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आठ कविताएँ

लाल्टू
ऐसा नहीं कि तुम अपने शहर से निकलती नहीं हो
मेरा शहर है जो तुम्हारी पहुँच से बाहर है
तुम्हारे शहर की गर्द में साँस लेते मैं थक गया हूँ
और तुम कहती हो कि मेरी चाहत में गर्द आ बैठी है

अपने शहर की *ारा-सी गर्द भेज रहा हूँ
इसकी बू से जानो कि यहाँ की हवा को
कब से तुम्हारा इंतजार है
इसे न*ााकत से अपने बदन में मल लो
यह मेरी छुअन तुम तक ले जा रही है

यह सूखी गर्द जानती है कि कितना गीला है मेरा मन
इसके साथ बातें करना, इसके गीत सुनना
पर इस पर कोई रंग मत छिडकना
यह मेरी ही तरह संकोची है

इसे चूमना मत
है यह गर्द ही
इसे करीब लाकर मेरी साँसों को सुनना
पैक करते हुए मेरी तडपती साँसें साथ कैद हो गई थीं
और इससे ज्यादा मैं तुम्हें क्या भेज सकता हूँ
मेरी साँसों में बसी खुद को भी महसूस कर लेना
इस तरह मुझे अपने में फिर से शामिल कर लेना

कभी तो तुम्हें याद आएगा
कि मेरी साँसों को कभी चाहा था
खुद से भी ज्यादा तुमने।





2. यहाँ

जब गाती हैं तो एक-एक कर सभी गाती हैं
रुक-रुक कर एक पर एक सवार हो जैसे
कौन-सी धुन किस चिडिया की है कैसे कहूँ

आँखें तलाशती हैं
तो दरख्त दिखते हैं जैसे
व्यंग्य-सा करते हुए कि क्या कल्लोगे

खिडकी तक चला ही जाऊँ
तो गिलहरी फुदकती दौडती दिखती है
उनकी बडी दीदी हो मानो

दिखने लगता है भरापूरा संसार
जब चारों ओर इतनी जंग-मार

खिडकी के अंदर से
देखता हूँ
यहाँ बचा है संसार
बची है रात की नींद
और दिन भर का घरबार

यहाँ। .


3. थकी हुई भोर

सुबह हड्डियाँ पानी माँगती हैं
पहले खयाल यह कि
फिर उठने में देर हो गई है
कंबल अभी समेटूँ या बाद में कर लेंगे
खिडकी का परदा हटाते हुए एक बार सोचना कि
खुला रखते तो जल्दी उठ सकते थे

आईना देखे बिना ही जान लेना कि शक्ल
*ारा और मुरझा गई है
एक और दिन यह कोशिश करनी है कि
थोडी-सी चमक वापस आ जाए
भले ही कल उठने पर वह फिर गायब मिले

असल में बुढापा एक सोच भर है
जिसमें यादें भी थकी हुई भोर बन कर आती हैं
यह बात मन में उमंग लाती है
कि दरअस्ल मुरझाते जिस्म के अंदर
पहले जैसा ही कोई शख्स छिपा बैठा है

फिर केंचुल फेंक कर
दिन रेंगता हुआ सामने आ जाता है
और फिसलती भोर पीछे रह जाती है।

4. नींद

वे अक्सर सोने से पहले कपडे बदलते हैं
और बीच रात उन्हें कभी सोए कपडों को
जगाना पडता है
कि गोलाबारी में सपने घायल न हो जाएँ

कोई शाम महक लिए आती है
*ारा सी छुअन को आतुर कोई पागल गीत गाता है
कोई चारों ओर के मलबे में से उफनती आती
हसरत के घूँट पीता है

नींद उनको भी आती है जो
जंग के माहौल में पलते हैं।

5. दरख्त

दरख्त में झेंप से अलग फक्कडपन भी है
अमूमन शांत खडे बरगद पीपल विदेशी दोस्तों के साथ
मस्त झूमने लगते हैं
गुलमोहर में वैसे भी बचपन से ही कुछ सनक-सी होती है

दरख्त की झेंप को पहचानता उसे बचाता हूँ
तो अपनी मस्ती में शामिल कर वह मुझे बचाता है।

मुझे अकेले में रोता हुआ देख कर दरख्त नाचता है
और अन्जाने ही मैं उसके नृत्य में शामिल होता हूँ
अँधेरा उतरता हो तो वह कह जाता है कि
सुबह वापस उनसे बतियाना न भूलूँ

सुबह खिडकी दरवाजे खोलते ही
हवा दरख्त को पास ले आती है
उसकी डाल पर बैठा सूरज हँसता है
उसे पता है कि दरख्त ने मुझे फक्कड बना दिया है

झेंपता हूँ और दरख्त कहता है
अमां सूरज को ज्यादा मसाला मत दो
कायनात में हर प्यार को उजागर करना इसका काम है

मुतमइन हूँ कि दरख्त मुझे बचाता है।
6. रंग

जो रंग तुमने मुझे दिए
वे मेरे कमरे की दीवार पर फैल गए हैं
कमीज के बटन उनके छींटों से भीगे हैं
होमर और फिरदौस को पता था
कि बातें इतनी सरल नहीं होती हैं
कि रंग बिखेर दिए जाएँ और कहानी खत्म हो जाएगी

मेरे तुम्हारे दरमियान जो खला है
उसमें से सोच की तरंगें सैर करती हैं
हालाँकि रंगों में कुछ ऐसा होता है
जिससे खला में कंपन होता है
सोच अपने साथ रंग ले जाती है

ऐसे ही वक्त के पैमाने पर
कब से खो जाते रहे हैं रंग
ऐसे ही खला में से सोच
ढोती रही है उन्हें
कुछ सच कुछ झूठ
जाने कितने खेल हैं रंगों में

रोशनी और अँधेरे के दरमियान
ऐसे ही खेल चलते रहते हैं
किस को पता होता है कि
कैसे खेल चलते रहते हैं
क्या रंग बिखेरते या समेटते वक्त हम जानते हैं
कि *ांदगी किस मौसम से गु*ार रही होती है
बहार और पतझड का हिसाब ठीक-ठीक रख पाना
और उनके मुताबिक सही रंग बिखेरना
हमेशा हो नहीं पाता है

हम तडपते रह जाते हैं
कि सही वक्त पर सही रंग क्यों नहीं बिखेर पाए
ऐसा लगता है मानो एक ही खेल चलता जा रहा है
खला को बीच में रख हम चक्कर काटते हैं

आखिर में जैसे सारे रंग खत्म हो जाते हैं
दीवारें फीकी रह जाती हैं
रागहीन सुबह शाम
न नीला न पीला
बस निःशब्द तूफान।

7. तस्वीर

यह तस्वीर कभी पूरी नहीं होगी
इसमें एक औरत है
वह पहाडों की ओर जा रही है
पहाड इतने दूर हैं कि
तस्वीर पूरी नहीं हो सकती है

पहाड तक जाना
कई कहानियों का पूरा होना है
बहुत सारी कहानियों से एक तस्वीर बनती है

मैं इस तस्वीर को कम से कम अल्फा*ा में
तुम्हें दिखलाना चाहता हूँ
कितनी कहानियाँ कहने के लिए मेरे लफ्*ा राजी होंगे
मैं नहीं जानता
चाहता हूँ कि औरत की कहानी कहूँ
तस्वीर में पहाड हैं और उन तक जाती सडक है
औरत के बदन में कपडे हैं
उसका जिस्म है
उसकी रूह है
यह तस्वीर कभी पूरी नहीं होगी

दो लफ्*ा तो उसके फटे जूतों को चाहिए
बहरहाल मैं यहीं रुकता हूँ
बीच में रुकना कविता की नियति है
कविता ने अनगिनत तस्वीरों को समेट लिया है
यह तस्वीर कभी पूरी नहीं होगी।

8. टुकडे
मेरे जिस्म के टुकडे समूची धरती पर फैले हुए हैं
मेरा बापू अपने जिस्म के टुकडे
पेशावर से रंगून तक फेंक आया था
बचपन में उसकी कहानियाँ सुनकर सोचता था कि
आदमी इतनी जगह कैसे बँटा हो सकता है

आज मैं घर आता हूँ तो ध्यान आता है कि
कुछ नाखून दफ्तर में छूट गए हैं
हालाँकि दफ्तर में प्यारे लोग मिलते हैं
पर अक्सर वहाँ मैं नाखून छोड आता हूँ
घर में मेरे आँसू हैं
यूरोप अमेरिका में मेरी टाँगें दफना दी जा चुकी हैं
फिर भी कंप्यूटर पर बैठे कभी
किसी टुकडे से बातचीत कर लेता हूँ

जहाँ भी मैं बिखरा पडा हूँ
हर जगह पुराने वक्त की भूख-प्यास में जीता हूँ
हजारीबाग के जंगल में कहीं अंदर जाकर
सुकुमार के कहने पर
सरकारी रसोइए ने आलू उबाले थे
दाल चावल बनने से पहले
भूख ने उबले आलुओं से दोस्ती कर ली थी
दूर देश में बर्फीले तूफान में किसी के संग की प्यास थी
इस पर मेरी कहानी तुम पढ सकते हो

मेरी कहानियाँ तुम्हारे लिए
मेरे जिस्म के सारे रहस्य खोल देंगी
आखिर मैंने चाहा ही क्या है
महज एक छटाँक प्यार के सिवा
ऐसे तनावों से गु*ारना
हर किसी के बस में नहीं होता
इसलिए ध्यान रखना कि
तुम कहीं मुझसे भी ज्यादा कमजोर न हो
जिस्मों की ऊपरी परतें पार कर ही
हम एक दूसरे को पढेंगे

नाजुक दिल जो है अनगिनत टुकडों में
टूटा बिखरा पडा।