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बहिष्कार भोगते समुदाय का यथार्थ

मलय पानेरी
साहित्य सदियों से समाज में फैली कुरीतियों और बुराइयों से लडते हुए सामान्य मनुष्यों के हितों में खडा रहा है। यहाँ लडने का अर्थ वैचारिक चेतना के संदर्भ में है। रूढियों से यदि आम सामाजिक को मुक्ति मिलती है तब ही उसका जीवन सामान्य हो पाता है। इस ओर रचनात्मक लेखन के प्रयास सदैव प्रशंसनीय रहे हैं। समाज में किसी भी प्रकार के प्रयत्न के लिए रचनाकार केवल विचार-प्रवाह का सहयोग दे सकता है। उसे व्यावहारिक स्तर पर लागू करना मनुष्यों का ही काम है। जैसा कि हम जानते हैं रचनाकरों ने साहित्य के माध्यम से ही समाज में क्रांति के प्रयास किये और उसके परिणाम भी सामने आए हैं। अत्याचार और उत्पीडन के विरुद्ध समाज में चेतना लाने के लिए सदैव लिखा जाता रहा है और सामाजिकों द्वारा ग्रहण भी किया जाता रहा, किंतु परिणामों में विलंब भी एक सामान्य क्रम के रूप में लिया जाता रहा।
पिछले दो-तीन दशकों में साहित्य ने दलित, नारी, वंचित और हाशिये के लोगों के लिए विमर्श की नयी *ामीन तैयार की। स्त्री और दलितों पर पर्याप्त लिखा और पढा गया साथ ही समाज का निम* तबका तथा मुख्यधारा में आने से जिन्हें सदैव रोका गया तो हाशिया भी अब चर्चा के केन्द्र में आया। हाशिये और निम* तबके में भी एक अन्तर बना रहा। निम* वर्गीय विमर्श तो खूब फला-फूला लेकिन मुख्यधारा में आने से वंचित किन्नर समाज की चर्चा केवल प्रसंगतः ही हुई है। किन्नरों को मनुष्य समाज में कभी सम्मान नहीं मिला, उसके कारणों में किन्नर नहीं है बल्कि शारीरिक लैंगिक दोष की वजह से उन्हें हमेशा अपमान झेलना पडा है। इस अपमान भाव में यदि कुछ कमी संभव हो सके तो जरूर किया जाना चाहिए। इस उद्देश्य से ही डॉ.रामकुमार घोटड और लता अग्रवाल के संयुक्त संपादन में ‘किन्नर समाज की लघुकथाएँ’ पुस्तक की रचना हुई है। छोटी-छोटी कथाओं के माध्यम से कथाकारों ने हमारे आज के समाज को सार्थक संदेश दिया है। इन संदेशपरक रचनाओं से पाठकों को इस वर्ग के प्रति भारतीय समाज के व्यवहार की असलियत का पता चलता है। किन्नरों के जीवन की व्यथा सामाजिक अवरोध से पनपी है। यद्यपि इनके उत्थान और समान व्यवहार की बातें की जाती रही हैं किन्तु धरातलीय स्तर पर इसकी अनुपालना नहीं हो पाती है। अभी भी इस वर्ग को समाज में व्यावहारिक समानता के लिए लडना पड रहा है किंतु कुछ कोशिशें इनके पक्ष में हो भी रही हैं। इस संग्रह की पहली लघुकथा अनघा जोगलेकर की ‘चंदन’ है। इसमें कथाकार ने इस समुदाय के बथुआ को सामान्य मनुष्य से श्रेष्ठ बताकर एक नया भाव संवर्द्धन किया है। इसे हम अति की श्रेणी में नहीं रख सकते हैं, क्योंकि इस समुदाय को आगे लाने के लिए अतीत की भरपाई का यही तरीका भी है। लेकिन हमारे समाज में सामान्य व्यक्तियों का व्यवहार उस श्रेणी के लोगों के लिए अच्छा कभी नहीं रहा है। यही कारण है कि ये लोग भी स्वयं को स्थायी रूप से समाज में मान्य और स्वीकृत लैंगिक रूप से पृथक मानने लगे। इस तृतीय रूप के लिए हमारा समाज और व्यक्तिगत रूप से हमारा व्यवहार अधिक जिम्मेदार है क्योंकि इन्हें स्वीकारने के लिए कभी सार्थक प्रयास नहीं हुए।
इस संग्रह की अधिकांश लघुकथाएं किन्नरों के जीवन-उत्थान की योजनाएँ संकलित तो करती हैं लेकिन उनमें स्वयं किन्नरों द्वारा ही एक हेय भाव का प्रदर्शन न*ार आता है। जैसे डॉ. भावना शुक्ल की लघुकथा ‘*ान्दगी’, ‘फैसला’ तथा ममता आहूजा की ‘पहचान’, मेघा राठी की ‘हिजडे नैना’, मीना पाण्डेय की ‘किन्नर’, चन्द्रेश धतलानी की ‘हिजडा चरित्र’ आदि ऐसी लघुकथाएँ हैं, जो किन्नर-समाज के यथार्थ और उनके प्रति हमारी सोच को उजागर करती हैं।
यह सच है कि सदियों से चले आ रहे मनुष्य-समाज में स्त्री-पुरुष के अलावा तृतीय लिंग को स्वीकार ही नहीं किया गया। जबकि इसमें एक जैविक त्रुटि के लिए उनकी स्वयं की कोई भूमिका नहीं है। यह भी हम देखते हैं कि जब हमारा समाज, वर्ग और वर्ण-व्यवस्था से संचालित था तब भी ये लोग थे लेकिन इस तरफ किसी ने ध्यान देना भी उचित नहीं समझा था। आज कुछ प्रयास इस समुदाय के लोगों के लिए हो रहे हैं परन्तु वे नाकाफी हैं। समाज में या साधारण जन में वैचारिक विमर्श इस ओर हो रहा है लेकिन व्यावहारिक स्तर पर इसका आरंभ अभी भी मुश्किल ही बना हुआ है। ऐसा लगता है जैसे आज भी इस समुदाय को कोरी बातों से फुसलाया जा रहा है, समाज की मुख्यधारा में लाने के सक्रिय प्रयास अभी भी नहीं हो पा रहे हैं।
इस संग्रह की लघुकथाएँ अपने कथ्य और शीर्षक से इनकी अच्छी *ान्दगी का संकेत नहीं देती हैं। अधिकांश लघुकथाएँ किन्नरों के खराब सम्बोधनों से ही आगे बढती हुई बुरे अंत तक पहुँच जाती हैं। हमारे सामाजिक कार्यक्रमों के शुभ प्रसंगों में इनका आगमन नेग वसूली के लिए होता है परन्तु उस क्षणिक मुलाकात में भी इनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता है। उस सच्चाई को अनेक कथाकारों ने स्वीकारा है और उस निर्मम व्यवहार को भी दर्शाया है जिसे किन्नर भुगतते आ रहे हैं। कुछ लघुकथाएँ किन्नर समाज की उन्नति के लिए शुभ संकेत करती हैं, जैसे - राशि सिंह की ‘सिर्फ माँ’, रेखा मोहन की ‘भ्रांतियाँ’, रेखा सुनार की ‘इंसानियत’ लघुकथाएँ जरूर उम्मीद जगाती हैं। इन कथाओं में किन्नरों को प्रताडित जीवन से मुक्ति की राह बनाई गई है। हाशिये के इस समुदाय का जीवन आज भी मनुष्य स्तर पर चुनौतियों से भरा है। समाज में सामान्य व्यवहार के लिए किन्नर समुदाय को भी अपने स्तर पर सामूहिक प्रयास करने होंगे। आज तक यदि वे समाज में प्रवेश से वंचित रहे हैं तो इसमें उनकी मानसिक नकारात्मकता की भूमिका भी रही है। आज बहुत से ऐसे मंच खुले हुए हैं जहाँ के अपनी सांगठनिक पहचान बना सकते हैं। बहिष्कृत रहने के लंबे अभिशाप से वे स्वयं मुक्त होने के प्रयास कर सकते हैं। इस दृष्टि से शिखरचंद जैन की ‘डरपोक हिजडा’ कथा हमारी आशा को बल देती है किंतु यहाँ किन्नर के सामर्थ्य पर भरोसा किया है पर उसे पुलिस महकमें में अधिकृत पहचान से दूर ही रखा है। जब तक समाज खुले रूप में इस श्रेणी-समुदाय को स्वीकार नहीं करेगा तब तक उनका उद्धार संभव नहीं है।
समग्रतः यह उम्मीद की जानी चाहिए कि यदि किसी प्रकार से अभिव्यक्ति के साथ-साथ व्यवहार-स्तर पर भी समाज किन्नरों को साथ लेता है तो इस समुदाय के लिए यह एक अच्छी शुरुआत होगी। साधारण मनुष्यों की सोच बदलने में यह पुस्तक ‘किन्नर समाज की लघुकथाएँ’ जरूर उपयोगी साबित होगी।

किन्नर समाज की लघुकथाएँ, सं. डॉ. राजकुमार घोटड,
डॉ. लता अग्रवाल, प्रकाशक ः साहित्य चन्द्रिका प्रकाशन, जयपुर, मूल्य ३००/-।