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पावनता का पुनर्वास और हमारा समय

रमेशचन्द्र शाह
1. हमारी बनावट ही कुछ ऐसी है कि हम अपनी अन्तर्मुखता में आद्य रूपात्मक हैं और बुहिर्मुखता में नाम-रूपात्मक। इसीलिए मनुष्य को अपनी प्रकृति के किसी भी पक्ष को नकारना नहीं है, बल्कि उच्चतर और निम्नतर, पारमार्थिक और लौकिक - दोनों के बीच सामंजस्य साधते हुए चलना है।1
- आनन्द कुमार गोस्वामी
2. रोम नास्तिकता और भौतिकवाद की ही खुराक पर पला-पुसा विशालकाय जन्तु है, जो अपने अलावा और किसी को नहीं पूजता। दूसरी ओर इजराइल है- म*ाहबी जन्तु- उतना ही विशालकाय। न तो पहला, न वह दूसरा जन्तु ही हमें प्रिय लग सकता है। जन्तु तो जन्तु ही है चाहे जितना विशालकाय हो। विशालकाय जन्तु सदैव और लाजिमी तौर पर हमें बिदकाने वाला ही होता है।2
- सिमोन वेल
3. यच्चाप्नोति यदादत्ते, यच्चात्ति विषयाति
यस्यास्ति संततो भावः तस्मादात्मेति कीर्त्यत।।
- लिंग पुराण 1/76/396
अद्वैत वेदान्त की भारतीय परम्परा में ज्ञान अपने सर्वोच्च अर्थ में आत्मज्ञान होता है ः एक ऐसा स्वतःस्फूर्त तत्काल-अनुभूत यथार्थ जिसमें ज्ञाता और ज्ञात वस्तु के बीच का द्वैत विलीन हो जाता है। किन्तु ‘ज्ञान’ की पाश्चात्य अवधारणा में ही कुछ ऐसी प्रवृत्ति बद्धमूल है, जो अन्य को, ममेतर दूसरे को एक वस्तु में बदले बिना, और इस तरह उस पर कब्जा किये बिना रह ही नहीं सकती। ज्ञान इस तरह चराचर विश्व के अवधारणात्मक वशीकरण का अभियान बन जाता है- एक ऐसा अभियान और एक ऐसे निर्बाध हस्तक्षेप की दुर्निवार्य प्रक्रिया, जिसके अन्तर्गत इस चराचर जगत् की वस्तुओं-विभूतियों में तथा तमाम अन्य सांस्कृतिक-धार्मिक परम्पराओं में कुछ भी ऐसा सारतत्त्व बचे रहने की गुंजाइश ही जड से मिटा दी जाती है, जिस पर कब्जा न किया जा सके, समूची चराचर सृष्टि ही एक रहस्यरिक्त सूने सपाट, निरे उपभोग सामग्री में परिणत हो जाए। इसी तरह आस्था या धर्म-विश्वास की भी उनकी अवधारणा में कुछ ऐसा है, जो अपनी हस्ती के लिए उस इनफिडेल या काफिर के अस्तित्व को अनिवार्य पाता है जो उसकी आस्था यानी धर्मविश्वास की परिधि से बाहर है और जो इसीलिए न केवल मुक्ति की पात्रता से सर्वथा वंचित है, बल्कि निरवधि नरकवास के लिए जन्मना अभिशप्त एक निहायत ही गैर, विधर्मी और शाश्वत परायेपन से ग्रसित सत्ता है। ऐसी वस्तुस्थिति में हमारे मन में यह प्रश्न उठता है कि आज के इस पश्चिमीकृत विश्व में स्वयं अनुभव करने और जानने के किसी दूसरे मार्ग की क्या कोई संभावना अभी भी बची है जो इस सृष्टि की विभूतिमत्ता-सत्त्वमयता को यथावत् ग्रहण कर सके- बिना उसका वस्तुकरण किये- अर्थात् बिना उसे मह*ा उपभोग्य लक्ष्य की तरह बरते इस्तेमाल किये?
हममें से कइयों के मन में यह सवाल भी उठ सकता है कि क्या संस्कृत भाषा में कोई ऐसा शब्द है जो सैक्रेड बनाम प्रोफेन जैसे परस्पर विरुद्ध और धु*वीकृत लक्ष्यार्थों की अवधारणा के ही समकक्ष-समतुल्य - उन्हीं से उपजा हुआ और उन्हीं को पुष्ट करने वाला पर्याय हो? जैसाकि कई मर्मज्ञों ने रेखांकित किया है इस खूबी को- संस्कृत ने प्रारम्भ से ही अन्य आरोपीय भाषाओं में व्याप्त उस प्रवृत्ति को- जिसे हम रिप्रजेंटेशनल और ऑब्जेक्टिफाइंग प्रवृत्ति कहते हैं- उसका प्रतिरोध अपनी संरचना के भीतर ही विकसित किया है। संभवतः भारतीय दर्शन और धर्म की विलक्षणता ही उसकी इसी सहज सामर्थ्य में निहित है- वस्तुकरण और निर्वस्तुकरण को एकसाथ साधने की सजगता में। मूर्ति को सिराने का मुहूर्त मूर्ति की प्रतिष्ठा के मुहूर्त से नितान्त अलग-थलग और दूर नहीं होता। दोनों समान रूप से सहज अनिवार्य और उत्सवी गति-विधियाँ हैं। बरसों पूर्व कभी बेही हैमेन की एक पुस्तक मेरे पढने में आई थी जो इसी वैशिष्ट्य को लक्षित परिभाषित करती थी। उन्हीं के शब्दों में- तर्क के प्रति यह भारतीय दृष्टिकोण- जो प्राचीन और अर्वाचीन पश्चिम के दृष्टिकोण से इस कदर भिन्न है, उसी की परिणति है- भारतीय चिंतन में तार्किकता और रहस्यानुभूति- लॉजिक और मिस्टिसि*म का ऐसा अनोखा -अत्यन्त दुर्लभ मेल और सामंजस्य। अकारण नहीं है यह, कि विरुद्धों के सामंजस्य की पहली ही सैद्धान्तिक स्थापनाएँ, प्राचीन भारतीय चिंतन में प्रगट हो गई थीं; यह प्रतीति भी, कि यह विरुद्धों का सामंजस्य ही विश्व-ब्रह्माण्ड की चरम-परम आधारभित्ति है, नींव है। यह भी ध्यातव्य है कि मनुष्य की अपूर्णता का और पूर्णता की उसकी अभीप्सा का उत्तर भी ईसाइयत भविष्य के किसी सुदूर बिन्दु पर खोजती है। मनुष्य की बेहतरी का उसका सफा और दावा उस सुदुर भविष्य पर ही टिका है। स्वर्ग से बहिष्कृत होने से पूर्व की अच्युतावस्था को वहाँ मानवी विकास के संदर्भ में बिल्कुल भी विचारणीय या महत्त्व का स्थान नहीं दिया गया ः सिवाय विलियम ब्लेक और विलियम येट्स सरीखे कवियों के यहाँ- जिन्हें अपनी सभ्यता-संस्कृति की उक्त कमी की भरपाई के लिए अपनी ओर से नई पूरक व्याख्याएँ और पुराण-संकल्पनाएँ गढनी पडीं। दूसरी ओर - तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो वैदान्तिक हिन्दुत्व आत्मन्-ब्रह्मन् की अपनी केन्द्रीय अनुभूति के बूते मूलगामी निर्दोषिता उस आदर्श एकता पर ही आधारित है जो किसी अतीत या भविष्य की दूरारूढ संकल्पना पर नहीं, बल्कि उस सदा उपस्थित, अनुभवसिद्ध अनुभूति और साक्षात् अन्तःप्रमाण पर ही प्रतिष्ठित है जो, माया के आवरणों से भले बारम्बार आवृत होते रहें किन्तु जिन्हें कभी भी पूरी तरह मिटाया कभी नहीं जा सकता।
अब, जैसा कि इस व्याख्यन के आरम्भ में ही उद्धृत किये गए कुमारस्वामी के कथन से झलकता है, हमारा भारतीय भाव-बोध लौकिक और लोकातिक्रामी दोनों धरातलों पर एकसाथ सक्रिय रहा है- मानवीय अस्तित्व के ऐहिक और पारमार्थिक- सैक्रेड और प्रोकेन दोनों आयामों में समान रूप से त्रि*याशील। निस्सन्देह, इनमें जो पारमार्थिक या लोकोत्तर आयाम है, बहु लौकिक आयाम के भंगुर और सीमाबद्ध पहलुओं को देखते हुए, तुलनात्मक दृष्टि से उच्चतर-श्रेष्ठतर है ही; किन्तु, ध्यान देने की बात यह है कि अपनी सारी सीमाओं और बन्धनों के बावजूद यह इहलोक उस लोकोत्तर पारमार्थिक विश्व से कदापि पूर्णतः विच्छिन्न नहीं होता, बल्कि उससे गहरे कहीं जुडा हुआ और उसी से संपोषित होता है। उसका उद्धार, उसकी कृतार्थता सदैव संभाव्य रही आती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो आत्मसाक्षात्कार की पात्रता से वह कभी भी पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता- किसी भी परिस्थिति में। मनुष्य का पुरुषार्थ कैसी भी परिस्थिति का अतिऋमण कर सकता है। इस पुरुषार्थ और आत्म-साक्षात्कार के लिए उसके पास सर्वोच्च परमात्मा-सत्ता की अनुभूति तक पहुँचाने वाले तीन मार्ग सदैव खुले रहते हैं ः ज्ञानमार्ग, कर्ममार्ग और भक्ति मार्ग। तीनों योग कहलाते हैं। भारतीय दर्शनों और धर्मों के पीछे जो चिन्तन सक्रिय रहा है, वह संगणनात्मक (कैलकुलेटिव) से कहीं अधिक मननात्मक (मैडिटेटिव) रहा है। यहाँ हाइडेगर द्वारा प्रयुक्त शब्दावली सहज ही याद आती है क्योंकि मैडिटेटिव और कैलकुलेटिव विचार- पद्धतियों के बीच जो सुस्पष्ट विवेक इस शब्दावली में किया है उसने, वह प्रस्तुत प्रसंग में एकदम प्रासंगिक, सटीक और सारगर्भित जान पडता है। विशेषकर, यदि उक्त तीनों मार्गों के मूलभूत सर्वनिष्ठ तत्त्व पर ध्यान दें तो आधुनिक युग के एक महाकवि और भारत के कहीं बहुत गहरे में भवित महाकवि विलियम येट्स ने अपने सुहृद् सखा पुरोहित स्वामी द्वारा अनूदित पातंजल योग की Aphotrisms of Yoga नामक पुस्तक की भूमिका में इसी ‘योग’ के बारे में जो अभिमत प्रकट किया है, उसे उद्धृत करना मुझे यहां प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है। येट्स की अंग्रेजी शब्दावली में वह अनुभव इस प्रकार व्यक्त हुआ है- The experience, accessible to all, who adopt a traditional technique and habit of life has become the central experience of Indian civilization.... that, wherein all thoughts and all emotions expect their satisfaction and rest. अर्थात्, योग वह साक्षात् प्रत्यक्ष अनुभव है, जो उन सबके लिए सुलभ है, जो उसके अभ्यास की एक पारम्परिक जीवन्त प्रणाली अपना सकें। यह योग भारतीय सभ्यता का वह केन्द्रीय अनुभव है, जिसमें मानव के समस्त विचार और समस्त भाव-संवेग अपनी संपूर्ण संतुष्टि और विश्रान्ति उपलब्ध करने की संभावना के प्रति आश्वस्त हो सकते हैं। योग की- अर्थात् पावनता के प्रत्यक्ष बोध की- यह समझ हममें से अनेक लोग यहाँ- अपने यत्किंचित् अनुभव के अन्तःप्रमाण का हवाला देते हुए कह सकते हैं, कि- सर्वथा सम्यक और प्रामाणिक है।
अब, जहाँ तक हमारी आज की समसामयिक अवस्थिति का प्रश्न है, वह तथाकथित सेक्युलराइजेशन और डिसैक्रेलाइजेशन-अर्थात् पावनता और दिव्यता के बोध के पूर्ण विलोपन की अवस्थिति है। अनेकानेक इतिहासज्ञ, दार्शनिक और सामाजिक-धार्मिक विचारक इस बारे में एकमत प्रतीत होते हैं कि मानव-इतिहास की यह एक अभूतपूर्व और सर्वथा निराली घटना है। कई विचारकों का यह भी मानना है कि इस घटना का उद्गम और क्रमिक विस्तार जूडियो क्रिश्चियन परम्पराओं में- यानी उनकी पूर्व प्रतिज्ञाओं में ही निहित है। बात को इस तरह न भी रखा जाय तो भी इतना तो समझ में आता ही है कि अपनी जड में यह पावन के लोप की समस्या मानव-जीव के सोचने को उसके होने से विच्छिन्न करके ही अपनी दिग्विजयी प्रगति का रथ हाँकने वाली पाश्चात्य सभ्यता के इतिहास की ही उपजाई हुई है। किंतु स्वयं भारत जैसे देश की सभ्यता भी जहाँ सुदूर अतीत में नहीं बल्कि ठेठ आज की तारीख में भी अतीत के महानतम योगियों-ज्ञानियों के समकक्ष अर्वाचीन विभूतियाँ- महात्मा मंगतराम और निसर्गत्त महाराज सरीखी- लगातार साक्षात् हमारे बीच प्रकट होती रही हैं,- इस विश्वव्यापी संक्रामक से अछुते नहीं रहे स्वयं हमारे सबसे तेज तर्रार बुद्धिजीवियों की गतिविधियों से नित्यप्रति प्रकट हो रहा है कि हम कहाँ जा रहे हैं? मानना पडेगा कि मात्र परम्परागत शब्दावली का कवच ओढकर- जिसके अर्थ को हमने खुद अपने नये तप और अध्यवसाय के बलबूते नहीं कमाया - अपने को सुरक्षित समझ लेना आत्म-प्रवंचना ही होगी। हमें अपने पारंपरिक- पावनताबोध को आत्म-विज्ञान और परमात्मविज्ञान को भी- नए सिरे से अर्जित करते हुए आज की इस अभूतपूर्व धर्मग्लानि के बीचोबीच उसके साथ सीधे संवाद का सूत्रपात करना होगा। हमें स्वयं श्री अरविन्द और जे.कृष्णमूर्ति सरीखे एक दूसरे से नितान्त भिन्न मनीषियों के भी कृतित्व का पुनर्मूल्यांकन करना होगा - न केवल भारतीय परंपरा, प्रत्युत स्वयं पश्चिम की भी उस गुह्य आध्यात्मिक परपंरा के भी आलोक में - जिसे स्वयं पश्चिम की ही उस म*ाहबी परम्परा ने अवदमित और कुंठित कर दिया जिसे आल्डुअस हक्सले ने थियोलॉजिकल इम्पीरियलिज्म का नाम दिया है। तभी -एक आमूलचूल टकराहट के भीतर से हमें स्वयं अपने आज के जीवन और आज की परिस्थिति-परिवेश में स्वयं अपनी तथा विश्वव्यापी परिस्थिति के बीचोबीच योग की संभावित भूमिका और संभावना का भी सही-सही अनुमान हो जाएगा। सवाल यह है कि विश्व इतिहास का यह जो दौर अभी चल रहा है- जो पूर्णतः पश्चिम की प्रगतिवादी विश्वदृष्टि और चमत्कारिक वैज्ञानिक तकनीकी उपलब्धियों से प्रेरित है- उसके बारे में हमारा वस्तुनिष्ठ आकलन क्या है? क्या हम मानव-जाति के तथाकथित विकास-ऋम की सबसे ऊँची लहर पर सवार हैं? किस अर्थ में, विकासवाद का सिद्धान्त आध्यात्मिक क्षेत्र पर लागू हो सकता है? माक्र्स का कम्यूनिस्ट यूटोपिया यदि साधन और साध्य की अनर्थकारी बुनियादी विसंगति के चलते विफल हो चुका है तो क्या श्री अरविन्द का अतिमानस के अवतरण का तथाकथित यूटोपिया उसकी जगह उसके बदले कृतकार्य हो सकता है? लक्ष्य तो सारे विपरीत न*ार आ रहे हैं; सम्पूर्ण मोहभंग और सम्पूर्ण नकारवाद (निहिलि*म) का - सेम्युलरिज्म के नाम पर पृथ्वी के सम्पूर्ण निर्दैवीकरण (desacralization) का दृश्य ही हमारी आँखों के समक्ष उजागर है। इस त्रासदी की विभीषिका को व्यक्त करें, तो पुरोधा कवि अज्ञेय के शब्दों में देवता अब भी जलहरी को घेरे बैठे हैं/ पर, जलहरी में पानी सूख गया है/ देवता भी धीरे-धीरे सूख रहे हैं/ उनका पानी मर चुका है..... तो, निर्दैवीकरण से ग्रस्त और पावनता के बोध से विरहित इस आधुनिक सभ्यता के मरुस्थल में अतिमानस के अवतरण की संभावना कहाँ दीखती है? हाइडेगर के विश्व-विश्रुत मर्मज्ञ स्व.प्रो.जे.एल. मेहता के शब्दों में - हम उस विरासत से पूरी तरह वंचित और बेदखल कर दिये गए है, जहाँ हम देवताओं की उपस्थिति महसूस करते थे। हम ऐसी दुनिया में पटक दिये गए हैं जिसमें पावन और प्रभासिक्त जैसा कुछ भी शेष नहीं बचा। स्वयं आध्यात्मिकता का क्या अर्थ शेष रह जाता है, ऐसे परिवेश और युग में, जब सेक्यूलर अवधारणाएँ, जो स्वयं यूनानी-ईसाई इतिहास की प्रसूति हैं, सर्वत्र बेखटके अपनी सम्पूर्ण निरपेक्षता और स्वयंपर्याप्तता का दावा कर रही हैं?
क्या ये चिंताएँ हमारे अपने भारतीय जीवन-संदर्भ में कुछ अप्रासंगिक या अतिरेकी नहीं लग उठतीं? जब हम अपने बचपन के परिवेश को याद करते हैं, जहाँ दिन का आरंभ ही घर के देवताथान में सुनाई देती देवताओं को जगाने वाली घंटी की ध्वनि से होता था - उन देवताओं को, जो ठेठ स्थानीय से लेकर उच्चतम श्रेणी के विष्णु तथा उसके अवतार राम और कृष्ण और उनसे भी पहले शंकर महादेव और सारी देवियाँ- जगदम्बाएँ भी हुआ करती थीं- देवी-देवताओं का एक भरा-पूरा समूचा प्रजातंत्र- सबके अपने विशेष त्यौहार... पर्व-प्रसंग। सभी अपने सगे-सम्बन्धियों सरीखे हमारे एकदम निकट और जीवन्त.... देवता जिन्हें हम बरतनों की तरह माँजते देखते थे अक्सर.... और विशेष अवसरों पर रो*ा से ज्यादा चमाचम....खुद अपनी तरह। वह बचपन का घर था, जिससे हम बहुत दूर छिटक गये हैं। किन्तु, न सही हम, हमारे भाई बहन ....और सगे-संबंधी तो आज अभी भी वह दिनचर्या निभा ही रहे हैं। क्या वहाँ जाने पर और स्मृति में ही नहीं, सचमुच भी वही उत्साही भाव, वही सामूहिक राग- येट्स के मुहावर का emotion of multitude हम पर नहीं छा जाता? वैसा ही यहाँ भाव, बल्कि उसमें भी ज्यादा जीवन्त और प्रत्यक्ष अनुभव काशी या प्रयाग के कुम्भ मेले में या हरिद्वार में गंगा तट पर कभी भी नहीं जाग उठता? और यह मात्र स्मृति या उत्सवी भाव की ही बात नहीं हैं। अभी कुछ ही वर्ष पूर्व की तो घटना है वह, जब हमने पांडुरंग शास्त्री आठवले द्वारा प्रवर्तित स्वाध्याय आन्दोलन की विस्मयकारी उपलब्धियों को भक्ति को, एक सामाजिक शक्ति के रूप में लाखों लोगों को अनुप्राणित करते स्वयं अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देखा था- एक बार नहीं, तीन-तीन बार...और इस आंदोलन के प्रणेता आठवलेजी को हम आमंत्रित बुद्धिजीवियों के बीच अपने अनुभवों के बारे में नितान्त सहजआत्मीय और प्रभावशाली ढंग से बोलते देखा सुना था। ......यह लौह युग, यानी कलियुग...आठवले की वह आवाज’’ इसी क्षण भी मेरे कानों में गूँजने लगी है।- इस कलियुग से अधिक उपयुक्त समय हो ही नहीं सकता भक्तियोग को जीने बरतने के लिए - आठवले हमसे कह रहे थे।....भक्तियोग और गीता के कर्मयोग को। और वे यूँही नहीं कह रहे थे। हमने स्वयं देखा था कई बस्तियों में जाकर, मिल-बतिया कर उन मछुवारों और दूसरे भी लोगों से, कि कैसा आमूल-चूल रूपान्तर घटित हो गया था उनके जीवन में कुछ ही बरसों के भीतर....., इस निहायत ही सामान्य और घरेलू से प्रतीत होते, मगर वस्तुतः असाधारण रूप से विरल विलक्षण कर्मयोगी पाण्डुरंग शास्त्री अठावलेजी की इस अनूठी कर्मयोगी पहल के फलस्वरूप। तभी तो कह रहे थे वे हम बुद्धिजीवियों से, कि...अरे सतजुग या द्वापर होता तो मेरे जैसे आदमी को पूछता ही कौन? जरूरत ही क्यों होती लोगों को मेरी? मैं याज्ञवल्क्य से भी बहुत-बहुत अधिक भाग्यशाली हूँ-सच मानिये।
तो, वह निश्चय ही एक आश्वासनदायी अद्भुत अनुभव था हम बुद्धिजीवियों के लिए.....हमें अपने पुरखों की बुद्धिमत्ता का प्रत्यक्ष प्रमाण देने वाला। फिर क्यों हम उस प्रेरणादीप्त मनोदशा को - वहाँ से लौटने के बाद यथावत् कायम नहीं रख सके? क्यों फिर से स्खलित हो गए-उसी आत्मावसाद में? जैसे वह आँखों देखा यथार्थ नहीं, मह*ा एक सपना रहा हो। आखिर हम सिर्फ हमारे मन पर पडे संस्कार या स्मृतियाँ या बाल्यकालीन परिवेश तो हैं नहीं। हमारा जो वर्तमान समाज-परिवेश और समकालीन बौद्धिक वातावरण है, वही तो सबसे ज्यादा हमारी चेतना को प्रभावित करेगा। समाज के सबसे विचारप्रवण और शैक्षिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में अग्रणी लोग ही तो, जिनसे हमारा रोजाना का संग-साथ रहता है, वही तो हमारा परिवेश भी हैं ः यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।। स्वयं गीता इस कडवी सच्चाई को स्पष्ट अभिव्यक्त करती है कि नहीं? श्रेष्ठजनों बौद्धिकों के बीच कैसा क्या संवाद चला करता है, वह भी हमारे ज्ञान और आचरण को निर्धारित करता है कि नहीं? इसी जीवन-यथार्थ की यथातथ्य समझ ही हमारे एक अत्यन्त प्रबुद्ध अग्रज के कथनानुसार यह मानने के लिए अति विवश करती है कि, -चूँकि यह पारस्परिक संवाद ही किसी कालखण्ड में एक समाज की मूल्य चेतना को निर्धारित और अभिव्यक्त करता है, इसीलिए हमें उसी के एक अंग- भाष्य-कर्म को अत्यन्त गंभीरतापूर्वक ग्रहण करना चाहिए। प्रो. मेहता के शब्दों में-यह भाष्य-कर्म या कि ‘हर्मेन्युटिकल एन्डीवर’ ही एकमात्र वह प्रभावी मार्ग और जरीया है जिसके बूते हम खुद अपनी परम्परा की आधार स्तंभ सरीखी कृतियों को उनमें अन्तर्निहित संजीवनी शक्ति को- और अर्थ-समृद्धि को फिर से अपने लिए उपलभ्य और कारगर बना सकते हैं।
संभव है, इसे एकमात्र मार्ग न भी माना जाय। परन्तु इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि यह उन कई मार्गों में से एक मार्ग तो है ही, जो हमें आज के समय में आज के इस जटिल जीवन-संसार के लिए उस पावनता-बोध की थाती को फिर से उपलभ्य बना सकता है। एक दूसरा मार्ग श्रेष्ठतम (नए पुराने दोनों) कवियों की वाग्विभूति को स्वायत्त करना भी है। जिसका आधुनिक काल में एक अत्यंत श्रेष्ठ और मार्मिक उदाहरण दार्शनिक हाइडेगर द्वारा विख्यात जर्मन कवि ह्योएल्डरलिन के काव्य का मूल्यांकन है। भारत की परम्परा में दोनों प्रक्रियाओं को समान महत्त्व दिया जाता रहा हैः शब्द ब्रह्म की सारस्वत साधना एक तरफ, और ध्यानयोग की मौन गहन प्रक्रिया द्वारा चेतना के उन्नयन-रूपान्तरण की साधना दूसरी तरफ। तो हमारे जैसे घोर अन्तःसंघर्ष और अन्तर्द्वन्द्व में पडे हुए साहित्यकर्मी बौद्धिकों को जो भी जैसा भी प्रेरणादायी समाधान इन दो समान रूप से हमें अपनी ओर खींचने वाली प्रवृत्तियों (योग-साधना और एक सारस्वत वाक-साधना) के बीच चाहिए वह एक द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध के विकास और परिपाक के स्तर पर ही चाहिये। हमने उच्चतम कविकर्म से मिल सकने वाले आलोक का उल्लेख भी अभी-अभी इसी सिलसिले में किया था। महान् कविता से मिल सकने वाला यह ज्ञान भी हममें पावनता-बोध को जगाने-उकसाने में सचमुच सहायक-प्रेरक होगा। महान कवि तुलसीदास ही, मसलन, अपने महाकाव्य का आरंभ किस तरह करते हैं, तनिक सुनिएः
आकर चारि लाख चौरासी।
जाति जीव जल थल नभ वासी।।
सियाराम मय सब जग जानी।
करहुँ प्रनाम जेरि जुग पानी।।
मेरी तरह आप सुधीजनों ने भी विश्व के प्रसिद्ध महाकाव्य कई पढे होंगे। मैं अपनी कहूँ तो - मुझे तो उनमें से किसी में भी ऐसा उदात्त और फिर भी सर्वजन सुलभ आवाहन दिव्य और पावन सत्ता का नहीं मिला। नर-नारायण के सम्बन्ध की वास्तविकता का ऐसा परम्परागत और फिर भी सर्वथा नया, रोमांचित कर देने वाला आवाहन और मात्र मानववादी नहीं, चराचरवादी-चराचरमूलक, चराचर में ओतप्रोत दिव्यता और पावनता के ऐसे गहरे सम्बन्ध को प्रत्यक्ष मूर्त कर देने वाला स्वर विश्व-साहित्य में कितना विरल दुर्लभ है, कहने की बात नहीं। जैसा कि जॉर्ज स्टाइनर का कहना है- हाइडेगर सिर्फ गहरा दार्शनिक ही नहीं, हमारे समय में काव्य का सबसे गहरा मर्मी पाठक था- यह ह्योएल्डरलिन (और, हाँ रिल्के) के काव्य की उसकी मर्मग्राही परख से पता चलता है। उसी का यह भी बडा मर्मस्पर्शी कथन याद आ रहा है कि- कवि उस दुर्भेद्य रहस्यमय पावन दिव्य शक्ति और हम सामान्य मानवों के बीच सबसे सुदृढ सेतुबंध रचने वाला मध्यवर्ती है, जो अपनी सभ्यता के लिए वरदान स्वरूप सिद्ध होता है। स्वयं हाइडेगर की दृष्टि में ‘‘देवता वे मध्यवर्ती शक्तियाँ ही हैं- जिनपर कवि अवलम्बित होता है, और जो स्वयं कवि पर अवलम्बित होते हैं। क्या यह बात हममें स्वयं अपने पुरातन वैदिक भावबोध का यज्ञ के मूल में निहित अनुभूति का स्मरण नहीं जगाती? यह न तो आकस्मिक है, न अकारण, कि हाइडेगर के मर्मग्राही विशेषज्ञ मेहताजी अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में वेद के सर्वथा मौलिक भाष्य में प्रवृत्त हुए - एकदम नवीन खोज में। इस संदर्भ में उनके अपने अनुभव की साखी भी उन्हीं के शब्दों में सुन लेना हमारे लिए जरूरी होगा। वे कहते हैं एक जगह-

वैदिक वाङ्मय की व्याख्या में दो दुर्लध्य बाधाएँ हैं ः एक तो वे म*ाहबी और सांस्कृतिक नृतात्त्विक पूर्वग्रह, जो दो सदियों से पाश्चात्य वैदिक विद्वत्कर्म के मूल में कार्यरत रहे हैं, और दूसरे, वे दर्शनशास्त्रीय पूर्वधारणाएँ, जिन्होंने पूर्वोक्त म*ाहबी पूर्वग्रहों से कम अनर्थ नहीं उपजाया है। उस अनर्थ के मूल में है, पाश्चात्य अवधारणाओं को एक नितांत भिन्न परम्परा पर बिना सोचे-समझे आरोपित करते रहने की अहमन्य कुटेव। कहना मुश्किल है किसने ज्यादा कहर ढाया है इन दोनों में।
मेरे समानशील मित्रो! अब मैं आफ साथ इस संवाद को एक ऐसी अलग दिशा में मोडने की प्रेरणा अनुभव रहा हूँ, जो हो सकता है आपको आकस्मिक विषयान्तर सरीखा लगे; किन्तु मेरा खयाल है वह अन्ततः आपको भी उतना ही प्रासंगिक और विषय के मर्मस्थल में सीधी पैठ करने -कराने वाला उपऋम लगेगा। कम से कम ऐसा विषयान्तर, जो इस तरह की प्रश्नाकुलता में अनिवार्यतः उपजने वाली उलझनों में निहित अतिबौद्धिकता से अर्थात् स्वयं एक तरह की विषयासक्ति के प्रलोभनों से उबारते हुए अपने हृदय की बात कह-सुन पाने सरीखा अनुभव संभव कर सके।
निस्संदेह, अपनी जड में तो यह पावनताजनित बोध के विलोप की समस्या- मनुष्य के सोचने की त्रि*या को उसके होने के यथार्थ से विच्छिन्न करके ही अपनी प्रगति का रथ हाँकने वाली पाश्चात्य सभ्यता के इतिहास की ही उपजाई हुई प्रतीत होती है- देकार्त का आई थिंक देयरफोर आई एम सूत्र जिसका स्वयं आधुनिकता का भी प्रस्थान बिंदु क्या परिपाक-बिंदु ही लग उठता है। किन्तु भारत जैसे देश की धर्मप्राण संस्कृति भी जिसे महान् आधुनिक कवि येट्स ने रेलीजन ऑव दि सेल्फ (आत्मा का धर्म) निरूपित किया है,- वह भी उसके विश्वव्यापी संऋामक से अछूती नहीं रह सकती- यह भी हम देख चुके हैं। यह भी, कि मात्र एक परम्परागत शब्दावली का कवच ओढकर- जिसके अर्थ को हमने अपने नए तप से- एक अभिनव अध्यवसाय के बल-बूते नहीं कमाया- अपने को सुरक्षित- अवेध्य मान लेना आत्मप्रवंचना ही है- हमें पावनता के अपने पुरातन बोध को-पारम्परिक आत्मबोध यानी आत्म-विज्ञान और परमात्म-विज्ञान को भी एकदम नए सिरे से अर्जित करना होगा। तभी हम पावनता के पुनर्वास जैसी चेष्टा और उक्ति को- जो प्रस्तुत व्याख्यान की केन्द्रीय विषयवस्तु है- सचमुच चरितार्थ करने की दिशा में आगे बढ सकते हैं।
अब, जैसा कि अतिमानस के अवतरण की संभावना के प्रतिपादक श्री अरविन्द का भी मानना है, प्रकृति अपने विकास-ऋम में जीव की प्राणिक सत्ता को जहाँ तक ले आई है -मनुष्य तक - वहाँ से आगे वह उसे नहीं ले जा सकती। वहँा से आगे उसे केवल मानव-चेतना का एक अभूतपूर्व पुरुषार्थ ही ले जा सकता है- जैसा कि स्वयं अरविन्द के महाकाव्य ‘सावित्री’ की शुरुआत में ही प्रयुक्त मुहावरे- ऐडवेंचर ऑव कांशसनेस से व्यंजित होता है। चेतना मनुष्य में ही आत्मचेतन होती है और तभी उसकी साधना और संभाव्य सिद्धि के आयाम भी तभी उसी में उजागर होते हैं। यह अपनी सीमाओं को लाँघने की प्रेरणा सृष्टि के मूल में ही, और उसकी विकास-प्रक्रिया में भी अंतर्निहित होनी चाहिए अर्थात् उसी प्रक्रिया में, जिसकी परिणति मनुष्य में हुई, जो कि मात्र भोक्ता ही नहीं प्रत्युत साक्षी और आत्मचेतन चेतना है। अर्थात् आत्मा और परमआत्मा का ही अंश होने की संभावना से युक्त है। आत्मा - यानी क्या? सर्वाधिक प्राचीन और प्रचलित इस शब्द का अभिप्राय क्या है? क्या यह मह*ा एक रूढ अभ्यास या कि खब्त भर है? या कि हमारे मनुष्य होने के अनुभव का ही स्वतः प्रमाण आख्यान और अभिव्यक्ति? क्या आत्मा मैं हूँ इस आद्य प्राथमिक तथ्य और बोध का सातत्य है? इस व्याख्यान के प्रारंभ में ही हमने जो तीसरा उद्धरण टाँका था- वह तो- लगता है- आत्मा को इसी तरह परिभाषित कर रहा है। सीधा शब्दार्थ उसका यही तो है कि .....यह पुरुष, जो सुषुप्ति में ब्रह्म-भाव को प्राप्त हो जाता है, स्वप्न में बगैर इन्द्रियों के’ और जागृतावस्था में इन्द्रियों से विषयों को भोगता हुआ निरन्तर वर्तमान रहता है, वह इसीलिए ‘आत्मा’ कहलाता है। आदिपुरुष मनु ने अपने होने को कैसे अनुभव किया? मैं हूँ यह वरदान सदृश क्यों लगा गूँजने कानों में / मैं भी कहने लगा मैं रहूँ / शाश्वत नभ के गानो में... यह आधुनिक हिन्दी के महाकाव्य कामायनी का मनु कहता है। किन्तु क्या हम मनु के वंशज- आज के मानव-जीव अपने होने को उस तरह अनुभव करते हैं? हमारी हालत तो उससे कहीं बदतर है जिसका पूर्वाभास कामायनीकार जयशंकर प्रसाद ने ही झलका दिया था ः
ज्ञान दूर कुछ, त्रि*या भिन्न है,
इच्छा क्यों पूरी हो मन की?
एक दूसरे से न मिल सके,
यह विडम्बना है जीवन की।
सचमुच, क्या हम कभी भी अपने आप में प्रतिष्ठित होते हैं? बेशक, हम जीते तो इसी भ्रम में हैं, हम में से कोई भी यह मानने को तैयार न होगा कि वह एक स्वचालित यंत्र भर है। मगर किसी भी दिन- आज और अभी आप *ारा अपने ऊपर यह प्रयोग कर देखें। अपनी पल-प्रतिपल बदलती मनःस्थितियों और परिस्थितियों में क्या-क्या हरकतें आप करते हैं- हर हरकत का तुरन्त फोटू खींच डालें- तब पता चलेगा कि आप किस कदर बिखरे हुए, और अपनी आदतों और जडीभूत संस्कारों से परिचालित यंत्र हैं। आपकी हर क्रिया क्रिया नहीं- मात्र, प्रतित्रि*या है। तब आप देखेंगे कि आप किस तरह उन्हीं-उन्हीं बातों-हरकतों-मुद्राओं को यंत्रवत् दुहराते रहते हैं मानो- अपने ही कर्म-भोग की लाचार पुनरावृत्तियों से बँधे। कैसा दुश्चक्र है यह! सुनी ही होगी आपने हिस्टरी के बारे में वह प्रसिद्ध उक्ति एक नामचीन इतिहासकार की ही,- कि एकमात्र सबक जो आदमी अपने इतिहास से सीखता है, वह यही है, कि आदमी अपने इतिहास से कभी भी कुछ नहीं सीखता। मानव समुदायों के ऊपर भी यह बात उतनी ही लागू होती है जितनी मानव-व्यक्तियों पर। क्या ही विडम्बना और क्या ही विरोधाभास है यह- सोचिए *ारा- कि जो चेतना हमें मुक्ति का पात्र बनाती है, वही हमारी आजीवन काल-कोठरी की कैद बन जाये। इसका मतलब यही न हुआ कि हम सचमुच, वास्तव में चेतन यानी आत्म-चेतन कभी होते ही नहीं। मानो हमारी चेतना सिर्फ उस पर पडी असंख्य छापों की ही निरीह पुनरावृत्तियों का सिलसिला भर हो।
दूसरी ओर, इस तथ्य को भी कैसे नकारा जा सकता है कि यही मनुष्य अनवरत विकास करता आया है। अपने बुद्धि-बल से उसने हर क्षेत्र में अपनी क्षमता का विस्तार किया है। प्रकृति में निहित ऊर्जा स्रोतों की खोज और भरपूर दोहन करते हुए उसने प्रकृति से स्वतंत्र होकर अपनी सभ्यता और संस्कृति का निर्माण और विकास किया है। यहाँ तक कि तमाम सांस्कृतिक विविधताओं के परे मानव मात्र की एकता का स्वप्न भी उसी ने देखा है और उसे चरितार्थ करने का भी अनवरत प्रयत्न वह करता रहा है। सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म। वह क्या है जो उस अनादि- अनन्त परात्पर ब्रह्म को इस सादि-सान्त मानव से- इस आत्म चेतना के मनुष्यरूपी अधिष्ठान से जोडता हैं? तो इस मनुष्य रूपी आत्मचेतन अधिष्ठान की इस ब्रह्माण्ड में कोई भमिका भी अवश्य होनी चाहिए। वह भमिका क्य है? ब्रह्माण्ड की संचालक महा शक्ति ने- शंकराचार्य के शब्दों में कहें तो जगत्साक्षिणी संवित् चेतना ने अपनी सर्वाधिक परिष्कृत ऊर्जा उसी पर तो निछावर की है। तभी तो वह मैं हूँ तो मैं कौन हूँ जैसे प्रश्न के सम्मुख स्वयं को खडा पाता है। तो, इसका मतलब यही न निकला कि उस सृष्टि-विधायक परात्पर (और सर्वभूतान्तरात्मा भी) सत्ता के साथ- जिसे परमात्मा या नारायण भी कहा जाता है, उस नारायण के साथ इस नर की सत्ता एक बहुत ही खासुलखास स्पन्दात्मक सम्बन्ध में जुडी होनी चाहिए। सृष्टि का कोई उद्देश्य, कोई प्रयोजन अवश्यमेव होना चाहिए जिसकी पूर्ति इस नर की आत्म-चेतना के सहयोग की अपेक्षा रखती है। अब यूँ तो सभी विश्वधर्मों में- उनके मूलोद्गम में मसलन Essene Christianity में भी इस नर-नारायण सम्बन्ध के संकेत मिलते हैं, किन्तु भारतीय वाङ्मय में इसकी जैसी सुदृढ-तात्त्विक और अटूट अभिव्यक्ति मिलती है, वैसी अन्यत्र और दुर्लभ लगती है। जीव और ब्रह्म, आत्मा और परमात्मा को मौलिक एकता का ऐसा उद्घोष ठेठ तत्त्वमीमांसीय धरातल पर और कहाँ मिलेगा- कुछ गिने-चुने अपवाद स्वरूप रहस्यदर्शियों को छोडकर? यूँ उन्हें मुख्यधारा से बहिष्कृत भी कर दिया जा सकता है- कुफ्र का इलजाम लगाते हुए बहरहाल...।
समस्या मगर वही उठती है जिसका उल्लेख अभी ऊपर हुआ है। जैसा कि हमारी हिन्दी के एक मौलिक तत्त्वचिंतक-दार्शनिक यशदेव शल्य का कहना है - हम जगत्भाव को प्राप्त चैतन्य हैं। पर यह भाव चेतना के लिए अनिवार्य नहीं है। सर्वथा सत्य कथन है यह। किन्तु हमारी विडम्बना यह है कि हम चौबीस घंटे इसी जगत्भाव में निमग्न रहते हैं। चौबीसों घंटे उसी से अपने को आइडेन्टिफाई करते रहते हैं। उससे अपने को विलग करके अपने वास्तविक स्वरूप को खोजने की विकलता कदाचित् ही कभी महसूस करते हैं। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि अपने एक केन्द्रीय और स्थायी मैं की क्षणिक कौंध भर हममें कभी-कभी जागती है; पर वह टिकाऊ नहीं होती, तुरन्त बिला जाती है। हम अपने उस आत्मस्वरूप को भूले रहते हैं जो मैं हूँ की निरन्तर और अकाट्य प्रतीति का मूलाधार है। इसका अर्थ यही हुआ कि हममें आत्मा एक संभावना के स्तर पर तो विद्यमान रहती है, पर अधिकांशतः हम उस संभावना से बहुत-बहुत निचले धरातलों पर ही जीते चले जाने के अभ्यस्त हो रहते हैं। परन्तु दूसरी ओर, उक्त नर-नारायण के पारमार्थिक अद्वैत की जाग्रत्-जीवन्त अनुभूति भी तो इसी हाड-माँस की देह के माध्यम से मनुष्य ने ही कमाई है। तभी तो गीता में कहा गया है कि-
मनुष्याणां सहस*ेषु कश्चिद् यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानाम् कश्चिन्मां वेत्ति तत्वः।।
अर्थात् हजारों में कोई एकाध ही आत्म-साक्षात्कार या परमार्थसिद्धि के लिए यत्नशील होता है। और अयत्नशील साधकों में भी कोई बिरला ही वास्तव में मुझे जान पाता है। यह कौन कह रहा है? किससे कह रहा है ? यह वह कह रहा है जो पुरुषोत्तम परमात्मा है, योगेश्वर है, और उससे कह रहा है जो स्वयं भी बिरलों की ही श्रेणी में आता है, जो उस पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण से भी यह कहलवा लेता है कि भक्तोऽसि मे, सखा चेति। तू मेरा भक्त और अनन्य सखा है। तनिक इस नर-नारायण सम्बन्ध पर- निराले ही सखा सम्बन्ध पर- ध्यान दीजिए नर और नारायण जितने निकट और घनिष्ठ साहचर्य को व्यक्त करने वाले नाम हैं, वैसे ही पुरुष और पुरुषोत्तम भी। क्या इससे नाम सुमिरन का एक सर्वथा नूतन अर्थ प्रगट नहीं होता? नाम- सुमिरन अर्थात् आत्म-स्मरण, सेल्फ-रिमेम्बरिंग अर्थात् वह आत्म-™ाान, जो परमात्म-™ाान का ही पर्याय नहीं, तो उसकी अनिवार्य पूर्व-प्रति™ाा तो अवश्यमेव है। जितने भी ज्ञान-वि™ाान हैं उनमें सर्वाधिक दुस्साघ्य। किन्तु इसीलिए तो वह सर्वाधिक मूल्यवान, सर्वाधिक स्पृहणीय ज्ञान ठहरता है, जिसके अभाव में बाकी सारे ज्ञान अ™ाान सदृश लगने लगते हैं। ऐसे ज्ञान तक पहुँचने के लिए जाने कितनी सीढियाँ चढनी पडती होंगी। जबकि अधिकांश लोग तो शुरुआती सीढियों पर ही हिम्मत हार जाते होंगे। आरम्भ में ही मैं कौन हूँ इस प्रश्न के उत्तर में बीसियों मैं अपना-अपना दावा पेश करने लगेंगे। दरअस्ल गेंगे जैसा कि अभी हाल आरमेनिका में उपजा और दुनिया भर में धूम मचा देने वाला चमत्कारी गुरु जी.आई. गुर्जिएफ भी अपने अनजाने ही हमारे जयशंकर प्रसाद आदि के सुर में सुर मिलाता हुआ कहता है- हमारे होने करने के तीन प्रमुख केन्द्र हैं- मनुष्य अनेकायामी या कह लीजिए- या कम से कम त्रिआयामी जीव है। ये तीन केन्द्र है- शारीरिक स्नायविक भाव, वेगात्मक और बौद्धिक। तो अनिवार्यतः हमारा व्यक्तित्व उसी अनुपात में सुगठित सामंजस्यपूर्ण और आत्म-प्रतिष्ठित कहलायेगा जिसके अनुपात में ये तीनों केंद्र पूरे आपसी ताल-मेल के साथ हमारे भीतर सक्रिय होंगे, यानी परस्पर सहयोगी और ऐक्योन्मुख होंगे। मगर हमारे वास्तविक रोजमर्रा के जीवन में वस्तुस्थिति ठीक इसके विपरीत है। तीनों केंद्रो के बीच आपस में कोई ताल-मेल नहीं बन पाता। कुल मिलाकर- कामायनी के कथ्यानुसार वस्तुस्थिति यही, कि-
ज्ञान दूर कुछ, त्रि*या भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की? एक-दूसरे से न मिल सके, यह विडम्बना है जीवन की।
परन्तु यदि यह विडम्बना है, तो उसका कोई उपचार भी तो होना चाहिये। क्या होगा वह उपचार? क्या हम मानव-जीव केवल भोक्ता ही हैं, और हमेशा भोक्ता ही बने रहेंगे? या कि कभी अपने भोक्तापन के साक्षी भी बनेंगे? यूँ थोडा-बहुत साक्षी तो हम होते ही हैं अपने कर्मों के, अपने भोग के। नहीं होते तो वह विडम्बना, जो हमारे साथ घटती है, उसे भी कैसे पहचान या देख पाते? मगर देख पाते हैं, इसीलिए तो उसके इलाज के लिए जो कुछ करणीय है, वह हमें करना चाहिए। पहले तो फिलहाल तो हमें लगातार उसे ‘देखना’ है- सतत आत्मनिरीक्षण का अभ्यास डालना है। भोक्ता की बजाय इस साक्षी का ही क्षेत्रफल बढाना है। मशीनी प्रतिक्रया के दुश्चक्र को तोडना है। उस कर्म-श्ाृंखला को तोडना है जिससे हम जाने-अनजाने निरीह ढंग से बँधे हुए हैं। उस तात्कालिक प्रतिक्रिया को तुरन्त देखकर उसे जहाँ का तहाँ स्थगित करके ही हम अपनी अभ्यासजनित जडता पर नियंत्रण कर सकते हैं। इसी तरह अपने इस साक्षी-भाव को विकसित करते हुए ही आप अपने बौद्धिक केन्द्र को, और भाविक-प्राणिक केन्द्रों को भी अधिकाधिक चैतन्य-स्फूर्त होते हुए पाएंगे। पहली बार ये तीनों केन्द्र सचमुच एक-दूसरे से जुडेंगे। इसी आत्मनिरीक्षण, इसी साक्षी चेतना की सक्रियता के फलस्वरूप आप धीरे-धीरे अपने उस केंद्रीय ‘मैं’ की ओर अग्रसर होते जाएँगे। आपकी बोध-शक्ति, इच्छा-शक्ति, क्रिया-शक्ति तीनों जागकर एकाग्र समन्वित ढंग से काम करने लगेंगी। ऊर्जा का अपव्यय रुक जाएगा, तीनों केंद्रों की एकाग्र ऊर्जा तब फिर आगे जाकर उन उच्चस्तर स्रोतों से जुडेगी जो आपकी उच्चतर भाविक और बौद्धिक ऊर्जा के स्रोत हैं और आफ मस्तक में, या उसके ठीक ऊपर अवस्थित हैं। अब यूँ तो ये उच्चतर केंद्र भी आफ अनजाने सदा सत्रि*य रहते हैं किन्तु उनसे आपका कोई तगडा सम्बन्ध यानी जुडाव ही नहीं बन पाता। दरअस्ल वह ध्यानलभ्य वस्तु है, साक्षात् अनुभव की। उससे सम्फ होते ही आपको अनुभव होगा कि कोई ऊर्जा तरंगें उच्चतर केंद्रों से उतरकर आफ भीतर प्रवेश किया चाहती हैं, कर रही हैं। आप तो बस पूर्णतः बिछ जाईये, समर्पित हो जाइए उनके प्रति। क्या पता जिसका उल्लेख गीता करती है- ‘सुखेन ब्रह्म संस्पर्शमत्यन्त सुखमश्ा*ुते’ वह- या कम से उसका कुछ पूर्वाभास सा आपको होने लगे।
मित्रो! अब तक आप उकता चुके होंगे कि यह क्या बकवास हो रही है? सोचते होंगे ही काहे को उठाएँ यह जहमत? क्यों अपनी बँधी-बँधाई दिनचर्या में विक्षेप आमंत्रित करें। ......पर उपदेश कुशल बहुतेरे ।..... कौन कहता है कि हम एक मशीनी रूटीन के बन्दी हैं? आप आज भी हमें पता है वही रूटीन निभा रहे हैं। तब फिर काहे को यह साक्षी-भाव और आत्मनिरीक्षण की अलामात हम पर थोप रहे हैं? हमारे हर ‘एक्शन’ को आप ‘रिएक्शन’ करार दे रहे हैं। यानी हमें ‘रिएक्शनरी’ बता रहे हैं। आप होंगे रिएक्शनरी। हम तो पूरे होशोहवास में अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए जैसा जो भी थोडा-सा लुत्फ *ान्दगी की न्यामतों का उठाने का हक मिला है हमको, वह उठा रहे हैं। अब आप हमसे कह रहे हैं - ‘ठहरो अपनी इन सहज स्वाभाविक हरकतों को जहाँ का तहाँ ठप्प कर दो। तुम नहीं हो ये सब। बिल्कुल नहीं हो। तुम तो सिर्फ देखो, देखते रहो उन्हें साक्षी की तरह- बिना उसमें दिलचस्पी लिए।’ अरे, वैसे ही क्या कोई कम मुसीबतें हैं रोजमर्रा की हमारी *ान्दगी में, जो हम यह एक नई मुसीबत मोल लें? अनवरत आत्म-निरीक्षण की। आप फरमाते हैं कि आधुनिक युग के एकतर्फा बौद्धिक विकास ने आदमी की त्रिआयामी समग्रता को कुंठित कर दिया है। मगर आप यह क्यों नहीं देखते कि इसी विकास ने कैसे अभूतपूर्व अवसर जुटा दिये हैं जो हम सबकी पहुँच के भीतर हैं, सिर्फ मुट्ठी भर संपन्नों के लिए नहीं। तो ऐसे में प्रत्यक्ष लाभ को छोडकर सुनी-सुनाई परोक्ष बातों के पीछे अपनी जान हलकान करना - यह तो कोई समझदारी नहीं। क्यों उठाएँ हम यह जहमत और जोखिम, जिसके नतीजों के बारें में हम कुछ नहीं जानते?
अब, इस क्यों? का उत्तर तो हम आपको दे नहीं सकते। वह तो उस रास्ते पर- यानी जगत्साक्षिणी चेतना के रास्ते पर चलकर ही हासिल हो सकता है। मह*ा एक भोक्ता - उपभोक्ता के तर्क-वितर्क से नहीं। यदि यह सब आपकी दृष्टि में अनर्थ है तो बताइये ना, कि फिर अर्थ कहाँ है? क्या बिना अर्थ की खोज किये, यंत्रवत् एक रूटीन जीवन जीतेचले जाना आपको अपनी मानवीय गरिमा के अनुरूप लगता है? ‘जीवन’ सहस्रमुख भय और शोक है’ ऐसा आपका ‘महाभारत’ कहता है और सिर्फ कहता ही नहीं, यथावत् आपको दिखा भी देता है उसे। मगर वहीं या अन्यत्र यह उसका विरोधी अनुभव भी तो उचारा गया है कि ‘जीवन अलभ्य वरदान है, अखण्ड सौभाग्य है।’ क्या ये दोनों बातें अनुभवप्रसूत और अपनी जगह सच नहीं हैं? हमने अद्वैत वेदान्त के उल्लेख से इस बातचीत की शुरुआत की थी ना? तो सुनिए, उसका सर्वोच्च दार्शनिक शंकराचार्य क्या कह रहा है - मनीषापंचकम् में-
‘शश्वन्नश्वरमेव विश्वमखिलं निश्चित्य वाचा गुरोः
नित्यं ब्रह्म निरन्तरं विमृशता निर्व्याजशांतात्मना
भूतं भावि च दुष्कृतं प्रदहता संविन्मये पावके
प्रारब्धाय समर्पितं स्ववपुः नूनं मनीषा मम।’
अर्थात् चेतना रूपी अग्नि में निरन्तर अपने अतीत और भविष्य की बन्धनकारी कर्मश्ाृंखला की आहुति देते रहना, निर्भ्रान्त शान्तिपूर्वक इस नश्वर जगत् के सारे प्रलोभनों की असलियत जानते-समझते हुए नित्यब्रह्म के विमर्श में लगे रहना..., जो नियत है, उसका अकुण्ठ स्वीकार करना... क्या यह निरा भाग्यवाद है? याकि बौद्धिक-भाविक परिपक्वता?..... अलावे इसके, क्या यह मात्र एक आदमी के व्यक्तिगत छुटकारे की बात है? याकि जीवन का उसकी समग्रता में यथातथ्य स्वीकार तथा ऋण-शोध? जीवन का ही नहीं, जीवन के स्रोत और चरम लक्ष्य स्वरूप उस नित्य सत्ता का भी ऋण शोध? जीवन आखिर सिरजा ही इसीलिए तो गया है ः इसी मुक्ति चेष्टा के ‘ऐडवेंचर’ के लिए। सवाल सिर्फ हमारे व्यक्तिगत या सामाजिक ‘स्व’ का नहीं है सवाल हमारे ‘होने’ के- यानी मनुष्य-भाव के-संपूर्ण यथार्थ का है। मात्र एकांगी तार्किक विचारणा का, या देहात्मबुद्धि जगत् भाव का, यानी आइडेंटिफिकेशन में ही लिथडे रहने का नहीं । सवाल ‘मैं हूँ’ - इसलिए ‘मैं सोचता भी हूँ’ का है, न कि बकौल देकार्त, ‘मैं सोचता हूँ इसीलिए ‘मैं हूँ’ का। असली चुनौती तो यही है- शरीर में घर बनाकर डटी हुई आदतों की गुलामी की- जिससे रिहाई तब तक नामुमकिन है, जब तक हम उसके बरक्स एक उच्चतर ऊर्जा के आवाहन और अवतरण की प्रत्रि*या से नहीं जुडते। हम बडी आसानी से देवासुर-संग्राम और अमृत-मंथन की कथाओं को पौराणिक गल्प मान के छुटी पा जाते हैं परन्तु क्या हम सचमुच जानते हैं, जीते हैं उसके जीवन्त मर्म को? वह मर्म, जिसे गुर्जिएफ जैसे पुरुषार्थी चेतना के धनी लोगों ने हमें सीधे दो-टूक आज की भाषा में बताने और पहचनवाने की तपस्या की थी। गुर्जिएफ ही क्यों, श्री अरविन्द ने भी- अपने ढंग से। गुर्जिएफ जिसे चेतना मार्ग कहता है उसी को तो हमारे यहाँ जैसा हम ऊपर पहले ही कह चुके हैं- गुर्जियफ के ही समकालीन श्री अरविन्द ने दि ऐडवेंचर आफ कांशसनेस कहा है। श्री अरविन्द भी तो गुर्जिएफ की तरह समग्र मानव जीवन के आमूलचूल रूपांतरण पर जोर देते हैं। पर वह बिना उच्चतर ऊर्जा की सहायता के संभव नहीं। जिसे इसी बीसवीं सदी में काशी के विशुद्धानन्द परमहंस महाशक्ति और मा कहते थे- उसी को हमारे असली मैं यानी आत्मा का स*ोत बताते हुए। बिना मा के जीवन्त स्पर्श के तुम इस साधना पथ पर एक पग भी आगे नहीं बढा सकते। -वे कहते हैं। पर यह भाषा उनकी हम बुद्धिजीवियों को कैसे पकडेगी बिना उस स्पर्श की साक्षात् अनुभूति के? तो, लीजिये गुर्जिएफ की पट्टशिष्या मदाम सॉल्जमन की भाषा में सुन लीजिए उसी बात को, मदाम कहती हैं-Without relationship whit the Higher Energy, life has no meaning. Higher energy is your permanent self; but you have no connection with that.
क्यों? आखिर क्यों हैं हम इतने अनेकाग्र-बिखरे हुए? इसीलिए ना, कि हम अपने स्वरूप में कायम रह ही नहीं पाते। स्वरूप-विस्मृति में ही जीते हैं हम। पातंजलयग में उल्लिखित ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम’ हमारे लिए महज एक किताबी सूत्र भर रहा आता है। ऐसे में सचमुच टिकाऊ और कारगार पावन दिव्यता की मूल चेतना कहाँ से और कैसे संभव हो? गुर्जिएफ जो उपाय सुझाता है, वह उसीके शब्दों में यह है कि रिमेम्बर योरसेल्फ ऑलवे*ा ऐंड ऐवरीव्हैर। याद कीजिए, अपनी गीता भी तो ठीक यही न कहती है! तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च का भला और क्या अर्थ है? इसी जगह हमें श्री अनिर्वाण द्वारा रेखांकित ध्यानलभ्य सेंसेशन को हृदयंगम करना होगा। जो स्वतंत्र रूप से मदाम सॉल्जमन के शब्दों में इस तरह अभिव्यक्त हुई है- सुन लीजिए। बहुत मुद्दे की बात है यह। मदाम कहती हैं-
इट इज नैसेसरी टु मेंटेन अ कांटेक्ट बिटवीन दि माइण्ड ऐंड दि बॉडी, दैट इ*ा अ सेंसेशन। दैट परमिट्स ऐन ओपनिंग फॉर द इनर्जी व्हिच कम्स फ्राम दि हैड। व्हाइल वन इज इन रिलेशनशिप विद दैट इनर्जी, देयर इज फ्रिडम। अदरवाइज दयर इज ऑलवे*ा सम फियर।
यह कथन जहाँ हमें गीतोक्त ध्यानयोग के मर्म में सीधे प्रवेश दिलाता है वहीं दूसरी ओर वह मेरे दिमाग में कभी से जमी हुई महात्मा मंगतराम की इस मर्मोक्ति से भी अनायास ही जुड जाता है कि जो लाग साधनविहीन होके सिर्फ किताबें पढ के अभय प्राप्त करना चाहते हैं, वे कायर हैं और अपना अमूल्य समय व्यर्थ ही गँवा दते हैं। जब तक हम अपनी इस स्वरूप-विस्मृति की त्रासदी और विडम्बना को, और अर्जुन जिसे नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा कहता है, उस स्मृति को यथातथ्य हृदयंगम करके जीना नहीं सीखते तब तक हमारे उद्धार की संभावना संदिग्ध ही रही आएगी। गाँधीजी की आश्रम भजनावली की पहली ही प्रार्थना है- प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुट दात्यतत्त्वं। सच्चित्सुखं परमहंस गति तुरीयम्। हमें रटा हुआ है वह कबसे। पर क्या हम उसे वस्तुतः समझते हैं? क्या यह यूँही है कि ओल्ड टेस्टामैंट और न्यू टेस्टामैंट दोनों में परमपिता का सबसे पवित्र नाम आई ऐम ही बताया गया है। अभी हाल 198॰ तक हमारे बीच विद्यमान निसर्गदत्त महाराज का तो मूलमंत्र ही यही था- आई-ऐम। इसका अर्थ यही न हुआ कि आत्म-ज्ञान के बिना सच्चा परमात्म-विज्ञान और धर्म-विज्ञान संभव नहीं। क्या श्री अनिर्वाण और क्या मदाम सॉल्जमन सभी ने जिस एक ही बात को रेखांकित किया है वह यही है कि सत्य के असीम विस्तार को किसी एक रूपाकार में नहीं बाँधा जा सकता। उन्हीं के शब्दों में -दि बिविल्डरिंग ऐरे ऑव गॉड्*ा फिलॉसफीज एंेड माइथोलॉजी*ा इन इंडिया प्वाइण्ट्स टु दिस। यह सर्वसमावेशी अनेकता ही हमारी शक्ति है, जो समूचे विश्व में भारतीय सभ्यता को अप्रतिम बनाती है। परन्तु इस शक्ति का स्रोत क्या है? निश्चय ही अद्वैत का तात्त्विक और यौगिक साक्षात्कार ही ऐसी चकरा देने वाली अनेकता और विविधता को धारण कर सकता है। परन्तु हमें अपने पुरखों की उस दूसरी स्पिरिच्यअल कॉमनसेंस को भी सदैव ध्यान में रखना होगा, कि......धर्मो रक्षति रक्षितः। इसमें भारी सन्देह है कि हमारे अधिकांश बुद्धिजीवी इस दोहरी सच्चाई को सचमुच स्वायत्त कर पाते हैं, कि धर्म भी उसी की रक्षा करता है जो स्वयं धर्म की रक्षा करने में समर्थ है। हमारा निकट इतिहास ही साक्षी है कि कितना अनर्थ उपजाया है तमाम साम्राज्यवादी धर्म संस्थाओं ने, और खुद हमारे परोपजीवी, औपनिवेशिक जेहनियत के मारे हुए बुद्धिजीवियों ने हमारी इस सबसे गहरी सांस्कृतिक मूल्य-दृष्टि और धर्मदृष्टि का, जो हमें अभीप्सित पावनता के पुनर्वास, की भी एकमात्र आशा है। उक्त अनर्थ से खुद उबरना और दूसरों को भी उबारना ही हमारे सामने वह सबसे बडी चुनौती है, जिसे स्वीकार किये बिना हम स्वयं अपने समाज और देश-काल के लिए अनिवार्य मूल्य-चेतना और विश्व-दृष्टि का पुनराविष्कार और जतन नहीं कर सकते ।
मित्रो! स एकाकी ने रमते।.....एकोऽहं बहुस्याम् ..नारायण को भी नर की- नर के सहयोग की अपेक्षा है - नर जिसकी अनझिप आँखों में, नारायण की व्यथा भरी हैं। नर को नारायण की जितनी जरूरत है, उससे कम जरूरत नारायण को भी नर की नहीं है। इस आधुनिक युग ने मनुष्य के लिए एक ओर यदि अमूतपूर्व सुविधाएँ जुटाई हैं तो दूसरी ओर अभूतपूर्व खतरे और विपदाएँ भी तो उसके साथ ही साथ उपजा दी हैं। *ााहिर है कि तब ऐसी विकट परिस्थिति में मनुष्य को अभय-साधना भी एकदम नये ढंग की चाहिए इस अभूतपूर्व संकट का सामना करने और उससे उबर पाने के लिए। आत्म-विज्ञान और परमात्म -विज्ञान की ब्रैंड-न्यू समझ।
वह समझ क्या होगी? क्या हो सकती है- इसी प्रश्न-कुलता का सामना और सत्कार करना मेरे इस व्याख्यान की प्रेरणा और विषय-वस्तु है। प्रसंगवश नितान्त अपूर्वानुमेय ढंग से मुझे यहाँ जे.कृष्णमूर्ति का स्मरण हो आया है। इससे ज्यादा उपयुक्त समापन मेरे इस व्याख्यान का और कला क्या हो सकता है? एक जगह कृष्णमूर्ति कहते है-
परम्परा से आपको हजारों उत्तेजनाएँ और दमन चेष्टाएँ वसीयत में मिली हैं। उनका सामना करिये। उनको देखिये-समझिये। तभी उनसे पार पा सकेंगे। यह अन्तहीन पुनरावृत्ति उन प्रतित्रि*याओं की और उन पर काबू पाने की आपकी उतनी ही यांत्रिक चेष्टाएँ, सब निरर्थक हैं चेतना और साक्षी चेतना ही जीवन के असली परमार्थ और उद्देश्य है। वही जीवन की अनन्त समृद्धि और संभावनाओं को चरितार्थ कर सकती है।
इसमें इतना ही और जोडा जा सकता है ः ‘जीवन की अनंत संभावनाओं के साथ ही- उनकी चरितार्थता की पूर्वप्रतिज्ञा सदृश ‘पावनता के पुनर्वास’ को भी। धन्यवाद। इतने धीरज के साथ आपने मुझे सुना इस कृपा के लिए तुमुल कोलाहल-कलह में/मैं हृदय की बात रे मन...। जय।
यह लेख १४ नवम्बर, २०१८ को इन्स्टीट्यूट ऑफ एडवांश स्टडी, शिमला के प्रतिष्ठित रवीन्द्रनाथ टैगोर स्मृति व्याख्यानमाला की पाँचवीं कडी का अविकल अंश है।