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देहरी पर दीपक

माधव हाडा
अभिव्यक्ति मनुष्य अस्तित्व की नैसर्गिक जरूरत है। मनुष्य अस्तित्व की संभावनाओं के पल्लवन और संपूर्ण विकास के लिए अभिव्यक्ति की निर्बाध और अकुंठ आजादी बहुत जरूरी है। अभिव्यक्ति पर रोक-टोक और स्थगन दूसरी तरह से मनुष्यता पर रोक-टोक और उसका स्थगन भी है। यह विडंबना ही है कि नैसर्गिक जरूरत होने के बावजूद अभिव्यक्ति की आजादी मनुष्य का सहज सुलभ अधिकार नहीं है। इसे पाने औैर सुरक्षित रखने के लिए मनुष्य निरंतर संघर्षरत रहा है। उसकी इस संघर्ष यात्रा में कई उतार-चढाव और मोड-पडाव हैं। संचार के साधनों के अभाव में विश्व समाज कई सांस्कृतिक इकाइयों में विभाजित था, इसलिए अलग-अलग समाजों में उनकी जरूरतों के तहत अलग-अलग अभिव्यक्ति की संस्कृति विकसित हुई। भारतीय समाज आरंभ से ही वैविध्यपूर्ण है। यहाँ सदियों से कई समूह अपनी भिन्न संस्कृतियों के साथ एक-दूसरे के साथ रह रहे हैं। उन्होंने एक-दूसरे को निरंतर दिया-लिया भी है, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर इस समाज का नजरिया विश्व के दूसरे समाजों से अलग है। यहाँ भी अभिव्यक्ति की पूर्ण और निर्बाध स्वतंत्रता को लेकर कई तरह की उठापटक, ऊहापोह और अंतर्बाधाएँ हैं, लेकिन यह समाज कुछ हद तक इसका सम्मान भी करता है। विभिन्न सांस्कृतिक समूहों के सदियों के सहजीवन के अभ्यास और संस्कार से यहाँ अभिव्यक्ति की ऐसी संस्कृति विकसित हुई है, जिसमें एक-दूसरे की भिन्नता की स्वीकृति, असहमति का सम्मान और असहमति को एक स्वतंत्र विचार और मत में ढलने और विकसित होने की स्वतंत्रता है। अभिव्यक्ति की यह निरंतर स्वतंत्रता और वैविध्य यहाँ इसलिए है, क्योंकि इस समाज के जीवन और व्यवहार में कुछ हद तक तर्क और युक्ति के लिए जगह हमेशा रही है।
यहाँ अभिव्यक्ति की निर्बाध, व्यापक और अकुंठ स्वतंत्रता है, यह कहना भी एक तरह का सरलीकरण होगा। यहाँ भी भिन्न संस्कृति समूहों में एक-दूसरे की आस्था, विश्वासों और पूजा-पद्धतियों की अभिव्यक्तियों में ऊँच-नीच का आग्रह है, इनको लेकर उद्धत और गर्वोक्तिपूर्ण फतवेबाजयाँ हैं, लेकिन यह इस समाज का सदैव और संपूर्ण स्वभाव नहीं है। सदियों के सहजीवन से इस समाज का स्वभाव ऐसा बन गया है कि इस तरह की फतवेबाजयाँ और घटनाएँ कुछ समय के लिए इसकी सतह पर हावी दिखती हैं, लेकिन कुछ ही समय बाद इन सबको धो-पोंछकर यह समाज अपने बुनियादी स्वभाव पर लौट आता है।
1.
सदियों के सहजीवन के अभ्यास और संस्कार के कारण भारतीय समाज के विभिन्न सांस्कृतिक समूहों में एक-दूसरे के अस्तित्व की स्वीकृति और सम्मान भाव है, इसलिए ये एक-दूसरे को अभिव्यक्ति की छूट देते हैं और इस कारण यहाँ अभिव्यक्तियाँ प्रायः बहुवचनीय हैं। भारत में शैव, शाक्त, वैष्णव, जैन, बौद्ध, मुस्लिम, ईसाई, पारसी, सिक्ख आदि कई सांस्कृतिक-धार्मिक समूह हैं। इनमें से कुछ यहीं बने-बिगडे और कुछ बाहर से आए, लेकिन मामूली प्रतिरोध-संघर्ष के बाद उन्होंने एक-दूसरे के साथ रहना सीख लिया। इनके साथ रहने का सबसे बडा आधार एक-दूसरे की विद्यमानता की स्वीकृति है। यह इस तरह का स्वीकार भाव है कि आप हम जैसे नहीं हैं और हम आप जैसे नहीं हैं। एक-दूसरे की विद्यमानता का यह स्वीकृति भाव यहाँ के दर्शन और साहित्य सहित सभी कला रूपों के वैविध्यपूर्ण विकास में फलीभूत हुआ है। ऐसा यहाँ बहुत पहले से है। आर्य और आर्यपूर्व लोगों के बीच संघर्ष हुआ, लेकिन बाद में उनमें सहअस्तित्व का भाव आ गया। उनकी अलग-अलग जीवन और पूजा-पद्धतियाँ कई सदियों तक जारी रहीं। आगे चलकर तो आर्यों ने आर्यपूर्व देवी-देवताओं को अपना लिया और आर्यपूर्व लोगों ने वैदिक देवताओं को मानना शुरू कर दिया। वेदों की अभिव्यक्तियाँ भी एकरूप नहीं हैं- ये कई लोगों की अलग-अलग धारणाओं और विश्वासों की अभिव्यक्तियाँ हैं। उपनिषद्काल में अभिव्यक्ति का यह बहुवचन सही मायने में चरितार्थ हुआ। उपनिषदों में व्यक्त विचार वैविध्यपूर्ण हैं। एक ही उपनिषद् के अलग-अलग अध्यायों में अलग-अलग लोगों के विचार हैं। कहीं-कहीं तो ये विचार परस्पर विरोधी हैं। उपनिषदों में धर्म, सृष्टि और अंतिम वस्तुतत्त्व पर विचार किया गया है, लेकिन यहाँ प्रश्नों के उत्तर समान नहीं हैं। कुछ मानते हैं कि सत की उत्पत्ति असत से हुई, जबकि कुछ इससे असहमत हैं। इसी तरह कुछ द्वैतवादी हैं, तो कुछ उनसे अलग अद्वैतवादी हैं। कुछ पारलौकिक अस्तित्व में विश्वास करते हैं, जबकि कुछ इस तरह की किसी सत्ता के अस्तित्व को ही खारिज करते हैं।
भारतीय दर्शनों का विकास भी इस तरह से हुआ कि इसमें विचारों के वैविध्य की विद्यमानता को स्वीकार किया गया है। ईसा पूर्व की सातवीं और दूसरी सदी के बीच भारत में लोकायत, सांख्य, न्याय, वैशेषिक, योग, मीमांसा, वेदांत, जैन, बौद्ध धर्म आदि कई दार्शनिक विचारधाराएँ अस्तित्व में आईं। ये आदर्शवादी, भौतिकवादी, नास्तिक, आस्तिक आदि सभी तरह की दर्शन प्रणालियाँ हैं। पंद्रहवीं सदी में हुए मध्वाचार्य का अपना एक दार्शनिक मत है, लेकिन उन्होंने अपने ग्रंथ सर्वदर्शन संग्रह में चालीस विभिन्न प्रकार के दार्शनिक मत-मतांतरों को बिना किसी भेदभाव के शामिल किया। खास बात यह है कि बहुत स्पष्ट और मुखर असहमति के बावजूद इसमें अनीश्वरवादी लोकायत या चार्वाक दर्शन को भी विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
शैवों, शाक्तों और वैष्णवों के आराध्यों। पूजा- पद्धतियों और धारणाओं की अभिव्यक्तियाँ अलग थीं, इनका जो साहित्य लिखा गया, वो भी एकरूप नहीं है। इनमें भी वर्चस्व के लिए संघर्ष हुए, लेकिन धीरे-धीरे ये एक-दूसरे के अभ्यस्त हो गए। धीरे-धीरे लोक में आकर ये एक-दूसरे के पास भी आ गए और अंततः एक-दूसरे में घुलमिल गए। इनमें भेद केवल इनके शास्त्रों तक सीमित रह गया। शैव, शाक्त और वैष्णव हिंदू समाज के भीतर थे, उनमें पारस्परिक विरोध था, लेकिन बौद्ध और जैन समूह तो पारंपरिक हिंदू समूह और उसके विश्वासों के विरुद्ध और उससे अलग थे। अमर्त्य सेन ने बौद्ध और जैन धर्म को हिंदू धर्म के विरुद्ध विद्रोह कहा है। इन दोनों के दर्शन, साहित्य और कलारूप अलग-अलग तरह से विकसित हुए। खास बात यह है कि इनमें एक-दूसरे की आलोचना या एक-दूसरे पर सतही टीका-टिप्पणी लगभग नहीं है। इनमें खंडन-मंडन भी है तो यह अकसर गूढ दार्शनिक मीमांसा के रूप में है और इसकी भाषा बहुत संयत और शालीन है। वृहद् भारतीय समाज में जैन और बौद्ध धर्मों को स्वीकृति भी प्राप्त हुई और बहुसंख्यक समाज से अलग और कुछ हद तक उसके विरुद्ध होने के बावजूद इनको अभिव्यक्ति की पूरी छूट भी मिली। जैन और बौद्ध धर्मों ने हिंदू प्रतीकों, चरित्रों, पूजा-पद्धतियों और कथाओं का अपने साहित्य में अपनी धारणाओं के अनुसार रूपांतरण भी किया, लेकिन इसे लेकर कहीं कोई संगठित नाराजगी और प्रतिरोध नहीं हुआ। बाहर से आने वाले समूहों- पारसी, ईसाई, मुस्लिम आदि की मौजूदगी भी यहाँ बहुत पुरानी है। इनकी मौजूदगी की स्वीकृति आसान नहीं थी- खास तौर पर मुस्लिम समुदाय की स्वीकृति में प्रतिरोध और संघर्ष की अनदेखी करना गलत होगा, लेकिन यह भी सही है, जिस तरह इसे प्रचारित किया गया है, यह वैसा नहीं है। यह जरूर है इसकी स्वीकृति में समय लगा, आजादी से तत्काल पहले और इसके बाद में हुए दंगों के दौरान कुछ क्षेत्रों में इसमें तात्कालिक विचलन भी देखने को मिले, लेकिन समय और स्थान के विस्तृत दायरे में देखने पर लगता है कि इस स्वीकृति की सांस्कृतिक जडें भी बहुत गहरी हैं और दोनों समुदायों ने एक-दूसरे के साथ रहने की अपनी नियति को स्वीकार कर लिया है। दोनों अपने सांस्कृतिक अस्तित्व की धारणाओं और विश्वासों को स्वतंत्रतापूर्वक व्यक्त करते हैं और इन्हें लेकर कोई प्रतिरोध या पाबंदी नहीं है। सिक्ख धर्म ने अलग रूप लिया, उस पर इस्लाम का प्रभाव भी हुआ, लेकिन उसके अस्तित्व को लेकर कोई प्रतिरोध नहीं हुआ। इसके अपनी तरह के विचार और साहित्य को भी स्वीकृति मिली।
भारतीय बहुवचनीय अभिव्यक्ति संस्कृति को लोक या सामाजिक स्वीकृति के साथ समय-समय पर सांस्थानिक और शासकीय स्वीकृति भी मिली। ज्ञात इतिहास में इस तरह की शासकीय स्वीकृति का पहला उदाहरण अशोक का है। अशोक स्वयं बौद्ध धर्म में दीक्षित था, लेकिन अन्य धर्मों की धारणाओं और विश्वासों के लिए उसके मन में गहरा सम्मान था। उसका विचार था कि जो व्यक्ति अपने संप्रदाय के प्रति लगाव के कारण अन्य लोगों के मतों का अपमान करता है, वह अपने इस व्यवहार द्वारा अंततः अपने ही संप्रदाय का अहित करता है। मध्यकाल में अकबर ने भी इस बहुवचनीय अभिव्यक्ति संस्कृति को शासकीय समर्थन प्रदान किया। उसने विभिन्न धार्मिक-सांस्कृतिक समुदायों के सम्मेलन आयोजित कर विभिन्न विचारों और विश्वासों की विद्यमानता को स्वीकृति और सम्मान दिया। यही नहीं, उसने इनमें संवाद और को भी प्रोत्साहित किया। आजादी का आंदोलन अपने चरित्र में ही बहुलतावादी था, भारतीय सामाजिक बुनावट के अनुसार इसमें कई सांस्कृतिक और राजनीतिक समूह सक्रिय थे, इसलिए आजादी के बाद भारतीय संविधान ने अभिव्यक्ति की बहुवचन संस्कृति में दृढतापूर्वक अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की। संवैधानिक प्रावधानों में भारत में कई समुदायों और उनके कई विश्वासों और विचारों की विद्यमानता को स्वीकृति और इन्हें अपने को व्यक्त करने की छूट दी गई।
2.
अभिव्यक्ति की खास भारतीय संस्कृति का विकास इस तरह से हुआ है कि इसमें असहमति के विचार और तर्क को पर्याप्त महत्त्व और जगह दी गई है। यहाँ उसकी उपेक्षा, अवहेलना और अनदेखी नहीं है। वाद, विवाद और संवाद तथा खंडन-मंडन की परंपरा यहाँ बहुत आरंभ से ही रही है। आरंभिक आर्य विचारकों ने विचार के किसी भी रूप को अंतिम या शाश्वत कभी नहीं माना। खास बात यह है कि कोई धारणा या विचार यहाँ कभी प्रश्न और जिज्ञासा से ऊपर नहीं रहा। ऋग्वेद में ऐसे कई सूक्त हैं, जो देवताओं के अस्तित्व पर संदेह व्यक्त करते हैं। एक सूक्त में ऋषि कहता है- ‘लोग कहते हैं इंद्र नहीं है, किसने उसे देखा है?’ एक अन्य सूक्त में कहा गया है- ‘इंद्र कौन है? उसे किसने देखा है? एक-दूसरे से वे कहते हैं- इंद्र नहीं है तो हम किसकी पूजा करें?’ उपनिषदों में जिस विचार का खंडन किया गया है या जिससे असहमति है उस विचार या तर्क को विस्तार और पूर्णता में प्रस्तुत किया गया है। भारतीय दार्शनिक विचारधाराओं में असहमति को बहुत महत्त्व दिया गया है। दर्शनों में विवेचन और मीमांसा की जो पद्धति विकसित हुई, उसमें विरोधी या विपक्षी मत के लिए स्थान पहले से निर्धारित है। तर्कतीर्थ लक्ष्मण शास्त्री जोशी ने भारतीय दर्शन की विवेचन पद्धति की इस खास विशेषता की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखा है कि ‘इस पद्धति की महत्त्वपूर्ण विशेषता है विपक्षी के सिद्धांतों को स्पष्ट करने के बाद अपने सिद्धांत का समर्थन करना। प्राचीन भारतीय पंडितों की यही धारणा थी कि अनेकों प्रतिकूल तथा अनुकूल मतों के परामर्श के बिना स्व सिद्धांत सिद्ध ही नहीं होता। ईश्वर नहीं है।, वेद प्रमाण नहीं है। आदि नास्तिपक्षीय विचारों को स्पष्ट करने के उपरांत ही ईश्वर है।, वेद प्रमाण है। आदि आस्तिपक्षीय सिद्धांतों का प्रणयन प्राचीन भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने किया। वे जानते थे कि वैचारिक विरोध ही विचार वृद्धि की प्रवर्तक शक्ति है। नास्तिक को पथ का दावेदार समझ कर उसे नष्ट करने का प्रयत्न वे नहीं करते; बल्कि उसे खेल का साथी समझ कर वैचारिक क्रीडांगन में सम्मिलित कर लेते हैं। विद्या के विषय में इनकी बौद्धिक संस्कृति का यही प्रण था।’ आस्तिक और नास्तिक भारतीय दर्शन प्रणालियों ने इसीलिए अपने प्रतिपादन में एक-दूसरे की स्थापनाओं और धारणाओं का विस्तार से वर्णन किया है। अनीश्वरवादियों और चार्वाकों या लोकायतों की स्थापनाओं से संबंधित ग्रंथ उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन खास बात यह है कि जनसाधारण में उस समय लोकप्रिय इन विचारकों की धारणाएँ उनके विरोधी अध्यात्मवादी और आदर्शवादी विचारकों के ग्रंथों में विस्तार से विद्यमान है। बौद्ध ग्रंथ दिव्यदान में लोकायत की टीका और प्रवचन मौजूद है। कौटिल्य ने भी अपने अर्थशास्त्र में अनवीक्षकी शास्त्र, जिसमें लोकायत भी आता है, के सकारात्मक पक्ष की सराहना करते हुए लिखा है कि ‘इन विज्ञानों के प्रकाश में देखने पर अनवीक्षकी शास्त्र इस संसार के लिए सर्वाधिक लाभप्रद है, वह दुःख और सुख दोनों में मस्तिष्क को स्थिर रखता है और दूरदृष्टि, वाणी तथा क्रिया-कलाप को श्रेष्ठता प्रदान करता है।’
रामायण और महाभारत में भी असहमति और निरस्त तर्क को सर्वथा खारिज नहीं किया गया है। इनमें ऐसे कई प्रकरण और घटनाएँ हैं। रामायण में जाबालि के विचार पारंपरिक और उस समय मान्य अध्यात्मवादी या आदर्शवादी विचारों से अलग भौतिकवादी हैं, लेकिन उनको विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। महाभारत में भी कृष्ण का पक्ष विजेता का पक्ष है, लेकिन इसमें अर्जुन के पक्ष को भी पूरे ब्यौरे के साथ रखा गया है। खास बात यह है कि अर्जुन का पक्ष खारिज या पराजित पक्ष है, लेकिन यह कई बार विजेता के पक्ष पर भारी पडता है। यहाँ पराजित पक्ष की धारणाओं की युक्तियुक्त प्रस्तुति है। बौद्ध और जैन दर्शन और साहित्य में भी हिंदू धार्मिक मान्यताओं का खंडन है, लेकिन यहाँ भी पद्धति विपक्ष को पूरा अवसर देने की है। बौद्ध धर्म में दीक्षित अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मणों का उल्लेख सम्मानपूर्वक है। इनमें कर्मकांड की निंदा लेकिन ब्राह्मणत्व की सराहना की गई है। जैन ग्रंथ सूत्रकृतांग में जैन दार्शनिक धारणाओं का प्रतिपादन है, लेकिन इसके लिए यहाँ वेदांती विचार को यथोचित जगह दी गई है। महाभारत में शांतिपर्व में अनीश्वरवादी और भौतिकवादी सिद्धांतों- स्वभाववाद, यदृच्छावाद, परिणामवाद आदि को स्वीकार्य नहीं होने के बावजूद सम्मानपूर्वक प्रस्तुत किया गया है। खंडन-मंडन की यह परंपरा आगे भी निरंतर है। शंकराचार्य आदि कई आचार्यों ने बौद्ध और जैन धर्मों का विरोध किया, लेकिन इस विरोध की भाषा बहुत संयत थी। शंकराचार्य की स्थापनाएँ तर्क और युक्ति पर आधारित थीं और उनको व्यापक प्रचार-प्रसार और स्वीकार्यता भी मिली, लेकिन विरोध उनका भी हुआ और उसे व्यापक स्वीकृति मिली। वैष्णव, भागवत, पंचरात्र, शैव आदि कई संप्रदाय शंकराचार्य के विरोध में खडे हुए। राष्ट्रीय आंदोलन का चरित्र हमारे सामाजिक ताने-बाने के अनुरूप बहुलतावादी था। इसमें सक्रिय नेता एक-दूसरे से असहमत थे। नवजागरण के अग्रदूतों में राजाराममोहन राय, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, नारायण गुरु, महादेव गोविंद रानाडे, एने बिसेंट के विचार अलग थे। इनमें कोई एक दूसरे से सहमत नहीं था। दयानंद के विचार जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में प्रतिरोधात्मक गतिरोध से पीडित हिन्दू धर्म को एक आक्रामक, प्रचारात्मक (मिशनरी) धर्म बनाने के प्रयत्न से प्रेरित थे। राजाराममोहन राय हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों और कर्मकांड के ईसाई धर्म के समर्थन की हद तक आलोचक थे। विवेकानंद सहित कई अन्य का आग्रह हिन्दू धर्म और दर्शन के विलुप्त गौरव के पुनरुत्थान पर था। महात्मा गांधी राष्ट्रवाद के मुद्दे पर रवींद्रनाथ टैगोर से असहमत थे। नेहरू और गांधी की पारस्परिक असहमतियों पर बहुत विचार हुआ है। खास बात यह है कि दोनों आजादी बाद भी अपने विचारों पर कायम थे और खुलकर अपनी असहमतियों को व्यक्त भी करते थे।
अभिव्यक्ति की भारतीय संस्कृति असहमति को केवल जगह ही नहीं, उसको पृथक और स्वतंत्र विचार के रूप में पल्लवित होने का अवसर भी देती है। यह संस्कृति इस अर्थ में खास है कि इसमें असहमति अकसर अलग विचार या मत के रूप में पल्लवित हुई है। इसने जन-साधारण के विश्वास और धारणा को गहराई तक प्रभावित किया है। जैन और बौद्ध धर्मों का विकास वैदिक धर्म से असहमतियों के आधार पर ही हुआ। कालांतर में बौद्ध धर्म का पल्लवन और विस्तार तो इस तरह हुआ कि यह भारत के बाहर विश्व की बडी जनसंख्या का धर्म बन गया। जैन धर्म की भी इसी तरह भारत के बडे भू-भाग की प्रभावशाली जातियों में स्वीकार्यता हुई। शंकराचार्य के अद्वैतवादी एकेश्वर और माया के सिद्धांत का आदर्शवादी हिंदू दार्शनिकों ने ही विरोध किया। रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य की उनसे असहमति नए दार्शनिक मत-मतांतरों में फलीभूत हुई और इस आधार पर विशिष्टाद्वैतवाद और द्वैतवाद जैसी नई दार्शनिक प्रणालियाँ अस्तित्व में आईं। खास बात यह है कि देशव्यापी भक्ति आंदोलन में शंकराचार्य से अधिक प्रभाव विशिष्टाद्वैतवाद और द्वैतवाद का पडा। मध्यकाल में भी असहमति ने कई नए संप्रदायों, धर्मों और विचारों को जन्म दिया। वज्रयान से सिद्धों, सिद्धों से नाथों और नाथों से संतों की छोटी-छोटी असहमतियों से भक्ति आंदोलन के कई रूप बने-बिगडे। कृष्ण भक्ति के भक्ति विधानों संबंधी परस्पर असहमतियों ने कृष्ण भक्ति के कई संप्रदायों को जन्म दिया और उनमें अलग-अलग विश्वासों वाले कई भक्त और कवि हुए।
3.
अभिव्यक्ति की बहुवचनीय भारतीय परंपरा और संस्कृति तर्क और युक्ति पर निर्भर है। तर्क और युक्ति का आग्रह यहाँ के लोगों के सोचने-समझने के ढंग में आदत की तरह शामिल है, इसलिए यह उनके दर्शन, विचार, साहित्य और कलारूपों में भी मौजूद है। परंपरा और आस्था-विश्वास का आग्रह यहाँ के लोगों की सोच और समझ में भी है, लेकिन तर्क और युक्ति पर जोर देने की उनकी आदत के कारण परंपरा यहाँ पुनर्नवा होती रहती है और आस्था-विश्वास कभी अंतिम और सनातन नहीं बन पाते। विश्व के कई और समाजों में आस्था-विश्वास अंतिम और सनातन हैं, लेकिन भारतीय समाज में ऐसा नहीं है। तर्क और युक्ति से आस्था-विश्वासों का पुनरावलोकन और परंपरा में जोड-बाकी यहाँ के समाज का स्वभाव है। आस्था और परंपरा का आग्रह अभिव्यक्तियों को समूहवत् और एकरूप करता है, लेकिन भारतीय अभिव्यक्तियाँ सदियों से विविध और बहुवचन हैं, क्योंकि ये तर्क और युक्ति की आदत और आग्रह के कारण प्रायः वैयक्तिक हैं।
तर्क और युक्ति पर निर्भरता यहाँ के विचार, दर्शन और साहित्यिक अभिव्यक्तियों में बहुत पहले से है। विश्व के अन्य समाजों में सृष्टि की उत्पत्ति एवं व्यवहार को लेकर जो कथाएँ मिलती हैं, उनमें कोई तर्क संगति और वैज्ञानिक सुसंबद्धता नहीं है। वैदिककाल में भारतीयों ने भी सृष्टि की उत्पत्ति और व्यवहार को लेकर कथाएँ बनाईं, लेकिन उनकी कथाएँ कार्य-कारण संबंध से युक्त रूपक हैं। यह प्रवृत्ति बौद्धिक विकास की सूचक है। चार वर्णों की उत्पत्ति की कथा के रूपक का कार्य-कारण संबंधयुक्त अर्थ जैमिनीय ब्राह्मण में बताया गया है। अथर्ववेद आदि में भी इसी तरह की कई रूपक कथाओं मेंकार्य-कारण संबंधयुक्त अर्थों का खुलासा है। उपनिषदों में रूपकों से अलग और स्वायत्त, तर्क और युक्ति पर निर्भर चिंतन की शुरुआत हुई। उपनिषदों का चिंतन प्रामाणिक, सुसंबद्ध तथा शुद्ध कल्पनामूल तर्कबुद्धि पर आधारित है। खास बात यह है कि इसमें समाज के सभी तबकों की भागीदारी है। उपनिषदों में स्त्रियाँ और निम्न वर्ग भी तत्त्व चिंतन में हिस्सेदार हैं। उपनिषदों में धर्म, सृष्टि और अंतिम वस्तुतत्त्व का प्रतिपादन है। सृष्टि, आत्मा, ब्रह्म आदि कई मुद्दों पर उपनिषदों में विचार किया गया है और इनमें आधार तर्क और युक्ति है। छांदोग्य उपनिषद् में तार्किक बुद्धि का उपयोग सर्वाधिक है। यहाँ शास्त्र या सिद्धांत निर्माण की प्रक्रिया में पहली बार दृष्टांतों को आधार बनाया गया है। इसी तरह तर्क यहाँ कई बार प्रयोगसिद्ध हैं।
उपनिषदों के बाद शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंदस और ज्योतिष नामक छह अनुशासनों का विकास पूरी तरह केवल तर्क और युक्ति पर आधारित है। इन अनुशासनों में तार्किक विवेचन पद्धति अपने चरम पर है। इन अनुशासनों में विवेचन और प्रतिपादन की वैज्ञानिक पद्धति प्रयुक्त हुई है। विवेचन की इस पद्धति के व्याख्या, वर्गीकरण, सामान्य तथा विशेष नियम, प्रमाणों की रचना, पूर्वोत्तर पक्षात्मक चर्चा और सिद्धांतों का प्रणयन नामक छह चरण हैं। यह पद्धति और व्यवस्था इस तरह की है कि इससे युक्तिसंगत निष्कर्ष तक पहुँचा जा सकता है। इस पद्धति का उपयोग कल्पसूत्र, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा में भी हुआ और इससे उपलब्ध मूलगामी ज्ञान में वृद्धि हुई है। बाद में सांख्य और योग दर्शनों का जन्म हुआ और इन्हीं से आगे चलकर वैशेषिक और न्याय जैसी दर्शन प्रणालियाँ अस्तित्व में आईं। इन दर्शन प्रणालियों की तर्क और युक्ति पर निर्भरता इस सीमा तक थीं कि ये धर्म और श्रद्धा से बहुत दूर चली गईं। विवेचन में तर्क और युक्ति की जो व्यवस्था शुरू हुई, उससे व्याकरण और काव्यशास्त्र के क्षेत्र में ऐसी स्थापनाएँ और धारणाएँ सामने आईं, जो पूर्णतया वैज्ञानिक थीं और जिनको आज भी चुनौती नहीं दी जा सकती। पाणिनी का व्याकरण उनकी तर्क बुद्धि का इतना बडा आविष्कार है कि सदियों तक इस पर टीकाएँ और पूरक रचनाएँ लिखी जाती रहीं। इसकी कतिपय स्थापनाएँ आज भी अंतिम और अपरिवर्तनीय हैं। तर्क और युक्ति पर निर्भरता ने भारतीय ज्योतिष को भी समृद्ध किया। विश्व के कई समाज जब ग्रह-नक्षत्रों की उत्पत्ति और उनकी गतियों के रहस्य को जानने के लिए कथा-कहानियों पर निर्भर थे, तब इसमें ऐसे निष्कर्ष निकाले गए और ऐसी गणनाएँ हुईं, जो आज भी पूरी तरह वैज्ञानिक और प्रामाणिक हैं।
बौद्ध और जैन दर्शनों में भी तर्क और युक्ति का उपयोग कम नहीं हुआ। बौद्ध दर्शन की कुछ बुनियादी धारणाएँ आधुनिक युग में भी मान्य हैं। बौद्ध तत्त्व दर्शन में अणु को विश्व की अंतिम इकाई माना गया है, जो निरंतर परिवर्तनशील है। उसके अनुसार ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो परिवर्तनशील न हो। इस परिवर्तन को इसमें अप्रतिसंख्या विरोध, मतलब समझ न आने वाला परिवर्तन और प्रतिसंख्या विरोध, मतलब समझ में आने वाला परिवर्तन में वर्गीकृत किया गया है। धर्म, नीति, वस्तु, ज्ञान, प्रमाण, शिक्षा आदि से संबंधित बौद्ध दर्शन और विचार की इसी तरह की कई मूलगामी धारणाएँ हैं। तत्त्व दर्शन और तर्कशास्त्र के क्षेत्र में जैन धर्म ने जो काम किया, वो बहुत मूल्यवान है। जैनाचार्य सिद्धसेन दिवाकर और समंतभद्र ने अनेकांतवाद और स्यादवाद जैसी विचार.पद्धतियों की बुनियाद रखी। अनेकांतवाद और हिगेल और माक्र्स के द्वंद्ववाद में बहुत समानताएँ हैं। जैन आचार्य हरिभद्र सूरि शंकराचार्य की कोटि के दार्शनिक थे। उनके चिंतन का आधार धर्म कम, युक्ति और तर्क *यादा थे। लोक तत्त्वनिर्णय में उन्होंने एक जगह लिखा है कि मैं न महावीर के संबंध में पक्षपात रखता हूँ, न कपिल आदि का द्वेष रखता हूँ। वही कथन स्वीकार्य है, जो युक्तियुक्त होता है। इसी तरह उन्होंने एक जगह और लिखा है कि मैं उसकी वंदना करता हूँ जिसके मन में राग, द्वेष आदि संसार बीज अंकुर की वृद्धि में सहायक विकारों का क्षय या विध्वंस हुआ है, चाहे वह ब्रह्मा हो, विष्णु हो, हर हो अथवा जिन हो।
भक्ति आंदोलन एक तरह का सांस्कृतिक आंदोलन थाए जिसकी व्याप्ति पूरे देश में थी। आस्था, विश्वास और श्रद्धा की इस आंदोलन के व्यापक प्रसार और सामाजिक स्वीकार्यता में निर्णायक भूमिका है, लेकिन मनुष्य की सहज तर्क प्रज्ञा की भूमिका भी इसमें कम नहीं है। ईश्वर के समक्ष मनुष्य मात्र की समानता के तर्क ने इस आंदोलन में कई अच्छी बातें जोडीं। जाति-पाँति का विरोध, कर्मकांड की आलोचना आदि इस आंदोलन के मुख्य सरोकार इसी कारण बने। अंग्रेजों के आगमन के बाद चले सांस्कृतिक नवजागरण में पुनरुत्थान और समाज सुधार के अपने आग्रहों में भी तर्क और युक्ति का उपयोग हुआ। राजा राममोहन राय आदि के यहाँ यह कुछ *यादा ही है।
यह सवाल स्वाभाविक है कि अभिव्यक्ति के इस पारंपरिक बहुवचन की मौजूदगी वर्तमान भारतीय परिदृश्य पर बहुत मुखर और ध्यानाकर्षक क्यों नहीं है या अभिव्यक्ति के स्थगन और उस पर रोक-टोक की घटनाओं का कोलाहल ही दृश्य पर इतना प्रमुख क्यों है? दरअस्ल भारतीय समाज ऐसा समाज है, जो सतह पर कम, अंदर *यादा है। सतह के दृश्य को प्रमाण हमारे यहाँ कभी नहीं माना गया। देहरी-दीपक न्याय हमारी आदत में है। हमारे यहाँ दीपक देहरी पर, बीच में है और इसका उजाला अंदर-बाहर सब जगह है। जो दीपक को केवल अंदर या बाहर रखकर उसके सीमित उजाले में सोचते-समझते हैं, हमारे यहाँ उनकी संख्या गिनती की है। शेष अधिकांश के यहाँ तो दीपक देहरी पर है और उन्हें अंदर से बाहर को और बाहर से अंदर को देखने-समझने की आदत सदियों से है।