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पाँच कविताएँ

राजूराम बिजारणिया
चलता है वक्त माँ के हिसाब से
रोजाना एक सी
होती है दिनचर्या
माँ की!

उठना सबसे पहले
मुँह अंधेरे
सोना सबको सुलाकर

दुहना गाय
देना चाटा
डालना चारा
करते ही बिलौना
पीसना देश...

दादी जो खाती है
मोटा अनाज!

दादा की चाय से
पापा की लस्सी
और छोटू के दूध से लेकर
सबके खाने तक का
टाइम टेबल दर्ज है
माँ के दिमाग में!

अंगुलियों के
बिसवों पर
चलाती घर
करती हुई हिसाब
गृहस्थी का
बेशक अनपढ है
अक्षर ज्ञान के लिहाज से
मेरी माँ....

मात देती है मगर
कम्प्यूटर को।

मजाल है
हो जाए
इधर से उधर
कोई गणना
दिन से छिटके पल की।

वक्त के
इस खांचे को
भरना आता है
बखूबी माँ को।

दरअस्ल...
माँ वक्त के हिसाब से नहीं
चलता है वक्त
माँ के हिसाब से!

रंग बदलते ख्वाब
वह बेटी थी
तो ख्वाब थे
ख्वाब भरते थे
रंग रोजाना

ख्वाब पलते थे
आँखों के घोंसले में
चिडिया की
उडान की तरह

ख्वाब जागते थे
उसके सोने के बाद
जब जागते ख्वाब
तब कहाँ सो पाती थी वह
नींद से अक्सर
उठ जाती थी झिझककर।

अग्नि फेरों ने
बदल दी तस्वीर
ख्वाबों वाली

तब ख्वाब
उसके नहीं
पलने लगे
दूसरे की
आँखों के घोंसले में

माँ का ओहदा
बदल गया
बहुत कुछ...

अब माँ की आँखों में
पलती है औलाद
औलाद की आंखों में
पलते हैं ख्वाब...!


घर माँ के कंधों पर

लोग कहते हैं
शेषनाग के फन पर
टिकी है धरती

यदि सही है
लोगों का कहना

तो यह बात उससे
कहीं अधिक खरी है

कि मुस्तैदी से
खडा है घर
माँ के कंधों पर!


बुनियाद घर की

घर की धुरी
घूमती है
माँ के इर्दगिर्द

माँ सुनती है
माँ गुनती है
माँ बुनती है
घर का
एक एक सुख
हर सवाल का
जवाब माँ है।

सीखने की प्रत्रि*या में
माँ ने सीखा है
फकत जोडना
खुद को सबसे
सबको घर से

हिल जाती है
बुनियाद घर की
एक दिन भी
चली जाए
माँ अगर मायके।
मसला गंभीर है

चिंता और चिंतन के बीच
देवताओं ने
बुलाई है
आपात बैठक

मसला गंभीर है...!

इन्द्र का
डोला है आसन
खिसक गया है
धीरे-धीरे स्वर्ग
धरती की ओर
जाने कहाँ
किस छोर

नारद ने खोला रा*ा
‘महाराज!
जिसके चरणों में स्वर्ग
और आँखों में पूरा जहाँ है।
जिसने स्वर्ग को खींचा
और कोई नहीं माँ है...!’