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रघुवीर सहाय : आज

प्रयाग शुक्ल
रघुवीर सहाय उन कवियों में से हैं जिनकी कविता और जिन के विचार, हर काल के लिए प्रासंगिक बने रहते हैं। निश्चय ही वह आज के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। उनके यहाँ निजी और सार्वजनिक, सामाजिक और राजनीतिक, एक-दूसरे से बहुत दूर के नहीं हैं और जिनकी भाषा भी किसी काल की सीमा में घिरी हुई नहीं लगती है। लगता तो यही है कि सुभद्राकुमारी चौहान की तरह रघुवीर सहाय की कविता भी ऐसी है, जो हिन्दी की दुनिया में जब भी सामने आएगी, ताजा लगेगी। डेटेड नहीं। वह अपने को और अन्यों को एक साथ संबोधित है। संबोधन का यह गुण, आज के पाठकों को तो अपना लगता ही है, भविष्य के पाठकों को भी अपना ही लगेगा- यही मानने का मन करता है। उनका कवि-मन हमेशा अपने को वृहत्तर समाज के बीच रखकर देखता-सोचता है और एकांत को भी वह इसलिए जरूरी मानता है कि उसके छिनने से, मानो आजादी भी छिन जाती है। विषयवस्तु(ओं) के मामले में भी, जितने प्रश्ा* और मामले इस समय उपस्थित हैं, वे सब उनकी कविता में हैं। राज्य सत्ता, जिस तरह नागरिकों पर कई तरह के और गैर जरूरी अंकुश लगाने के लिए तैयार रहती है, और जिस तरह प्रायः वह अपनी आलोचना *ारा सा भी बरदाश्त नहीं कर पाती, उन सबको वह बहुत अच्छी तरह पहचानते, और व्यक्त करते रहे हैं। उनकी कविता रामदास हो या हँसो-हँसो जल्दी हँसो हो या आनेवाला खतरा या आने वाला कल हो- उनमें आज, विगत-आगत-वर्तमान एक साथ झलक उठते हैं। आने वाला कल की दो पंक्तियाँ उनकी दृष्टि और भविष्य-दृष्टि का कितनी बखूबी के साथ बयान करती हैं -
‘ हर थका चेहरा तुम गौर से देखना
उसको वह छिपा कहीं होगा गया कल
और आने वाला कल भी कहीं कहीं होगा’
रघुवीरजी की कविता की बडी विशेषता वही है जो हमारे संत कवियों से लगाकर आधुनिक काल के सुभद्राजी और भवानीप्रसाद मिश्र, निराला, नागार्जुन और त्रिलोचन की रही है- किसी अनुभव का इतना पका हुआ बखान या बयान कि वह अपनी सीधी-साधी कहन शैली में बडी गहराई में मर्म को स्पर्श करे, और जब भी उसको पढा-बोला-सुना- सुनाया-गाया-बजाया जाये, उसकी कई और अर्थ छटाएँ झलक उठें। उनकी कविताएँ कंठ में बस जाने वाली हैं, और आज भी हिन्दी कविता के पाठक को वह सहज ही याद आ जाती है। पानी कविता को ही लीजिए जिसकी पंक्तियाँ किसी भी जल-संकट का ध्यान आते ही भीतर गूँजने लगती हैं-
बच्चा बच्चा हिन्दुस्तानी
मांग रहा है पानी पानी
हमको पानी नहीं दिया
तो हमको मानी नहीं दिया...
वह बहुत कम शब्दों में, जिस अनुभव को, या उसके कई स्तरों को रखते हैं, वह सब एक ‘मूर्तिशिल्प’ हो उठता है ः तराशा हुआ, प्रेम से रखा हुआ अपने को मूर्त करता, पर यह भी बताता हुआ कि उसे देखना, एक बार में समाप्त हो जाने वाला नहीं है, उसकी ओर बार-बार लौटा जा सकेगा।
यह आश्वासन भी है, और उनकी कविता की आकांक्षा भी है कि वह साथ रहे अपने पढने वालों के, आज भी कल भी।
रघुवीर जी के साथ बहुत रहा हूँ। उनके साथ काम किया है, दिनमान में कई बरस। थोडे समय के लिए नवभारत टाइम्स में भी। उनके साथ के कई लेखकों, कलाकारों से मिला हूँ। बातें की हैं। सहमत-असहमत हुआ हूँ। उनका बहुतेरा गद्य भी पढा है। रोज-रोज उन्हें देखा है। कुछेक बार उनके साथ कोई फिल्म देखी है। प्रदर्शनी या नाटक देखने गया हूँ और हर बार यह पाया है कि वे उसकी परख अपनी तरह से कर रहे हैं। उस पर चर्चा कर रहे हैं और चर्चा में उसके मूल मर्म, कथन आदि की शिनाख्त करना-करवाना चाह रहे हैं। किसी विवरण, किसी डिटेल, किसी इमेज पर उनकी जो न*ार गयी है, उसे लेकर भी उत्साहित हो रहे हैं, मानो उन्हें कोई कुंजी मिल गयी है, उस कृति के रहस्यों में पहुँचने की। हाँ, उनकी कविताएँ भले ही कितनी सीधी और बूझ ली गयी लगें, पर रघुवीर जी का आग्रह ची*ाों के बहुस्तरीय अर्थों का ही रहा है। और सूक्ष्मताओं को, आवरण के भीतर की ची*ाों को, उन्होंने समझने-बूझने के स्तर पर *ारूरी माना है। कृति की अपनी एक दुनिया होती है, और सरल अर्थों वाली लगकर भी उसकी सरलता को ग्रहण कर ही छुट्टी ना पा ली जाए, ऐसा मानते हुए वे दिखाई पडते थे।
आज सोचता हूँ तो लगता है रघुवीर जी का अन्याय के प्रति, विषमताओं के प्रति, राजनीतिक आचरण की क्षुद्रताओं के प्रति जो करुणा मिश्रित क्रोध या वही उनकी कविताओं की भी पूंजी और कुंजी है। क्रोध में अगर मानवीय करुणा न मिली हुई हो, मानवीय न्याय-बोध, और मूल्यबोध न मिला हो, तो उसकी परिणति कुछ देर बाद फुस्स हो जाती है- उनकी रचनाएँ भी यही कहती हैं।
भारतीय समाज (या समाजों) में स्त्री की दुनिया के प्रति आमतौर पर जो दकियानूसी रही है, उसके शोषण के जो जाने-अनजाने रूप रहे हैं उसका प्रत्याख्यान अपनी कविताओं, कहानियों, निबंधों में उन्होंने हमेशा संवेदना के एक ऊँचे, गहरे धरातल पर किया है।
गद्य कविता के लिए कितना जरूरी है, और गद्य के लिए कविता, यह वे कभी भूलते नहीं हैं; और आज उनकी इस दृष्टि की प्रासंगिकता को हम तब और अधिक समझ पाते हैं, जब यह देखते हैं कि चाहे सोशल मीडिया हो या प्रिन्ट मीडिया या इलेक्ट्रानिक मीडिया, वहाँ यह दृष्टि प्रायः गायब है, इसलिए एक सनसनी, उत्तेजना और बौखलाहट का वातावरण तो बहुत बनाया जाता है, पर गद्य मिश्रित कविता या कविता मिश्रित गद्य वाले तत्त्व जो एक दूरगामी, अधिक टिकाऊ समझ विकसित कर पाते हैं, यथार्थ की, उसका अभाव हो रहा है।
इस अर्थ में भी रघुवीर जी की ओर देखना, आज बहुत *ारूरी हो गया है। उनकी गजब की ‘धीरता’ की सराहना भी मैंने हमेशा की है। वे सुंदर को सराहने और उसी को ‘उगाने’ की चेष्टा करने वाले लेखक-कवि (रहे) हैं। निजी जीवन म भी उनको हमेशा अंदर की, रचनात्मक की, तलाश करते हुए ही देखा है। गाँधी, जयप्रकाश, लोहिया की ओर उन्होंने देखा है। जयप्रकाश और लोहिया का संग-साथ उन्हें मिला था। वैचारिकी दूसरों की और अपनी भी, हमेशा उनके साथ रही, पर रचना तो रचना है, वह अधिक खुला और विस्तृत आकाश चाहती है- यथार्थ को भेदने, उसे पाने, उसका संधान करने के लिए; वह अपनी तरफ से ही आगे बढती है। उसका भरोसा और विश्वास उन्हें था- तभी उनकी डर कविता, जिसमें हमारे समाज में, अंग्रेजी की स्थिति को लेकर एक मार्मिक टिप्पणी है (बिना अंग्रेजी भाषा मात्र का विरोध किये), वह टिप्पणी आज और भी अधिक प्रासंगिक हो उठी है। ऐसी ही उनकी अन्य कई रचनाएँ हैं- गद्य-पद्य, दोनों में, जिन्हें पढते हुए लगता है कि कितना अच्छा है कि रघुवीरजी हमारे साथ हैं।
जिनका इस बात में कुछ भरोसा है कि कविताएँ एक संबल हुआ करती हैं, एक नैतिक बल, हर काल में ची*ाों को समझने-बूझने-परखने का; वे पाएँगे कि अन्य समर्थ, जीवन-दर्शी, समाज-दर्शी और मनुष्य की हर काल की दशा-दुर्दशा में, उसकी सहयोगिनी बनी रहने वाली कविता की तरह, रघुवीर सहाय की कविता भी आज हमारे साथ खडी है।