fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

मानपत्र : स्त्री उत्सर्ग की कथा

विवेक श्रीवास्तव
उस्ताद ने हंस कर कुछ उदासी के साथ कहा था ‘बागेश्वरी में पंचम वर्जित है और पंचम ही तुम्हारा आधार है।’ बागेश्वरी में पंचम को जिस उलाहना की तरह कभी दीपंकर से कहा गया था वही पंचम सुर ‘संगीत के शिखर पर दीप की तरह दीपित’, दीपंकर के चरित्र का आधार बन कर संजीव की कहानी ‘मानपत्र’ के कथासूत्र का विस्तार बनता है। संजीव की कहानी ‘मानपत्र’ एक कलाकार के असहज जीवन की जीवंत कथा है। एक कलाकार की ऐसी कहानी जो उसके चमत्कृत कर देने वाले व्यक्तित्व और कृतित्व के पार्श्व की कहानी है। मंच के सामने की चौंध का हमसाया मंच परे का अँधियारा। अक्सर ही दुनिया मंच की चमक-चौंध में इस कदर मुब्तिला हो जाती है कि न किसी को इस बात का खयाल ही होता है कि मंच से परे भी कुछ है और न इस बात का कोई अंदा*ाा कि मंच के बरक्स उसका पार्श्व कितने घने अंधियारे में डूबा हुआ हो सकता है।
संजीव की कहानी ‘मानपत्र’ चमक-चौंध में दिये जाने वाले मानपत्रों से अलग कला के लिये जीने वाले दो कलाकारों के जीवन पर एकतरफा संवाद है। अंधेरे पक्ष का मानपत्र। स्तुति और प्रशस्ति से बिल्कुल अलग। जीवन के धरातल का संघर्ष, चरित्रों की चरमराहट और टकराहट। पूरी कहानी कलाकार की तरह, एक पुरुष की तरह ‘दीपंकर’ को उसके अहम्, उसकी चारित्रिक कमजोरियों में पकडने और उघाडने (प्रस्तुत करने) के लिये आगे बढती है। वैसे तो यहाँ कहानी में तीन मुख्य पात्र हैं - बाबा, वीणा और दीपंकर। हां, बाबा (उस्ताद) और वीणा (बाबा भी अपनी बेटी को वीणा कह कर पुकारने लगे थे) जो कहानी के तीसरे पात्र और ‘वीणा के कलाकार’ को, ‘दीपंकर के कलाकार’ के अनुरूप बढता-बदलता देखने के लिये किनारे खडे थे अभिशप्त। कला की ऊँचाइयों पर तो सिर्फ दीपंकर को ही पहुँचना था और वही पहुँचा भी।
मानपत्र एक कलाकार के विकसन और संघर्ष की कहानी तो है ही पर पूरे राग में तानपूरे पर निरंतर बजता है, स्त्री-पुरुष के अहम् का आदिम संघर्ष। कलाकार के अहम् में जब पुरुष अहम् साथ-साथ घुल जाए तो नशा और असर दोनों दोगुने। एक समय वह भी आया, आना ही था, कि दीपंकर की कला ‘संगीत’ पर कम, उसके मायावी प्रदर्शन पर ज्यादा केंद्रित हो गयी। वही कला अपने लिये ‘प्रायोजक’ ढूंढने में लग गई और ‘नथिंग सक्सीड्स लाइक सक्सेस, नथिंग फेल्स लाइक फेल्योर’ के बीच कहीं जब ‘कलकत्ते में जो कुछ हुआ, उससे तुम रूठ गए’ ये ‘रूठना, रूठना ही था। एक तो एक विधा के लोग, प्रतियोगी न भी हों तो तमाशबीनों द्वारा बना दिये जाते हैं, दूजे एक (मैं) नारी और तुम पुरुष। ईगो की चरमराहट।’ बस यही एक इगो की चरमराहट ही है जो कहानी के केन्द्र में है। कलाकार का एक अहम्, उसके ऊपर पुरुष का अहम्। *ांदगी के सबसे आम परन्तु सबसे खास संघर्ष की कहानी पुरुष अहम् का रूप मानपत्र के अहम् में मह*ा इस बात में अलग है कि इस अहम् के ऊपर कलाकार के अहम् का एक और आवरण है, एक और छद्म। समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों में स्त्री का आत्मोसर्ग ही परंपरा है। इसी से पुरुष मानस का निर्माण होता है। दीपंकर भी इसी समाज का एक पुरुष और वीणा भी इसी समाज की एक स्त्री। ‘संगीत समारोहों का दौर-दौरा फिर शुरू हो गया। वीणा की भूमिका तुम्हें सजा-संवार कर मंच पर भेज देने की और सबसे पीछे तानपूरा ले कर बैठने तक सीमित हो गयी।’ पारंपरिक समाज में पुरुष खुद को असीम आजादी का हकदार मानता है। दीपंकर के लिये आ*ाादी का ये अहसास दोगुना था। पुरुष तो वो जन्मना था, बाबा के चरणों में बागेश्वरी की सेवा से अब वो कलाकार था। बडा कलाकार। ‘नथिंग सक्सीड्स लाइक सक्सेस।’
संजीव कहानी में पुरुष अहम् और अवसरवादिता को दीपंकर और वीणा की कहानी से आगे विराट् विस्तार देते हैं और तुलसी, हरिश्चंद्र और युधिष्ठिर से लेकर सिद्धार्थ तक को इस परम्परा में देखते हैं, सफलता या आप चाहें तो कहें प्रेरणा की पहली सीढी पर खडी, पत्नी के प्रति आदिम उपेक्षा पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, ‘पत्नियाँ शायद इसीलिये होती हैं कि सफलता के लिये उनकी बलि दी जा सके! ....। उत्कट प्रेम की यह कैसी परिणति? शायद पति-पत्नी के बीच कोई तीसरा आ जाता है - सफलता जनित अहमन्यता का प्रेत!’
‘मानपत्र’ में संजीव परंपरा से चले आ रहे एक आदिम संघर्ष को वीणा और दीपंकर के संघर्ष में आरोपित करते हैं पर वो कहीं स्त्री देह विमर्श और देह के मोह पर, वितृष्ण दुःख पर आ कर रिड्यूज होती है। निसार भाई के साथ आई महिला पत्रकार से वीणा के अकेले में हुए संवाद में यह रेखांकित होता है- ‘मैं भी एक औरत हूँ, इसलिए तुम्हारी पीडा को आसानी से समझ सकती हूँ। मगर सच कहूँ, यह कला की दुनिया ही अजीब है वीणा! पता नहीं कौन सी ची*ा किसका प्रेरणास्रोत या उद्दीपक बन जाए....! पश्चिम में तो कोई परवाह भी नहीं करता ऐसी बातों की.....’ कहानी का एक मुख्य और सहज प्रश्न है जो कहानी में वीणा पूछ बैठती है। ‘तो क्या एक कलाकार को एक हद के बाद स्वैराचार करने की छूट मिल जानी चाहिए? सिर्फ इसलिए कि वह कलाकार है?’ यहाँ आ कर कहानी में स्त्री के मन की वो गाँठ खुलती दिखती है जो सदियों से वफा और बेवफाई के खांचे में पति-पत्नी के रिश्ते को नापती है और यहीं से यह साफ होना शुरू होता है कि कहानी एक स्त्री की पारम्परिक पीडा का विस्तार है। सफलता के बाद *ामाने भर में अपनी आशंसा-प्रशंसा के उत्कर्ष पर जा बैठे कलाकार के लिये जितना वहां ऊँचाई पर पहुंचना महत्त्वपूर्ण होता है, उससे बडी चुनौती खुद को वहां सम्हालना और खुद को दुनिया के, समाज के, परंपरा के बंधनों से ऊपर उठ जाने के अहसास से बचाने का होता है। सफलता के लिये आरम्भिक संघर्ष में जिस आत्मीय का, जिस प्रेम का साथ था, फ्यू*ान के प्रयोगों में जिन उँगलियों के लिये कभी मि*ाराब बन जाने का वायदा था, वही सफलता की चमकीली दुनिया में, उसी दिल पर घाव दे जाए तो सफलता के दूसरे सिरे पर खडी एक स्त्री की इसी घनीभूत पीडा का कथा-रूपांतरण है- मानपत्र।
बाबा ने कभी बहुत सोच कर धीरे से उठ कर बैठते हुए कहा था- ‘मुसलमानों ने तो काफी पहले ही मुझे काफिर मान लिया है। मैं इस बात से परेशान नहीं हूँ कि ऐसा करने से उनकी राय पर ठप्पा लग जायेगा। धरम यहाँ क्या कहता है और मजहब के फतवे क्या कहते हैं- मुझे नहीं मालूम, जानना भी नहीं है। मौसिकी सिर्फ मौसिकी है, फन सिर्फ फन ...। चाहता सिर्फ इतना हूँ कि जिन हाथों में बेटी का हाथ दूँ, उन हाथों में उसका फन और उसकी खुशी दोनों सलामत रहे। कहाँ तुम ऊँचे खानदान के पंडित और कहाँ आयशा? उस्ताद की शक्ल में हमें सर पर बिठाते हैं हिंदू, मगर एक दूरी से ही।.... यानी एक के लिये म्लेच्छ और एक के लिये काफिर! इनसे भाग कर ही मैं मौसिकी की पनाह में आया हूँ तो यहाँ महफू*ा हूँ, मगर कब तक? जब तक नीचे न उतरूं! अभी तो जवानी है, जज्बा है, जूनून है, जीत लोगे जंग, मगर इसके उतरने के बाद?’
‘आप मुझ पर भरोसा कर सकते हैं उस्ताद!’
*ांदगी लगभग सारी ही भरोसे पर कटती है। बात सिर्फवीणा के भरोसे की नहीं थी, सफलता के उत्तुंग पर पहुंचने वाला दीपंकर बाबा की आयशा के भरोसे को तो बहुत पहले ही तोड चुका था, बाबा को भरोसा दिला कर भी उस भरोसे को भी वो तोड रहा था, अपनी सफलता के बहुत से कीर्त्तिमानों की मानिंद।
यह कहानी का एक पक्ष है। पक्ष जो लेखक ने चुना है और हमारे सामने रखा है।
कहानी के भाव पक्ष के साथ अगर इसके कुछ और पहलुओं पर न*ार डाली जाये तो ध्यान जाता है कि कहानी, आरोप की भाषा और संरचना में है। लगभग एकतरफा। स्त्री के त्याग, समर्पण और उसके खुद से और *ामाने भर से किये जाने वाले संघर्ष की तुलना में यहाँ बेहद स्वाभाविक भी है कि उसे सहानुभूति मिले। उसकी पहचान और उसकी मौन समिधा को कहीं पहचाना जाए, उसे स्वीकारा जाए। ऐसी ही एक कोशिश वीणा करती है, दीपंकर की आत्मकथा में खुद को खोजने की। सफलता की सीढियों को सफल हो कर, ऊँचाई पर पहुँच कर नीचे धकेल देना, अपने आप में निष्ठुरता है और इस सबके बरक्स एक मह*ा स्वाभाविक सी सहानुभूति का ही पक्ष बनता है। पूरी कहानी पाठक को एक खास तरह की संवेदना और सहानुभूति के बीच रखती है। मानपत्र की शक्ल में उपेक्षा जो एक कलाकार को, एक स्त्री को, एक दूसरे कलाकार से, पुरुष से जो कुछ जीवन भर मिली, जो उसने सही उसके कहने से, उलाहने से कहानी बनती है। कहानी का शीर्षक है, मानपत्र, ऊहात्मक। जिंदगी भर की उपेक्षा और अपमान के प्रतिकार में दर्ज घनीभूत शब्द-पीडा को शीर्षक मिला है मानपत्र। कहानी का शिल्प और स्वर तंज का है, उलाहना और प्रतिकार का है।
इस बीच कहीं स्वाभाविक-सी बात जो दिमाग में आती-जाती रहती है कि प्रस्तुत पक्ष का दूसरा पहलू भी तो कुछ होगा! इस चर्चा में लेखकीय पक्ष का प्रतिपक्ष भी तो कहीं किसी स्तर पर कुछ सोचता, चाहता या कहना चाहता होगा। परन्तु इस का माकूल जवाब पहले ही कहानीकार ने सोच कर, कथाशिल्प इस तरह के एकालाप का चुना है जिस में ‘एक पक्ष’ ही प्रस्तुत करने की सुविधा है और दूसरे पक्ष को दृश्य से बाहर रखा जा सकने की सुविधा है। वैसे संतुलन महत्त्वपूर्ण अवयव है परन्तु यह भी महत्त्वपूर्ण है कि रचनात्मक द्वंद्व के बीच भी किसी भी रचनाकार को आखिर अपना एक पक्ष चुनना ही होता है। कहा जा सकता है कि कला रचना, मध्यमवर्गी संतुलन से उत्कर्ष पर नहीं पहुँचती। कहानीकार की कहानी, कलाकार की कला की ऊँचाई, तटस्थता में नहीं तलाशनी चाहिए। दीपंकर के पक्ष को वीणा की तरफ से जितना जाना जा सकता था, वो एक सहज, सहानुभूति का लाभ वीणा को देता है इस दृष्टि से कहानी, एक स्त्री के उत्सर्ग की शानदार अभिव्यक्ति बन कर प्रस्तुत होती है। कहानी आरम्भ में जहाँ दो कलाकारों के अहम् के साथ पुरुष और स्त्री अहम् के संघर्ष की कहानी की तरह विकसित होती है वहीं एक स्तर पर अन्त तक पहुंचते हुए विवाह जैसी संस्था पर एक गंभीर टिप्पणी का रूप लेती है। यद्धपि कहानी एक बडे ‘पुरुष’ कलाकार द्वारा खुद के लिये सीमाओं को तोड कर उत्साह में कुछ गहराइयों में उतरते-गिरते जाने और दुनिया की न*ारों में महान बनते जाने की कहानी की तरह प्रस्तुत की गयी है। फिर भी यहाँ यह कह दिया जाना *ारूरी लगता है कि भले ही यह कहानी स्त्री के उत्सर्ग को उभार कर सामने रखने को लिखी गयी हो, परन्तु पुरुष के पक्ष और मनोविज्ञान की एकतरफा अनदेखी से कहानी में और तनाव जो आ सकता था, जहाँ कहानी और अधिक विश्वसनीय बन सकती थी वह, कहीं लेखक के हाथ से फिसलती है। कहानी में मनुष्य मन की उलझन और रहस्यात्मकता को थोडा और करीब से पकड पाने की एक बची रह गयी कोशिश ने कहानी को एकपक्षीय और एक पुरुष के अधःपतन की चटपटी कहानी बना दिया है। भले ही सम्यक तटस्थता की *ाद कहानीकार से यहाँ न भी की जाय तब भी कहानी में इस हद तक एकपक्षीय टिप्पणी भी कहानी के व*ान को थोडा तो कम ही करती है।
‘मानपत्र’ के अंतिम हिस्से में वीणा और दीपंकर के जीवन के बहाने विवाह संस्था पर एक तीखी टिप्पणी के साथ कहानीकार ने अपनी कहानी का अन्त या कहें कि उत्स निर्धारित किया है। कहानी में ‘पुनश्च’ की तरह से आने वाले इस हिस्से को कहानीकार का शिल्प माना जाना चाहिए जहाँ कहानीकार का चुनाव है कि वह इस प्रसंग को विमर्श के केन्द्र में रखने की दृष्टि से अधिक महत्त्व के साथ यहाँ रेखांकित करता है। यदि ‘कला’ के बहाने से विवाह संस्था और देह विमर्श पर टिप्पणी की तरह से देखा जाय, तो यह थोडा आश्चर्यजनक लगता है। यदि कहानी को विवाह की व्यर्थता और देह के लिये सजगता पर कला की इस आक्रोशित और व्यंग्यात्मक टिप्पणी पर ही आ कर संपन्न होना था तो यह कहानी के अन्त का शायद सही निर्वाह नहीं है। दो कलाकारों के जीवन संघर्षों और कला विमर्शों से, जीवन में एक दूसरे के लिये *ारूरतों, संवेदनाओं और सहानुभूतियों के आग्रह से एका-एक हट कर कहानी को सीधे ‘देह ही ठोस सत्य है’ पर ले आना कहीं न कहीं कहानी को रिड्यू*ा करने जैसा लगता है। क्या यही स्त्री विमर्श है जो कहानी का अभीष्ट था? क्या इस अन्त के साथ कहानी को बाजार की न*ार में स्त्री-पुरुष और उससे भी आगे, दो कलाकारों के उलझे हुए मनोविज्ञान की कहानी को जिसमें एक हिस्सा देह भी है, उसे केवल स्त्री की आ*ाादी की कहानी बना देना ही लेखक का लक्ष्य होना था? एक आ*ााद स्त्री! बाजार के बनाये स्त्री चित्र की आ*ााद ‘कला’! आश्चर्य है कि यह ‘कला’ कहानी के आरम्भ से अन्त के ठीक पहले तक दृश्य में कहीं भी नहीं है और वह जब कहानी के अन्त के लिये कहानी में आती है तो वह अस्वाभाविक सी लगती हुई वीणा के आरोपों की पुष्टि के लिये खडी होती एक और चरित्र मात्र लगती है, *ारूरी नहीं है कि कला के जीवन के विस्तार हमें दिये जाने थे, यह भी अस्वाभाविक नहीं है कि कला अपनी माँ के जीवन भर के कुंठित स्वर को नयी पीढी के युवा की तरह अकुंठ स्वर दे परन्तु यहाँ कला का उस परिवार का हिस्सा होते हुए इस सारे परिदृश्य को समेटते हुए इस आक्रामक ढंग से ‘निर्णायक’ की मुद्रा में फैसला देते हुए आगे बढना कि ‘बुर्जियां, मेहराबें, अटारियाँ, कंगूरे ही नहीं किले की एक-एक ईंट, एक-एक पत्थर ध्वस्त हो चुका था और उसकी जगह उभर कर आया था, वह क्या था!’ वह क्या था? दरअस्ल वह कहानी के आरम्भ से एक प्रेमी, पति, पिता और कलाकार पुरुष पर एक-एक कर दर्ज आरोपों पर फैसले जैसा कुछ था। जिरह कहीं नहीं थी, कुछ आरोप थे, कुछ दृश्य थे, कुछ स्थितियाँ थीं और एक फैसला था। वीणा को ‘...पता नहीं क्यों, इन बर्बादियों के बावजूद (मुझे) अपनी कला पर ना*ा आ रहा था।’ कहानी इसी ना*ा पर समाप्त होती है, इसके ठीक पहले जब कि बुर्जियाँ, मेहराबें और किले की ईंटें गिर रही थीं तब कलाकार की स्थिति उसकी परिणति पर द्वितीय पुरुष कथन की तरह वीणा मानपत्र में दर्ज करती है ‘तुम काँपे और लडखडा कर गिर पडे।’ गिर पडने के साथ वीणा ने फूलों से निकलती ध्वनियाँ सुनीं और जलती हुई ध्वनियाँ देखीं। कहानी में कलाकार के लिये ‘मानपत्र’ यहाँ पूरा हुआ। हालांकि जैसा कि मैं पहले भी कहता रहा हूँ, यह एक स्त्री के उत्सर्ग की कथा है, उसके लिये सहानुभूति की कथा है पर संतुलन और विश्लेषण से एकदम इनकार ने इसे कहीं न कहीं एक कुंठा की कहानी बना दिया है। एक स्त्री के तनाव और कुंठा के कारणों की तह में जाने की कोशिश करती इस कहानी में एक पुरुष और एक कलाकार की एक स्त्री, पत्नी और कलाकार के प्रति उपेक्षा यद्यपि कहानी में पूरी शिद्दत से आती है और उस के बरक्स खडा एक कलाकार पुरुष जिसे सुविधा के आधार पर शुरुआती कुछ हिस्सों में तो दर्ज किया गया है पर बाद में उसे संवाद नहीं दिया जाना कहानी के शिल्प पक्ष की तरह चुना गया है वह कहानी के अन्त में लडखडा कर गिर पडता है, यह कहानी का एक स्त्री के अहम् की संतुष्टि का अभीष्ट अन्त है और शायद इसे जीवन के शाश्वत की तरह भी प्रस्तुत किया जाना अतिरेक नहीं। ऊपर चढने के बाद कुछ लोग स्वाभाविक ढंग से उतरते हैं और कुछ लोग लडखडा कर गिरते हैं। यह कहानी एक कलाकार के बनने और चढने की फिर उसके खुद गिरने और उसे गिराने से बनती है। भले ही संगीत में बागेश्वरी में पंचम वर्जित हो पर यहां बागेश्वरी में वर्जित पंचम के वितान से ही पूरी कहानी बनती है।