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ट्रांसप्लांट

संदीप अवस्थी
‘‘अभी नही मिला है सर, आपकी बच्ची से मैच करता हार्ट, हम पूरी कोशिश कर रहे हैं...‘‘कहते कहते डॉक्टर के चेहरे पर पसीना आ गया। ‘जी पैसों की कोई बात नहीं। 2 करोड काफी है इंतजाम के लिए मिलना चाहिए। मैं जल्द खबर करता हूँ आपको।’ यह बडे शहर का बडा हॉस्पिटल था पूरा ए.सी. जगमगाता हुआ। यहां के मालिक डाक्टर प्रमोद इस बडे राजनेता की बेटी के दिल में हुए सुराख के लिए हार्ट ट्रांसप्लांट की तलाश में थे। पर नहीं मिल पा रहा था। वैसे हर बार मिलते थे हर तरह के ओरगन। मुर्दा या जिंदा लोगों के भी। पर इस छोटी आयु का हार्ट नहीं मिल रहा था। सब जगह गुपचुप खबर करदी गई थी।
छोटी गली जहाँ खत्म होती है वहां से बडी गली शुरू होकर आगे मुख्य सडक से मिलती है। वहीं वह बडा तो नहीं पर ठीकठाक सा स्कूल है। जैसा छोटे शहर में होता है। आसपास बच्चे इसी छोटी गली से स्कूल आते जाते हैं। क्यों कि मुख्य सडक से बहुत घूमकर जाना पडता है। गली सर्विस लेन की ही तरह थी, सुनसान और खाली खाली, जिसमें दिन में भी अंधेरा रहता क्योंकि ऊपर के मकानों ने उजाले को नीचे आने की इजाजत नहीं दी थी। तीन बजे के बाद का वक्त था। उसे देर हो गई थी स्कूल से निकलने में। मैडमजी के साथ कॉपियों को जमाने फिर स्टाफ रूम में रखने तक उसकी सभी सहेलियां जा चुकी थीं। छठी क्लास में पहली परीक्षा में अच्छे अंक लाने से गोरी चिट्टी गुडिया सी श्रेया को मैडमजी द्वारा मॉनिटर बना दिया था। पिछले महीने ही उसका दसवाँ जन्मदिन सभी घरवालों ने खूब धूमधाम से मनाया था। ढेर सारे मिले उपहारों को याद करती नन्हे-नन्हे पाँव से चलती जा रही थी वह उस सुनसान पडी गली में। आज बादलों की वजह से उजाला भी कम था। तभी उसे सामने कोई चमकीली चीज दिखी। वह ठिठकीया, देखा पाँच का सिक्का था। मम्मी ने मना किया है किसी की गिरी चीज नहीं उठाना, वह आगे बढ गई। दूर छुपी दो जोडी आँखें देख रही थी। चन्द कदम दूर एक और फंदा था। नया नकोर ज्यामिती बॉक्स पडा था। लाल रंग का मिक्की माउस बना हुआ। कदम रुके, बालमन ललचाया, आँखों में चमक आई पर .......। मम्मी ने कहा है कुछ भी नहीं उठाना है। स्कूल से सीधा घर। वह अंधेरी गली आधी पार हो चुकी थंी। उसके बाहर दायीं हाथ की तरफ मुडते ही सामने वाली कॉलोनी में उसका घर था। भूख लग रही थी । मम्मा के हाथ का स्वादिष्ट भोजन याद आने लगा। घूरती आँखों में खीज, निराशा के भाव आए फिर एक ने इशारा किया। सामने से एक ऑन्टी कुछ ढूंढती हुई गली में आगे बढी। श्रेया ने उन्हें सौ कदम की दूरी पर देखा गली में कुछ ढूंढते हुए। वह पास आई और बोली, ‘‘मेरी बेटी की डिबिया गिर गई है, क्या तुमने देखी?’’ बच्ची की मासूम आँखों में डिबिया की पहचान के भाव उभरे। उसने घूमकर पीछे इशारा किया और कुछ बोलने के लिए मुँह खोला। तभी पास के मकान की साइड दीवार से चिफ आदमी ने उस पर एक चादर सी डाल दी। उसमें से बडी भीनी भीनी खुशबुएँ उठ रही थी। जब तक वह सोचती वह बेहोश हो गई थी।
............ जयपुर भोपाल सुपरफास्ट शाम छह बजे चलती है और भेपाल सुबह 8 बजे पहुँचती है। जाना जरूरी था क्योंकि अचानक से अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय से अंतरिम पद के लिए काल आया था। तत्काल में भी जगह नहीं मिली तो जनरल बोगी में बैठा हुआ था आर्यन। पीएचडी नेट दर्शनशास्त्र में करने के बाद भी कोई जगह नहीं थी। भारतीय संस्कृति, वेद दर्शन के देश में। जिस विषय को हर कॉलेज, स्कूल में होना चाहिए वह सभी जगह से गायब हो रहा था। बाजारवाद का असर था या खराब किस्मत। अब यहां एक सीट पर वह इंटरव्यू के लिए चुना गया था अस्थाई व्याख्याता। अभी रात्रि के 9 बजे थे पर इस बोगी के लोग बैठे बैठे सोने लगे थे। सामने ही पुराने, मैले कपडे पहने वह औरत बैठी थी। साथ में मैल भरे बेतरतीब कटे बालों, चेहरे पर कालिख और पुरानी सी फ्राक में वह बच्ची, जो सूनी ऊंघती सी आंखों से कभी बाहर देखती बैठी थी। अभी अभी एक स्टेशन गया था भीड के मध्य से बडी मुश्किल से वह पूरी सब्जी लेकर आया था कौर तोडी ही था कि उस बच्ची की निगााहों को उसकी ओर देखते पाया। उसने एक पूरी में सूखे आल की सब्जी लपेटकर बच्ची की तरफ बढाई। तभी ऊंघती सी औरत का हाथ बीच में आ गया। ‘‘लाओ साहब मैं खिलाती हूँ।’’ बच्ची ने सहमी सहमी आँखों से खिडकी की ओर मुँह कर लिया। ‘‘लो खाओ.......! बच्ची ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। आर्यन खाते हुए बाहर देख रहा था। तभी धीमी-सी आवाज आई ‘‘नहीं खाना मुझे’’। वह चौंका तभी वह स्त्री चेहरे पर विनम्रता लाती बोली, ‘‘खाले बेटा, अब नहीं डांटूंगी तुझे। गुस्सा मतकर। खालो बेटे तंग नही करते मम्मी को।’’ बोगी के अधिकांश लोग सो गए थे वह भी बैठे बैठे सोने की तैयारी में लग गया। मार्च के महीने में भी काफी सर्दी थी। बोगी खचाखच भरी थी। रात को उसके पाँव के पास आहट हुई। उसने नींद से बोझिल आंखों से देखा वह महिला दो सीटों के मध्य की जगह पर अखबार बिछाए बच्ची को लिपटाए सो रही है। वह आँखें बंद करने वाला ही था कि उसने देखा वह बच्ची नींद से बोझिल होती अधखुली आँखों से उसी की ओर देख रही है। वह कुछ पल उन आँखों को देखता रहा फिर उसने सीट से सर टकराया और आँख बन्द करली। बोगी में कुछ आँखें जगी हुई थी जो उसे ही देख रही थी।
वह श्रेया थी। वह दूध सी उजली,मम्मी पापा की लाडली परी। उस दस साल की बेटी के रेशमी बालों पर केंची चलाकर मिट्टी भर दी थी। पूरे बदन पर कीचड, मिट्टी, कालिख, ग्रीस फिर ऐसे झाडा की आधी लगी रही। चाय में कुछ नशीला पदार्थ खिलाया जिससे वह आधी बेहोशी में। उठाने वाली टीम अलग, कैरियर वाली अलग जिससे किसी को शक न हो। उधर रात को मम्मी पापा ने सब जगह तलाशकर रिपोर्ट दी। पुलिस जाँच कल दिन में समय हुआ तो प्रारम्भ करेगी वरना क्या जांच। और जरूरी कार्य है हफ्तावसूली के बदमाशों, नेताओं, हत्यारों से अपने बच्चे का खुद खयाल क्यों नहीं रखते ये लोग? तब तक बच्चा शहर से राज्य सं सुपरफास्ट ट्रेनों से हजारों मील दूर।
कभी खुद को खोकर देखें कि कितना मुश्किल होता है खुद को ढूंढ पाना। फिर यह तो छोटे-छोटे बच्चे, जिन्होंने मम्मी पापा के बिना अगला मोहल्ला तक नहीं देखा कभी। उनके ऊपर संगठित शिकारियों की घात।
उधर बात हो गई थी ऊपर तक। आंकडे गवाह हैं अधिकांश बच्चे कभी नहीं मिलते। बच्चे कहाँ जाते हैं? ट्रैनों में तो रोज ही देश के हर कोने से अपहृत बच्चे ले जाए जाते हैं। आरपीएफ के अनुभवी लोग जानते हैं किस पंछी का क्या काम है, परंतु भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है मासूम बच्चों की तस्करी।
पीछे रह जाती है सूनी आंखों से राह तकती माएँ, भाई, बहन, खाली लगता घर, गलियाँ। वे स्कूल के साथी, खेलते बच्चे सब यादों में ढूंढते रहते हैं। उधर यह भी याद करते हैं पल पल माँ का आँचल, अपना घर, पापा का प्यार, साथी संगी। परन्तु अब इन सबसे इस जन्म में मिलाप नहीं होगा शायद।
‘‘हाँ सुरेश ट्रेन वही है। सीधे वहाँ मत ले जाना, सावधान रहना। तुम्हारा पेमेंट पिछली बार का भी मिलाकर 3 लाख भिजवा रहा हूँ।’’ फिर उसने फोन रखकर अपने एसी आफिस से बाहर देखा और एक फोन मिलाकर धीमी आवाज में बोला, ‘‘जी जैसा चाहा वैसा ही पार्सल है। कल आपकी खिदमत में होगा।
पर....’’।
‘‘पर क्या?’’ ‘‘थोडा पेमेंट बढा देते तो सर जी?’’ क्यों? बीस लाख कम है? और इतने पैसों का करोगे क्या?’’
‘‘हे हे हैं एसी ऑफिस, गाडी सब मेंटेन करना पडता है। और सारा खतरा हमारा ही है। क्योंकि हम सामने हैं। ऊपर से पुलिस, आप जानते ही हो बहुत लालची हो गया है। तीस करदो।’’
कुछ देर बाद उधर से आवाज आती है,‘‘ठीक है। अगली बार 25 डन लेकिन अब एक साल तक कोई डिमांड नहीं। और थोडा जल्दी जल्दी पार्सल मंगवाया करों। बहुत डिमांड है।’’ थैंक यू, सरजी बिल्कुल हो जाएगा, कोई दिक्कत नहीं।’’ वह खुशी से किलका।
उधर डॉक्टर ने फोन रख अपनी सेक्रेटरी से कहा, कल पार्सल आ रहा है। तुरंत सभी पार्टीज को खबर करदो कि बाकी पेमेंट जमा करा दें।’’
‘‘सर, दो विदेशी बच्चे भी इंतजार में हैं, उन्हें भी?’’ ‘‘ओह ओह, let me think ..... एक का किडनी खराब था और दूसरे का?’’
‘‘सर, लीवर विकसित नहीं हुआ है बच्चे का। वह बदलना है।’’
‘‘ओके ओके forgotton...that's good... सुनो उन्हें ऐसे कहना कि अर्जेंसी है। तो डबल चार्ज लगेगा। वह छह महीने बाद आएँ।’’
‘‘सर.....सर....डबल मीन्स एक करोड? ‘‘वह खुशी दबाती बोली।
‘‘स्टुपिड, ठ्ठश्ाह्ल श्ाठ्ठद्ग ड्ढह्वह्ल एक एक करोड दोनों से। दो पार्टियाँ है न। एक किडनी केस और सऊदी वाले बच्चे का लीवर ट्रांसप्लांट।’’
‘‘जी....जी सर’’ वह चेक करती बोली.... ‘‘वह आंखें जिस बच्चे को लगानी है और फेफडे (lungs)वाले को भी डबल कह दूं?’’ डॉक्टर ने सोचा, विचार किया फिर कहा, ‘‘नहीं नहीं। वह पहले 25-25 लाख दे चुके हैं। हमें भी थोडी मानवीयता दिखानी चाहिए।’’
....फिर डॉक्टर ने सेलफोन से एक कॉल लगाया। ‘‘जी जैसा चाहिए था वैसा ही मिल गया है हार्ट। अब आफ बच्चे को नया दिल मिल जाएगा दो दिन में। but sir..... ‘‘काफी मेहनत और खर्च हुआ है थोडा यदि और आप.......। क्या !! थ्री करोड? ओ so nice of you sir....thnx आप कल उसे एडमिट करें। don't worry....thank you sir."
..........अपहृत बच्ची ट्रेन में ही थी पर उसकी मासूम आँखों, गुलाबी दिल, लीवर, किडनी, आँतों, फेफडों का करोडों में सौदा हो चुका था। यह साउथ एशिया के गरीब मुल्कों का स्वर्ग था। मेडिकल टूरिज्म, ऑर्गन ट्रांसप्लांट बढा है कई गुना पर किस कीमत पर? कहाँ से आते हैं हर आयु वर्ग के ताजा ताजा निकले हुए अंग, धडकते हुए दिल? बस जरा-सा आपरेशन करके इन सब चीजों को अलग अलग करके सेफ लिक्विड जार में पैक करके खास कूलिंग में फ्रीज रखना। इन मासूम गुलाबी बच्चों के मजबूर छोटे शहरों में रहते मां बाप कहाँ तक और कैसे ढूंढते? कौन सुनता उनकी? अलग अलग जारो में महानगरों के हॉस्पिटल्स में कैद उनके बच्चों का ताउम्र कोई पता नहीं लगता। 2ड्ढष्,प्लाज्मा से भरपूर खून और हड्डियाँ तक मुँह माँगे दामों में बिक जाती। तभी हजारों हजार बच्चे कभी नहीं मिलते।
विदेशी आका, डॉक्टर्स का फ्री विदेश यात्राओं में सिखाते, समझाते हैं। अपनी ही फ्रेंचाइसी भारत में खोलने की पेशकेश। करोडों की मशीनें, मामूली कीमत पर इनके शहरों के हॉस्पिटल्स में। जिनसे अंग सुरक्षित अलग अलग निकाले जा सकें नर पिशाचों द्वारा। शहरों, कस्बों तक में बडे भव्य निजी हॉस्पिटल्स,नर्सिंग होम खुलते जा रहे हैं। जिनकी प्रत्यक्ष आमदनी मरीजों से बडी ही मामूली है। पर वह उगते और जमते जा रहे हैं। जीते जी मासूमों के निकाले गए दिलों, आँखों, लिवर, किडनी, फेफडे, खून, ब्रेन में जवाब छुपा है। जितने अपराधी तत्त्व हत्याएँ अपने पूरे जीवन में नहीं करते उससे कहीं ज्यादा यह भ्रष्ट डॉक्टर्स, हास्पिटल्स हर महीने करते हैं।
भोर के 5 बजे थे कोई छोटा स्टेशन था जहाँ क्रासिंग थी। उसने पांव हिलाए तो कुछ अटका। वह झुका, देखा कोच के फर्श पर सोती बच्ची ने अपना छोटा-सा हाथ उसके पांव पर लपेट रखा था। वह हाथ हटाने झुका तो देखा उसके मासूम चेहरे आंसू बहकर सूख गए थे। उस औरत का एक हाथ बच्ची को कसकर जकडे था। उसने सोचा क्या करें जगह नहीं भी हो तो भी लोगों को यात्रा करनी ही पडती है। उसने धीरे से फिर आंखें बंद करलीं।
उज्जैन, महाकाल की नगरी, ठीक साढे छह बजे आया। कुछ लोग उतरे। चाय वालों की आवाज से आँख खुली, इधर उधर देखा, संभाला सामने वह औरत और बच्ची नहीं थे शायद उतर गए थे। बच्ची प्यारी और भोली थी। उसने गहरी साँस ली और प्लेटफॉर्म पर उतर गया। महाकाल को प्रणाम कर आज इंटरव्यू अच्छा हो जाए की कामना की। चाय पीकर वह वापस सीट पर आया और बाहर देखन लगा। यहां से भोपाल एक घण्टे का रास्ता है। ट्रेन धीरे धीरे चल पडी कुछ देर बाद टॉयलट से वही औरत बच्ची का हाथ पकडे आती दिखी। बच्ची अभी भी नींद में थी। सुबह की ठंडी-ठंडी हवाएँ मन को प्रफु लित कर रही थी। सुबह के उजाले में बच्ची की मासूम आंखें, चेहरा और प्यारा लग रहा था। पर वह एकदम गुमसुम, चुप चुप न जाने क्यों थी? शायद रात को नींद नहीं आई होगी। पास बैठी औरत उसी की ओर देख रही थी। झटपट उसने बच्ची के बालों को ठीक किया और अपने से लिपटा लिया। बच्ची की आंखों में उदासी गहरा गई थी। खेरगढ आ गया था, इसके बाद भोपाल। तभी एक आदमी प्लेटफॉर्म से आया और खिडकी में से बिस्किट का पैकेट औरत को देकर बोला, ‘‘ले कुछ खिला दे इसे, भूखी होगी। महिला ने पैकेट से बिस्कुट लिए और धीमी आवाज में बोली, ‘‘ले खाले करमजली।’’ और दो बिस्कुट उसके मुँह में ठूंस दिए।
ऊधर उस बडे निजी हॉस्पिटल के चमचमाते एयर कंडीशंनड आईसीयू ओटी में तैयारी हो रही थी। जहां बच्ची की आँखो, लीवर, दिल, किडनी, फेफडों, ब्रेन आदि को निकालकर अलग अलग कॉटेनिंग लिक्विड नाइट्रोजन बॉक्स तैयार थे। इनमें माइनस उनचालीस डिग्री तापमान होता था जिससे जीवित अंग खराब न हों। उधर कॉटेज रूम में अमीरों के बीमार बच्चे, विदेशी बच्चे एडमिट किए जा रहे थे। इतनी सीक्रेसी, इतनी चुप्पी थी कि मरीजों के घर वाले भी मुँह नहीं खोल रहे थे। बस चुपचाप धीमा धीमा, रिदम-सा संगीत था मौत की आहट का। मौत नन्ही-सी जान की जो ट्रेन में ही थी अभी। पर पहुँचते ही यहाँ दो घण्टे में पूरी स्केनिंग, टेस्ट, करके ऑपरेट करके पुर्जा-पुर्जा खोल दी जाने वाली थी। ताजा शुद्ध रक्त तक भरने की व्यवस्था थी। ट्रेंड, निर्मम लोग ऐसा असंख्य बार कर चुके थे।
ट्रेन भोपाल पहुँच रही थी। आर्यन ने अपना बैग संभाला। बोगी आधी खाली हो गई थी। सामने एक निगाह डाली। बच्ची का एक हाथ औरत के हाथ में था। बच्ची की आँखें उसे उठता पाकर ऊपर उठी मानो कुछ कहना चाहती हो। पर आवाज नहीं निकली। अपनी मम्मी की लाडली श्रेया उन्हें याद करती नहीं जानती थी कि बस चन्द घण्टे ही उसकी जिन्दगी बाकी थी। नशीली दवा का असर था कि वह चाह कर भी बोल नहीं पा रही थी। उसने उन आँखों में देखा, लगातार रोने से सूजी हुई उदास आँखें। पपोटो पर आंसू सूखकर जम गये थे। उसकी निगाह सशंक भाव से बाहर किसी को तलाशती उस औरत के काले कठोर चहरे पर टिकी। आर्यन ने गहरी साँस ले मुस्कराते हुए बच्ची के सिर पर हाथ फेरा और उतरने के लिए कोच के गेट की ओर चल दिया। प्लेटफॉर्म पर उतर कर वह आगे बढता भीड में खो गया।
‘‘चला गया’’ पीछे से आता वह आदमी बोला ‘‘हाँ, मैं तो डर रही थी कि कहीं यह मुँह न खोलदे। पर वह नशे का बिस्किट असर कर गया। अभी भी सांयें बाएं है यह तो।’’‘कहकर औरत मुस्कराई और बच्ची को लेकर उतरने की तैयारी करने लगी। बाहर खडा आदमी अंदर आकर सामान उठाने लगा। तभी आहट हुई, ‘‘बहनजी जरा अपनी और बच्ची की आईडी दिखाएंगी?’’ कडक आवाज सुनकर उस औरत ने सामने देखा। वही सामने वाला बाबू दो पुलिस वालों के साथ खडा था। उसके प्राण कांप गए।
श्रेया बचा ली गई पर हजारों बच्चे बच नहीं पाते।