fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

जन आंदोलन की वैचारिक चेतना

डॉ. मीनाक्षी चौधरी
भक्तिकाल अपने अखिल भारतीय स्वरूप में लगभग एक हजार वर्ष के कालखंड को घेरे हुए है और इस काल को आधार बनाकर लिखी गई पुस्तकों की संख्या भी एक हजार से कम न होगी। भक्तिकाल पर इतनी व्यापक पाठ्य सामग्री की उपलब्धता के बावजूद नित नई पुस्तकों का लेखन व प्रकाशन इस बात का द्योतक है कि अभी भी बहुत कुछ प्रकाश में आना शेष है, बहुत सी अवधारणाओं का टूटना और स्थापित होना बाकी है। डॉ. जगदीश गिरी की पुस्तक ‘भक्ति आंदोलन’ इसी श्ाृंखला की एक कडी है। पुस्तक में लेखक ने भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि, परम्परा और इसके विकास पर पुनर्विचार कर पूर्वस्थापित मान्यताओं को इतिहास और साहित्य की दृष्टि से परखने का प्रयास करते हुए कुछ नवीन अवधारणाओं को स्थापित किया है।
पुस्तक में भक्ति आंदोलन का सफर 12॰ पृष्ठों का है, जिसमें अध्याय रूपी तीन प्रमुख पडाव हैं, तत्पश्चात् उपसंहार व ग्रंथ सूची है। प्रथम अध्याय में भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि और परम्परा पर प्रकाश डालते हुए भक्ति के उत्स को खोजने का प्रयास किया गया है। विद्वानों के एक वर्ग ने भक्ति का संबंध द्रविड सभ्यता से माना है। दूसरे वर्ग के विद्वान इसे ऋग्वेद व कुछ अन्य उपनिषद् और गीता से उद्भूत मानते हैं। लेखक ने भक्ति आंदोलन के आंतरिक मर्म की पडताल करते हुए भावावेशमयी, अनुरागसूचक व निष्काम भावना से युक्त भक्ति के बीज ज्ञान प्रधान एवं कर्मकांड प्रधान वेद संहिता एवं ब्राह्मण ग्रंथों में ढूँढने को सरासर गलत माना है, जहाँ भय मिश्रित श्रद्धा है, भक्ति नहीं। इन्होंने कहा कि भक्ति का उद्भव आर्येतर सभ्यता से माना जा सकता है और चूँकि आर्येतर सभ्यता मातृ-प्रधान थी इसलिये भक्ति में भावों का समावेश अवश्यंभावी था। डॉ. मोती सिंह के अनुसार आर्येतर सभ्यता के ध्वंसावशेषों से प्राप्त कलात्मक मूर्तियों से इनकी उपासना पद्धति और देवी पूजा के प्रचलन का पता चलता है। कालांतर में ये आर्येतर लोग आर्यों से पराजित हो दक्षिण की ओर पलायन कर गए। इनकी भक्ति पद्धति को आर्यों ने स्वीकार कर लिया और ‘भक्ति द्रविडी उपजी’ सूत्र वाक्य साहित्य में प्रसिद्ध हो गया।
डॉ. गिरी ने यह स्पष्ट किया है कि भक्ति के बीज भारत के अलग अलग क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में व्याप्त थे। भारत के पूर्वी क्षेत्र में तंत्रयान व महायान धर्म में भक्ति के बीज मिलते हैं तो पश्चिम में नाथ पंथियों में शिव के प्रति भक्ति के भाव हैं। उत्तर में महायान और कश्मीरी शैवों में, तो दक्षिण में आलवारों, नायनारों तथा शिवशरणों में भक्ति परम्परा का विकास दिखाई देता है। शंकराचार्य कृत ‘सौन्दर्य लहरी’ में महामाया की उपासना को भी भक्ति के बीज के रूप में देखा जा सकता है। इसके अलावा महाभारत, भागवत में भी भक्ति के तत्त्व मिलते हैं। कालान्तर में जैन व बौद्ध धर्म ने भी प्रभाव-स्वरूप भक्ति के तत्त्वों को समाहित कर लिया। यानी भक्ति तत्त्व अलग अलग रूपों में भारत में सभी जगह व्याप्त थे।
पुस्तक के दूसरे पडाव में भक्ति आंदोलन के विकास पर चर्चा है। भक्ति परम्परा को आंदोलन के रूप में परिवर्तित करने का श्रेय आलवार और नायनार भक्तों को दिया जाता है। आलवार गायकों ने भक्ति को शास्त्रीयता के बंधनों से मुक्त करवाया और बिना किसी भेदभाव के आमजन के लिए भक्ति मार्ग को प्रशस्त करके भक्ति को आंदोलन का रूप दिया। अध्याय में तमिल संघ साहित्य, संघ-पूर्व व संघोत्तरकालीन रचनाओं, तमिल देवी-देवताओं, उपासना पद्धति, अन्य प्रचलित सम्प्रदायों, प्रसिद्ध आलवार व नायनार भक्त कवियों के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई है। तमिल प्रदेश का यह काल विष्णु -नारायण-वासुदेव-कृष्ण और तिरुमाल या मायोन के एकीकरण का था। तिरुमाल यहाँ विष्णु हैं तथा देवता मायोन ग्वाल लोगों के देवता हैं, जिनके बाल रूप की उपासना की जाती थी। तत्कालीन समय में तमिल प्रदेश में भक्ति आंदोलन के उत्स के पर्याप्त कारण मौजूद थे, जैसे कि विभिन्न धर्मों में समय के साथ आई विकृतियाँ और भागवत संप्रदाय में ब्राह्मणों का बढता आधिपत्य आदि, जिन्होंने भक्ति आंदोलन की आधार भूमि तैयार करने का काम किया।
भक्ति को जन आंदोलन बनाने में रामानुज व इनके द्वारा प्रतिपादित श्री संप्रदाय की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। लेखक ने भक्ति के संदर्भ में श्री संप्रदाय, रामानुजाचार्य और उनके बाद के देशिकाचार्य, पिल्लै लोकाचार्य, तैन्कलै मत, मध्वाचार्य, द्वैतवाद के प्रभाव पर दृष्टिपात करते हुए माना कि श्री संप्रदाय और उसके बाद मध्व मत के प्रभाव स्वरूप कर्नाटक प्रदेश में भी भक्ति आंदोलन का प्रभाव दिखाई देने लगा। यानी भक्ति आंदोलन तमिल प्रदेश से बाहर निकल कर अखिल भारतीय स्वरूप ग्रहण करने की ओर अग्रसर होने लगा। महाराष्ट्र का वारकरी संप्रदाय बरार, गुजरात, कर्नाटक और आंध्र तक फैला, इसकी भजन और कीर्तन पद्धति राजस्थान, बंगाल और उडीसा प्रांत में भी अपनाई गई। निम्बकाचार्य के सनक संप्रदाय और वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग ने भी भक्ति को अखिल भारतीय स्वरूप देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. गिरी के अनुसार भारतीय भक्ति आंदोलन के विकास में बौद्ध व जैन धर्म का अप्रत्यक्ष किन्तु महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। बौद्ध-श्रमण क्रान्ति का उद्भव पुरोहितवाद, यज्ञ-हिंसा व जातिवाद के विरोध में हुआ। लेखक ने माना है कि यह प्रथम जन-क्रांति थी जिसमें निम्न व हीन मानी जाने वाली जातियों को ईश्वर की उपासना का अधिकार दिया गया ।
भक्ति के उत्स और उत्थान में स्त्रियों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, जिसे कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। भक्ति में स्त्रियों के योगदान पर चर्चा करते हुए लेखक कहते हैं कि आर्येतर सभ्यता मातृ-प्रधान थी। स्त्री प्रधानता के चलते इनकी उपासना पद्धति व धार्मिक प्रथाएँ ज्ञानमूलक न होकर भावना मूलक थी। अतः नारी भक्तों को भी अन्य संतों की भांति समान रूप से आदर दिया गया । सिद्ध साधना में शक्ति के रूप में नारी की अनिवार्य उपस्थिति भी किसी न किसी रूप में भक्ति आंदोलन में नारी के योगदान को प्रभावित कर रही थी। उत्तरवर्ती कश्मीर में तो भक्ति आंदोलन के सूत्रपात का श्रेय ही संत कवयित्री लल्लद्यद को है। इनके अलावा माणिक्कवाचकर, मुक्ताबाई, आलवार संत आण्डाल, शैव संत कारैक्काल अम्मैयार, अक्क महादेवी, निलम्मा, मीरा, मुक्ताबाई, दयाबाई, सहजोबाई आदि की भक्ति आंदोलन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
साहित्य के प्रत्येक कालखण्ड में सतही स्तर पर समानता दृष्टिगत होती है, किन्तु जैसे-जैसे हम सतह के भीतर जाकर उसे समझने और बारीकी से उसका विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं, वैसे-वैसे विरोधी प्रवृत्तियाँ उभरकर सामने आने लगती हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि पूर्वग्रहों से ग्रस्त व प्रभावित होकर विरोधी प्रवृत्तियों को छिपाने का प्रयास सायास किया जाता है। इनमें से कुछ विरोधी प्रवृत्तियों को सामने लाकर भक्ति आंदोलन के सही स्वरूप को समझने का प्रयास इस पुस्तक में हुआ है। यहाँ विरोध निर्गुण-सगुण के बीच, सवर्ण और शुद्रों के बीच, ज्ञान और भक्ति के बीच, अद्वैत और द्वैत के बीच, आर्यों व आर्येतर लोगों के बीच है। द्रविड उपजी भक्ति को स्वीकारने का तात्पर्य यह नहीं था कि दोनों जातियों में भीतरी विरोध समाप्त हो गया था। शिव आर्येतर जाति के लोगों के देवता थे और आर्यों ने उन्हें संहारक, ब्रह्मा को सृष्टि का कर्ता और विष्णु को जगपालक घोषित कर अपनी श्रेष्ठता को बनाए रखने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप विष्णु बहुसंख्यक समुदाय में लोकप्रिय हो गए और आर्येतर देवता शिव धीरे धीरे गौण हो गए। लेखक ने कुछ उदाहरण स्वरूप यह भी माना है कि पुराणकारों ने कई घटनाओं का प्रणयन शिव को निम्न देवता घोषित करने के लिए किया।
भक्ति-युग साहित्य में सामाजिक सरोकारों के आरम्भ का युग है। धार्मिक आवरण में सामने आने के बावजूद यह जन आंदोलन पहले है और धार्मिक आंदोलन बाद में। इसमें प्रथम बार दलितों, दमितों और नारियों को भक्ति का अधिकार और अपनी पीडा अभिव्यक्त करने का अवसर मिला। भक्तिकाल के आचार्यों ने ब्राह्मण-अब्राह्मण सभी को अपना शिष्य बनाकर सामाजिक समरसता का प्रचार किया। संत कवियों ने साम्प्रदायिक विद्वेष, बाह्याडम्बरों, कर्मकाण्डों, छुआछूत, खान-पान संबंधी कट्टरता और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक विकृतियों का विरोध कर मानव धर्म की स्थापना का प्रयास किया। आंदोलन का नेतृत्व पहले निम्न वर्ण के संतों के हाथों में रहा। किंतु कुछ समय उपरांत वैदिक धर्म और सगुण मत द्वारा विरोध और समायोजन की क्रिया के चलते निम्न वर्ण से जुडा निर्गुण मत कमजोर होने लगा। समायोजन पद्धति में कई लोक-देवताओं को अवतार घोषित किया गया। निर्गुण मत से पहले बौद्ध धर्म, वासुदेव और लोकायत धर्म भी विरोध, विकार और समायोजन के कारण कमजोर हो कर पार्श्व में जा चुके थे।
इस आंदोलन की लोकधर्मी चेतना का एक पक्ष यह भी है कि इस युग के सभी संतों और भक्तों ने जन-भाषा का प्रयोग किया। जन भाषा के प्रयोग से समाज में एक क्रान्ति का आगा*ा हुआ। संत कवियों द्वारा जन भाषा में गाए गए भक्तिपरक गीतों ने बहुतायत में जन समुदाय को अपने साथ जोड लिया। भक्ति आंदोलन के फलस्वरूप भारतीय भाषाओं के विकास को एक आधार भूमि प्राप्त हुई। तृतीय अध्याय में लेखक ने समस्त भारतीय भाषाओं में रचित भक्ति साहित्य पर प्रकाश डाला है। भक्ति आंदोलन के अखिल भारतीय स्वरूप में संस्कृत का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। संस्कृत की महान रचनाओं का अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओं में हुआ। इन ग्रंथों का भक्ति आंदोलन के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। दक्षिण भारत में तमिल भक्तों ने आमजन से जुडाव की आवश्यकता समझते हुए तमिल भाषा में अनेक रचनाएँ लिखी। लेखक ने तमिल आलवारों और नायनारों का परिचय, उनकी रचनाओं एवं रचनाओं में प्रतिपाद्य विषय और उनका परवर्ती भक्ति कवियों पर पडने वाले प्रभाव की विस्तारपूर्वक चर्चा की है। तमिल साहित्य की श्रीवृद्धि करने में दोनों संप्रदायों का ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उधर कन्नड साहित्य ने भी संस्कृतनिष्ठ कन्नड का परित्याग कर बोलचाल की कन्नड को साहित्य की भाषा स्वीकार करते हुए देशी छंदों के प्रयोग पर बल दिया। कर्नाटक में भक्ति आंदोलन को गति देने में शिवशरण और हरिदास साहित्य बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। महाराष्ट्र में महानुभाव पंथ और वारकरी संप्रदाय जनमानस में लोकप्रिय हुए। गुजरात, पंजाब और कश्मीर, बिहार, बंगाल, उडीसा और आसाम में भी विभिन्न भक्ति संप्रदायों की स्थापना हुई। इनसे जुडे संत कवियों ने स्थानीय जन भाषा में रचनाएँ लिखी, जिससे जन भाषाओं को विकसित और प्रसारित होने का अवसर प्राप्त हुआ ।
भक्तिकाल को लेकर हिन्दी साहित्य में कई ‘साहित्यिक वेद-वाक्यों’ की स्थापना हो चुकी है, तथा अनेक विद्वानों ने यह मान लिया गया है कि इन पर विमर्श की कोई गुंजाइश व आवश्यकता शेष नहीं है। इन्हीं ‘ब्रह्म-वाक्यों’ के भ्रम-जाल से निकलने और उन्हें प्रामाणिकता की कसौटी पर परखने का प्रयास लेखक द्वारा पुस्तक में किया गया है। डॉ. जगदीश गिरी ने भक्ति आंदोलन के एक क्षेत्र विशेष में पनपने और वहीं से अलग-अलग क्षेत्रों में फैलने की अवधारणा को गलत बताते हुए यह माना कि भक्ति आंदोलन का स्वरूप देशव्यापी था और इस आंदोलन की जडें भारत के प्रत्येक अंचल में विद्यमान थी। भक्ति आंदोलन के दौर में विभिन्न भारतीय भाषाओं को विकसित होने का अवसर मिला। अनेक भारतीय भाषाओं का लिखित साहित्य भक्ति आंदोलन की प्रेरणा से ही शुरू हुआ। भक्ति आंदोलन अलग अलग प्रदेशों में विकसित भक्ति परम्परा को समेटते हुए आगे बढा और हिन्दी प्रदेश में पहुँचकर चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर सका। हिन्दी प्रदेश के पाठक व शोधार्थी ‘भक्ति आंदोलन’ पुस्तक के माध्यम से इस आंदोलन की व्यापकता और समग्र चेतना को भली प्रकार से समझ सकेंगे, ऐसी आशा की जा सकती है।
पुस्तक ः भक्ति आंदोलन, लेखक ः डॉ. जगदीश गिरी, प्रकाशक ः मोनिका प्रकाशन, जयपुर, वर्ष ः 2017
मूल्य ः 190/-