाओं और स्थानों को चुना है वह चुनाव ही उनकी पक्षधरता को दिखाने वाला है। इन संस्मरणों में भाषा का जादुई संसार मिलता है लेकिन यह कोई वायवीय संसार नहीं अपितु लडते, संघर्ष करते मामूली लोगों के जीवन की ही दुनिया है। महात्मा गांधी की हत्या पर लिखा संस्मरण इस अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है इतिहास का एक कटु अध्याय फिर खोलता है। तब नन्द बाबू महाराष्ट्र के एक छोटे से कस्बे नसीराबाद के एक स्कूल के हेडमास्टर थे। गांधी हत्या के समाचार से उपजते तनाव और आतंक में वे साम्प्रदायिक विभाजन का बुनियादी कलुष देखते हैं। यहाँ गोलवलकर के एक व्याख्यान और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बैठकों का विवरण साम्प्रदायिक विभाजन की कलुषता को भिन्न-भिन्न कोणों से परखने वाला है। इस संस्मरण से स्वयं नन्द बाबू के भी प्रतिरोधी और अनत व्यक्तित्व का चित्र निकलता है जो खतरे उठाना जानता है।
संस्मरण निजी छवियों की निर्मिति या पिछला बाकी चुकाने की साहित्यिक अभिलाषा नहीं हैं। नन्द बाबू के संस्मरणों का मूल्य गहरी सामाजिकता और वैचारिक प्रतिबद्धता है। फैशन से बाहर हो चुके आन्दोलनकामी विचार और कार्यकर्ताओं को चित्रित करती यह पुस्तक विधाई अन्तःक्रिया का भी अनुपम मेल है। जहाँ इसे पढकर समाजवादी आन्दोलन की एक तस्वीर बनती है वहीं नन्द बाबू के अपने जीवन-रचना संघर्ष का ब्यौरा और साहित्यिक किलों से दूर राजस्थान के लेखन-लेखक संसार का चित्र भी बहुरंगी छटा से भरा है। नन्द बाबू दरअस्ल उन बातों को नहीं करते जो बहुत जानी-पहचानी हैं। वे बाकी की बातें बताते हैं जिन्हें इतिहास भी नहीं जानता। जैसी उनकी काव्य पंक्तियाँ हैं-
इतिहास सिर्फ मौत बताता है
बाकी की बातें तो जिन्दगी को ही
तलाश करनी पडती हैं।
उनकी दूसरी संस्मरण पुस्तक जो बचा रहा का प्रकाशन 2॰14 में हुआ। इस पुस्तक में भी नन्द चतुर्वेदी के संस्मरण और कुछ आलोचना लेख हैं। कवयित्री मीरांबाई, कवि जीवनानंद दास, कवि कन्हैयालाल सेठिया, हरीश भादानी, गणपतचंद भंडारी, मदन डागा और विचारक-राजनेता राम मनोहर लोहिया के कृतित्व पर समीक्षा आलेखों के साथ यहाँ कवि नईम, राजनेता-लेखक रजनीकांत वर्मा, आलोचक जीवन सिंह, गांधीवादी कार्यकर्ता नेमीचंद भावुक और शिक्षक भाई भगवान पर गहरे स्नेह और ऊष्मा के साथ लिखे गए संस्मरण हैं। इन संस्मरणों और समीक्षा आलेखों में संस्मृतों पर बात करते हुए नन्द बाबू बहुधा कविता, साहित्य और समाज के संबंध में भी कोइघरी बात कह देते हैं जो पाठकों को देर तक याद रह जाने योग्य होती है। रजनीकांत वर्मा के प्रसंग में उन्होंने लिखा है- मैं कभी कभी यह सोचता हूँ कि आशा के उछलते हुए घोडों पर मनुष्य, शायद, हमेशा ही सवारी करना चाहता है। (जो बचा रहा, पृ.17) नन्द बाबू आशा के लिए जनजीवन से ऊर्जा ग्रहण करते हैं और मामूली लोगों के पक्ष में बोलते हुए-लिखते हुए-तमाम दुष्चक्रों और मुसीबतों में भी हार न मानने का संकल्प भर देते हैं। इसी संस्मरण में उन्होंने राजनेता रजनीकांत वर्मा और शिक्षिका-सामाजिक कार्यकर्ता हबीबा बानो के विवाह का पुराण प्रसंग याद किया है। वे लिखते हैं - पचास वर्ष पहले की कट्टरताओं और विभाजन की त्रासदी के बीच शांता-परसराम त्रिवदी के ब्राह्मण परिवार और हबीबा के बोहरा मुस्लिम परिवार की ऐसी घनिष्ठता को मैं अब भी जब-जब याद करता हूँ तो निराशा से उबर जाता हूँ। (जो बचा रहा, पृ.19) भारतीय समाजवादी आंदोलन ने धर्म, परिवार और निजी संबंधों पर भी गहरा विचार किया है। यह परम्परा महात्मा गांधी, नेहरू, आचार्य नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण तक के लेखन में मिलती है। नन्द बाबू इस परम्परा से रोशनी ग्रहण करते हैं।
भाई भगवान पर लिखा गया संस्मरण राजस्थान के समाजवादी आंदोलन का भी एक अध्याय है। नन्द बाबू ने लिखा है- मैंने भाई भगवान के साथ अपने साथियों के चुनाव प्रचार में थका देने वाला तब भी आनंददायक समय व्यतीत किया है। हमने टूटी हुई साइकिलों, जर्जर बसों और फटीचर कारों में गाँव के दौरे किये हैं और कथावाचकों की तरह लच्छेदार भाषण दिए।.... इन दौरों में हमने गाँव के लोगों के धूल और उदासी में लिप्त चेहरों को देखा था और उन स्त्रियों को जो अपने परिवार के लिए जाने कितनी दूरियों से पानी लाती थीं। इन मायूस स्त्री-पुरुषों को देखकर हम जोर से नारे लगाते- हमारी मंजिल समाजवाद।’ (जो बचा रहा, पृ. 28-29) भारतीय राजनीति में कांग्रेस के विकल्प की अवधारणा को गढने में समाजवादी आंदोलन से जुडे ऐसे हजारों कार्यकर्ताओं और नेताओं ने बडी भूमिका निभाई। ऐसे अनेक परिचित और गुमनाम लोगों के सम्बन्ध में लिखा जाना शेष है। नन्द बाबू के संस्मरण लेखन की विशेषता है कि उनके लिए मनुष्यता विचार से पहले है और उनके लिए गांधी जी द्वारा दिया साधनों की पवित्रता का सिद्धांत इस मनुष्यता के वाजिब बखान में उपयोगी है।
अम्लान रोशनी की तलाश में शीर्षक से लिखा गया संस्मरण सामंतशाही के राजस्थान का एक चित्र दर्शाता है जहाँ सर्दी की लम्बी ठंडी और अंधेरी रातों में किसी तरह जीवन व्यतीत कर रहे मामूली लोगों का वृत्तांत आया है। यहाँ एक रोचक किन्तु दुखद प्रसंग है जब पुलिस ने गांववालों को आदेश दिया कि अंग्रेज गवर्नर गाँव से होकर निकल रही रेल से निकलेंगे तो गाँववाले उनके सम्मान में रौशनी जलाकर पटरियों के किनारे खडे रहें। उन्होंने लिखा है- सुबह चिडचिडाते हुए नाना ने बताया कि रात में कई रेलें गुजरीं। उस पूरे जनांचल में जहाँ हजारों साल से अँधेरे और अकाल की ठंडी छायाएं पसरी पडी थीं, वहां गवर्नर की रेल को सुरक्षित गुजरने के लिए अपार रोशनी जगमगा रही थी।’ (जो बचा रहा, पृ.139) संस्मरण के अंत में उन्होंने लिखा है- मैंने जल्दी ही गाँव छोड दिया लेकिन एक अम्लान रोशनी की तलाश में जिंदगी काट दी। आसानी से रोशनी की किरण मिलती नहीं है। जिंदगी की हर सीधी फिसलती हुई, निःस्तब्ध अँधेरे के मातम में डूबी रहती है फिर भी आदमी है कि रोशनी, हँसी और दोस्ती के सपने देखता है। इन सपनों की ताकत से वह हर फिसलती सीढी पर खडा रहता है और दुनिया बदल देता है। (जो बचा रहा, पृ.14॰)
दलित शिक्षक रामचंद्र जी मास्साब पर लिखा गया संस्मरण मार्मिक है और प्रेरक भी। यहाँ गुलामी से निकलकर बन रहे नए भारत में एक दलित शिक्षक के स्वाभिमान का सुंदर दृश्य है। नन्द बाबू ने लिखा है- मुझे लगता है मास्साब ने एक वर्णवादी सामंती समाज की सारी अवमाननाएँ निःशब्द होकर सहीं। वे विषमतावादी समाज में शांत, गणित के योग्य अध्यापक होकर भी बिना किसी हीनताबोध के जूतियां बनाते और पहनाते रहे। उनके विधायक काल की उपलब्धियों से मैं अनभिज्ञ रहा। वैसे भी विभाजित वर्णवादी व्यवस्था में कुलीनों की उपलब्धियों का ही कीर्तन होता है या धन्ना सेठों का। (जो बचा रहा, पृ.152) दलितों के जीवन की विषमताओं का उल्लेख करते हुए नन्द बाबू इस विषमता के मूल कारणों को नहीं भूलते।
इन संस्मरणों में नन्द चतुर्वेदी संस्मृतों के अवदान पर भी जहाँ-तहाँ टिप्पणी करते हैं। राजस्थान के कवि गणपतचंद भंडारी के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा- गणपतचंद भंडारी जी की इस विशेषता को रेखांकित करना चाहिए कि इन कवि सम्मेलनों में मनुष्य को यथास्थिति पर हँसने वाला और असहाय श्रोता नहीं बनाया, न दिलासा दी और न क्रांति की लंतरानियां हाँकीं। उन्होंने मंच की प्रकृति को समझा और उसे बदलाव की इच्छा पैदा करने वाला माध्यम बनाया (जो बचा रहा, पृ. 1॰5) आपातकाल में अपनी कविताओं के लिए प्रसिद्ध हुए कवि मदन डागा पर लिखते हुए उन्होंने कविता भाषा पर काम की बातें कही हैं- दरअसल पिछली आधी सदी में हमने दुनिया की बेरहमियों को इतनी जगह से देखा है और इतनी बार हम या हमारे साथ का आदमी व्यवस्था के द्वारा लज्जित या कि अपमानित किया गया है कि उसने हमारी कविता भाषा को बनाया। (जो बचा रहा, पृ.113) इसी तरह एक अन्य स्थान पर उन्होंने लिखा, कविता का सत्य यथार्थ को सिकोडने में या अमूर्त करने में नहीं है, उसे विस्तार देने में, चाक्षुष करने में है। (जो बचा रहा, पृ. 82) हेमंत शेष ने उचित ही रेखांकित किया कि नन्दजी के गद्य में सर्वा जो खरापन, तार्किकता और विश्लेषण दिखता है वह उनकी गहरी अविचल और दृढ समाजवादी-अंतर्दृष्टि से आया है। उस कन्विक्शन में किसी तरह की आंसू-धकेल भावुकता या राजनीतिक हठवादिता नहीं-सामाजिक-औचित्य, वैज्ञानिक-तर्क और मानववादी-विवेक की प्रखर रोशनी है।....और भी नन्द जी के गद्य की खासियत उसका ओढा हुआ पांडित्य नहीं, बल्कि उसकी सहज, सरल विश्वसनीयता है। भाषा के सौन्दर्य का जितना आकर्षण इस गद्य में सुलभ है- उसी अनुपात में लेखक की अपनी अविचलित आस्था और सामाजिक प्रतिज्ञा भी हमें निरंतर अनुभव होती है। (वही) कहना न होगा कि इन संस्मरणों में नन्द चतुर्वेदी का गद्य वैभव अपने उरूज पर है। वैचारिक निबंधों के समानांतर यहाँ जीवन के राग-विराग अधिक संलग्नता से आए हैं। यह जीवन संघर्षों की धीमी और कष्टपूर्ण आंच पर निखरा गद्य है जिसमें कवि ने पिछली शताब्दी के अँधेरे में भी ‘अम्लान रोशनी’ की तलाश नहीं छोडी।