fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

किसन.......

संजय पुरोहित
अलार्म ठीक समय पर बजा। आँखें मसलते हुए किसन ने घडी की ओर देखा। एक बजने को था। बाऊजी की बस रात को दो बजे गाँव की बाईपास वाली पक्की सडक पर आने वाली थी। उसने लालटेन की लौ को कुछ ते*ा किया। गाँव की गलियों में कुत्तों के भौंकने और रोने की आवा*ों आ रही थीं। किसन डरपोक नहीं था, लेकिन कुछ असहज जरूर हो रहा था। वह धीरे-धीरे आँगन में गया। बाल्टी में से अंजुली भर पानी लेकर चेहरे पर छिडका। आँखें पूरी खुली तो अपनी चप्पल को तलाश किया। टार्च गले में लटकाई। साईकिल निकाली और घर से निकला। आज किसन को अपनी बहादुरी को साबित करना था। वैसे बाऊजी ने खुद उसे मना किया था कि रात को दो बजे उसे लेने के लिए नहीं आए लेकिन किसन तो जैसे अडा हुआ था। वह यह जताना चाहता था कि अब वह बडा और समझदार हो गया है।
साईकिल के पैडल मारते हुए किसन डर भी रहा था। कुत्तों के भौंकने की आवाजें अब करीब आ रही थीं। इससे उसके भय में वृद्धि हो रही थी। उसे लगा उसे अपने साथ दो चार रोटी के टुकडे डाल लेने चाहिये थे, ताकि कुत्तों को शांत कराया जा सके। जैसे-जैसे वह बढता जा रहा था, उसका भय भी बढता जा रहा था।
‘ये बाऊजी भी ना... अरे दिन की बस से भी तो आ सकते थे’, वह खुद से ही बोले जा रहा था,‘...नहीं, चाहे रात के दो बज जाएँ पर सोना अपने घर में जाकर। बाऊजी के नियम कायदे बाऊजी जानें.....पर बाऊजी ने तो मुझे मना ही किया था कि मत आना, ये तो मेरी गलती थी कि मैंने कहा मैं जरूर आऊंगा...हूहं, मैं भी...कई बार तो बेजा मूर्खता कर बैठता हूँ...।’
एक क्षण को उसने सोचा, पडोसी तेजालाल या अनूप सिंह को उठा लिया जाये। दूसरे ही क्षण यह सोच कर रुक गया कि कल यही दोस्त उसकी हंसी उडायेंगे। वैसे इन दोस्तों ने आज शाम से ही उसे डराना शुरू कर दिया था। ना जाने कैसी कैसी बातें करते हैं। अर्द्ध रात्रि को आत्माएं भटकती हैं। प्रेतों के पैर उलटे होते हैं। प्रेत पूरी गरदन घूमा सकते हैं। भूत इंसानी खून पीते हैं। भूतों को मानव की गंध दूर से ही आ जाती है। वे मनुष्य को पूरा निगल लेते हैं। भूत किसी की भी काया में प्रवेश कर सकते हैं... और भी ना जाने कैसी कैसी बातें। ऐसे दोस्तों से तो भगवान ही बचाए। अपने डरते मन को झूठी सांत्वना देता हुआ किसन आगे बढ रहा था। दोस्तों की बातें बार-बार उसे याद आ-आकर डरा रही थीं। क्या सचमुच भूत-प्रेत होते हैं? क्या रात को प्रेतात्माएँ घूमती हैं, क्या कुत्तों को प्रेत दिखाई देते हैं? और ना जाने कैसे कैसे प्रश्न वह खुद से ही पूछने की कोशिश करने लगा। वह अपना ध्यान इन बातों से जितना हटाता, उतना ही उसका चंचल मन फिर उसे उसी केन्द्र पर ला पटकता। किशोर होने के पडाव की ओर खिसकता उसके जीवन स्वाभाविक रूप से डर का अनुभव कर रहा था। उसका कोमल मन पर भय और आशंका की हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। उसने मन ही मन स्वयं को मजबूत करने की कोशिश की। अपने बाऊजी की बात को याद किया कि केवल ईश्वर से डरो और दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं जिससे डरा जाए।
‘बाऊजी तो कुछ भी बोलते रहते हैं। मास्टर जो हैं।’ किसन बुदबुदाया, ‘रात को डेढ बजे अकेले पक्की सडक तक जाना कोई कम बहादुरी का काम है क्या...।’ अपने भांत-भांत के विचारों की कशमकश में उलझे किसन ने अपनी साईकिल के पैडल तेजी से मारना शुरू किया।
अचानक ही किसन को अंधेरे में दो चमकती आँखें न*ार आई। यह एक कुत्ता था, जिसकी आँखें चमक रही थी। वह तो जैसे किसन का इन्त*ाार ही कर रहा था। किसन को देखते ही उसने भौंकना शुरू कर दिया। उसकी भौंकने की आवा*ा सुन कर अन्य कुत्तों को जैसे सन्देश मिल गया हो। सभी ने भौंकना आरम्भ कर दिया। किसन भयभीत हो गया। उसे लगा कि सभी कुत्ते एक राय होकर उस पर हमला करेंगे। उसके पैर और तेजी से चलने लगे।
ऊपर आधा चाँद पूरा चमक रहा था। गाँव के घरों के आस-पास झाडियाँ खडी कर बनाई चारदीवारी अंधेरी घाटी जैसी न*ार आ रही थी। कंटीली झाडियों के मध्य पंचायत करते झींगुर अपनी आवा*ा से किसन को डराने का सामूहिक कार्य कर रहे थे। घरों-झोंपडियों से निकली नालियों के पानी ने फैल कर चाँद की अधपकी रोशनी में विचित्र आकृतियां बना डाली थी। किसन को लगा कि प्रेतात्माएँ जरूर इन्हीं आकृतियों जैसी ही होंगी और क्या पता ये प्रेतात्माएं ही हों!! उसका भय बढता जा रहा था।
अचानक ही एक चमगादड किसन के कान के पास से फडफडाता हुआ निकला। किसन हडबडा गया। साईकिल असंतुलित हो गई और किसन बचते-बचते भी गिर ही पडा। टार्च उसके गले से छिटक कर एक पत्थर पर जा पडी। किसन को ऐसा लगा जैसे कि परिस्थितियां अब उसके हाथ से बाहर निकल रही हैं। वह डर से काँपने लगा। काँपते हाथों से ही उसने टार्च जलाने की कोशिश की, लेकिन टार्च तो गिरने के कारण खराब हो चुकी थी। अब किसन की आँखों में आंसू आ गए। इसी बीच हवा का एक ते*ा झोंका आया और मुट्ठी भर बालू किसन के चेहरे पर डाल गया। किसन की आँखों में भी बालू मिट्टी के कण घुस आए थे। नन्हा किशोर किसन बालू के नन्हे कणों को निकालने की कोशिश करने लगा।
आँखें मसलते हुए ही उसने सामने के पीपल के बडे से वृक्ष को देखा। हवा के अनियंत्रित झोंकों के पीपल से टकराने के कारण तरह-तरह की भयभीत कर देने वाली ध्वनि पैदा हो रही थी। यह ध्वनि उसके भय की जडों को मन की भूमि में गहरे तक धंसा रही थी। उसका साहस तो उसे कभी का छोड चुका था। किसन को लगा कि पक्की सडक तक पहुंचने से पहले ही वह मर जाएगा। उसे कोई भूत मार डालेगा या प्रेत उसका खून पीने आएगा। किसन सुबकने लगा। अचानक ही एक आहट हुई। किसन ने चारों ओर देखा। हवा के बहाव में शीतलता हावी होने लगी। किसन की घबराहट और बढ गई। अर्द्ध चन्द्र की चाँदनी में आधी रात को गाँव की सुनसान गली में गिरी साईकिल के पास सुबकते हुए बारह वर्षीय किसन के लिए इससे भयानक अनुभव नहीं हो सकता था। उसका कलेजा मुँह को आने लगा। वह उकडू बैठा और अपने माथे को घुटनों में ठूंसने की कोशिश करने लगा।
सहसा किसी ने उसे पुकारा, ‘किसन.... ओ किसन’
किसन ने गरदन उठाई और खुशी से चिल्ला पडा।
माँ!....माँ तुम ?’ किसन माँ से लिपट गया।
‘हट डरपोक कहीं का। मुझे मालूम था कि तुम चुपचाप बाऊजी को लेने जा रहे हो। मैं भी चुपचाप तुम्हारे पीछे चल पडी। पर किसन इतना कोई डरता है भला?’ माँ ने उसके बिखरे बालों में अपनी नरम अंगुलियां फेरते हुए पूछा।
‘मैं और डरपोक?’ किसन में जैसे किंगकोंग जैसी ताकत आ गई हो, बोला, ‘माँ, मैं कभी नहीं डरता। किसी से भी नहीं डरता, तभी तो रात को डेढ बजे बाऊजी को लेने पक्की सडक तक जा रहा हूं।’
‘सो तो है, मानना पडेगा....तो तुम जब डरते ही नहीं हो तो फिर मैं वापिस जाऊँ?’ माँ के इस प्रश्न से किसन सकपका गया। रोआंसा होते हुए बोला, ‘नहीं माँ...नहीं।’
‘अच्छा ठीक है, नहीं जाऊँगी, पर अब आगे तो चल।’ माँ ने कहा और दोनों आगे चल पडे। पीपल के पेड के आगे से गुजरते हुए किसन बोला, ‘माँ, ये पीपल तो मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे अपनी शाखाएँ निकाल कर मुझे खींच कर मार डालेगा।’
‘अरे नहीं पगले, पीपल तो पवित्र वृक्ष है। बाऊजी ने उस दिन बताया था ना कि भगवान विष्णु पीपल में निवास करते हैं। है ना?, अरे तभी तो हम पीपल की पूजा भी करते हैं।’ माँ ने उसे याद दिलाया।
‘हूँ....हूँ....’ किसन को जैसे बाऊजी की बात याद आ गई।
‘किसन.... तुझे याद है लल्ला कि जब तुम दस साल के हुए थे, तब कहीं जाकर तुम्हारा मुण्डन करवाया था, तब तक तुम्हारे बाल कितने लम्बे हो गए थे, बिल्कुल लडकियों की तरह?’ कहते हुए माँ खिलखिला कर हंसी।
‘याद है माँ, और ये भी याद है कि तुम ढेर सारा तेल लगा कर लाल रंग के रिबन से मेरी चोटी भी कर दिया करती थीं, मेरे सारे दोस्त मुझे लडकी कह कर चिढाया करते थे।’ कहते हुए दोनों हंसने लगे।
बातें करते हुए मालूम ही नहीं पडा कि कच्चा रास्ता कब खत्म होने को आया और पक्की सडक दिखाई देने लगी। चलते-चलते माँ बोली, ‘वो देख किसन। वो रही पक्की सडक। देखो वो आ रही है बस। जल्दी करो, कहीं बाऊजी को इन्तजार न करना पडे।’
किसन ‘हाँ...हाँ’ कहता हुआ साईकिल पर बैठा और तेजी से पैडल मारने लगा। कुछ ही क्षणों में वह बस के करीब पहुँच गया।
बाऊजी उतरे। किसन की साईकिल के कैरियर पर अपना बैग रखा। बोले, ‘शाबाश किसन। आखिर तुमने साबित कर दिया कि तुम एक बहादुर बालक हो....पर क्या तुम डरे नहीं?’
‘नहीं बाऊजी। आप ही तो कहते हैं कि केवल ईश्वर से डरो और दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है जिससे डरा जाए।’ किसन ने शेखी बघारी।
‘पर बेटे, मैंने एक बात और बताई थी और वो यह कि कभी झूठ मत बोलो।’ बाऊजी ने उसके पसली में गुदगुदी करते हुए कहा।
किसन समझ गया था कि बाऊजी ने उसकी बात पकडली है। बोला, ‘बाऊजी, पहले तो मैं डर गया था। गिर भी गया था। रोने लगा था। मुझे भूत-प्रेतों का डर लगने लगा लेकिन फिर माँ दौडी-दौडी आई और मुझे संभाला। फिर मैं नहीं डरा। हम दोनों साथ-साथ आए हैं।’
...माँ! .... बाऊजी विस्मित होकर बोले।
‘हाँ, बाऊजी, माँ।’ किसन ने गर्दन हिलाई।
‘किसन बेटे, तुम अपने भय में यह भी भूल गये कि तुम्हारी माँ का निधन तो दो वर्ष पूर्व ही हो चुका है।’ बाऊजी ने जैसे किसन को अतीत से उठा कर वर्तमान में पटक डाला।
किसन ने कच्ची पगडण्डी की ओर देखा, उसे दूर तक कोई दिखाई नहीं दिया।