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तीन हिंदी कविताएँ

मदन गोपाल लढ्ढा

पसीने की गंध
कोई आने को उत्सुक है
कोई जाने की जल्दी में है।

आने वाले को नहीं है सरोकार
कि जाने के लिए
कौनसा साधन
किस राह से गु*ारता है
जाने वाला भी बेफिऋ है
आने वाले साधनों व मार्गों से।

आने वालों की आँखों में
चमक है
उनको देखना है कितना-कुछ
कितनी मुलाकातें करनी हैं
कितने काम निपटाने हैं।

जाने वालों के पाँवों में
थकान है
वे करते रहते हैं हिसाब
कितना कुछ कर पाए
और बाकी रहा कितना।

जब भी मिलते हैं दोनों
अचानक किसी मोड पर
आने वाले के डिओ की खुशबू पर
भारी पडती है अक्सर
जाने वाले के पसीने की गंध।
भूल जाते हैं दोनों

आने वाले सोचते हैं
कदाचित् ऐसा हो जाए
जाना ही नहीं पडे कभी
यहीं रहें ताउम्र।

जाने वाले भी सोचते हैं
कदाचित् बिना आए ही
चल जाए काम
कितना झंझट है आने में।

अक्सर भूल जाते हैं दोनों
ये दुनिया आनी-जानी है।




हंसती है राह

आने वालों को लगता है
जल्दबा*ाी में निकल पडे
अकेले ही
कोई साथ होता तो
कितना अच्छा होता
आजकल कितना डर है
सफर में।

जाने वाले सोचते हैं
बिना काम भीड कर बैठे
क्या जरूरत थी इतनों की
इस मंदी में
अकेले की पार पड जाए
वही बहुत है।

राह हँसती है
दोनों की मनगत जानकर
अंतर्यामी जो ठहरी।