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नया सवेरा

सुरेश कुमार अग्रवाल
सूरज ढलने को था, पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। भाग्यश्री अपने घर के दरवाजे पर बैठी कुछ सोच रही थी। विचारों की इस उलझन के बावजूद उसका ध्यान बरबस छिपते हुए सूरज की लालिमा की ओर खिंच जाता था और वह कह उठती- जिन्दगी कितनी सुन्दर होगी प्रकृति की, प्रकृति के विभिन्न अवयवों की। क्या मनुष्य भी इस आनन्दमयी प्रकृति की तरह गुलजार हो सकता है? तभी वहाँ से युवाओं का एक हुजूम निकला। उनके परिधान एवं हावभाव से लग रहा था कि किसी कॉलेज के विद्यार्थी होंगे। आज का कॉलेज का विद्यार्थी गम्भीर कम ही होता है। गम्भीरता उसमें कॉलेज से निकलने के बाद आती है जब वह रोजगार के चक्कर में कोचिंग सेंटर का सदस्य बनता है और इसके माध्यम से किसी सरकारी नौकरी में अपना भाग्य तलाशता है। अधेड उम्र की भाग्यश्री तभी अपने भूतकाल में खो गई। अब चार वर्ष बाद तो मुझे रिटायर होना है किन्तु कितनी अच्छी थी हमारे समय की शिक्षा एवम् शिक्षण पद्धति। प्रत्येक को उच्च शिक्षा समाप्ति के पश्चात् रोजगार सुलभ हो जाता था। मैकाले की काली छाया तो उस वक्त शिक्षा व्यवस्था पर ज्यादा थी किन्तु विद्यार्थी का गाम्भीर्य एवम् शिक्षक की कर्मठता मैकाले की इस शिक्षा व्यवस्था से भी विद्यार्थी को वांछित रोजगार मुहैया करवाने में सफल रहते थे। बैंक कार्यों में रुचि रखने वाला बैंककर्मी बन जाता था, शिक्षा कर्म के प्रति उत्साह रखने वाला शिक्षक और प्रशासन में जाने का इच्छुक प्रशासनिक अधिकारी। यद्यपि ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली की कालिख से प्रभावित समाज प्रशासक को ही ज्यादा महत्त्व देता था तथापि प्रशासक वर्ग में शिक्षक के प्रति आदर भाव था। यही कारण था कि प्रशासक अपनी सफलता का श्रेय शिक्षक को ही देता था। विद्यार्थी भी सरस्वती का पुजारी होता था, अतः उसमें ‘स्किल्स’ प्राप्त करने की इच्छा सदैव बनी रहती थी। विद्यार्थी ‘कैरियर ओरियेन्टेड’ तो होता था किन्तु ‘कैरियरिस्ट’ नहीं। उसे याद नहीं आता कि किसी विद्यार्थी ने उसके समकालीन विद्यार्थी जीवन में निराश होकर आत्महत्या करने की सोची हो। पर अब सब बदल गया। विद्यार्थी में उच्छृंखलता बढी है और इसके साथ ही बढा है निराशा भाव। आये दिन विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या करने की बात सुनने को मिलती है। समाज किसी व्यक्ति का स्टेटस इस आधार पर तय करने लगा है कि उसकी सन्तान किसी आई.आई.टी., आई.आई.एम., मेडिकल कालेज इत्यादि में अध्ययनरत है और उसके बाद अगर वह नौकरी में है तो उसका पैकेज कितना है।’
इसी बीच पास वाले घर से चीत्कार की आवाज आई। वह सहम गई। उसे मालूम था कि उसके पडोस में एक पति-पत्नी अपने दो बच्चों के साथ रह रहे थे। पडोसी अभी कुछ महीने पूर्व ही स्थानान्तरित होकर यहाँ आये थे। जब वह उन बच्चों की दिनचर्या देखती थी तो उसे आज की शिक्षण व्यवस्था पर तरस आता था। जब वह सुबह उठकर घर का दरवाजा खोलती तो लडका सुमित आईआईटी की कोचिंग के लिये जा रहा होता और कुछ ही समय बाद लडकी वन्दना का भी ऑटो आ जाता था कोचिंग इन्स्टीट्यूट जाने के लिये क्योंकि वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी जो कर रही थी। अब यह चीत्कार की आवाज और तेज हो गई थी। इसी चीत्कार के बीच कोई कह रहा था अब क्या करेगा तू? सब बर्बाद कर दिया तूने! तुम दोनों के कारण मैं स्थानान्तरण करवा कर यहाँ आया था। मुझे कितना नुकसान हुआ है। वहाँ तो डेपुटेशन अलाउन्स भी मिल जाता था। मैं कुछ एक्स्ट्रा काम भी कर लिया करता था। रोहित को देख! आज उसे 40 लाख का पैकेज मिल रहा है और विभा का बडा बेटा तो ऊँचाईयों को छू रहा है किन्तु तू.... क्या कहूँ, खाता है, सोता है बस। इस वीभत्स आवाज के बीच चीत्कार में एक आवाज आई- ‘पापा! लेकिन इसमें मेरा क्या दोष है, मैंने पूरी पढाई की किन्तु भाग्य ने मेरा साथ नहीं दिया। अब की बार तो मैं शत-प्रतिशत हासिल करने की लालसा रखता था। प्रश्न भी सब आते थे किन्तु परीक्षा में सब उलटा-सीधा हो जाता है।’ तभी भाग्यश्री का ध्यान पडोसियों के कमरे की खिडकी की तरफ गया। उसने देखा कि पति-पत्नी एवम् सुमित तथा वन्दना सभी खडे हुए थे। सुमित फूट-फूट कर रो रहा था और वन्दना उसे चुप करवाने का प्रयास कर रही थी। पत्नी सहमी हुई थी और पति का पारा चरम पर था। भाग्यश्री का मन उन्हें कुछ कहने को कर रहा था किन्तु उसने कुछ भी कहना केवल इसलिये उचित नहीं समझा क्योंकि पडोसियों से परिचय ज्यादा पुराना नहीं था। अतः पडोसी इसे किस तरह से लेगा... तभी उसे ध्यान आया कि आज आईआईटी एडवांस प्रवेश परीक्षा का परिणाम आया था। उसने अंदाज लगाया कि संभवतः सुमित आईआईटी एडवांस प्रवेश परीक्षा क्वालिफाई नहीं कर पाया होगा।
पडोस में आवाज सुनकर सामने वाली पडोसी दोस्त भावना भी भाग्यश्री के पास आ खडी हुई। कितना सुखद संयोग था कि दोनों साथ पढी, साथ ही नौकरी लगी और एक ही शहर में दोनों की शादियाँ हो गई। एक ही शहर में व्याख्याता के रूप में सरकारी कॉलेज में नौकरी लग गई। भावना इतिहास पढाती है और भाग्यश्री हिन्दी।
स्त्री स्वभाव से पुरुष से ज्यादा उत्सुक होती है। फिर भावना और भाग्यश्री तो सहपाठी, सहचरी जो ठहरी। अतः दोनों में चर्चा भी हमेशा ठहाके भरे अन्दाज में ही होती थी। किन्तु आज भावना बहुत गम्भीर मुद्रा में थी। भाग्यश्री से रहा न गया। आज तू इतनी गम्भीर क्यों है? ‘अरे यार! अभी किसी की चीत्कार की आवाज जो आई, उसने मुझे विचलित कर दिया। मनुष्य जीवन कितना दुःखद है।’ भाग्यश्री ने पास वाले मकान की तरफ इंगित किया और चुप हो गई। वह नहीं चाहती थी कि उनकी इस चर्चा से किसी को वेदना पहुँचे। उसने विषय को टालते हुए कहा, ‘कल सायंकाल से तू दिखी नहीं, घूमने न आज सुबह ही आई और न ही कल सायंकाल।’ ‘तेरे को तो पता ही है कल मोहित जर्मनी जा रहा है- बस उसी की तैयारियों में जुटी हूँ। सारा सामान जो उसे ले जाना है, एकत्र किया है।’ भाग्यश्री को भावना की नजदीकी मित्र होने के कारण भावना के सम्पूर्ण परिवार के बारे में जानकारी थी। मोहित भावना का बडा बेटा था और समीर छोटा। दोनों बच्चों की परवरिश दादा-दादी ने ही की थी। दादा-दादी अपने दूसरे दो बेटों के साथ गाँव में ही रहते थे। भावना के पति का व्यवसाय शहर में था और उसकी नौकरी भी इसी शहर के कालेज में। अतः दोनों पति-पत्नी यहाँ शहर में रहने लगे थे। गाँव ज्यादा दूर नहीं था। यही कोई 30-40 किमी की दूरी होगी। अतः वीकएन्ड पर दोनों परिवार से मिलने अक्सर गाँव चले जाते थे। बच्चे बडे हुए तब भी दादा-दादी ने ही उन्हें पढाया। भावना के ससुर अपने समय के विज्ञान के माने हुए अध्यापक थे। अतः उन्होंने अपने सभी पोते-पोतियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया था। शिक्षा के साथ उन्हें इस तरह से प्रशिक्षित भी किया था कि उनमें निराशा का भाव दूर-दूर तक पैदा न हो। यही परिणाम था कि भावना के दोनों बच्चे भी आत्मविश्वास से लबरेज थे। छोटे वाला पढाई में थोडा कमजोर जरूर था पर जीवन कौशल के गुणों से परिपूर्ण था वह भी।
भाग्यश्री भावना का हाथ पकड घर के अन्दर ले गई। ‘आ तूझे चाय पिलाती हूँ।’ भाग्यश्री ने कहा। जैसे ही भाग्यश्री ने यह कहा, भावना को लगा कि उसकी तात्कालिक इच्छा पूरी हो रही थी। वह अन्दर आई और भाग्यश्री के साथ किचन में खडी हो गई। भाग्यश्री ने चाय के लिए पानी रखा और भावना की तरफ मुँह कर कहने लगी, ‘जिन्दगी सचमुच कितनी दूभर हो गई है, यह मुझे आज समझ आया। मैं निःसंतान होकर भी प्रसन्न रहती हूँ। जीवन है ही कितने दिन का। क्या पता कब बुलावा आ जाये। अब देखो ना, पास में जो पडोसी आये हैं, उनके दो बच्चे हैं- लडका सुमित एवम् लडकी वन्दना। दोनों ही ‘क्यूट’ भी हैं। जब भी बाहर दिख जाती हूँ- दोनों का सिर श्रद्धा से झुक जाता है। उनके अभिवादन की आवाज ‘नमस्ते आन्टी।’ कितनी अच्छी लगने लगी है मुझे। परन्तु कई बार हम माँ-बाप को भी कितनी अपेक्षाएँ हो जाती हैं, बच्चों से। उनका बच्चा इसमें पास हुआ है, उसने कैट परीक्षा में 10वीं रैंक प्राप्त की है और उसका एडमिशन आईआईएमए में हो गया है लेकिन हमारे वाले तो फिसड्डी ही रहे। आज जिस चीत्कार ने तुम्हें विचलित किया उसके मूल में हम पैरेन्ट्स की बच्चों से की गई अतृप्त अपेक्षाएँ ही हैं। हम बच्चों के सामने तुलना करने से नहीं चूकते और अध्ययन-अध्यापन में ऐसी अपेक्षाएँ उनसे कर लेते हैं जो बच्चों को निराश कर देती है।’
भाग्यश्री कुछ और कहती, पर इससे पहले ही भावना ने उसे टोका ‘अरे बाबा, मेरे यहाँ ऐसा कुछ नहीं होता! तू यह क्या दर्शन शास्त्र झाडने लगी।’ ‘अरे, मैं तुम्हें चीत्कार (जो अभी तुमने सुना है) का मूल कारण बता रही हूँ।’ भाग्यश्री ने कहा। दोनों ने चाय पी और भावना अपने घर वापस चली गई।
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कुछ दिन बीते। नये पडोसियों से भी भाग्यश्री की दोस्ती हो गई, सोशल जो थी वह। नई पडोसन करुणा भी विनम्र मिलनसार स्वभाव की महिला थी। ईश्वर ने विनम्रता व सरलता उसमें कूट-कूट कर भर दी थी। खाली समय में वह भाग्यश्री के पास आ जाती। कभी भाग्यश्री उसके पास चली जाती। इस तरह समय गु*ारता गया। अब भाग्यश्री करुणा के पूरे परिवार को अच्छी तरह से जानने लगी थी। करुणा के पूरे परिवार से आत्मीय सम्बन्ध बना लिये थे उसने। दोनों परिवार समय-समय पर साथ-साथ घूमने भी जाने लगे। जब परिवार घूमने जाते तो करुणा के पति घूमने जाने से पहले ही कहने लगते- ‘देखो! ज्यादा समय नहीं लगाना है, बच्चों की पढाई खराब होती है। एक घंटा पर्याप्त है।’ प्रारम्भ में भाग्यश्री चुप रही। किन्तु करुणा के पति की इस बात को बार-बार सुनकर वह उकता चुकी थी। एक दिन उसने निर्णय किया कि वह करुणा के पति को ‘एज्यूकेट’ करके रहेगी।
शुक्रवार का दिन था। रिमझिम बारिश के बाद मौसम सुहावना हो गया था। भाग्यश्री की इच्छा हुई कि क्यों न आज ‘आउटिंग’ के लिये निकला जाय। भाग्यश्री और उसके पति में एक अच्छी ‘अण्डरस्टेंडिंग’ थी। उसे पता था कि आज उनके पति के पास कुछ विशेष काम नहीं होगा, वीकएण्ड जो था। अतः पति से पूछे बगैर ही उसने करुणा से फोन किया और दोनों परिवारों की सहमति बनी कि सायंकाल 6.00 बजे घूमने निकला जाय। इसके बाद भाग्यश्री ने पति को फोन किया और उन्होंने सदैव की तरह अपनी स्वीकृति दे दी। भाग्यश्री के पति ठीक 5.30 बजे घर पर पहुँच गये। दोनों परिवार ठीक 6.00 बजे अपनी-अपनी गाडी से आउटिंग के लिये निकल पडे। करुणा के पति को ड्राईव करना नहीं आता था, अतः सदैव की तरह आज भी उसी ने ड्राईव किया और दूसरी गाडी भाग्यश्री के पति ने। बीच में एक जगह पानी-पतासे खाने के लिये उतरे। इसी बीच भाग्यश्री ने देखा कि करुणा के पति बेचैन थे। हम सबकी तरफ देखते हुए उन्होंने कहा ‘करीब पौन घंटा हो गया है, अब हमें यहीं से लौट चलना चाहिये। वापस पहुँचते-पहुँचते एक घंटे से भी ज्यादा हो जायेगा। बच्चों की पढाई का नुकसान जो होगा।’ भाग्यश्री सुनती रही। अब वह करुणा के पूरे परिवार से खुल चुकी थी। ‘भाई साहब! आप हमेशा पढाई-पढाई करते रहते हो। अगर आप से कहा जाय कि आप 18 घंटे अध्ययन करो, आप कर लेंगे? आज आप को रुकना ही पडेगा, हम गन्तव्य पर पहुँचने ही वाले हैं।’
गाडियाँ आगे बढी, गन्तव्य भी आ गया। दोनों परिवारों ने खूब आनन्द लिया। लग रहा था मानो वन्दना और सुमित भाग्यश्री की संतानें हैं। आन्टी-आन्टी कहते मुँह सूखता था दोनों का। भाग्यश्री को भी लगता था कि वन्दना और सुमित उसी के बच्चे थे। यही कारण था कि घर में जब भी कुछ बनाया जाता तो वह वन्दना एवम् सुमित के लिये अवश्य भेजा जाता था। वन्दना एवम् सुमित से फोन करके भी भाग्यश्री उनकी कुशलक्षेम पूछती रहती थी। अगर वह किसी दिन फोन नहीं कर पाती तो अजीब-सी बेचैनी होती थी उसे। इस बेचैनी को वह दूसरे दिन दो बार फोन करके पूरा करती थी। बच्चे भी आनन्द ले रहे थे। भाग्यश्री और करुणा अपने पति के साथ बैठे हुए प्रकृति का आनन्द ले रहे थे। भाग्यश्री इस अवसर को खो देना नहीं चाहती थी।
भाग्यश्री करुणा के और नजदीक आ गई जिससे कि वह करुणा के पति से अच्छी तरह से बात कर सके। करुणा के पति की ओर देखते हुए उसने कहा, ‘भाई साहब! अच्छा लग रहा है न! कितना सुरम्य वातावरण है! ऐसा लगता है मानो जीवन के सभी आनन्द सिमट कर हमारे पास एकत्र हो गये हैं।’ अब करुणा के पति को कुछ कहना था। ‘सचमुच भाग्यश्री जी इस तरह का लुत्फ कम ही उठा पाते हैं, आप तो वास्तव में भाग्यश्री है। ऐसी भाग्यश्री, जो अपने साथ-साथ दूसरों का भी भाग्य खिला देती है। हम तो इस आनंदमयी स्थल तक पहुँच ही नहीं पाते, अगर आप हमें यहाँ नहीं लाती। सचमुच हम भाग्यशाली हैं कि हमें आप जैसे पडोसी मिले।’ करुणा ने बीच में ही कहा ‘मजा आ गया यार भाग्यश्री! सचमुच कितना सुन्दर स्थल है।’
अब भाग्यश्री की बारी थी। करूणा के पति की तरफ मुखातिब हो, हँसते हुए भाग्यश्री ने कहा- ‘वाह भाई साहब! वाह! तो आपको बहुत अच्छा लगा, करुणा को भी अच्छा लगा। लेकिन कितना व्यंग्यात्मक है देखो ना, आप तो मजा लेंगे किन्तु बच्चों का समय ‘बर्बाद’ नहीं हो, इसलिये बच्चों के समय की बचत हेतु उनका बचपन ही आप उनसे छीन लेंगे। मुझे बताइये -कितने दिनों बाद आपने बच्चों को घर से बाहर निकाला है। पढाई के नाम पर उन पर इस तरह के प्रतिबन्ध लगाना कहाँ तक उचित है!’ बच्चों की तरफ इंगित करते हुए भाग्यश्री ने कहा- ‘देखिये, बच्चों के उन खिलखिलाते चेहरों को। संभवतः कई वर्षों बाद इस तरह की चमक देखी है बच्चों के चेहरों पर। आप सचमुच सौभाग्यशाली हैं कि आप वन्दना एवम् सुमित जैसे बच्चों के पिता हैं। इन बच्चों में वे सभी गुण हैं जो एक अच्छे इंसान बनने के लिये आवश्यक हैं- कर्त्तव्यपरायणता, कर्मठता, आज्ञाकारिता, ईमानदारी, इत्यादि-इत्यादि। यह कितना उचित है कि हम जिन्दगी में सफलता को केवल ‘कैरियर’ में सफलता से ही जोडकर देखते हैं। संभवतः आप को लग रहा होगा कि एक आइआइटियन का पिता होना ही गर्व का विषय होता है। किन्तु क्या आप को यह पता है कि उस आईआइटियन में वे सब गुण होंगे जो सुमित में है। मैंने देखा है कि सुमित अपने दिन की शुरुआत आप दोनों पति-पत्नी के चरण स्पर्श कर आफ आशीर्वाद से करता है। इतना श्रमशील है वह, प्रातःकाल 4.00 बजे उठता है और देर रात 11.00 बजे बाद सोता है। नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद ध्यान करना और उसके बाद वह केवल पढाई ही नहीं करता है, अपितु घर के काम में भी हाथ बटाता है। प्रातःकालीन चाय सुमित ही बनाता है न! घर के लिये वांछित सामान करुणा के साथ बाजार जाकर कौन लाता है- सुमित ही न! पढाई भी अच्छी ही कर लेता है। आईआईटी मैन्स में तो उसका परिणाम अच्छा ही रहा है न। लेकिन इसके बावजूद भी आपका असंतोष समझ में नहीं आता। अगर आप की यह बात मान भी लें कि वह आपकी इच्छानुसार उच्च अंक प्राप्त नहीं कर पाता है किन्तु जिन्दगी में सफलता व असफलता का क्या यही पैमाना है? आप सोचिये- आप कहाँ तक सही हैं, मैं तो मानती हूँ कि हम माता-पिता हमारी अपूर्ण अपेक्षाएँ बच्चों पर थोप देते हैं और उनसे वह करने की आशा करते हैं जो स्वयं हम माँ-बाप हासिल नहीं कर पाये। यही दुःख का कारण भी है।’ भाग्यश्री ने सोचा करुणा के पति के लिये इतना डोज पर्याप्त था।
भाग्यश्री का भाषण सुनने के बाद करुणा के पति स्तब्ध थे। तभी भाग्यश्री ने घडी की ओर देखा- रात के 10.00 बजने वाले थे। अतः सभी ने घर लौटने का निर्णय किया।
***
कुछ दिन बीते। भाग्यश्री अब करुणा के परिवार की सदस्य हो गई थी। करुणा के परिवार में अब सब कुछ सामान्य हो गया था। न कभी चिल्लाने की आवाज सुनी और न ही कोई अन्य अवाँछित घटना हुई। एक दिन करुणा के पति ने कहा- ‘करुणा! तुम्हारी यह मित्र भाग्यश्री बडे काम की महिला है, दो घंटों के अल्प-समय में उसने मुझे वह सब कुछ सिखा दिया जो मैं जिन्दगी के 50 वर्षों में भी नहीं सीख पाया। आओ, भाग्यश्री के घर चलते हैं।’ करुणा तो तैयार ही थी। जाने से पहले करुणा ने बच्चों को सूचित किया (जो सदा से उसकी आदत में था) और वे दोनों घर से निकलने ही वाले थे कि करुणा के पति ने आवाज लगाकर दोनों बच्चों को कहा- ‘अरे बच्चो! आप को भी अगर कहीं बाहर जाना है तो आप भी घूम आओ, सारे दिन पढाई नहीं होती।’ आवाज लगाने के साथ ही करुणा के पति बच्चों के कमरे की ओर बढे। सुमित के पास पहुँच, सुमित को कंधे पर उठा लिया उन्होंने। वन्दना को स्नेहिल आँखों से निहारते रहे। सुमित ने देखा कि पापा की आँखों में आँसू थे। सुमित ने कहा, ‘पापा! यह सब क्या है, आप ऐसा बिल्कुल नहीं करेंगे।’ ‘मैं आज तक पिता के दायित्वों का भली-भाँति निर्वहन नहीं कर पाया। मैं दूसरों के बच्चों से अपने बच्चों की अवांछित तुलना करता रहा। मैं वह अपनत्व और दुलार तुम पर कभी बिखेर नहीं पाया, मैं तुम्हारा पिता कहलाने लायक नहीं हूँ।’ अब वन्दना से रहा नहीं गया- ‘पापा! यह सब क्या है, आप के स्नेह ने ही हमें इतना बडा किया है और आप की डाँट के मूल में क्या स्नेह नहीं था? नहीं पापा, नहीं। आप को हम ऐसा नहीं करने देंगे।’ वन्दना ने सुमित की ओर इशारा कर पापा को कुर्सी पर बिठाने के लिये कहा और स्वयं पानी की बोतल लाने फ्रिज की ओर दौडी। पापा को पानी पिलाया और आराम करने के लिये कहा।
करुणा घर के मैन गेट पर खडी पतिदेव का इंतजार कर रही थी। उसे इंतजार करते 20 मिनट से भी ज्यादा हो गये थे। अतः उसने दरवाजा खोला और बच्चों की तरफ बढी। करुणा को देखकर उसके पति फफक-फफक कर रो पडे। इस रुदन के कारण उनकी आवाज भी रुग्ण हो गई थी। पति कह रहे थे, ‘आज नया सवेरा हुआ है’ मुझे समझ में आ गया है कि एक पिता का दायित्व क्या होता है। इस दायित्व को मैं पहचानने में विफल रहा और बच्चों की सफलता का आकलन उनके कैरियर की सफलता से ही करता रहा। आज मैं देदीप्यमान हो गया हूँ।’ करुणा यह सब सुनती रही और तब उसने अपनी स्नेहिल आवाज में पति को डाँटते हुए कहा, ‘आप इतना दृढ होने का नाटक करते हो, आप तो बच्चों से भी दुर्बल हैं। अब सब सोचना बन्द कीजिये, आफ अपनत्व के कारण ही हमारे दोनों बच्चे ‘‘गुड ह्यूमनबीइंग’ हैं।
‘करुणा तुम ऐसा सचमुच मानती हो ना। सचमुच।’ कहते हुए करुणा के पति की आवाज कुछ रुक सी गई थी। तभी करुणा ने टोका, अपने को संभालो- हमें भाग्यश्री के घर भी जाना है।’ करुणा के पति कुर्सी से उठे, मुँह धोया और भाग्यश्री के घर रवाना हो गये।