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तीन कविताएँ

विजय राही
एक
ेम बहुत मासूम होता है
यह होता है बिल्कुल उस बच्चे की तरह
टूटा है जिसका दूध का एक दाँत अभी-अभी
और ताई ने कहा है
कि जा! गाढ दे, दूब में इसे
उग आये जिससे ये पुनः और अधिक धवल होकर
और वह चल पडता है
खून से सना दाँत हाथ में लेकर खेतों की ओर

प्रेम बहुत भोला होता है
यह होता है मेले में खोई उस बच्ची की तरह
जो चल देती है चुपचाप
किसी भी साधु के पीछे-पीछे
जिसने कभी नहीं देखा उसके माँ-बाप को

प्रेम बहुत सरल होता है
यह इतना सरल होता है कि
कभी-कभी इसे खा जाता है वनराज
उस मेमने की तरह
जिसकी माँ ने शायद ही किया होगा कभी पानी गंदा

कभी-कभी मिटना भी पडता है प्रेम को
सिर्फ यह साबित करने के लिए
कि उसका भी दुनिया में अस्तित्व है

लेकिन प्रेम कभी नहीं मिटता
वह टिमटिमाता रहता है आकाश में
भोर के तारे की तरह
जिसके उगते ही उठ जाती हैं गाँवों में औरतें
और लग जाती हैं पीसने चक्की
बु*ाुर्ग करने लग जाते हैं स्नान-ध्यान
और बच्चे माँगने लग जाते है रोटियाँ
कापी-किताब, पेन्सिल और टॉफियाँ

प्रेम कभी नहीं मरता
वह आ जाता है पुनः
दादी की कहानी में
माँ की लोरी में,
पिता की थपकी में
बहन की झिडकी में
वह आ जाता है पडोस की खिडकी में
और चमकता है हर रात आकर चाँद की तरह...

दो
क्या आपने कभी सोचा है
कवि क्या देखता है
मैं आपको बताता हूँ
कवि देखता है अपने घर में
छतों-दीवारों पर बरसात में आई सीलनों में
आपकी ही तरह अपने प्रियजनों के चेहरे
चाँद-सूरज, पर्वत-नदियाँ,
पंछी-ढोर, फूल-पत्तियाँ

कवि देखता है आँगन वाले नीम के पेड को
हवा में लहराती उसकी डालियों को
बिल्कुल पड चुकी कुछ पीली पत्तियों को
वह देखता है रो*ा शाम को आकर
बैठने वाले मोर की डाल को
और अनुभव करता है उस आनंद को
बैठकर स्वयं मोर की जगह
वह घुस जाता है तोतों-गिलहरियों के कोटरों में,
और सो जाता है थोडी देर उनके बच्चों के साथ
पुराने कपडों, रूई, तिनकों और पन्हियों के बीच

कवि देखता है पीपल वाले कुएँ को
जिस पर भरती है अलसुबह से देर रात तक आसपास/
मुहल्ले की औरतें पानी
वह पढ लेता है उनके घूंघट में ढके चेहरों के भाव
वह सुन लेता है उन सबकी दर्द-भरी कहानियाँ
जो पनघट की हवा में घुलकर कहीं गुम हो जाती हैं
वह सब देख लेता है
उनके मन के साथ तन के धाव भी
जो रखती हैं वो छुपाकर एहतियात से
कभी दिखाई भी पड जाये तो
टाल देती हैं यह कहकर
कल अँधेरे में लग गई थी दरवा*ो से टक्कर

कवि देखता है कैर के लाल-गुलाबी फूलों को
कवि देखता है
सावन में बागों में पडे कुछ खाली झूलों को
वह देखता है बरसात की बादली को
वह देखता है बेर की झाडियों में फँसी
साँप की काँचली को
जिसके लिए माँ कहती थी
आँखों से जो लगा ले इसको इक बार
तो नहीं दूखती आँखें उसकी फिर उम्रभर
कवि वह सब देखता है
जो आमतौर पर सब लोग नहीं देखते

3. एक-दूसरे के हिस्से का प्यार

एक समय था
जब दोनों का सब साझा था
सुख, दुःख,
हँसना, रोना,
नींद, सपने
या कोई भी ऐसी-वैसी बात।
कुछ ची*ों ऐसी भी थीं-
जो बेमतलब लग सकती हैं
जैसे साबुन, स्प्रे, तौलिया
कभी-कभी शॉल भी।
शरारतें, शिकायतें,
ये तो साझा होनी ही थी।
कार, मोबाईल, ट्विटर
फेसबुक, व्हाट्सएप
जैसी कई ची*ों
बडी भी, छोटी भी
यहाँ तक कि रोटी भी।
अब नहीं रहा,
तो कुछ नहीं रहा
सिवाय उस पाँचवर्षीय बच्चे के
जिसे करते हैं दोनों
एक-दूसरे के हिस्से का भी प्यार।