fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

वह हर साल अपनी माँ की खोज में भारत आती थी

मधु कांकरिया
मुंबई के शुरुआती दिन और गर्मी की दोपहरी। मुर्दनी और बोरियत से बचने के लिए विदेशियों को हिंदी सिखाना शुरू कर दिया। उन्हीं दिनों आयी थी प्रणीता मुझसे हिंदी सीखने। वह नीदरलैंड के ऐमर्सटडम शहर से आयी थी। मध्यम कद, गोरेपन की ओर उन्मुख गेहुँआ रंग, काले बाल, हलकी भूरी आँखें और अजंता-एलोरा की मूर्तियों-सी उठान ..... सब कुछ उसके भारतीय होने की गवाही दे रहे थे, पर उसका उच्चारण.... शुभानअल्लाह! वह हिंदी तो क्या अंग्रेजी भी टूटी फूटी ही बोल पाती थी। उसकी मातृभाषा डच थी।
वह इंडियन हार्डवेअर में यूरोपियन सॉफ्टवेयर का अजीब कॉम्बिनेशन थी! एक दिन मैंने उसे कह ही दिया कि तुम यदि मुँह न खोलो तो शर्तिया तुम्हें कोई भी डच नहीं कहेगा। यह सुन उसकी आँखों की बाँबी से कुछ सर्प सरसराए थे। धीरे धीरे मैंने यह मालूम कर लिया कि वह मुंबई के चरणी रोड इलाके में स्थित अनाथालय ‘बाल आनंद’ के बच्चों के साथ कुछ महीने बिताने लगभग हर साल भारत आती है। एक दिन जब मैं उसकी क्लास ले रही थी तभी मेरी माँ का फोन आया। मैंने उसे अपनी माँ के बारे में बताया। इस बार उसकी आँखें डबडबायी। धीरे धीरे पंखुडी सी खुली वह। अटल बिहारी अंदा*ा में एक लम्बा-सा विराम लिया उसने, फिर जो सामने आया वह यह था।
उसका जन्म नागपुर के किसी सरकारी अस्पताल में हुआ था। उसके जन्म के दस दिन बाद ही उसकी माँ उसे एक बास्केट में डाल उसे अस्पताल के ही चाइल्ड केयर हाउस में छोड गयी थी। उसकी बास्केट में ही उसका जन्म सर्टिफिकेट भी नत्थी किया हुआ था। उसके सर्टिफिकेट में उसका धर्म ‘हिन्दू’ लिखा हुआ था, माँ का नाम ‘मधुबाला’ लिखा हुआ था और पिता का कॉलम रिक्त था। उसी अस्पताल के कर्मचारियों ने ही उसे नाम दिया था ‘प्रणीता’। इसके छह महीने बाद उसे मुंबई के चरणी रोड स्थित ‘बाल आनंद’ में भेज दिया गया, जहाँ से पौने दो साल बाद उसे ऐमर्सटडम के एक फर्नाडीज दंपति ने गोद ले लिया। आज भी प्रणीता उन्हीं के साथ रहती हैं। वह वहां के प्राइवेट अस्पताल में सीनियर नर्स है, चींटी की तरह रात दिन खटती है, बूँद-बूँद पैसे बचाती है, अपने दूसरे दोस्तों की तरह न उसने माँ बाप का घर छोड अकेला रहना शुरू किया, न बॉय फ्रेंड बनाए। न ही कहीं दुनिया घूमने निकली। अपनी सारी बचत वह ‘बाल आनंद’ के बच्चों पर और अपनी माँ को खोजने में लगा रही है। उसकी माँ का नाम भी ऐसा है कि वह महाराष्ट्र की भी हो सकती है और उत्तर भारत में भी कहीं की। पर ज्यादा संभावना है कि उसकी माँ शायद महाराष्ट्रियन थी और नागपुर के आसपास की थी, इसी कारण वह जब भी भारत जाती है नागपुर से मुंबई के बीच चक्कर काटती रहती है।
प्रणीता को कभी लगता है कि वह शायद कुँवारी माँ थी और भारत में कुंवारी माँ बहुत बडा सामाजिक कलंक है, इस कारण उसकी माँ ने उसे फेंक दिया तो कभी उसे लगता है कि चूंकि वह कन्या थी, और शायद उसका परिवार पुत्र चाहता था इस कारण विवश होकर उसकी माँ को उसे टोकरी में डाल फेंक देना पडा। वह इतनी आक्रांत और ओब्सेस्ड है अपनी माँ से कि जीवन की हर घटना को माँ से जोडकर देखने की उसकी आदत पड चुकी है। एक बार यहाँ के लाल बत्ती इलाके को देख चीख पडी थी, ‘कौन जाने मेरी माँ लाल बत्ती इलाके की रंडी रही हो। खुद उसको ही नहीं पता हो कि कौन था मेरा बाप इसीलिए.....’
एक बार उसने मुझसे अनुरोध किया- आंटी, बाल आनंद के बच्चों से हिंदी में बात करने के लिए आपको मुझे मदद करनी पडेगी। मैं आपको लेने आ जाऊँगी।
अपने वादे के अनुसार ही वह मुझको लेने भी आ गयी थी। लोकल ट्रैन में भीड अपेक्षाकृत कम थी, हमें महिलाओं के लिए आरक्षित ट्रेन के डिब्बे में बैठने की जगह मिल गयी थी। भीतर एक अलग ही दुनिया थी। खाने के बिस्किट से लेकर साज श्ाृंगार के सभी सामान वहां बिक रहे थे। बच्चे, लडकियाँ, औरतें....सभी बेचने में मशगूल, किसी के माथे पर सब्जियों की टोकरी तो किसी के हाथों में स्ट्रावेरी के पैकेट। किसी के नन्हे हाथों में बिंदी और हेयर क्लिप का पत्ता, तो कोई चूडियाँ और नकली गहनों के साथ। कुछ श्रमजीवी औरतें आलथी पालथी मारकर तो कुछ उकरू बैठे दरवा*ो के पास ही डब्बा निकाल खाने लगी तो एक मध्यवर्गीय घरेलू टाइप कर्मयोगी महिला इतनी भीड भाड में भी क्रोसिए से लैस बुन रही थी। एक औरत इन सबसे निर्लिप्त अपनी पीठ सीट से टिकाए हनुमान चालीसा का जाप कर रही थी। एक महिला कान का मैल निकालते निकालते ही दिव्य अनुभूति में लीन हो गयी थी। ट्रैन फिर अगले स्टेशन पर रुकी, एक बुर्काधारी महिला चढी, कुछ उत्सुक न*ारें उठी उस ओर कि तभी उसने बुर्का उतारा और देखते ही देखते उसके भीतर से जींस टॉप में लिपटी एक आधुनिका निकली। प्रणीता की प्रतिक्रिया देखने के लिए मैं उसकी और ताकी तो कयामत ही आ गयी थी। वह अपने मोबाईल पर कभी अपनी ही तस्वीर को देखती तो कभी दरवा*ो पर बडा पाव खाती महिलाओं को गौर से अपलक देख रही थी। यह क्या प्रणीता! अपनी ही तस्वीर को क्या देख रही हो? वह लज्जित हुई, आवा*ा से जैसे लहू टपका- इन सामान बेचनेवालियों की उम्र देखिये.... जाने क्यों मुझे लगता है कि मेरी माँ शायद इन्हीं सामान बेचनेवालियों में कोई हो। वह धीरे से फुसफुसाई- देखिये न आंटी क्या इनमें कोई मिलती है मेरी शक्ल से? धत्! यह क्या गधापन है? क्या ऐसे मिलती है मां? मेरी त्वरित प्रतिक्रिया यही थी। लेकिन उसके चेहरे से बरसते उम्मीद के नूर ने मेरी बोलती बंद कर दी। कचरे से उठकर होश संभालते ही एक लडकी ने अपनी जन्मदाता के बारे में जानना चाहा था। उसके सवाल की नोंकें मुझे चुभने लगी। लगा जैसे धरती भी कुछ क्षणों रुक गयी अपनी ही धुरी पर और सोच रही है कि क्या जवाब दें इस दर्द भरे सवाल का? मेरी साँस भारी हो रही थी। पल-पल पहाड, कब खत्म होगा यह दर्दनाक सफर? कुछ पल सरके कि तभी उसने मोबाइल पर फिर अपनी ही तस्वीर देखनी शुरू कर दी।
मैंने पूछने की धृष्टता कर ही दी आखिरकार, ‘तुम अपनी तस्वीर क्यों देख रही हो बार बार? जवाब और भी विचित्र मिला।
-मैं कई बार अपना चेहरा ही भूल जाती हूँ, अपने चेहरे को सामने रखकर मैं सामने वाली के चेहरे से अपने चेहरे की रेखाओं को मिलाती रहती हूँ। काश! मेरी माँ ने मेरे बर्थ सर्टिफिकेट के साथ अपनी तस्वीर भी रख दी होती! उसने काँपते होठों से कहा और अजीब निगाहों से मुझे देखा... वहाँ फिर कुछ सर्प सरसराए- क्रोध, विवशता और दुःख के सर्प!
थोडी ही देर में बांद्रा स्टेशन आया, फिर एक अधेड संभ्रांत और समृद्ध महिला चढी। संयोग से वह हमारे सामने की ही सीट पर पसर कर बैठी थी। प्रणीता की सम्पूर्ण देह जैसे आँखें बन गयी थीं। अपलक ताकती रही उसे.... फिर मोबाईल पर अपनी ही तस्वीर को देखने लगी। कभी उसको देखती कभी अपनी तस्वीर को देखती। मेरे भीतर हूक सी उठी- इसे तो माँ की खुजली हो गयी है। क्या रोकूं इसे? कहूँ ऐसा न करे ? पर जो बूंद-बूंद पैसे बचाकर सात समुन्दर पार से आई है यहाँ अपनी मां को खोजने उसे मैं तो क्या, संसार की कोई भी ताकत रोक सकती है भला?