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पाँच कविताएँ

राहुल राजेश
हक

पानी पर किसी सरहद का नहीं,
सिर्फ प्यास का हक है

पानी पर सियासत से नहीं,
सिर्फ मोहब्बत से नाम लिखा जा सकता है

पानी की बादशाहत ऐसी कि
इसपे नहीं टिकता
किसी बादशाह का अक्स भी

पानी की आँख
सिर्फ प्यासे का प्रतिबिंब पहचानती है ।

पानी पुल्लिंग है

मिट्टी, घास, जड
धरती, देह, आत्मा
सांस, प्यास, आस
सभ्यता, संस्कृति, प्रगति

सब स्त्रीलिंग है

पानी पुल्लिंग है
और पूरी पृथ्वी को
सींचता है ।
पानी का व्याकरण

स्नान
ध्यान
नहान
खान-पान

सब पानी के पेट से
उपजी संज्ञाएँ हैं

बर्फ, बादल, बारिश, भाप
सब पानी के सर्वनाम हैं

नदी-नाले, ताल-तलैये
झरने, सागर, डेल्टाएँ
सब पानी की मात्राएँ हैं

इंद्रधनुष
पानी का विस्मयादिबोधक चिह्न है!

बहना-बहाना
डूबना-डुबाना
उबरना-उबारना
सब पानी की क्रियाएँ हैं

जलाभिषेक
जलढारी
कलश-स्थापन
हस्त-प्रक्षालन
सब पानी की अभिक्रियाएँ हैं

बाढ-सूखा?
पानी की प्रतिक्रियाएँ हैं

भाषा के व्याकरण से भी
आदिम है पानी का व्याकरण

भाषा के व्याकरण से भी
आधुनिक-अभिनव है
पानी का व्याकरण

हम पानी पीने को
जल खाना तो कह सकते हैं
जल चढाने को
पानी चढाना नहीं कह सकते!

जलाभिषेक को
जलढारी तो कह सकते हैं
पनढारी नहीं कह सकते!!
हक

पानी पर किसी सरहद का नहीं,
सिर्फ प्यास का हक है

पानी पर सियासत से नहीं,
सिर्फ मोहब्बत से नाम लिखा जा सकता है

पानी की बादशाहत ऐसी कि
इसपे नहीं टिकता
किसी बादशाह का अक्स भी

पानी की आँख
सिर्फ प्यासे का प्रतिबिंब पहचानती है ।





देह तो लकडी है

जैसे बात के अंदर बात है
वैसे ही जात के अंदर जात है !

क्या ऊँची, क्या नीची
हर जात के भीतर हैं
कई-कई दीवारें खिंची !

बडों के भीतर भी कोई छोटा है
छोटों के भीतर भी कोई बडा है !

हर कोई एक-दूसरे की राह रोके खडा है
तू नहीं, मैं बडा, इसी बात पर हर कोई अडा है !

भाँति-भाँति के धरम हैं देश में
भाँति भाँति के वेश
कोई जोगी है, कोई नागा है
कोई सूफी है, कोई दरवेश!

जात-धरम की जोडी ये बडी तगडी है
हमने भी क्या खूब कसकर
इनको पकड रखी है!

जात-धरम के चक्कर में
मूल धरम-करम की किसे पडी है?

देह तो लकडी है
पर हमारी बुद्धि भी बञ्जर हुई पडी है !!











इस अरण्य में

इस अरण्य में
जिसने भी मिथ्या की शरण ली,
उसे अभयदान मिला

इस अरण्य में
जिसने भी सत्य का संधान किया,
वह छला गया, मारा गया

इस अरण्य में
सुना है, देवताओं का वास है।