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सुर्ख गुलाब

भरतचन्द्र शर्मा
आज तो उस दफ्तर में हडकम्प मच गया। सबको कानोंकान खबर हो गयी। कोई राधा की टेबल के दराज में एकदम ताजा लाल सुर्ख गुलाब का फूल रख गया। अपना काम कम तथा कानाफूसी अधिक हो रही थी। तरह-तरह के सवाल दफ्तर के कर्मचारियों के जेहन में उठ रहे थे ।
आखिर राधा की दराज में गुलाब किसने रखा होगा। किसने यह हिम्मत की होगी। शक की सुई कहाँ जाकर टिकेगी। क्या दफ्तर के जो बाबू अभी-अभी नौकरी में लगे हैं, ऊपर से छडे भी हैं उनमें से कोई एक हो सकता है? कुछ लोगों का कयास हो सकता है-रसिक मिजाज बडे बाबुओं में से भी कोई हो सकता है। क्या नये प्रशिक्षु अफसरों में से कोई एक तो नहीं है? कुल मिलाकर सब अपने-अपने अनुमान लगाने लगे।
राधा की दराज में गुलाब रखने से इस दफ्तर की शांति भंग होने का अंदेशा हो गया। इसका मुख्य कारण है दफ्तर की सर्वेसर्वा एवं मुख्य अधिकारी स्वयं एक अधेड एवं सख्त मि*ााज महिला है। वह इतनी सख्त है कि कोई उनके सामने कुर्सी पर बैठने की हिम्मत नहीं कर सकता। कानून एवं नियमों की ज्ञाता है, लोग कहते हैं-एक नम्बर की कलम कसाई है। कलम कसाई का अर्थ है छोटी से छोटी गलती पर भी इतनी सख्त कार्यवाही करना जिसमें बचने की कोई गुंजाइश नहीं रहे। बहुत कम बोलना व सख्त लहजे में बात करना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। किसी ने मेम सर को हंसते अथवा मुस्कुराते नहीं देखा। उनका चेहरा भावशून्य एवं सख्त है।
उनके अतीत के बारे मे किसी को कुछ पता नहीं है। स्टाफ में कभी इतनी ही बात होती है कि वो कभी आई.आई.एम. की टॉपर रही हैं।
वह कहाँ की है? परिवार में कौन है? शादीशुदा है, अविवाहित है, परित्यक्ता है, विधवा है?
मसलन महिला की किस केटेगरी में आती है यह एक यक्ष प्रश्न है।
इसके विपरीत राधा के बारे में तो कमोबेश दफ्तर का हर कर्मचारी जानता है। वह मगन की विधवा है। मगन इसी दफ्तर में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मतलब चपरासी था।
एक नम्बर का नशेडी था। नशे की लत बहुत तगडी थी। दिन में भी उसकी खुमारी नहीं उतरती। उसकी आँखों के डोरे लाल अंगारे की तरह दहकते थे। दिन में भी मुँह से आने वाली दुर्गन्ध को रोकने के नाकाम प्रयास में वह पान अथवा गुटखे चबाया करता था।
मगन किसी की परवाह नहीं करता। मम सर के पहले वाले सर स्वयं मदिरापान में रुचि रखते थे। इसी कारण से मगन की उनके साथ पटरी बैठ गयी थी। वह तो सरेआम स्टॉफ को जतलाता रहता था-‘अफसर मेहरबान तो गधा पहलवान।’
लगभग तीस बरस के मगन की जोरू यह राधा, जो पचीस के आस-पास थी, दो बच्चियों की माँ थी। गाँव गंवई की प्राइमरी तक पढी सीधी सादी राधा जब मगन को दारू के लिये टोकती तो वह यदा कदा उस पर हाथ भी उठा देता।
लुगाई जात को अपने दायरे में रहना चाहिये। क्या करती राधा बेचारी अपनी दोनों बेटियों को छाती से लगाकर सुबकती रहती।
एक दिन भरी जवानी में राधा को असहाय छोडकर मगन यह संसार छोड गया। क्या हुआ था उसे, बस खून की चार उल्टियाँ। दरअस्ल जब तक पता चला बहुत देर हो चुकी थी।
कहते हैं उसके पेट की आँतें सड गयी थी, वह केन्सर से मरा था।
मगन के मरने के तीन महीने बाद दफ्तर का परिदृश्य भी बदल गया। बडे साहब भी ट्रान्सफर होकर कहीं चले गये। उनकी जगह पर यह मेम आ गयी। इनकी सख्ती और लहजे से डर कर ही स्टॉफ इन्हें ‘मेम सर’ कहने लगा था।
समय की पाबंदी, काम में तत्परता, मटरगश्ती बंद होना, निर्धारित समय में ही लंच, कार्यालय में आने वालों के साथ मृदु व्यवहार। कुल मिलाकर दफ्तर का पूरा परिदृश्य अनुशासन की धार पर चलने लगा।
मेम सर बहुत कम किसी को अंदर बुलाती थी। बुलावा आया तो समझो शामत आ गयी। केबिन की घंटी बजते ही बाहर स्टॉफ के कान खडे हो जाते, क्या पता किस पर गाज गिरे!
राधा के पति की मृत्यु के चार माह बाद किसी रिश्तेदार ने उसके बाप को समझाया।
ऐसे ठाले बैठे रहने से कुछ नहीं होगा। मगन के दफ्तर मं जाओ उसकी नौकरी तो कम ही रही पर जो भी रुपया मिले उसके लिये लिखा पढी करो। हो सके तो राधा को साथ लेकर जाओ। कहीं कोई अनुकंपा नौकरी मिले तो प्रयास करो। राधा के बाप ने संकोचवश कहा- ‘मेरी बेटी तो अनपढ है दस्तख्त करना तथा थोडा बहुत पढ लेना (बाँच लेना) जानती है। ये क्या नौकरी करेगी। अभी तो मगन को मरे छः महीने भी नहीं हुए हैं। साल भर का होग (शोक) हो जाने पर देखेंगे।
रिश्तेदार ने समझाया इस चक्कर में कहीं समय निकल गया तो क्या करोगे? इसके ऊपर तो दो बच्चियों की जिम्मेदारी और लंबा जीवन खडा है।
राधा को भी संकोच हो रहा था फिर भी बाप के कहने पर घूंघट काढ कर मगन के दफ्तर में गयी थी।
बाप तो मेम सर के पाँवों में ही पड गया। राधा घूंघट के पार देख कर आश्चर्यचकित थी कि कोई औरत इतने बडे पद पर भी हो सकती है। उसको दूसरा आश्चर्य हुआ मेम सर तो उससे दस साल बडी लगती है फिर भी मांग में सिन्दूर नहीं है तो क्या कुँवारी है या फिर उसी की तरह है।
मेम सर ने उसे हिदायत दी-आईन्दा यह घूंघट निकाल कर नहीं आए। क्या करती, स्वीकृति में सिर हिलाया।
दो तीन महीने में उसको मगन का भुगतान भी मिल गया साथ ही मगन के दफ्तर में चपरासी की नौकरी भी लग गई। दफ्तर में उसे बहुत संकोच होता। सारा दफ्तर अलग-अलग आयुवर्ग के पुरुषों से भरा पडा है।
कुल मिलाकर इस दफ्तर में अब दो महिलायें थी। एक धरातल पर और दूसरी शिखर पर। प्रारंभ में उसे कुछ भी पता नहीं चला। चपरासी का क्या काम है, कैसे कागज, रजिस्टर, छाँटने हैं कौनसी फाइल किस टेबल पर रखनी है। आगंतुक कोई फार्म माँगे तो कहाँ से लाकर देना है।
राधा के चेहरे पर एक उदास खामोशी थी, सूनी मांग तथा खाली कलाइयों एवं प्रायः सफेद साधारण साडी में वह बर्फ की किसी गुडिया जैसी लगती।
मेम सर का केबिन न केवल साफ करना बल्कि सजाकर रखना तथा कागजों को छाँटने का काम उसको दिया गया। बडे मनोयोग से वह यह काम करने लगी। मेम सर के केबिन में गुलदस्ता सजाना तथा पर्दे आदि बदलना, सोफों की धूल झाडना आदि काम बडे परिश्रम से करती।
दफ्तर के पीछे वाले हिस्से में उसे एक पुरानी टेबल दी गयी थी जिस पर कागज तथा फाइलों की छंटनी का काम करती थी।
कई बार उसे लगता कि पुरुषों की आँखें उसे घूर रही हैं तो कई बार उसके पति के साथ काम करने वाले चपरासी उससे अतिरिक्त सहानुभूति प्रकट करने लगते। राधा को यह सब विचित्र लगता। वह पुरुषों से भरे पडे इस दफ्तर में नौकरी करने की हिम्मत मेम सर को देखकर ही जुटा पायी। यद्यपि उनके बीच शायद ही कोई संवाद होता हो लेकिन मेम सर की कही हुई एक बात राधा के जेहन में आत्मविश्वास के साथ खडी है- कभी कोई समस्या आये तो मुझे बताना, चुपचाप नौकरी छोडकर भाग मत जाना।
राधा को नौकरी करते हुए साल भर का समय होने आया। राधा का किसी सहकर्मी से आवश्यक संवाद ही होता। आचरण में तो वो शर्मायी सकुचाई ही रहती पर वेशभूषा में थोडा परिवर्तन जरूर हुआ। घूंघट काढना तो दूसरे दिन से ही बंद कर दिया। अब कपाल पर बिंदी लगाने लगी, कलाइयों में चूडियाँ पहनने लगी। बालों में अलग अलग रंग के रिबन बाँधने लगी। उसका चेहरा वैधव्य के दंश से मुक्त होकर इन्द्रधनुषी रंगों में ढलने लगा। दफ्तरी माहौल, भाषा तथा कटाक्षों को कुछ-कुछ समझने लगी। उसमें यह परिवर्तन पुरुषों के लिये आकर्षण का केंद्र बनने लगा।
आज सवेरे राधा जब काम पर आयी तो मेज की दराज (जिसमें ताला तो कभी लगता ही नहीं था) खोलने पर लाल सुर्ख गुलाब मिला। यकायक उसके चेहरे पर अनेक रंग आये और चले गये। वह गुलाब की भाषा और अर्थ भी नहीं समझती थी। नौकरी में तनख्वाह मिल रही थी। उसने किश्तों पर एक टी.वी. खरीदा था। उसके विज्ञापन तथा मॉडल के क्रियाकलापों से वो स्त्री-पुरुष के मध्य देह की नई परिभाषा को कुछ-कुछ समझने लगी थी। आज इस गुलाब का पूरा अर्थ तो वह नहीं समझ पायी पर यह अनुमान तो लगा लिया कि स्त्री-पुरुष के मध्य की भाषा में गुलाब की कोई भूमिका है।
क्या भूमिका हो सकती है नहीं पता। इसी असमंजस में कहीं कोई अनहोनी की आशंका से ग्रस्त हो गयी। कुछ नहीं समझ में आया तो फूल लेकर मेम सर के केबिन में चली गयी।
मेम सर बडे बाबू को कुछ डिक्टेट करवा रही थी। राधा एक कोने में चुपचाप खडी थी। यकायक मेम सर ने नम्बरी चश्मे के पार कनखियों से राधा को देखा।
-बोलो क्या बात है, राधा?
राधा ने डर एवं संकोच के साथ हथेलियों से गुलाब का फूल ऊँचा किया- जी मेम सर, मेरे टेबल की दराज में न जाने कौन और क्यों यह फूल रख गया है।
चढ गयी थी मेम की त्यौरियाँ। शेरनी की तरह दहाडी-हू इज दिस इडियेट नोनसेन्स। समझते हो वर्क प्लेस पर इन बातों का क्या मतलब होता है? जाओ जाकर कडा संदेश दे दो। यह हरकत करने वाला जायेगा नौकरी से।
बडे बाबू की कलम सहम गयी। डर के मारे राधा के हाथ से गुलाब का फूल गिर गया। पँखुरियाँ चारों तरफ फैल गयी।
दिन भर दफ्तर में कानाफूसी चलती रही। केन्टीन में भी फूल चर्चा का विषय था। राधा आलमारियों में कुछ जमा रही थी तभी उस पर स्टॉफ की बातें उसके कानों में पडी। गुलाब के फूल के थोडे बहुत अर्थ भी खुलने लगे।
स्टॉफ बतिया रहा था।
-यार, ये राधा भी बहत भोली है। फूल लेकर मेम सर के पास जाने की क्या जरूरत थी? इतना भी नहीं समझती है। फूल का मतलब कि कोई इसे चाहता है। प्यार करता है।
कोई कह रहा था- बेचारी विधवा है, दो बच्चों की माँ है। उसके साथ यह बेहूदा हरकत किसी को नहीं करनी चाहिये।
किसी ने कहा- जब आयी थी तब गंवई गंवार थी। अब तो इसके भी पंख निकल रहे हैं। देखना कुछ दिनों में उडान भरेगी।
- तो क्या हुआ जीवन भर इस नशेडी मगन के नाम को रोने से रही। किसी के साथ घर तो बसाना ही पडेगा।
-तो फिर फूल रखने के बजाय उस आदमी को राधा से ही पूछ लेना था।
बात अब फूल रखने वाले की तरफ घूम रही थी। अफसर बाबूओं पर, बाबू चपरासियों पर तथा चपरासी उन दोनों वर्गों में अपराधी के बारे में कयास लगा रहे थे। कुँवारे एवं शादीशुदा भी एक दूसरे पर शक कर रहे थे।
किसी ने कहा- फूल के नाम पर भी धोखे हो सकते हैं। सारी बातें सुनकर राधा का मन बेचैनी में पड गया। वह यह भी नहीं समझ पाई कि फूल की बात मेम सर को बताकर उसने ठीक किया या गलत।
आज मेम सर भी अपने बंगले पर आकर बेचैन एवं व्यग्र रही। विचार में पड गयी। आज का कदम राधा के पक्ष में था या विपक्ष में था। उनका स्वयं का जीवन सूखी रेगिस्तानी नदी की तरह है। वास्तव में कोई राधा से सच्चा प्यार करता हो और उसको सहारा मिल जाये तो क्या बुरा है?
लगभग महीने भर तक यह चर्चा चलते-चलते मंद पड गयी। फूल रखने वाले के बारे में कुछ भी पता नहीं लगा। कुछ लोग यह भी संभावना टटोल रहे थे हो सकता है स्टाफ से बाहर का कोई आदमी हो। यहाँ तो जनता जनार्दन आती ही रहती है।
लगभग दो माह बाद राधा को अपने दराज में फिर लाल गुलाब मिला। इस बार भी उसे समझ नहीं आया क्या करे। देखा दफ्तर में अभी कोई नहीं है। न जाने क्या सूझा, उस फूल को मम सर के केबिन में गुलदस्ते के मध्य सजा कर रख दिया।
वह भीतर से डर रही थी। आज हो सकता है मेम सर के आते ही धरती हिल जायेगी। दफ्तर शुरू हो गया। राधा कोई फाइल देने केबिन में गयी। उसे आश्चर्य हुआ आज से पहले सर मेम की यह मुद्रा उसने कभी नहीं देखी थी।
सर मम फूल को एकटक निहार रही थी। उनके चेहरे पर अनेक इन्द्रधनुष तैर रहे थे।
आश्चर्य में पड गयी, सर मम।
कौन हो सकता है? उनके दायरे इतने सख्त हैं कि कोई मातहत तो यह हरकत कर ही नहीं सकता। ऊपर से अधिकारी भी उनके व्यक्तित्व का गांभीर्य देखकर सहम जाते। बस काम से काम। न एक शब्द कम न ज्यादा। उनके आभामंडल में किसी ने झाँकने का प्रयास भी किया हो तो तिलचट्टों की तरह दम तोडते देर नहीं लगी होगी।
गत दो माह की घटनाओं के भीतर गहराई तक चली गयी। राधा की तरह असभय वैधन्य के कारण जीवन के रूखेपन का शिकार न हो जाये। महिला होते हुए भी दूरी इतनी बना रखी है, इस विषय में मौखिक कुछ कहना अपने तिलिस्म से बाहर आना था। जो उन्हें कतई स्वीकार न था।
ऐसे ही किसी पल में उन्होंने संकेत की भाषा का उपयोग ठीक समझा। बस रख दिया एक फूल राधा की दराज में।
आज वही फूल उनके गुलदान में लौट आया। वो विचार में पड गयी, तो क्या राधा भी उनके पाषाण व्यक्तित्व में सेंध लगाकर कोई नदी खोज रही है?
पहली बार फूल का रंग सर मेम के चेहरे पर पसरने लगा।