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गाँधी के जीवन-मूल्य

डॉ. लहरी राम मीणा
डॉ. वेद मित्र शुक्ल का नया बाल-कविताओं का संग्रह बापू से सीखें उनके रचनात्मक विकास की प्रामाणिकता सिद्ध करता है। संग्रह बडी महीनता से गाँधी के बाल्यकाल से जुडे प्रसंगों और सिद्धांतों का रोचकता एवं नवीनता के साथ वर्णन करता है। यह बाल मनोविज्ञान से जुडे यथार्थ का जीता-जागता चित्रण है। इसमें कुल पन्द्रह बाल-कविताएँ हैं। संग्रह में महात्मा गाँधी के द्वारा बताये गए संस्कारगत मूल्यों, सत्य, अहिंसा, आचरण की शुद्धता, स्वच्छता, बडों का आदर-सम्मान, देश-भक्ति की भावना, सत्यमेव जयते, शारीरिक-श्रम, श्रवण कुमार की कहानी से सीख, बुरी आदतों को त्यागना आदि से संबंधित भाव चित्रित किए गए हैं।
यह कविता-संग्रह बच्चों के लिए संस्कारों की सीख के साथ-साथ भरपूर मनोरंजन से युक्त है। बच्चों के लिए तो जीवन-मूल्य आज के समाज में अतिआवश्यक हैं। इसी बात को आत्मसात् करते हुए श्री शुक्ल ने काव्य-संग्रह को आज के बच्चों के जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बना दिया है।
संग्रह की पहली कविता ‘मोहन’ है। इसके माध्यम से कवि यह बताना चाहता है कि किस तरह से संस्कारों में पले-बढे बच्चे बडों का आदर सम्मान करते हैं। मान करते हैं। लाख उन्हें किसी तरह के बहकावे में लेकर गलत कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाए, तब भी वे अपने संस्कारों पर ही अडिग रहते हैं। जैसे इन पंक्तियों में अपनी मां से मोहन कहते हैं - ‘‘मेरे भैया हैं वो। उन पर कैसे हाथ उठाऊँ। माँ की तब आँखें भर आयीं। बोली, आ जा गले लगाऊँ।’’
‘मोहन और श्रवण कुमार’ नाम से दूसरी कविता के माध्यम से आज के समय में माता-पिता और वृद्धों की हो रही उपेक्षा से जुडी एक बडी समस्या को बालसाहित्य के केंद्र में लाने का प्रयास किया गया है। बच्चे इस कविता के द्वारा जान पाते हैं कि किस तरह से श्रवण कुमार ने अपने अंधे एवं बूढे माँ-बाप को तीर्थ यात्रा करवाई और सेवा-शुश्रूषा की। मोहन और सत्य हरिश्चन्द्र’ नामक एक अन्य कविता में कवि बच्चों को सत्य हरिश्चन्द्र के माध्यम से यह बताने का प्रयास करता है कि हमेशा इन्सान को सत्य पर अडिग रहना चाहिए और झूठ का साथ कभी नहीं देना चाहिए। सत्य सदा बलवान होता है। इसी संदर्भ में ये पंक्तियां ध्यातव्य हैं- ‘‘मोहन’ ने तब मन में ठाना। सदा सत्य वह बोलेगा। चाहे जो कठिनाई आये। सत्य का साथ न छोडेगा।’’
इसी संग्रह में ‘सुबह का भूला शाम को लौटे भूला नहीं कहाता’ शीर्षक से शामिल कविता बच्चों को यह संदेश देने में सफल रही है कि अगर जीवन में कोई गलती होने के बाद गलती को स्वीकार कर लिया जाए तो वह माफ कर दी जाती है। वह गलती नहीं मानी जाती है। जैसे सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो भूला नहीं माना जाता है। उल्लेखनीय है कि यह कविता गांधी जी के बचपन से जुडी एक सच्ची घटना पर आधारित है।
‘शारीरिक श्रम और व्यायाम’ नामक कविता यह कहने का प्रयास करती है कि परिश्रम और व्यायाम दोनों ही हमारे जीवन के लिए उपयोगी और महत्त्वपूर्ण हैं। परिश्रम के द्वारा गांधी जी ने दूर-दूर तक पैदल चलकर देश को आजादी दिलाई।
आगे ‘स्वच्छता और बापूजी’ शीर्षक से छह कविताएँ हैं। हम सब जानते हैं कि गाँधी जी स्वच्छता को लेकर कितना गंभीर रहते थे। वह कहते थे कि स्वच्छता ही मनुष्य का असली श्ाृंगार है। बिना स्वच्छता के हम मानसिक और शारीरिक रूप से कभी स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त नहीं रह सकते। बच्चों के साथ-साथ बडों को भी स्वच्छता को गंभीरता से ध्यान रखने पर बल देते थे और यह आज के समय की अति आवश्यक माँग भी है। इसलिए ये कविताएँ और भी प्रासंगिक हो जाती हैं। स्वच्छता के विषय को बालसुलभ भाषा में प्रस्तुत करने वाली इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- ‘‘स्वच्छ रहेंगे स्वस्थ रहेंगे। बापूजी का है कहना। सच पूछो स्वच्छता हमारे। जीवन का असली गहना।’’
आगे और भी कहते हैं- ‘‘ज्ञान स्वच्छता का बापू ने। दुनिया को करवाया था। भेदभाव से ऊपर उठकर। सेवाभाव सिखाया था।’’ बापूजी ने अपने जीवन में स्वच्छता को विशेष रूप से अपनाया था। उनका कहना था कि जब घर-घर में स्वच्छता का ध्यान रखा जायेगा तब ही हम एक दिन भारत को स्वच्छ और स्वस्थ देश बना पायेंगे। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि गाँधी जी के स्वच्छता विषय को भारत-सरकार ने गंभीरता से लेते हुए बडे स्तर पर भारत देश को गंदगी से बाहर निकालने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की है। इस दृष्टि से भी ये महत्त्वपूर्ण कविताएं हैं।
बापू के तीन बंदरों से जुडी घटना हम सबके जीवन के लिए उपयोगी है। इसी पर आधारित इस संग्रह में एक कविता है। तीनों बंदरों के माध्यम से बापू जीवन में गुणवत्ता लाने के तीन संदेश देते हैं। ये हैं, कभी बुरा मत देखो, बुरा मत कहो और बुरा मत सुनो। ये मूल्यवान गुण आज के समय में आवश्यक हैं। ‘तीन बंदर’ कविता में कवि कहता है - ‘‘बापू जी के तीनों बंदर। सदा रहे कुपथ से दूर। कैसे बचे बुराई से सब। इनके तीन रूप मशहूर।’’
‘विश्व अहिंसा दिवस’ कविता के माध्यम से रचनाकार आज के बच्चों को गाँधी जी के माध्यम से यह सीख देना चाहता है कि गाँधी जी ने अहिंसा के बल पर अंग्रेजों से देश को आजाद करा लिया और कभी उनकी गोली बंदूकों से डरे नहीं, तो फिर हम क्यों आज हिंसा का रास्ता अपना रहे हैं। हर लक्ष्य हिंसा के माध्यम से ही क्यों पाना चाहते हैं, क्या हिंसा ही एकमात्र लक्ष्य हासिल करने का हथियार है? गाँधी जी हिंसा के माध्यम से कभी सफलता नहीं चाहते थे और न ही हिंसा के द्वारा प्राप्त लक्ष्य को सफलता मानते थे।
कुल मिलाकर यह पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि शुक्ल जैसे ऊर्जावान और साहित्यिक मर्मज्ञता से परिपूर्ण कवि की यह कृति बच्चों को गाँधीजी के द्वारा बताये गये मूल्यों और संस्कारों की जानकारी तो कराएगा ही साथ ही बच्चों को चारित्रिक रूप से सुदृढ बनाने में महत्त्वपूर्ण और उपयोगी सिद्ध होगी।

पुस्तक ः बापू से सीखें,
रचनाकारः डॉ. वेद मित्र शुक्ल,
प्रकाशक ः विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान,
कुरुक्षेत्र (हरियाणा), मूल्यः 35/-