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रामधारी सिंह दिनकर : राष्ट्रकवि या राष्ट्रीय कवि

शैलेन्द्र चौहान
यह अकारण नहीं कि हिन्दी के सुविख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर अल्लामा इकबाल और रवींद्रनाथ टैगोर को अपना प्रेरणा स्रोत मानते थे। उन्होंने टैगोर की रचनाओं का बांग्ला से हिंदी में अनुवाद किया। दिनकर के पिता एक साधारण किसान थे और दिनकर दो वर्ष के थे, जब उनका देहावसान हो गया। परिणामतः दिनकर और उनके भाई-बहनों का पालन-पोषण उनकी विधवा माता ने किया। दिनकर का बचपन और कैशोर्य देहात में बीता, जहाँ दूर तक फैले खेतों की हरियाली, बांसों के झुरमुट, आमों के बगीचे और कांस के विस्तार थे। प्रकृति की इस सुषमा का प्रभाव दिनकर के मन में बस गया, पर शायद इसीलिए वास्तविक जीवन की कठोरताओं का भी अधिक गहरा प्रभाव पडा। संस्कृत के एक पंडित के पास अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्रारंभ करते हुए दिनकर जी ने गाँव के प्राथमिक विद्यालय से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की एवं निकटवर्ती बोरो नामक ग्राम में राष्ट्रीय मिडल स्कूल, जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था के विरोध में खोला गया था, में प्रवेश प्राप्त किया। यहीं से इनके मनो-मस्तिष्क में राष्ट्रीयता की भावना का विकास होने लगा। हाई स्कूल की शिक्षा इन्होंने मोकामाघाट हाई स्कूल से प्राप्त की। इस बीच इनका विवाह भी हो चुका था तथा ये एक पुत्र के पिता बन चुके थे। 1928 में मैट्रिक के बाद दिनकर ने पटना विश्वविद्यालय से 1932 में इतिहास में बी.ए.ऑनर्स किया। सन् 1930 में गांधी जी के ‘नमक सत्याग्रह’ में सक्रिय भागीदारी भी की किन्तु अपने पारिवारिक जीवन के दायित्वों के कारण बी.ए. करने के लिए अपनी पढाई जारी रखनी पडी। एक निर्धन किसान परिवार की आर्थिक व प्राकृतिक परेशानियों से जूझते हुए बी.ए. पास करने के बाद उन्होंने 55/-रुपये मासिक पर एक स्कूल में हैडमास्टर की नौकरी शुरू की, किन्तु एक *ामींदार द्वारा संचालित इस स्कूल में अंग्रे*ायत का बोलबाला और साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के रहते उसे छोड कर उन्होंने 1934 में सब रजिस्ट्रार की नौकरी हासिल की और 1943 तक इस पद पर रहे। यहाँ भी उनकी देशप्रेम युक्त रचनाओं के कारण तत्कालीन अंग्रे*ाी सरकार की नारा*ागी सहनी पडी और पाँच वर्षों में बाईस बार स्थानान्तरण हुआ जिसका लाभ उन्होंने स्थानान्तरण के कारण मिली छुट्टियों में अधिकाधिक कविताएं लिख कर उठाया। ‘रेणुका’ और ‘हुंकार’ कृतियाँ इसी समय की देन हैं। इस घुटे माहौल में कई बार नौकरी छोडनी चाही किन्तु उनकी पारिवारिक स्थिति से परिचित श्री जयप्रकाश नारायण ने हर बार उन्हें रोका। फिर उन्होंने कई बार सोचा कि सरकार ही उन्हें निकाल दे किन्तु ऐसा भी नहीं हुआ। राष्ट्रीयता उनकी रग-रग में रची बसी थी। उनकी कविताओं में मातृभूमि की सौंधी गंध और धरती पुत्रों की करुण वेदना का मार्मिक मिश्रण उनके सच्चे देशभक्त होने की सार्थकता को सिद्ध करता है। कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के काव्य संसार में हृदय को छू लेने वाली ऐसी रचनाएँ भी हैं जो न केवल देश के यशोगान को दर्शाती हैं अपितु भारतीय समाज का एक व्यापक परिदृश्य उकेर कर भारतीय संस्कृति के सुखद-दुखद दोनों पक्षों से आत्मीय स्तर पर जुड कर पाठक का भी उनसे सीधा सम्बन्ध स्थापित कर उसे देशप्रेम के लिए उद्वेलित करती हैं। हिन्दी साहित्य में श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का प्रादुर्भाव तब हुआ जब छायावाद ढलान पर था। बीसवीं सदी का दशक, सन् 1928-29 का समय। पराधीन देश को जीवन, जागरण, प्रेरणा और अदम्य संघर्ष-शक्ति की जरूरत थी। लिहाजा साहित्य में यह काल सुकोमल, अमूर्त या वायवीय विषय-वस्तुओं पर रचना का नहीं, स्वाधीनता का भाव जगाने वाली, पराधीनता, शोषण-उत्पीडन और उपनिवेशवाद के विरोध में मुखर होकर अपनी बात कहने वाली रचना का था, पर यह सब इतना आसान नहीं था। वैचारिक सूत्रों को व्यक्त करने वाली भाषा-शैली भी चाहिये थी और दिल में गुलामी से लडने की आग, तभी मुक्ति के स्वर का बिगुल फूँकना संभव था। सामने की दुनिया से असंतुष्ट होकर हमारे अधिकांश कवि रोमांसवाद की पलायनवादी प्रेरणाओं से एकात्म हो रहे थे। वे या तो दुर्दिन से दुःखी होकर अंतर्मुखी हो जाना चाहते थे या फिर सृजन-सुख की तलाश में मुर्दा इतिहास में वापस लौट जाना चाहते थे। इस कठिन समय में आधुनिक हिन्दी कविता को एक ऐसे कवि की जरूरत थी जो ओजमयी, ऋजु भाषा-शिल्प में जन-गण के मन को मथकर उनमें स्वतंत्रता का भाव भर सके, दासता की नींद में ऊँघती लोक-चेतना को जगाकर उसे करने-मरने को उद्वेलित कर सके। जिसका श्रेय तत्कालीन साहित्य में मुख्य रूप से कवि दिनकर जी को जाता है, जिनकी सशक्त लेखनी ने अपनी तेजोमय आह्वान-शक्ति से जनता को ललकार कर विद्रोही स्वर में पराधीन भारत के मुक्ति के गीत गाये। उनकी रचना यात्रा ‘रामनरेश त्रिपाठी’ की ‘पथिक’ से प्रभावित होकर ‘मेघनाथ-वध’ नामक रचना से शुरू तो हुई किन्तु इसे वे पूरा न कर पाए, अधूरा ही छोड दिया। 1928 में ‘प्रण भंग’ उनकी पहली प्रकाशित रचना मानी जाती है जो अब अप्राप्य है। ‘द्वन्द्वगीत’ में 1932 से 39 तक के पद हैं, 1941 से 46 तक की कविताएं ‘सामधेनी’ में संकलित हैं। ‘बापू’ चार खण्डों की लम्बी कविता का प्रकाशन 1947 में हुआ जिसे बाद में 1948 में उनकी हत्या के बाद 31 बन्धों में व्यक्त किया। ‘इतिहास के आंसू’ 1952 में प्रकाशित है जिसमें ‘मगध महिमा’ पद्य नाटिका है। ‘धूप और धुआं’ 1953 में आई जिसमें स्वतन्त्रता की आशामयी धूप और उसके पश्चात् का धुआं उनकी ‘नई आवा*ा’ से नये स्वरों की अभिव्यक्ति है। ‘दिल्ली’ 1956 में चार कविताओं का संग्रह है। ‘नीम के पत्ते’ 1956 में व्यंग्य व वक्रोक्तिपूर्ण कविताएं हैं। ‘नील कुसुम’ प्रयोगवादी काव्य 1954 में प्रकाशित हुआ तथा ‘नए सुभाषित’ 1957 में, ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ 1963 में चीन आक्रमण के बाद प्रकाशित हुई, ‘कोयला और कवित्व’ 1964 में तभी ‘मृति-तिलक’ उनकी मुक्तक व अनूदित रचनाओं के संग्रह प्रकाशित हुए। उनके प्रबन्ध काव्य में ‘कुरुक्षेत्र’ 1946 में, ‘रश्मिरथी’ 1951 में, ‘उर्वशी’ 1961 में प्रकाशित हुए। उनकी सभी रचनाएँ विविधतापूर्ण हैं जिनमें उनकी काव्य यात्रा के विभिन्न पडाव, भावभंगिमाएं और विभिन्न सामाजिक चेतनाएं उभर कर आई हैं। ‘दिनकर’ के काव्य-भाव एक कर्मठ और जीवन संघर्षों से जूझते अथक व्यक्तित्व की अमोल कहानी कहते हैं जिस कहानी को यदि भारतीय संस्कृति की सही पहचान करवाने का व्यापक दस्तावेज कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
द्वितीय महायुद्ध में उनका स्थानान्तरण युद्ध प्रचार विभाग में कर दिया जहाँ के अन्तर्द्वन्द्व की देन ‘सामधेनी’ की कई पंक्तियों में प्रकट हुई है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद उन्हें प्रचार विभाग का डिप्टी-डायरेक्टर बना दिया गया किन्तु नौकरी से ऊबे हुए दिनकर जी ने 1950 में इस्तीफा दे दिया। पटना विश्वविद्यालय से बी.ए. ऑनर्स करने के बाद अगले ही वर्ष एक स्कूल में यह प्रधानाध्यापक नियुक्त हुए, पर 1934 में बिहार सरकार के अधीन इन्होंने सब-रजिस्ट्रार का पद स्वीकार कर लिया। लगभग नौ वर्षों तक वह इस पद पर रहे और उनका समूचा कार्यकाल बिहार के देहातों में बीता तथा जीवन का जो पीडित रूप उन्होंने बचपन से देखा था, उसका और तीखा रूप उनके मन को मथ गया। फिर तो ज्वार उमडा और रेणुका, हुंकार, रसवंती और द्वंद्वगीत रचे गए। रेणुका और हुंकार की कुछ रचनाएँ यहाँ-वहाँ प्रकाश में आईं और अंग्रे*ा प्रशासकों को समझते देर न लगी कि वे एक गलत आदमी को अपने तंत्र का अंग बना बैठे हैं और दिनकर की फाइल तैयार होने लगी। बात-बात पर कैफियत तलब होती और चेतावनियाँ मिला करतीं। चार वर्ष में बाईस बार उनका तबादला किया गया। उनकी कविताओं में छायावादी युग का प्रभाव होने के कारण श्ाृंगार के भी प्रमाण मिलते हैं। दिनकर के प्रथम तीन काव्य-संग्रह प्रमुख हैं- ‘रेणुका’ (1935 ई.), ‘हुंकार’ (1938 ई.) और ‘रसवन्ती’ (1939 ई.) उनके आरम्भिक आत्म मंथन के युग की रचनाएँ हैं। इनमें दिनकर का कवि अपने व्यक्तिपरक, सौन्दर्यान्वेषी मन और सामाजिक चेतना से उत्तम बुद्धि के परस्पर संघर्ष का तटस्थ द्रष्टा नहीं, दोनों के बीच से कोई राह निकालने की चेष्टा में संलग्न साधक के रूप में मिलता है।
उनके कविता संग्रह ‘रेणुका’ में अतीत के गौरव के प्रति कवि का सहज आदर और आकर्षण परिलक्षित होता है। पर साथ ही वर्तमान परिवेश की नीरसता से त्रस्त मन की वेदना का परिचय भी मिलता है। हुंकार में कवि अतीत के गौरव-गान की अपेक्षा वर्तमान दैत्य के प्रति आक्रोश प्रदर्शन की ओर अधिक उन्मुख जान पडता है। रसवन्ती में कवि की सौन्दर्यान्वेषी वृत्ति काव्यमयी हो जाती है पर यह अन्धेरे में ध्येय सौन्दर्य का अन्वेषण नहीं, उजाले में ज्ञेय सौन्दर्य का आराधन है। सामधेनी (1947 ई.) में दिनकर की सामाजिक चेतना स्वदेश और परिचित परिवेश की परिधि से बढकर विश्व वेदना का अनुभव करती जान पडती है। 1955 में ‘नील कुसुम’ दिनकर के काव्य में एक मोड बनकर आया। यहाँ वह काव्यात्मक प्रयोगशीलता के प्रति आस्थावान है। स्वयं प्रयोगशील कवियों को अजमाल पहनाने और राह पर फूल बिछाने की आकांक्षा उसे विह्वल कर देती है। नवीनतम काव्यधारा से सम्बन्ध स्थापित करने की कवि की इच्छा तो स्पष्ट हो जाती है, पर उसका कृतित्व साथ देता नहीं जान पडता है। अभी तक उनका काव्य आवेश का काव्य था, नील कुसुम ने नियंत्रण और गहराइयों में पैठने की प्रवृत्ति की सूचना दी। 6 वर्ष बाद उर्वशी प्रकाशित हुई, हिन्दी साहित्य संसार में एक ओर उसकी कटु आलोचना और दूसरी ओर मुक्तकंठ से प्रशंसा हुई। धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हुई। इस काव्य-नाटक को दिनकर की ‘कवि-प्रतिभा का चमत्कार’ माना गया। कवि ने इस वैदिक मिथक के माध्यम से देवता व मनुष्य, स्वर्ग व पृथ्वी, अप्सरा व लक्ष्मी और अध्यात्म के संबंधों का अद्भुत विश्लेषण किया। कवि के स्वर का ओज नये वेग से नये शिखर तक पहुँच जाता है। इन मुक्तक काव्य संग्रहों के अतिरिक्त दिनकर ने अनेक प्रबन्ध काव्यों की रचना भी की है, जिनमें ‘कुरुक्षेत्र’ (1946 ई.), ‘रश्मिरथी’ (1952 ई.) तथा ‘उर्वशी’ (1961 ई.) प्रमुख हैं। ‘कुरुक्षेत्र’ में महाभारत के शान्ति पर्व के मूल कथानक का ढाँचा लेकर दिनकर ने युद्ध और शान्ति के विशद, गम्भीर और महत्त्वपूर्ण विषय पर अपने विचार भीष्म और युधिष्ठिर के संलाप के रूप में प्रस्तुत किये हैं। दिनकर के काव्य में विचार तत्त्व इस तरह उभरकर सामने पहले कभी नहीं आया था। ‘कुरुक्षेत्र’ के बाद उनके नवीनतम काव्य ‘उर्वशी’ में फिर हमें विचार तत्त्व की प्रधानता मिलती है। साहसपूर्वक गाँधीवादी अहिंसा की आलोचना करने वाले ‘कुरुक्षेत्र’ का हिन्दी जगत् में यथेष्ट आदर हुआ। ‘उर्वशी’ जिसे कवि ने स्वयं ‘कामाध्याय’ की उपाधि प्रदान की है- ‘दिनकर’ की कविता को एक नये शिखर पर पहुँचा दिया है। भले ही सर्वोच्च शिखर न हो, दिनकर के कृतित्व की गिरिश्रेणी का एक सर्वथा नवीन शिखर तो है ही।
1955 में नील कुसुम दिनकर के काव्य में एक मोड बनकर आया। यहाँ वह काव्यात्मक प्रयोगशीलता के प्रति आस्थावान है। स्वयं प्रयोगशील कवियों को अजमाल पहनाने और राह पर फूल बिछाने की आकांक्षा उसे विह्वल कर देती है। नवीनतम काव्यधारा से सम्बन्ध स्थापित करने की कवि की इच्छा तो स्पष्ट हो जाती है, पर उसका कृतित्व साथ देता नहीं जान पडता है। अभी तक उनका काव्य आवेश का काव्य था, नील कुसुम ने नियंत्रण और गहराइयों में पैठने की प्रवृत्ति की सूचना दी। छह वर्ष बाद ‘उर्वशी’ प्रकाशित हुई, हिन्दी साहित्य संसार में एक ओर उसकी कटु आलोचना और दूसरी ओर मुक्तकंठ से प्रशंसा हुई। धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हुई इस काव्य-नाटक को दिनकर की ‘कवि-प्रतिभा का चमत्कार’ माना गया। कवि ने इस वैदिक मिथक के माध्यम से देवता व मनुष्य, स्वर्ग व पृथ्वी, अप्सरा व लक्ष्मी अग्र काम अध्यात्म के संबंधों का अद्भुत विश्लेषण किया है।
‘रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ,
जाने दे उनको स्वर्ग धीर पर फिरा हमें गांडीव गदा,
लौटा दे अर्जुन भीम वीर- (हिमालय से)
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो
- (कुरुक्षेत्र से)
मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये।
- (रश्मिरथी से)’
साम्प्रदायिक एकता, राष्टीयता, जातीय सद्भावना उन्हें अपने उस परिवेश से मिली जहाँ बारो गाँव में हिन्दू-मुस्लिम छात्र एक राष्ट्रीय पाठशाला में हिन्दी-उर्दू इकट्ठे पढते थे। यहीं से दिनकर को कविता के प्रति रुचि पैदा हुई। कवि का जीवन दर्शन ही प्रायः उनके काव्य में झलकता है। सामान्य जन के प्रति विशेष रुझान तथा देश की विषम स्थितियों के प्रति सदा जागरूक रहना कवि की अपने जीवनगत परिस्थितियों की देन है। इसके विषय में उन्होंने स्वयं गोपालकृष्ण कौल से एक भेंटवार्ता में स्पष्ट किया, ‘मैं न तो सुख में जन्मा था, न सुख में पल कर बढा हूँ। किन्तु मुझे साहित्य का काम करना है, यह विश्वास मेरे भीतर छुटपन से ही पैदा हो गया था इसलिए ग्रेजुऐट होकर जब मैं परिवार में रोटी अर्जित करने में लग गया जब भी, साहित्य की साधना मेरी चलती रही।’ (दिनकर सृष्टि और दृष्टि; पृ.17)
आरम्भ में दिनकर की युवा जोश-भरी रचनाएँ ‘युवक’ पत्र, जिसे रामवृक्ष बेनीपुरी जी निकालते थे, में ‘अमिताभ’ नाम से प्रकाशित हुई। चमक-दमक से दूर एक साधारण वेश-भूषा और सादा जीवन जीने वाले रामधारी सिंह एक मेधावी छात्र, देशप्रेम से ओत-प्रोत व तत्कालीन स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी सक्रिय भूमिका अंकित करने के उत्कट इच्छुक थे। ‘दिनकर’ हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। बिहार प्रान्त के बेगुसराय जिले का सिमरिया घाट उनकी जन्मस्थली है। उन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढाई पटना विश्वविद्यालय से की। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। ‘दिनकर’ स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्ाृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तियों का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है। उर्वशी को भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार जबकि कुरुक्षेत्र को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74वाँ स्थान दिया गया। दिनकर जी की प्रायः 50 कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं। हिन्दी काव्य छायावाद का प्रतिलोम है, यह कहना तो शायद उचित नहीं होगा पर इसमें सन्देह नहीं कि हिन्दी काव्य जगत् पर छाये छायावादी कुहासे को काटने वाली शक्तियों में दिनकर की प्रवाहमयी, ओजस्विनी कविता के स्थान का विशिष्ट महत्त्व है। दिनकर छायावादोत्तर काल के कवि हैं, अतःछायावाद की उपलब्धियाँ उन्हें विरासत में मिलीं पर उनके काव्योत्कर्ष का काल छायावाद की रंगभरी सन्ध्या का समय था। कविता के भाव छायावाद के उत्तरकाल के निष्प्रभ शोभादीपों से सजे-सजाये कक्ष से ऊब चुके थे, बाहर की मुक्त वायु और प्राकृतिक प्रकाश और चाहते ताप का संस्पर्श थे। वे छायावाद के कल्पनाजन्य निर्विकार मानव के खोखलेपन से परिचित हो चुके थे, उस पार की दुनिया के अलभ्य सौन्दर्य का यथेष्ट स्वप्न दर्शन कर चुके थे, चमचमाते प्रदेश में संवेदना की मरीचिका के पीछे दौडते थक चुके थे, उस लाक्षणिक और अस्वाभाविक भाषा शैली से उनका जी भर चुका था, जो उन्हें बार-बार अर्थ की गहराइयों की झलक सी दिखाकर छल चुकी थी। उन्हें अपेक्षा थी भाषा में द्विवेदी युगीन स्पष्टता की, पर उसकी शुष्कता की नहीं, व्यक्ति और परिवेश के वास्तविक संस्पर्श की, सहजता और शक्ति की। ‘बच्चन’ की कविता में उन्हें व्यक्ति का संस्पर्श मिला, दिनकर के काव्य में उन्हें जीवन समाज और परिचित परिवेश का संस्पर्श मिला। दिनकर का समाज व्यक्तियों का समूह था, केवल एक राजनीतिक तथ्य नहीं था। आरम्भ में दिनकर ने छायावादी रंग में कुछ कविताएँ लिखीं, पर जैसे-जैसे वे अपने स्वर से स्वयं परिचित होते गये, अपनी काव्यानुभूति पर ही अपनी कविता को आधारित करने का आत्मविश्वास उनमें बढता गया, वैसे ही वैसे उनकी कविता छायावाद के प्रभाव से मुक्ति पाती गयी पर छायावाद से उन्हें जो कुछ विरासत में मिला था, जिसे वे मनोनुकूल पाकर अपना चुके थे, वह तो उनका हो ही गया। उनकी काव्यधारा जिन दो कुलों के बीच में प्रवाहित हुई, उनमें से एक छायावाद था। भूमि का ढलान दूसरे कुल की ओर था, पर धारा को आगे बढाने में दोनों का अस्तित्व अपेक्षित और अनिवार्य था। दिनकर अपने को द्विवेदी युगीन और छायावादी काव्य पद्धतियों का वारिस मानते थे। उन्हीं के शब्दों में ‘पन्त के सपने हमारे हाथ में आकर उतने वायवीय नहीं रहे, जितने कि वे छायावादकाल में थे’, किन्तु द्विवेदी युगीन अभिव्यक्ति की शुभ्रता हम लोगों के पास आते-जाते कुछ रंगीन अवश्य हो गयी। अभिव्यक्ति की स्वच्छन्दता की नयी विरासत हमें आप से आप प्राप्त हो गयी। दिनकर ने अपने कृतित्व के विषय में एकाधिक स्थानों पर विचार किया है। सम्भवतःहिन्दी का कोई कवि अपने ही कवि कर्म के विषय में दिनकर से अधिक चिन्तन व आलोचना न करता होगा। वह दिनकर की आत्मरति का नहीं, अपने कवि कर्म के प्रति उनके दायित्व के बोध का प्रमाण है कि वे समय-समय पर इस प्रकार आत्म परीक्षण करते रहे। इसी कारण अधिकतर अपने बारे में जो कहते थे, वह सही होता था। उनकी कविता प्रायः छायावाद की अपेक्षा द्विवेदी युगीन स्पष्टता, प्रसाद गुण के प्रति आस्था और मोह, अतीत के प्रति आदर प्रदर्शन की प्रवृत्ति, अनेक बिन्दुओं पर दिनकर की कविता द्विवेदी युगीन काव्यधारा का आधुनिक ओजस्वी, प्रगतिशील संस्करण जान पडती है। उनका स्वर भले ही सर्वदा, सर्वथा ‘हुंकार’ न बन पाता हो, ‘गुंजन’ तो कभी भी नहीं बनता। राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ ने हिंदी साहित्य में न सिर्फ वीररस के काव्य को एक नयी ऊंचाई दी, बल्कि अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का भी सृजन किया। इसकी एक मिसाल 70 के दशक में संपूर्ण क्रांति के दौर में मिलती है। दिल्ली के रामलीला मैदान में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने हजारों लोगों के समक्ष दिनकर की पंक्ति ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ का उद्घोष करके तत्कालीन सरकार के खिलाफ विद्रोह का शंखनाद किया था। दिनकर ने गुलाम भारत और आजाद भारत दोनों में अपनी कविताओं के जरीये क्रांतिकारी विचारों को विस्तार दिया। आजादी के समय और चीन के हमले के समय दिनकर ने अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों के बीच राष्ट्रीय चेतना को बढाया। उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की। एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का ताना-बाना दिया। उनकी महान रचनाओं में रश्मिरथी और परशुराम की प्रतीक्षा शामिल है। आलोचक खगेन्द्र ठाकुर के अनुसार दिनकर राष्ट्रीय भावधारा के प्रमुख कवि हैं। इस प्रसंग में ध्यान देने की बात यह कि राष्ट्रीय भाव धारा में कई अंतर्धाराएँ हैं, जैसे राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम की कई धाराएँ हैं। सभी धाराओं में समानता एक बात में है कि वे सभी ब्रिटिश सत्ता से भारत को मुक्त करने के पक्ष में हैं। सभी स्वतंत्रता के पक्ष में हैं, लेकिन अंग्रेजों से लडने के तरीकों के बारे में, स्वतंत्रता के स्वरूप के बारे में, स्वतंत्र भारत की व्यवस्था के बारे में उनमें तीखा मतभेद है। यह मतभेद राजनीति में ही नहीं साहित्य में भी स्पष्टतः प्रतिबिंबित होता रहा है। यों तो समस्त आधुनिक साहित्य का संबंध राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम से है, राष्ट्रीय कविता, स्वच्छंदतावादी कविता, छायावादी कविता, प्रगतिशील कविता इन सबका संबंध किसी न किसी तरह स्वाधीनता संग्राम की चेतना से जोडा जा रहा है, लेकिन राष्ट्रीय कविता से जो खास या रूढ अर्थ लिया जाता रहा है, वह यही है कि प्रत्यक्षतः स्वाधीनता संग्राम को विषय बना कर लिखी गई कविता राष्ट्रीय कविता है। इस राष्ट्रीय कविता में भी मैथिलीशरण गुप्त, माखन लाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी, सुभद्रा कुमारी चौहान और रामधारी सिंह दिनकर, सबकी अपनी अलग विशेषताएँ हैं और उनमें पारस्परिक फर्क भी है। दिनकर की भावनात्मक विशिष्टता को समझने के लिए इस फर्क पर गौर करना जरूरी है।
‘उर्वशी’ को छोडकर दिनकर की अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत हैं। भूषण के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमती है। ‘उर्वशी’ स्वर्ग परित्यक्ता एक अप्सरा की कहानी है। वहीं, कुरुक्षेत्र, महाभारत के शान्ति-पर्व का कविता-रूप है। यह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लिखी गयी रचना है। वहीं सामधेनी की रचना कवि के सामाजिक चिन्तन के अनुरूप हुई है। संस्कृति के चार अध्याय में दिनकरजी ने कहा कि सांस्कृतिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक देश है। क्योंकि सारी विविधताओं के बाद भी, हमारी सोच एक जैसी है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार दिनकर गैर-हिंदीभाषियों के बीच हिन्दी के सभी कवियों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थे और अपनी मातृभाषा से प्रेम करने वालों के प्रतीक थे। हरिवंश राय बच्चन के अनुसार दिनकर को एक नहीं, बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिन्दी-सेवा के लिये अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने चाहिये। रामवृक्ष बेनीपुरी ने कहा है कि दिनकर ने देश में क्रान्तिकारी आन्दोलन को स्वर दिया। नामवर सिंह के अनुसार दिनकरजी अपने युग के सचमुच सूर्य थे। राजेन्द्र यादव कहते हैं कि दिनकर की रचनाओं ने उन्हें बहुत प्रेरित किया। प्रसिद्ध रचनाकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि दिनकर राष्ट्रवादी और साम्राज्य-विरोधी कवि थे। सुशील कुमार कहते हैं कि ‘द्वंद्व दिनकर के काव्य-जीवन के पग-पग में घटित है। या कहें कि उनकी भावना और चिंतन का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं है। यह द्वंद्व उनकी रचना में भावों का गुंफन पैदा करता है, विषय-वस्तु के प्रत्येक क्षेत्र मंह भरमाता है और बेचैन करता है। दिनकर का कवि इस गंभीर संकट से जूझता है, उबरता है जिसमें उनकी काव्य-साधना उसकी चुनौतियों को स्वीकार करती है और फिर उसका समाधान भी प्रस्तुत करती है। उनका ‘कुरुक्षेत्र’ द्वंद्व की (1946) एक सर्वाधिक समर्थ अभिव्यक्ति है जो युद्ध और शांति, हिंसा और अहिंसा, प्रवृति और निवृत्ति की जीवन-शैली तथा विज्ञान और आत्मज्ञान की परिणति में निहित है। उसके पूर्व ‘द्वंद्व-गीत’ (1940) नाम से ही स्पष्ट है। ‘उर्वशी’ (1961) तो अप्सरा और लक्ष्मी, संशययुक्त मानव और संशयरहित देवता एवं काम और अध्यात्म के द्वंद्वों की अप्रतिम गाथा है।’
1947 में देश स्वाधीन हुआ और वह बिहार विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष नियुक्त होकर मु*ाफ्फरपुर पहुँचे। 1952 में जब भारत की प्रथम संसद का निर्माण हुआ, तो उन्हें राज्यसभा का सदस्य चुना गया और वह दिल्ली आ गए। दिनकर 12 वर्ष तक संसद-सदस्य रहे, बाद में उन्हें सन् 1964 से 1965 ई. तक भागलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। लेकिन अगले ही वर्ष भारत सरकार ने उन्हें 1965 से 1971 ई. तक अपना हिन्दी सलाहकार नियुक्त किया और वह फिर दिल्ली लौट आए। दिनकर का पहला काव्यसंग्रह ‘विजय संदेश’ वर्ष 1928 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद उन्होंने कई रचनाएं की। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं ‘परशुराम की प्रतीक्षा’, ‘हुंकार’ और ‘उर्वशी’ हैं। उन्हें वर्ष 1959 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। पद्मभूषण से सम्मानित दिनकर राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वर्ष 1972 में उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान भी दिया गया। रामधारी सिंह दिनकर एक ओजस्वी राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत कवि के रूप में जाने जाते थे। दिनकरजी को उनकी रचना कुरुक्षेत्र के लिये काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार से सम्मान मिला। संस्कृति के चार अध्याय के लिये उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें 1959 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। भागलपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने उन्हें डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। गुरु महाविद्यालय ने उन्हें विद्या वाचस्पति के लिये चुना। 1968 में राजस्थान विद्यापीठ ने उन्हें साहित्य-चूडामणि से सम्मानित किया। वर्ष 1972 में काव्य रचना उर्वशी के लिये उन्हें ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया। 1952 में वे राज्यसभा के लिए चुने गये और लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे।
24 अप्रैल, 1974 को उनका देहावसान हो गया। दिनकर ने अपनी ज्यादातर रचनाएं ‘वीर रस’ में कीं। भूषण के बाद दिनकर ही एकमात्र ऐसे कवि रहे, जिन्होंने वीर रस का खूब इस्तेमाल किया। वह एक ऐसा दौर था, जब लोगों के भीतर राष्ट्रभक्ति की भावना जोरों पर थी। दिनकर ने उसी भावना को अपनी कविता के माध्यम से आगे बढाया। वह जनकवि थे इसीलिए उन्हें राष्ट्रकवि भी कहा गया।’ देश की आजादी की लडाई में भी दिनकर ने अपना योगदान दिया। वह बापू के बडे मुरीद थे। हिंदी साहित्य के बडे नाम दिनकर उर्दू, संस्कृत, मैथिली और अंग्रेजी भाषा के भी जानकार थे। वर्ष 1999 में उनके नाम से भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया।