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डेटावाद और हम

ब्रजरतन जोशी
हम डेटा समय के नागरिक हैं। डेटा ही जीवन है। जहाँ देखें वहाँ डेटा की धमक। डेटा हमारे समय की सर्वोच्च माँग है। डेटा मानी ज्ञान का प्राथमिक स्रोत। कोई भी डेटा सूचना से इस रूप में भिन्न है कि उसमें बिखराव, अवर्गीकरण के साथ परिपक्व जानकारी नहीं होती। सूचना ज्ञान का द्वितीय स्तर है, क्योंकि सूचना डेटा के माध्यम से निर्मित होती है और सूचना से ज्ञान की यात्रा आगे बढती है। इसीलिए डेटा के सामने सब गौण है। डेटावादी के लिए हर मनुष्य एक चिप है। हमारे समय का चरम-परम सब कुछ डेटा ही है। क्योंकि ज्ञानद की वर्तमान राजनीति में जो भी तर्क और गणनाएँ हमारे सम्मुख आती है उनका आधार डेटा ही है। इसलिए डेटावादी यह मानते हैं कि यह संसार डेटा के अजस्त्र प्रवाह का ही परिणाम है। इसलिए हर डेटावादी सूचना तंत्र को और अधिक मजबूत बनाने, फैलाने और संगठित करने में लगा। क्योंकि अब उसका लक्ष्य डेटा से महाडेटा की ओर का है।
डेटा शब्द का पहली बार प्रयोग सोलहवीं शताब्दी से मिलता है। डेटा शब्द लेटिन के Datum से बना है जिसका अर्थ है कुछ देना। इस रूप में डेटा तथ्यों और सांख्यिकी के मिश्रण से हमें कुछ विश्लेषण देता है। ज्ञान के वर्तमान परिदृश्य में पहली बार डेटा शब्द का प्रयोग डेविड बु*क्स ने न्यूयार्क टाईम्स में प्रकाशित अपने लेख द फिलॉसफी ऑफ डाटा में प्रयुक्त किया। कालान्तर में विश्व इतिहास के गंभीर अध्ययेता और हमारे समय के लोकप्रिय लेखक युवाल नोवा हरारी ने इसे स्थापित करते हुए इसकी विस्तरित व्याख्या की है। वे इसे उभरते विमर्श और एक नवीन म*ाहब के रूप में व्याख्यायित करते हैं। अपनी चर्चित कृति होमोडेयस में वे कहते हैं कि - डेटावादी के लिए केवल मनुष्य ही नहीं वरन् सृष्टि का हर प्राणी मात्र एलगरिदम है। एलगोरिद्म के मानी एक कलन विधि अर्थात् गणितीय नियमों की प्रणाली। वे कहते हैं कि डेटावाद का जन्म जीव विज्ञान और कम्प्यूटर विज्ञान की छत्रछाया में हुआ है। इसमें भी जीव विज्ञान की भूमिका अहम है।
डेटावाद की मान्यता के उलट हमारी अपनी ज्ञान परम्परा में सूचना का स्थान सबसे निचले पायदान पर है। क्योंकि सर्वप्रथम हम सूचना का संग्रहण करते हैं और सूचना से ज्ञान की ओर बढते हैं। यही ज्ञान आगे जाकर प्रज्ञा में बदलता है। लेकिन आज के समय में सूचनाओं के विस्फोट के चलते हम ज्ञान और प्रज्ञा के साथ तालमेल बैठाने में असमर्थ होते जा रहे हैं। बल्कि ज्ञान और प्रज्ञा तो इस समय संदेह के घेरे में हैं। अब तो महाडेटा की यात्रा पर निकल चुका तकनीकी मानववाद मनुष्य की अनंत क्षमतओं को बौना साबित करने में जुटा है। डेटावाद की मान्यताओं के आलोक में आगे बढे तो पता लगेगा कि सूचना ही जीवन है। सूचना और जीवन का सम्बन्ध नाभिनालबद्ध है। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह अधिकाधिक माध्यमों का उपयोग करे, उनसे जुडाव रखे, और अपलोड, लाईक और साझा करने की अहम प्रविधि को अपनाते हुए डेटा से महाडेटा की यात्रा को गति और बल दे। डेटावादी मानववाद की इस पुरानी मान्यता को नकारते हैं कि हमें भीतर की ओर उन्मुख होना चाहिए। मानववादी ऐसा इसलिए कहता था क्योंकि अनुभव का जन्म हमारे भीतर ही होता है। प्रत्येक अनुभव हमारे भीतर ही जन्मता, पलता और विकसित होता है। इसलिए कहा गया कि हमें भीतर की ओर उन्मुख होना चाहिए।
जब कि डेटावादी का तर्क अनुभव को भीतर महसूस करने की बजाय साझा करने पर बल देता है। इतना ही नहीं, डेटावादी तो इससे भी आगे जाकर यह भी मानता है कि मनुष्य और पशु के अनुभव में कोई श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ नहीं है। फर्क सिर्फ इतना भर है कि पशु डेटा प्रणाली की समृद्धि में कोई भूमिका नहीं निभाते जबकि मनुष्य डेटा की समृद्धि में हस्तक्षेप कर उसे और उन्नत बना सकता है। इसलिए डेटावादी के लिए मनुष्य पशु की तुलना में श्रेष्ठ है और वह मानवीय अनुभव को पवित्र भी नहीं मानता।
ऐसा वह इसलिए भी मानता है कि क्योंकि डेटावादी मान्यता के अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपने आप में एक इंडिविजुअल नहीं वरन् एक एल्गोरिद्म या एल्गोरिदमों का समुच्च्य है। क्योंकि वह एल्गोरिदम से बना है। अतः वह स्वतंत्र नहीं है। यानी मनुष्य का संचालन बाहरी दबावों का परिणाम होगा। यह विचारणीय प्रश्ा* है कि क्या यह डेटावाद हमें हमारे सर्वोच्च लक्ष्य मुक्ति तक ले जा पाने में सक्षम है? क्या यह सचमुच हमारी समस्याओं का अंत करने वाला साबित होगा? या उन्हें और अधिक जटिल बनाने वाला? क्या यह हमारी रूपान्तरणकारी प्रवृत्ति के अनुकूल है या प्रतिकूल? ऐसे अनेक प्रश्ा* हमारे सामने उठते हैं। यहाँ स्पष्ट हो जाना जरूरी है कि डेटा या महाडेटा कई भी हमारी इन्द्रियानुभव की जीवंतता की बराबरी नहीं कर सकता। मनुष्य एक अनुभव, संवेदना सम्पन्न प्राणी है। अनुभव एक व्यक्तिनिष्ठ घटना है। प्रत्येक अनुभव में तीन घटकों का योग होता है, जो क्रमशः इन्द्रियबोध, भावावेग और विचार के रूप में देखे जाने एवं लक्षित किए जाते हैं। संवेदनशीलता से तात्त्पर्य है इन्ही तीनों घटकों पर ध्यान देना और इनसे स्वयं/अन्य को प्रभावित करने की गुंजाईश का होना। यहाँ यह भी ध्यान में रखा जाना प्रासंगिक होगा कि अनुभव एवं संवेदनशीलता एक अंतहीन क्रम में एक-दूसरे को गढते रहते हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी ऐसा उपक्रम जो हमारे आनंद प्राप्ति का साधन/माध्यम बने, उसका अनुभव होना आवश्यक है। संवेदनशीलता से उस अनुभव को हम महसूसते हैं। डेटावादी क्रांति से पूर्ण आनंद के लक्ष्य की प्राप्ति किसी स्तर पर संभव नहीं है। क्योंकि यहाँ इन्द्रियनुभव है ही नहीं। यहाँ तो सब कुछ एल्गोरिद्म है। मनुष्य एक डाटा प्रोसेसिंग प्रणाली का हिस्सा मात्र है।
दूसरे, डेटा के आधार पर बनी तकनीक जहाँ एक हमारे जीवन को सहज और सरल बनाती है, वहीं दूसरी ओर मनुष्य की हस्तक्षेपकारी भूमिका को अति सीमित या लगभग विलोपित ही कर देती है। परिणामस्वरूप जो समाज या व्यवस्था जितनी अधिक डेटा सम्पन्न होगी, वहाँ निरन्तर मानवीय हस्तक्षेप कम होता या लगभग समाप्त हो जाएगा। वर्तमान तकनीकी उपक्रम इसके जीते-जागते प्रमाण हैं। ऐसे में मनुष्यता का एक विशाल हिस्सा श्रम से वंचित हो जाएगा और मनुष्य समाज में रोजगारविहीन विकास की समस्या अपने विकरालतम रूप में हमारे सम्मुख प्रकट होगी।
एक और अहम परेशानी यह होगी कि इस व्यवस्था में प्रकृति के साथ हमारा कोई संवाद और सम्फ नहीं रहेगा। इसलिए पारिस्थितकीय असन्तुलन भी हमारे लिए भयावह साबित होगा।
प्रकृति के प्रांगण में पलते जीवन की विडम्बना यह होगी कि वह अपनी पृथ्वी माँ का होकर भी उसका नहीं हो सकेगा। और रही बात आनंद की तो डेटा संसार तो एक आकर्षक, लुभावनी और अकेलेपन के भयावह नर्क में डालनेवाली आभासी दुनिया है। यहाँ तो सब कुछ आभासी है। क्योंकि इसमें हमारी शारीरिक उपस्थिति नहीं है। केवल भास है, भान नहीं। अतः आनन्द की प्राप्ति तो यहाँ संभव ही नहीं है। इसलिए हम देख रहे हैं कि इस आभासी दुनिया के दुष्प्रभावों से आत्महत्या, मोटापा और तनावपूर्ण जीवन हमारा चिरसंगी होता जा रहा है। पूर्व में हमारी समस्याएँ अकाल, शारीरिक बीमारियाँ और मृत्यु का भय था जो दिन-ब-दिन बढती डेटावादी ताकतों के बल के चलते हमारी सूची से खिसक रही है।
यहाँ इस पर ध्यान दिए जाने की पूरी जरूरत है डेटा की ताकत से उपजी तकनीक दरअस्ल जो सहजता एवं सरलता हमें दे रही है, वह हमारे ऐन्द्रिक बोध में इजाफा भर है। इतना ही नहीं प्रौद्योगिकीय नियतिवाद के चलते प्रकृति के साथ हमारा जो मातृत्व का रिश्ता था, अब वह हिंसा और अन्तहीन शोषण में बदलता जा रहा है, जबकि नवीन अनुसंधानों से यह साबित हो चुका है कि मनुष्य मूलतः एक हिंसक प्राणी नहीं है और न ही वह एक मशीन है। यह डेटावाद मनुष्य को मशीन में रूपान्तरित कर, उसे उसके मूल से च्युत कर रहा है।
इस संदर्भ में हमें ध्यान यह रखना है कि डेटा और तकनीक को हम अपने जीवन में वहीं तक रखें, जहाँ तक वे हमारे जीवन का पोषण करते हुए उसे सरल एवं सहज बनाए रखे। जब वे हमारे जीवन को विघटित करने लगे, तो उस स्थिति में वह हमें स्वीकार्य नहीं है। और फिर प्रकृति के साथ तो जीवन का रिश्ता ही नहीं रहेगा, ऐसे में क्या यह जीवन में पल रहे जीवन को नष्ट करना नहीं होगा?
क्योंकि मनुष्य एक चेतन प्राणी है और अस्तित्व के विभिन्न आयामों के साथ वह अपनी ऊर्जा के बल पर संवाद करने में सक्षम हैं। अतः वह जीवन विकास की प्रक्रिया में हस्तक्षेप भी कर सकता है। ऐसे में हम डेटावाद को उस हद तक स्वीकार करेंगे जहाँ तक वह हमारे संवेदनात्मक विकास के जरीये अस्तित्व के साथ संवाद की प्रक्रिया को और ज्यादा सजग और गंभीर बनाए रखने में सहायक बने, लेकिन साथ ही हमें इसकी खामियों को भी ध्यान में रखना होगा जो मनुष्य के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है या जिसका खमियाजा मनुष्यता को उठाना पड सकता है।
हमेशा की तरह इस अंक में नौ लेख, उपन्यास अंश, दो कहानियाँ और तीन कवियों की कविताओं के साथ तीन पुस्तकों की समीक्षाएँ भी हैं। हम आभारी हैं उर्दू अदब के मर्मज्ञ शीन काफ नि*ााम के जिन्होंने हमारे आग्रह पर उर्दू अदब के नायाब शाइर मीराजी की न*मों का हिन्दी अनुवाद हमारे पाठकों के लिए उपलब्ध करवाया।
हमारे हर अंक में हमारी पूरजोर कोशिश रहती है कि उपलब्ध सामग्री को बेहतर से बेहतर ढंग से आफ लिए प्रस्तुत किया जाए। आप सब के सहयोग से ऐसा करने में हमें थोडी सफलता भी मिल रही है। आपका संवाद और सहयोग ही हमारी असली ताकत है। नये साल की शुभकामनाओं के साथ-