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धर्मवीर भारती : साँस की कलम का लेखक

गंगाशरण सिंह
माखनलाल चतुर्वेदी ने धर्मवीर भारती के कहानी संग्रह की भूमिका में लिखा था कि भारती घास की कलम से नहीं, साँस की कलम से लिखते हैं।
जब आप धर्मवीर भारती के समग्र लेखन पर न*ार डालते हैं, तो उनके लिए कही गई माखन दादा की ये पंक्तियाँ पूर्णतया प्रासंगिक लगने लगती हैं। धर्मवीर भारती की बहुआयामी रचनात्मकता के इतने छोर हैं कि यदि उनके समग्र लेखन का अवलोकन करने बैठें। तो सहसा विश्वास ही नहीं होता कि किसी एक व्यक्ति के लिये अपने जीवनकाल में इतना सब कर पाना कैसे सम्भव हो सकता है। वह भी तब जबकि उसके जीवन के अधिकांश सत्रि*य वर्ष एक पत्रिका के सम्पादन की भेंट चढ गए हों! धर्मवीर भारती का उदात्त रचनाकर्म उन्हें काल और विधा की सीमाओं से ऊपर एक ऐसे मकाम पर ले जाता है जहाँ पहुँचने का स्वप्न हर रचनाकार देखता है।
गुनाहों का देवता भारती जी की सबसे चर्चित रचना है। यह उपन्यास जितना सकारात्मक कारणों से चर्चित रहा उतना ही विवादों के कारण। कुछ विद्वानों द्वारा सिरे से खारि*ा किये जाने के बावजूद अब तक हुए सौ से अधिक संस्करण इस उपन्यास की सार्वकालिक लोकप्रियता की कहानी खुद कहते हैं और कुछेक नकारात्मक प्रतिक्रियाओं के बावजूद यह किताब आज भी सबसे *यादा बिकने वाली चार शीर्ष किताबों में शामिल है। प्रौढावस्था की दहलीज पर खडे तमाम पाठक स्वीकार करते हैं कि उनके किशोरावस्था के दिनों में ये किताब सदैव सिरहाने रहा करती थी। रही बात भारती की, तो अपने इस पहले उपन्यास की कमजोरियों और अपरिपक्वता को वे पुस्तक के आरम्भ में स्वयं स्वीकार करते हैं।
भारती के इस उपन्यास के ठीक विपरीत धरातल पर खडा है उनका दूसरा और अंतिम उपन्यास-सूरज का सातवाँ घोडा। हिन्दी साहित्य में प्रयोगात्मक स्तर पर जो उपन्यास लिखे गए हैं उनमें सबसे पहले सूरज का सातवाँ घोडा की चर्चा होती है क्योंकि भारती ने इस उपन्यास के कहन हेतु सर्वथा नए किस्म की भावभूमि और अनूठे शिल्प का सृजन किया था।

छठे दशक में धर्मयुग के सम्पादक का निमंत्रण आने तक उनके खाते में कई कहानी संग्रह, काव्य नाटक अंधा युग और खण्डकाव्य कनुप्रिया सहित कई चर्चित कविता संग्रह उनके खाते में दर्ज हो चुके थे। महाभारत के अन्तिम दिन की घटनाओं पर आधारित अंधायुग को यदि हम गहन वैचारिकता और मानवीय मूल्यों की दृष्टि से देखें तो संभवतः यह उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना है। सामान्य पाठकों के साथ ही साहित्य जगत् के तमाम आलोचकों और विद्वानों ने इसे सराहा है।
अंधायुग लिखने के बाद भी कहीं न कहीं उनके *ोह्न में एक असंतोष बना रहा कि शायद कुछ उनसे छूट गया है और कनुप्रिया के अंतिम अंशों में इस अधूरेपन का अंत करने के साथ ही वे संतुष्ट हो पाए थे।
धर्मवीर भारती की कुछ रचनाएँ पाठकों में इतनी प्रसिद्ध हुईं कि *यादातर समय उन्हीं पर चर्चाएँ होती रहीं और उनकी अनेक श्रेष्ठ रचनाओं पर सम्यक परिचर्चा और संवाद न हो सका। उदाहरण स्वरूप सबसे पहले उनकी कहानियाँ याद आती हैं। गुल की बन्नो का शुमार निस्संदेह हिन्दी की श्रेष्ठतम कहानियों में होता रहा है और लगभग हर प्रतिनिधि कहानी संग्रह में ये शामिल होती रहीं किन्तु बंद गली का आखिरी जैसी कई कहानियाँ उनके विशिष्ट प्रशंसकों और पाठकों तक ही सीमित रह गईं। साथ ही आरम्भिक कहानी संग्रह भी बरसों अनुपलब्ध रहे। भारती की मृत्यु के बाद उनकी सहधर्मिणी पुष्पा भारती ने उनकी समस्त कहानियों को एकत्र कर उनकी सम्पूर्ण कहानियों का एक संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कराया।
196॰ में भारती टाइम्स समूह के आमंत्रण को स्वीकार कर मुम्बई आये और यहीं से धर्मयुग के सम्पादक के रूप में एक नई और युगांतरकारी भूमिका का सूत्रपात हुआ। उनके कुशल नेतृत्व में धर्मयुग ने सर्वथा नई ऊँचाइयों को छुआ और फिर एक समय ऐसा भी आया जब इस पत्रिका की बिक्री ने लाखों प्रतियों की संख्या पार कर ली। सत्तर और अस्सी के दशक के अनेक महत्त्वपूर्ण लेखकों, कवियों और शायरों को उनके आरंभिक दिनों में भारती का स्नेह और प्रोत्साहन मिला। धर्मयुग की गुणवत्ता और पूरे देश में उसकी पहुँच का ये आलम था कि इस पत्रिका में छपते ही कोई भी नवोदित रचनाकार रातोंरात एक चर्चित नाम बन जाया करता था।
आज हमारे समय के कई प्रतिष्ठित लेखक धर्मयुग में प्रकाशित अपनी रचनाओं के कारण ही जाने गए। भारती टाइम्स समूह से लम्बे अरसे तक जुडे रहे। इन दिनों नवनीत पत्रिका के यशस्वी एक सम्पादक के रूप में कार्यरत विश्वनाथ सचदेव ने एक वार्तालाप में एक आवश्यक संयोग की तरफ ध्यान दिलाया कि धर्मवीर भारती के समय धर्मयुग में अपने पत्रकारिता कॅरियर की शुरुआत करने वाले ज्यादातर पत्रकार आगे जाकर बडे सम्पादक बने। इस पत्रिका ने उनके संपादकत्व में ऐसे कई कीर्त्तिमान बनाये हैं जिनके आसपास क्या, बहुत दूर-दूर तक कभी कोई अन्य पत्रिका न पहुँच सकी। उस समय के पाठक बताते हैं कि पत्रिका का कोई भी नया अंक ज्यों ही घर पहुँचता था, सारे सदस्यों में छीना झपटी मच जाती थी। इन संस्मरणों के आधार पर जब पाठकों से कुछ प्रश्न किये गए तो लोगों ने बताया कि धर्मयुग मात्र साहित्यिक पत्रिका नहीं थी। उसमें फिल्म और क्रिकेट जैसे लोकप्रिय विषयों पर भी चुनिन्दा सामग्री होती थी और यही कारण था कि हर आयुवर्ग के पाठक उसके दीवाने थे।
तनावपूर्ण और कठिन *ाम्मेदारियों वाली इस भूमिका के चलतेभारती के लेखन पर असर पडना ही था। उनके सक्रिय जीवन की लगभग एक चौथाई सदी ऐसी गु*ारी जब किसी कविता संग्रह, नाटक या उपन्यास का सृजन उनकी कलम से न हो सका। हालाँकि यह मान लेना भी नितान्त अनुचित है कि इन वर्षों में भारती की लेखनी पूरी तरह थम गई थी। इस अवधि में उन्होंने देश विदेश की जितनी महत्त्वपूर्ण यात्राएँ की, उन यात्राओं के संस्मरण का एक बेहतरीन संग्रह वाणी प्रकाशन से यात्रा चक्र नाम से प्रकाशित हुआ। साहित्य, कला और संस्कृति को समर्पित विभिन्न हस्ताक्षरों पर केन्द्रित कुछ चेहरे कुछ चिन्तन पढकर उनके प्रौढ, परिपक्व और सरस लेखन का सहज अनुभव किया जा सकता है। उन दिनों धर्मयुग में उनका एक नियमित स्तम्भ होता था- शब्दिता। पत्रिका के पुराने पाठक आज भी बताते हैं कि अंक हाथ में आते ही सबसे पहले वे भारती का यह स्तम्भ पढते थे और फिर कहानियों या धारावाहिक उपन्यासों का रुख करते थे। देश, विदेश की किसी भी विशिष्ट किताब, शहर या लेखक पर केन्द्रित उनके इन आलेखों को पढकर कई पीढियाँ समृद्ध हुई हैं। इन समस्त आलेखों का संग्रह कालांतर में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित शब्दिता में हुआ।
धर्मवीर भारती की संगिनी पुष्पा भारती उन्हें याद करते हुए बडे अनुराग से बताती हैं कि ‘मैं भारती से प्रायः यह शिकायत किया करती थी कि धर्मयुग के रूप में अच्छी सौतन आपने मेरे सिर बाँध दी है जिससे निस्तार नहीं।’ इन चुलबुली स्मृतियों के साथ ही वे पूरी गंभीरता से यह भी बताती हैं कि अनेक सहायक संपादकों और स्वयं पुष्पा जी द्वारा स्वीकृत होने के बाद भी हर कहानी भारती जी की न*ारों से गु*ार कर ही प्रकाशित होती थी। संभवतः उनकी यही *ाद, लगन और प्रतिबद्धता थी, जिसने एक पत्रिका को शिखर पर पहुँचाया। पुष्पा भारती का ये कहना कि धर्मयुग को उनकी तमाम बहुचर्चित रचनाओं के समानांतर रखा जाना चाहिए। सबसे *यादा समय लेने वाला धर्मयुग भी उनकी महत्त्वपूर्ण और कालजयी रचना है’ पूरी तरह अर्थवान प्रतीत होता है।
धर्मयुग के सम्पादन के दौरान बीते पचीस तीस वर्षों के कालखण्ड में भारती का कोई कविता संग्रह भले ही न आया हो किन्तु ऐसा भी नहीं था कि उन्होंने इन बरसों में कविताएँ बिल्कुल नहीं लिखीं। छिटपुट ही सही किन्तु कविताएँ लिखी जाती रहीं और धर्मयुग से सेवानिवृत्त होने के बाद उनकी इन अप्रकाशित कविताओं का एक यादगार संग्रह वाणी प्रकाशन से आया जिसका नाम था सपना अभी भी। स्मृति शेष होने से पूर्व यही उनका अन्तिम प्रकाशित कविता संग्रह रहा जिसे प्रतिष्ठित व्यास सम्मान भी प्राप्त हुआ था।
धर्मवीर भारती स्वयं हिन्दी के रचनाकार थे किंतु अन्य भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य पर भी सदैव न*ार रखते थे। सिद्ध साहित्य पर तो उनके द्वारा किया गया कार्य अपनी प्रामाणिकता की साक्षी स्वयं ही देता है। बांग्ला सहित अन्य भाषाओं की अनेक बेहतरीन रचनाओं के अनुवाद धर्मयुग में लगातार छपते थे। विमल मित्र के कई बाँग्ला उपन्यास धर्मयुग में प्रकाशित होने के कारण हिन्दी पाठकों तक पहुँच सके और धीरे-धीरे हिन्दी के पाठकों ने उन्हें जैसे इसी भाषा का लेखक मान लिया। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय धर्मवीर भारती ने इस देश का दौरा किया और एक प्रभावी रचनाकार की हैसियत से बांग्लादेश के नागरिकों के लिए हरसंभव प्रयास करते रहे। वे न सिर्फ एक बडे लेखक बल्कि एक स्वप्नद्रष्टा एवं सजग, सचेत विचारक भी थे। उनका साहित्यिक और सांस्कृतिक अवदान इतना बडा है कि समकालीन रचनाधर्मिता की हर परिचर्चा उनके बगैर अधूरी रहेगी।